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पुरानी परम्पराएँ: मान लें या त्याग दें? || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी रुड़की में (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: जय-हिन्द आचार्य जी। मेरा प्रश्न यह है कि हम जीवन में हाँ और ना के बीच उलझे रहते हैं। हमारे बीच एक जंग छिड़ी रहती है कि हाँ बोलें कि ना बोलें। मैं एक प्रसंग आपको बताना चाहूँगा। हमारे यहाँ पर हवन-पूजन की परंपरा चलती है, तो हम कलावा बाँधते हैं।

घर वालों की सुनते हैं कि आप बाँध लीजिए। लेकिन हमारा मन नहीं करता, हम उसे मानते नहीं है, तो कभी-कभी हम उसे ना भी बोल देते हैं कि नहीं हमें नहीं बाँधना है; परन्तु घर वालों का दिल रखने के लिए हम मान लेते हैं। तो क्या हमें हाँ बोलना चाहिए उनका मन रखने के लिए या नो मीन्स नो (नहीं मतलब नहीं) ही होना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: जैसे वो बाँधना चाह रहें हैं उसको तो स्पष्ट ना है। लेकिन जो परंपरा है उसको तो ना बोलने से पहले हम सवाल पूछना चाहेंगे कुछ कि ये थी ही क्यों। आप जैसे बँधवाना चाह रहें हैं उसको ना है, क्योंकि आप बिना बताए बाँधना चाह रहे हैं। न आप ख़ुद जानते हैं और न आप हमें बता रहे हैं और किसी अंधी प्रक्रिया में शामिल होना हमें स्वीकार नहीं है, बात ख़तम।

जैसे आप चल रहें हैं, ऐसे तो हमें ना ही बोलना पड़ेगा। लेकिन हम ना बोल रहें हैं आपके तौर-तरीक़े को; सारी जो परम्पराएँ हैं हमारी उनको हम आदि से अंत तक ना नहीं बोल रहें हैं। अगर हम ये जान सकें, समझ सकें कि उस परंपरा के पीछे क्या है, उसमें निहित प्रतीकों का अर्थ क्या है और वो बात हमको उपयोगी लगे तो हम हाँ बोलेंगे, फिर बोलेंगे। साथ-ही-साथ ये भी हो सकता है कि जब हम जिज्ञासा करें तो हमें पता चले कि नहीं, वो बात पूरी अर्थहीन है, खोखली, रूढ़ी है, बाहर-बाहर से उसमें कुछ कर्म है, पाखंड है, भीतर उसके कोई प्राण, आत्मा है ही नहीं; तो फिर उसका पालन करने की कोई बात ही नहीं उठती।

बात आ रही है समझ में?

मैं नहीं चाहता कि आप जो दो बातें कह रहें हैं, उसमें से किसी एक को भी पकड़ लें। हाँ, कहने का अर्थ होगा कि जो पुरानी सी एक सड़ी हुई यात्रा चली आ रही है; हम भी उसमें सम्मलित हो गये, वो यात्रा किसकी है? वो यात्रा डर की है और अज्ञान की है — कुछ है जो बस करते चलो, न तो जानो कि वो क्यों कर रहे हो और प्रश्न भी पूछोगे तो ये मर्यादा का उल्लंघन और बे-अदबी कहलाएगा। यही चलता है न?

पहली बात तो घर-परिवार, समाज में ये सब कुछ जो हो रहा होता है, परम्पराओं के नाम पर; कोई नहीं जानता कि ये क्या है, क्यों है, इस से लाभ क्या है? नहीं जानते, कोई बात नहीं, न जानने में कोई अपराध नहीं हो गया। इंसान हैं भाई! सब चीज़ पता नहीं हो सकती। हमें नहीं पता है, तो हम पूछ रहें हैं कि बता दो; दिक्क़त यहाँ शुरू होती है। किसी ने पूछ लिया कि बता दो तो भड़कते हैं, बुरा मानते हैं, ‘इसको तो ना बोलनी ही पड़ेगी।’

तो जब मैं कह रहा हूँ हाँ, ‘ना बोलो’, तो मैं ना कह रहा हूँ। ये जो हठ पकड़कर अज्ञान बैठा है, इसको ना बोलो। न जानतें हैं, माने अज्ञान है। न जानने देंगे, माने हठ है। ये जो हठी अंधापन है, इसको ना कहनी ही पड़ेगी। कहनी पड़ेगी न? या चलने दें इसको? कि जो चल रहा है, चलने दो। चल रहा है, चलने दो। ये तो एक क़बीलाइ रवायत जैसी बात हो गयी।

पुराने क़बीलों में ये सब चलता है। जो न कुछ जान पाएँ हैं, न समझ पाएँ हैं, न प्रगति कर पाएँ हैं, वहाँ रहता है ये कि आज से चार हज़ार साल पहले भी उस पहाड़ के शिखर पर एक पत्थर रखा है, हम उसकी पूजा करते हैं और मानतें है कि उसमें हमारे पितरों की आत्माएँ निवास करतीं हैं। हम आज भी वही कर रहें हैं और हम पर जब कोई आपदा आती है, महामारी फैल जाती है, कुछ होता है, तो हम जाकर उस पत्थर से सवाल करा करतें हैं और फिर हम लौटते वक़्त उस पत्थर पर धागा बाँध देतें हैं — ये चल रहा है चार हज़ार साल से। तुम इसका पालन करो सिर्फ़ इसलिए कि ये चल रहा है चार हज़ार साल से — ऐसे तो नहीं मानेंगे।

इपिस्टमोलॉजी (ज्ञानमीमांसा) होती है दर्शनशास्त्र में, जो निर्धारित करती है कि कौन से प्रमाण स्वीकार्य हैं, किन सोर्सेस ऑफ़ नॉलेज (ज्ञान के स्त्रोतों) को वैलिड (वैध) माना जाएगा। नाउ ट्रडिशन इज़ नॉट अ वैलिड सोर्स ऑफ़ नॉलेज (अब परंपरा ज्ञान का वैध स्त्रोत नहीं है), ये बात अच्छे से समझ लीजिए। सिर्फ़ इसलिए कि कोई बात परंपरागत है, वो स्वीकार्य नहीं हो जाती। साथ-ही-साथ सिर्फ़ इसलिए कि कोई बात परंपरागत है, वो अस्वीकार्य भी नहीं हो जाती — हम तो पूछेंगे।

और बहुत सारी परम्पराएँ हैं, जिनमें हो सकता है कि गूढ़ और सुन्दर अर्थ निहित हों। मिल गये ऐसे अर्थ तो ऐसी परंपरा के सामने तत्काल सिर झुका देंगे। नहीं मिले ऐसे अर्थ, तो माफ़ करिएगा, हम इसमें शामिल नहीं हो सकते, बस इतनी सी बात है। पूछने से ये और संभावित है कि विचार करो, जानो और हो सकता है अर्थ रहा हो। अर्थ था, तुम्हें पता नहीं था, इसीलिए अँधा अनुकरण कर रहे थे, पूछा इसलिए अर्थ पता चल गया। जब अर्थ पता चल जाएगा न तो फिर अपनी परंपरा में भी विश्वास और गौरव दोनों पैदा होता है।

आज स्थिति यह है कि जो परंपरा का पालन नहीं करते, वो परंपराओं को निकृष्ट समझते हैं, बोलते हैं, 'बेकार की चीज़ है, हटाओ!’ परंपरावादियों को वो गाली ही दे देंगे। और जो परंपराओं का पालन करतें हैं, उसके मन में भी कहीं-न-कहीं ये चोर रहता है कि पालन तो कर रहें हैं, है क्या पता नहीं। मंत्रोच्चारण तो कर रहें है, लेकिन मन्त्र का अर्थ क्या है, पता नहीं, तो कहीं कोई पूछ न ले। तो फिर आज का बच्चा या जवान आकार पूछ लेता है, तो चिढ़ भी जाते हैं, कुपित हो जातें है कि क्यों पूछ लिया।

अगर उनको अर्थ पता होता तो क्या वो कुपित होते? आपको अर्थ पता है — कोई सवाल करे आपसे — आपके लिए ये प्रसन्नता की बात होती है न? आप कहते हैं, 'अच्छा हुआ बच्चे, तूने पूछा, आ मैं तुझे बता दूँ। आजा, बैठ आराम से, हम तुम्हें बताएँगे इसका अर्थ।' लेकिन वो कुछ नहीं जानते। न जानने से बड़ा अपराध कोई नहीं होता। होता है, न जानना, न जानने की इच्छा रखना। न जानने की माफ़ी होती है; जानने की इच्छा भी न रखने की कोई माफ़ी नहीं होती।

आदमी और जानवर में यही अंतर है — जानवर अपनी प्राकृतिक वृत्तियों का अँधा पालन करता रहता है जीवन भर — उसे नहीं जानना। वो कौन है? वो क्यों आया है? उसे घास क्यों चाहिए? उसे माँस क्यों चाहिए? वो पेड़ पर क्यों कूद रहा है? वो मादा के पीछे क्यों भाग रहा है? वो फ़लाने से डरता क्यों है? वो फ़लाने मौसम में छिप क्यों जाता है? हाइबर्नैशन (शीतनिद्रा) क्यों करने लगता है? जानवर को मतलब ही नहीं है ये सब जानने से।

किसी जानवर से आप पूछिए, 'तेरे जीवन का अद्देश्य क्या है?' वो कहेगा, 'घास कहाँ है?' कहेगा, ‘उद्देश्य हटाओ, घास बताओ।’ इंसान की पहचान है जिज्ञासा, क्योंकि इंसान अकेला है जिसे अपने अँधेरों से और अज्ञान से मुक्ती चाहिए। कोई पशु अज्ञान से मुक्ति नहीं माँगता। पशु आता ही है पाश से। पाश माने जो बँधा हुआ है आज्ञान से और आज्ञान से छूटना भी नहीं चाहता उसको कहते हैं, ‘पाशबद्ध।’ वहाँ से आता है पशु। वो बँधा है और बँधे रहने में ही मौज में है।

कई बार आपने देखा है, जानवरों के पट्टा डला होता है, वो अपने खूँटे से बँधे हैं, उसके बाद भी मस्त बैठे हैं। जैसे घर का कुत्ता हो गया या गाय-भैंस हो गयी। आप उनके चहरे पर कोई शिकवा-शिकन देखते हैं? कोई समस्या? कुछ नहीं। खाने को मिल रहा है न, खाना बढ़िया था। ज़्यादातर इंसान भी — बदकिस्मती की बात है — ऐसे ही हो गये हैं, खाना दे दो बस।

पशु मुँह से खाता है, हम सारी इन्द्रियों से खाते हैं, हमारे पास एक मन भी है खाने के लिए, उसका पेट कभी भरता ही नहीं। हम कहते हैं, 'बस खाने को मिल जाए, हमें आगे जानना नहीं है।' जो जानना नहीं चाहता, उस से बद्तर जानवर नहीं है दूसरा। ऐसे से बचना जो सवालों से घबराता हो। ऐसे से बचना जिसको जब समझाओ तो पीठ दिखा के भागे। मिलें हैं न ऐसे लोग?

उनके साथ व्यर्थ की बातें करो, वो साथ रहेंगे; उनके साथ कोई ढंग की बात करो या जो कुछ चल रहा है उस पर प्रश्न करो, वो भाग लेंगे। कहेंगे, ‘क्या! बेकार में दिमाग का दही कर रहे हो, ऊबा और रहे हो। चलो अभी जा रहे हैं, अच्छा-खासा मूड था सवाल-ववाल करके ख़राब और कर दिया’ — ये पशु हैं। चलो, थोड़ा सम्मान कर देते हैं, ये नर पशु है, ऐसों के साथ नहीं रहना है!

अपना दोस्त उसको मानना जो तुम्हारे मन में तब भी सवाल जगा दे जब सवाल था ही नहीं। तुम्हें लग रहा था, सब पता है, सब ठीक है, बढ़िया, जमा हुआ है है सब सेटल्ड और उसने खोद-खोद के वहाँ भी सवाल निकाल दिये जहाँ तुमको लगता था कि निर्णीत है मामला — वो दोस्त है तुम्हारा। हालाँकि, उस से समस्या आएगी, क्योंकि जब हमें लगता है कि हम जानते हैं तो एक तरह की शांति रहती है भीतर — सब पता है, सब पता है।

कई बार जाते हो एग्ज़ाम (परीक्षा) देने, तो होता है कि नहीं? ‘पूरी तैयारी है।’ फिर होता क्या है? मस्त सो गये थे, बारह ही बजे रात में सो गये थे। बाक़ी सब कर रहे थे, हमें तो सब पता है, सो गये थे और नंबर आये बिलो एवरेज (औसत से कम)। इससे अच्छा ये नहीं होता कि कोई रात में आकर के जगा के दो चार सवाल पूछ लेता और तुमसे वो सवाल नहीं बनते, बेहतर होता न? हालाँकि, जब वो सवाल पूछता तो तुमको चिढ़ लगती, तुम कहते, 'सब मुझे पता है, ये आकर के मुझसे कह रहा है, ये बताओ, ये बताओ।' लेकिन फ़ायदा हो जाता, अगले दिन इतने कम नंबर नहीं लाते तुम। होता है कि नहीं होता है?

मुझे आज तक बहुत कम लोग मिले हैं जो अपनी जे इ रैंक को लेकर दुखी न हों। कोई मिलता ही नहीं है ऐसा जो कहे — कम-से-कम मेरे बैच में तो ऐसा ही था, सबको यही लगता था — टॉप हन्ड्रेड (शीर्ष सौ) में आनी थी, ये नीचे गिर कैसे गयी? ‘ज़रूर कुछ ग़लती हुई है। या तो इवेल्यूएशन (मूल्यांकन) ग़लत हुआ है या आई सिम्पली हैड अ बैड डे (मेरा बस एक दिन बुरा था), कुछ ऐसा हुआ है।

हम अपने बारे में धोखे में रहते हैं। उन धोखों से मुक्त होने का एक ही तरीक़ा है, क्या? जाँचों-परखो, सवाल करो, उसको अपनी आदत बना लो, उसमें आनंद आने लग जाता है। अपनी ही ग़लतियों को ढूँढ-ढूँढ के निकालो, अपने ही चोर को पकड़ो। जहाँ लग रहा हो, मज़बूती पूरी है, वहाँ कमज़ोरी खोज निकालो, मज़बूत होने का यही तरीक़ा है।

झूठी मज़बूती को तोड़ दो, तब असली मज़बूती आती है। झूठे आश्वासन को, श्योरनेस (यक़ीन) को कॉन्फिडेंस को, आत्मविश्वास को तोड़ दो; फिर अपने प्रति सच्चा विश्वास आता है। झूठे में जीना एक तरह की राहत दे देता है, सस्ती ख़ुशी दे देता है, दूर तक नहीं जाता लेकिन।

समझ में आ रही है बात।

तो सारी परम्पराओं को सिरे से नकार देने कि सलाह मैं नहीं दे रहा हूँ, लेकिन ये भी समझ लो कि बहुत सारी परम्पराएँ बस संयोग से शुरू होतीं हैं एक पीढ़ी में, और अगली पीढ़ी में परंपरा बन जाती है। एक पीढ़ी का संयोग, अगली पीढ़ी की परंपरा; एक गाँव का संयोग, दूसरे गाँव की परंपरा बन जाता है। और कई बार तो एक पीढ़ी का पाखंड, अगली पीढ़ी की परंपरा बन जाता है और दो पीढ़ियों तक चल गया, तो फिर प्राचीन कहलाता है। ‘हमारी प्राचीन परंपरा है, इसका उल्लंघन कैसे हो सकता है?’

अरे! उसका तो नाम बता दो जिसने शुरू करी थी और उसके क्या था खोपड़े में? क्या सोचकर ये हरकत करी है? और हम हाथ जोड़ के निवेदन करते हैं कि अगर कोई अच्छी बात है इस परंपरा के पीछे तो हम अवश्य उसका पालन करेंगे। भाई, अच्छाई के साथ कौन नहीं होना चाहता! हम भी अच्छाई के साथ होना चाहेगे, लेकिन कोई अच्छाई दिखा तो दो। हम आतुर हैं अच्छाई पाने के लिए, दिखाओ, कहाँ है अच्छाई।

बात आ रही है समझ में?

लेकिन ये जो सवालिया रवैया है, ये जीवन में आप सिर्फ़ बाहरी परम्पराओं के प्रति नहीं रख सकते। ये आपको जीवन में सबसे पहले अपने और अपने मानसिक ढर्रों, माने मानसिक परंपराओं के लिए रखना पड़ेगा। जो स्वयं पर सवाल नहीं उठाता, वो दूसरों पर सवाल और उँगली उठाए, ये शोभा नहीं देती बात।

आपने अपनी-अपनी तो कुछ परंपरा बना रखी है और मानसिक आपकी परंपरा कुछ भी हो सकती है, उदाहरण के लिए — कोई धारणा पकड़ रखी है, आपके जो भीतरी विश्वास हैं, वो भी तो आपकी परंपरा ही हैं न? कि ऐसा तो करना ही होता है, उसपर आप सवाल करने को राज़ी नहीं हैं। और पिताजी ने बोल दिया आपको कि तिलक लगा लो, कि चंदन कर लो, कि कोई और परंपरा बता दी, आप वहाँ लड़ भिड़े, तो ये पाखंड हो गया कि नहीं हो गया? अब पाखंडी पिताजी को बोलें कि आपको बोलें?

पिताजी की परंपरा को आप तोड़ने को पूरा तैयार हो और अपनी जो परंपरा चल रही है, उसको नहीं। क्यों नहीं परंपरा होतीं? होतीं हैं, बहुत सारी होतीं है। उदाहरण के लिए — पढ़ाई की जाती है, नौकरी के लिए, पैसे के लिए, इज़्ज़त के लिए, शादी-ब्याह के लिए, ये एक परंपरा नहीं है क्या?

मैं कैम्पसिज़ में जाता था तो पूछता था, कुछ कम्पनियाँ ऐसी होतीं हैं, वो आतीं हैं और एक के बाद एक पिछले तीस सालों की परंपरा होती है कि अगर एक हज़ार लोगों का बैच है तो उसमें छ: सौ लोग *अप्लाई*करते हैं, ये परंपरा नहीं है क्या? हर साल एक निश्चित तारीख़ पर उस कम्पनी को आना है — त्यौहार की तरह — परंपरा हो गयी? जैसे— त्यौहार आता है, वैसे ही वो कम्पनी आती है प्लेसमेंट ऑफिस में, आ गयी परंपरा की तरह, उसके बाद जैसे सब त्यौहार मनाते हैं, नाचते हैं, गाते हैं; वैसे ही पूरा बैच नाचता है, गाता है, त्यौहार मनाता है, ठीक? जितने हैं, सब उसी में अप्लाई कर रहें है।

ऐसा कैसे हो सकता है कि एक हज़ार लोगों का सपना एक ही है। और तुम बात करते हो इंडिविजुअलिटी (व्यक्तित्व) की और इस पर कोई सवाल उठाने को तैयार नहीं हो। पिताजी को कहोगे दकियानूसी और हम मॉडर्न (आधुनिक) हो गये, क्योंकि हम टेक्नोलॉजी (तकनीकी) पढ़ रहें हैं।

पर अंधविश्वास हर तरह के होतें हैं। आधुनिक नहीं हो सकते क्या अंधविश्वास? बोलो। पाखंड भी क्या अल्ट्रा मॉडर्न (अत्यंत आधुनिक) नहीं हो सकता? बोलो। हो सकता है न?

और उसके बाद जैसे चलता है अभी भी, कुछ पिछड़ी जगहों पर कि सब लोग अपने घर का दरवाज़ा खोल दो और रात में लक्ष्मी जी आएँगी — चोर आते हैं काफ़ी उसमें — तो सब लोग अपने-अपने द्वार-दरवाज़े खोल देतें हैं स्वागत में, क्या? कि ऑफर लेटर (प्रस्ताव पत्र) आएगा। पर चोर भी हर घर में नहीं आता, तो इसी तरह दो-चार के घर में ऑफ़र लेटर आ जाता है चोर बनकर। बाक़ी कहते हैं, ‘अब हम आगे प्रतीक्षा करेंगे, अभी जो भी मिल रहा है ले लो, एक साल बाद जम्प (कूद) मारेंगे’ — जो भो है जम्प मारना।

ये सब क्या आधुनिक अंधविशवास नहीं है? इन परंपराओं पर कौन चोट करेगा?

‘मैं अट्ठाईस का हो रहा हूँ, अब तो शादी करनी ही है न।’ क्यों? फ़रमान आया है? किस ग्रन्थ में लिखा है? आकाशवाणी हुई है? क्या है ये? क्यों? इन परंपराओं पर हम बात क्यों नहीं करेंगे? आप अपने आप से पूछिएगा, कितने ही काम हैं जो आप करे ही जा रहे हैं बिना जाने कि क्यों कर रहे हैं?

इज़ दैट नॉट मकेनाइज़ेशन ऑफ़ कॉन्शसनेस ?(क्या यह चेतना का यंत्रीकरण नहीं हैं?) आपने चेतना को क्या बना दिया? मशीन। मशीन कुछ नहीं जानती; कर रही है, पर करती ख़ूब है। मशीन लगातार करती रहती है, उसे कुछ पता है, क्या कर कर रही है?

ये दोनों हैं (माइक की ओर इंगित करते हुए) कुछ जानते हैं, क्या सुन रहे हैं? और वैसे ही अगर हम भी सुन रहे हों तो? कोई फ़ायदा अगर समझा नहीं?

समस्या बस ये है कि जो कोई सवाल कर रहा होगा, उसके पास आप इसको ले जाते हो, ये ख़ुद कभी कोई सवाल नहीं करता, सबसे बड़ी समस्या यह है। मशीन बनने पर यही होता है, आप दूसरों के काम आते हो; अपने काम नहीं आते। ऐसी ज़िन्दगी जीनी है? (दोहराते हैं) ऐसी ज़िदंगी जीनी है?

तो सवाल करना सीखो, जानो, पूछो। मुक्ति के लिए दूसरा नाम बोध है। टू नो इज़ टू बी लिबरेटेड (जानना ही मुक्त होना है)।

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