
सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?


प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
ज़्यादातर लोग बाहर जी-तोड़ मेहनत करते हैं। लेकिन उनकी भीतरी दुनिया खाली, खोखली, कुछ नहीं, क्योंकि वो सारी मेहनत भीतर के केन्द्र को बदलने के लिए नहीं की गई होती है। वो जो आप बाहर खूब सारी मेहनत करके खूब सारे पैसे कमा रहे हैं, वो सिर्फ़ इसलिए कमा रहे हैं, क्योंकि आप अपनी आन्तरिक असुरक्षा को बचाए रखना चाहते हैं। आप भीतरी तौर पर एक डरे हुए आदमी हैं, इसीलिए बाहरी तौर पर आप बहुत मेहनत करते हैं। तो करते रहो बाहर कितनी भी मेहनत, आन्तरिक प्रगति कुछ नहीं होगी।

प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…

तुम्हारी समस्या यह नहीं है कि तुम्हें सही और गलत का ज्ञान नहीं है, बल्कि यह है कि सही राह सामने होने पर भी तुम उस पर दो कदम बढ़ाने का साहस नहीं करते। तुम्हें केवल अंतिम मंज़िल की उत्सुकता होती है, और आलस तुम पर हावी रहता है। जो सही और उचित प्रतीत होता है, वहां तक होशपूर्वक चलो और उसके प्रति निष्ठा रखो। जैसे-जैसे आगे बढ़ोगे, राह स्वयं खुलती जाएगी।