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कठिन परिस्थितियों में ज्ञान काम क्यों नहीं आता? || (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बताया तो बहुत गया है कि विषम परिस्थितियों में भी व्यवहार कैसा करें पर जब वैसी विपरीत या विषम परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तब सारा ज्ञान हिरा जाता है (खो जाता है) और आदमी अपना आपा खो बैठता है।

आचार्य प्रशांत: वह तो होगा ही, ज्ञान से थोड़े ही कुछ होता है, साधना करनी पड़ती है न। साधना करनी पड़ती है। ज्ञान साधना का विकल्प नहीं हो सकता, ज्ञान साधना में सहायक हो सकता है। ज्ञान मिल गया, अब साधना करो।

कोई भी परिस्थिति सामने आ करके तुमको कंपित इसीलिए कर देती है क्योंकि तुमने उस परिस्थिति से कोई स्वार्थ जोड़ रखा होता है। परिस्थिति से स्वार्थ जोड़ लिया, परिधि से स्वार्थ जोड़ लिया और वो स्वार्थ पूरा होगा नहीं, किसी का आज तक हुआ नहीं। जब होता नहीं है तो तुम पर गाज गिरती है, एकदम डर जाते हो कि यह क्या हो गया।

सोच रहे हो कि सवेरा होगा तो आसमान से फल गिरेंगे, कुछ भी सोच सकता है आदमी। सवेरा हुआ, फल तो गिरे नहीं, पत्थर बरस गए तो बुरा तो लगेगा न, लगेगा न? परिस्थितियों को अगर परिस्थिति ही रहने दो तो बाहर कितने भी आँधी-तूफान चल रहे हों, भीतर कोई बवंडर नहीं उठेगा। तुम परिस्थितियों को आंतरिक स्थिति बना लेते हो। तुम बाहर के मामले को भीतर बैठा लेते हो। बाहर अगर कुछ दिख गया उत्तेजक, तो तुमको लगता है कि वह भीतर की अपूर्णता भर देगा। बाहर अगर आ गया कुछ कठिन, तो तुमको लगता है कि वह भीतर कुछ तोड़ देगा। और बाहर अगर आ गया कुछ अनुकूल, तो तुम्हें लगता है वह भीतर कुछ जोड़ देगा।

शब्द ही कितना मुखर है, खुलासा कर देता है - 'पर-स्थिति', बाहर की हालत। बताने वालों ने सब बता दिया; बाहर की हालत। अरे! बाहर की हालत को बाहर की हालत रहने दो न! बाहर मौसम बदलते रहें, भीतर बस आकाश रहे।

मज़ेदार रहेगा न। यहाँ तो तुमने अपना हाल कुछ ऐसा कर रखा है कि बाहर की हर घटना की गूँज तुम्हारे भीतर सुनाई देती है। रसोई में प्याला चटका नहीं कि तुम्हारा दिल चटक जाता है। शेयर बाज़ार गिरा नहीं कि तुम गिर जाते हो। गोरी ने कंगन खनकाए नहीं, कि तुम खनक जाते हो। बाहर की चीज़ बाहर रहने कहाँ देते हो! कितने तो सुंदर शब्द दे गए देने वाले — अलभ्य, अचिंत्य, अकल्प, अगोचर, अगम, अडिग, अकंप।

कुछ है भीतर तुम्हारे जो कभी काँपता ना हो? तो किसको वो कह गए थे अकंप? यूँ ही? कुछ तो बात रही होगी न? और वह जो अकंप है चूँकि वो अकंप है इसीलिए वो हट तो सकता नहीं, हटेगा तो कंपन होगा, तो होगा वो तुम्हारे भी भीतर। तुमने उससे नाता तोड़ लिया, भीतर वह जो बैठा है, जो सर्वथा, सर्वदा अप्रभावित ही रहता है, निर्विशेष, निर्विकार, ना उठता है, ना गिरता है, ना बढ़ता है, ना घटता है, ना पास का है, ना दूर का है, उसकी तुमने कुछ कद्र करी नहीं। उसको तो तुमने यूँ ही मान लिया, दो कौड़ी का। अब कहते हो कि हवा बाहर चलती है, पत्ते भीतर झड़ते हैं, तो ये तो होगा ही न।

कहाँ है वो तुम्हारे पास जिसको उपनिषद कह गए कि मन से आगे, वाणी से परे? यह तो छोड़ो कि जिसे छू सकते हैं, वो ऐसा कि जिसकी बात नहीं की जा सकती। वो हो तो तुम्हें कुछ सहारा रहे। और वो क्यों नहीं है? 'क्यों नहीं' माने तुम्हारे लिए नहीं है, है तो है ही, पर तुम्हारे लिए नहीं है। जब लोग कहते हैं कि 'मैं आत्मा का अनुसंधान कर रहा हूँ', तो माने ये थोड़े ही कि आत्मा खो गई है। आत्मा तो है ही, आत्मा नहीं तो फिर और क्या है? तुम्हारे लिए नहीं रही, तुम कहीं और पहुँच गए, वह तो है ही। क्यों खो गई है तुम्हारे लिए? क्योंकि तुम कहीं और पहुँच गए हो। कहाँ पहुँच गए हो तुम? अब यह तुम बताओ न मुझको कि कहाँ पहुँच गए हो, किन चीज़ों से नाता जोड़ रखा है, क्या तुम्हारे दिमाग में घूमता रहता है, कहाँ घर बसा लिया है?

पचास ऐसी चीज़ों के साथ तादात्म्य कर लिया है, जो सब आवत-जावत हैं, उठती-गिरती हैं, उन्हीं के साथ तुमने अपना नाम जोड़ लिया, उन्हीं को जीवन बना बैठे और अब कह रहे हो कि भीतर भूचाल आ जाता है अगर सामने से बकरी भी गुज़र जाए तो। हल्की चीज़ों से नाता जोड़ोगे तो बहुत उठा-पटक रहेगी जीवन में। समझ में आ रही है बात?

चलो तुम्हें तुम्हारी भाषा में समझाए देता हूँ। तुम बैठो मारुति आठ-सौ में, कितना उसका वज़न? हल्के-से-हल्का, और तुम बैठो किसी भारी-भरकम एस.यू.वी. में, गड्ढे कब पता चलते हैं? हल्की चीज़ पर बैठोगे तो बाहर के गड्ढे तुम्हारे झटके बन जाएँगे। हल्की चीज़ पर मत बैठना। और पीछे आ जाओ, उसी सड़क पर चलो तुम साइकिल से, तो गड्ढा तो छोड़ दो, छोटी-से-छोटी ऊँचाई-नीचाई भी तुम अपने पिछवाड़े अनुभव करोगे। करते हो कि नहीं? हल्की चीज़ पर मत बैठना, हल्के से नाता मत जोड़ना। भारी से नाता जोड़ो।

भारत में भारी के लिए बड़ा सुंदर शब्द दिया गया है — गुरु। इसीलिए कहा, गुरुत्वाकर्षण। भार को कहा गुरुता, जहाँ भार है, जहाँ वज़न है, वहीं गुरु है। समझ में आ रही है बात? पृथ्वी में सबसे ज़्यादा वज़न है बाकी सब वस्तुओं की तुलना में, तो सब वस्तुएँ पृथ्वी की ओर खिंचती हैं। नहीं तो जानते हो गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत क्या है? वह ये थोड़े ही कहता है कि पृथ्वी सब चीज़ों को अपनी ओर खींचेगी, वो तो कहता है कि अगर दो वस्तुएँ हैं तो दोनों एक-दूसरे को खीचेंगी। तुमने तो लेकिन आज तक ऐसा देखा नहीं कि ऊपर पतंग थी तो पृथ्वी उठकर के पतंग तक चली गई हो। न्यूटन ने भी यही देखा कि सेब ज़मीन को आया, यह तो देखा ही नहीं कि ज़मीन उठकर के सेब तक गई थी। क्यों? क्योंकि जो भारी है, वह हिलता नहीं। जो भारी है वो हिलेगा नहीं। भारी का सहारा लो, हल्के का नहीं।

भारी का सहारा लो, कुछ ऐसा जो अडिग रह जाए, अचल बिलकुल। सब हिल गया, वो नहीं हिला। भौतिकी की ही दुनिया से एक और उदाहरण ले लो — ये जो अर्थिंग करते हो, ये क्या चीज़ होती है? अब किसी हल्की इमारत को करंट पिला दोगे तो इमारत ही जल बैठे, पर तुम बड़े-से-बड़ा विद्युत प्रवाह पृथ्वी को पिला देते हो, वो पी जाती है, उसे कोई अंतर ही नहीं पड़ता। तुम्हारे पास कुछ है ही नहीं ऐसा जिसे कोई अंतर ना पड़ता हो, जिसे कोई फ़र्क ना पड़ता हो। पृथ्वी को तुम इतना करंट पिला देते हो, मोटी विद्युत धारा तुम ने पिला दी पृथ्वी को, उसे कोई फ़र्क पड़ता है? तुम कहते हो, अर्थिंग कर दी, बात ख़त्म, वो पी गई। तुम्हारे पास कुछ ऐसा है ही नहीं जो पी जाए।

आसमान से जब बिजली गिरती है, उस बिजली के विरुद्ध रक्षा करने के लिए ऊँची इमारतें क्या व्यवस्था करती हैं? एक विद्युत चालक लगाया जाता है, जानते हो वो क्या करता है? वो इमारत से थोड़ा ऊपर होता है, और चूँकि वो चालक है, कंडक्टर है तो विद्युत सीधे उसी को पकड़ती है और वो उसको ले जाता है कहाँ सीधे? ज़मीन के नीचे तक और गाड़ देता है। क्यों गाड़ देता है? क्योंकि ज़मीन को फ़र्क ही नहीं पड़ता। इमारतें भी वही मजबूत होती हैं जो ज़मीन में बहुत गहरे तक गड़ी होती हैं। भूकंप आते हैं तो सतह-सतह पर जो चीज़ें हैं, वो सब गिर जाती हैं पर जो इमारत गहरी गड़ी हुई है, भारी का सहारा ले रखा है, उसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता।

गहरे गड़े रहो, फ़र्क नहीं पड़ेगा। सतह पर हो, उछाल दिए जाओगे, फेंक दिए जाओगे, कहीं के नहीं रहोगे। हवा चलती है, तो लहरें उठती हैं। कहाँ उठती है लहरें सागर में? सतह पर। गहराई में कहाँ कोई लहर उठती है! सतह पर रहोगे, फेंक दिए जाओगे। गहराई में उतर जाओगे, ‘बाल न बाँका कर सके जो जग बैरी होय’।

सतह पर मृत्यु है, गहराई में अमृत है।

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