तुम वो जो बाहरी को बाहरी जाने || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कोई भी अपने विचार हमपर थोप देता है, उसी विचार को हम फिर अपना बना लेते हैं और उसी के अनुसार जीने लगते हैं। दूसरों के विचारों को अपने ऊपर आने से कैसे रोकें?
आचार्य प्रशांत: क्या ये सवाल भी दूसरों ने कहा है पूछने को?
प्र १: नहीं सर, ख़ुद का है।
आचार्य: सवाल अपना है न? जब दूसरों ने ये सवाल तुमको नहीं दिया तो फिर ये सवाल कहाँ से आ गया?
प्र १: सर, दूसरों के विचारों से निकलकर।
आचार्य: बस जो बोला है सीधे-सीधे उसको पकड़ो और उसी का उत्तर दो। जब दूसरों ने तुम्हें ये सवाल नहीं दिया तो फिर ये सवाल कहाँ से आ गया? इस सवाल का स्रोत क्या है? है न कुछ? कुछ है न? जो दूसरों के दिये हुए को देख सकता है और उसको साफ़-साफ़ समझ सकता है, कुछ है न ऐसा कि नहीं है?
प्र १: है।
आचार्य:



