कोई ये न समझे कि ऋभु गीता सिर्फ़ काटती है। वो काटती नहीं है, वो सत्य को प्रतिस्थापित करती है। उसका काम यही भर नहीं है कि भ्रम को हटा दे। भ्रम का हटना और सत्य का चमकना एक ही घटना है, एक साथ घटती है। आप ये नहीं कह पायेंगे कि बादल छँट गये, चमकता सूर्य अभी भी नहीं दिख रहा, कैसे होगा ये? कैसे होगा? ‘सर्वं नास्ति’ कहने की परिणति है ये कह पाना कि ‘सर्वं ब्राह्म'। बादलों के छँटने और सूरज के आलोकित होने में न दूरी है, न अन्तर है, न समय है, एक साथ है और बादलों का छँटना किसी महत्व का नहीं, अगर उनके पीछे से? (श्रोतागण उत्तर देते हैं) सूरज चमके न। तो फिर क्यों कहा—‘सर्वं नास्ति'? फिर ये जानने का महात्म्य क्या रह गया? फिर कहाँ आनन्द है? ज्ञान फ़लीभूत होता है उस अज्ञेय के प्रति श्रद्धा में, जिसे ब्रह्म कहते हैं। समझिएगा बात को। ज्ञान आपको अज्ञेय के द्वार पर ले जाकर खड़ा कर देता है, अगर वास्तव में ज्ञान है। अज्ञेय के द्वार पर खड़ा करता है आपको ज्ञान। और उस मन्दिर में भीतर घुसते हैं आप, सर झुकाकर के, श्रद्धा में। उसी अज्ञेय का नाम है, ब्रह्म। नेति-नेति, नेति-नेति करके आप उस मन्दिर की सीढ़ियों तक तो पहुँच जायेंगे, द्वार तक तो पहुँच जायेंगे पर मन्दिर में प्रवेश नहीं पायेंगे क्योंकि प्रवेश पाने के लिए उसी सिर को झुकना पड़ेगा जिस सिर ने नेति-नेति करी। जिस बुद्धि ने, जिस चैतन्य ने, जिस चिन्मयता ने आपको उस मन्दिर तक पहुँचाया, उसी को समर्पित होना पड़ेगा तभी ‘सर्वं नास्ति' ‘सर्वं ब्रह्म' बनेगा अन्यथा आप सर्वं ‘नास्ति' पर अटक कर रह जायेंगे। और अगर आप ‘सर्वं नास्ति' पर अटक कर रह गये, तो जीवन बड़ा रुखा, बड़ा बोझिल हो जाएगा। आप जियेंगे कैसे? कैसे जियेंगे?