प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। ज्ञान के सम्बन्ध में कुछ सूत्र हैं; ‘ज्ञानं बन्धः’ – ज्ञान बंधन है। तो इस पर बहुत विचार किया था तो पता चला कि जो जानते हैं हम उसकी वजह से ही दुख में हैं। तो फिर बात ये उठी कि यहाँ पर भी तो हम कुछ जानने के लिए ही आए हैं और वो सहायक है, फ़ायदा हो रहा है। तो क्या सभी ज्ञान बंधन है?
फिर आगे एक और सूत्र मिला; ‘ज्ञानं जाग्रतः’ – ज्ञान जागृति है। फिर आगे और मिला; ‘ज्ञानं अन्नं’ – ज्ञान अन्न है। और इसी से सम्बन्धित एक और है; ‘विद्या’ शब्द उपयोग हुआ है, इंग्लिश में ‘नॉलेज’ बोला है कि ‘विद्यासंहारे तदुत्थस्वप्नदर्शनम्’ व्हेन नॉलेज इज़ डिस्ट्रॉयड, द ड्रीम इज़ सीन (जब ज्ञान का नाश होता है तो स्वप्न के दर्शन होते हैं)।
तो ज्ञान, विद्या – कौन कब सहायक है ये सब?
आचार्य प्रशांत: ‘ज्ञानं बन्धः’ ऐसा कहते हैं शिव सूत्र। उसको तुम समझना कि ज्ञानी ही बंधन है। ज्ञान किसको है? ज्ञान किसके लिए है? जो ज्ञानी बन गया हो, जो ज्ञान से अपना नाता जोड़ ले, नाम जोड़ ले, अपनी पहचान जोड़ ले, जो कहे कि मुझे परिभाषित करता है मेरा ज्ञान। मैं कौन हूँ? वो मेरे ज्ञान से निर्धारित हो रहा है। मैं कौन हूँ? वो जिसके पास ज्ञान है – ये ज्ञानी अब बंधन में है।
ज्ञान तो बेचारा अपनेआप में दुर्बल है, पंगु है, अचेतन है, क्या कर लेगा? आँकड़ा मात्र है, सूचना मात्र है। ज्ञान बंधन उसके लिए बन गया जो अपने-आपको ज्ञान के तल पर परिभाषित करने लग गया, जो कहे लग गया कि मैं वो हूँ जो मैं जानता हूँ। ‘मैं वो हूँ जो मैं जानता हूँ’, और जानते कैसे हो तुम? जानने का तुम्हारे पास जो उपकरण है वो अपनेआप में बड़ा बंधन है। कुछ भी जान पाओगे तुम अगर तुम्हारे पास मस्तिष्क न हो, मेधा न हो या स्मृति न हो? और मस्तिष्क माने शरीर। और जानने के लिए जिन उपकरणों का तुम सहारा लेते हो वो बड़े सीमित – आँख, कान, नाक। और जानने की जो प्रवृत्ति है वो भी आती अपूर्णता के ही भाव से है – ‘मैं वो हूँ जिसे कुछ पता नहीं है, तो क्यों न मैं ज्ञान इकट्ठा करूँ और ज्ञान के माध्यम से मैं अपनेआप को परिभाषित कर लूँ?’







