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सारे मज़े कर लो, बाद में सुधर लेना || आचार्य प्रशांत, दिल्ली विश्वविद्यालय सत्र (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! पहले तो मैं आपको धन्यवाद देना चाहूँगी, आपने मेरे जीवन को सही दिशा दी है। मुझे पता चला आपसे मिलकर कि मुझे अपने जीवन में क्या करना है।

पर एक समस्या ये है कि मुझे दो साल हो गया आपको सुनते हुए, उसके पहले मैंने बहुत कुछ ग़लत किया था अपने जीवन में और उसका पछतावा भी है और अभी भी मैं उसके परिणाम भुगत रही हूँ। मुझे इस बात की ख़ुशी होती है कि अब मुझे पता चल गया क्या सही है, पर इस बात का दुख भी है कि और पहले पता चलना चाहिए था तो और बेहतर होता।

तो मैं अब चाहती हूँ कि जो बच्चे हैं, ऐसा आप भी कहते है कि बचपन से ही उन्हें अध्यात्म की शिक्षा मिलनी चाहिए और मैं भी इस बात से बिलकुल सहमत हूँ। तो मेरे घर में भी एक छोटा बच्चा है। मेरी बहन का बेटा है छोटा, पाँच साल का। मैं चाहती हूँ वो भी अभी से इस रास्ते पर आये। उसे पता चले कि क्या सही है, वो ये सारी चीज़ें समझे।

पर ये तर्क आता है घर से भी और बाहर भी मैं अगर किसी को समझाने की कोशिश करूँ तो कि अभी क्या उम्र है। मुझे भी बोला जाता है और उसके लिए तो बोला ही जाता है कि यह सब तो बूढ़ापे की चीज़ें हैं और ये सब कुछ।

मैं उनको बहुत समझाने की कोशिश करती हूँ। फिर वो मुझे ही लांछन लगाने लगते हैं कि तुमने भी तो इतना कुछ कर लिया और सब कुछ करने के बाद तुम सही रास्ते पर आये हो और फिर ज्ञान दे रहे हो। तो मैं अपनी बात को नहीं बोल पाती हूँ। फिर ऐसा अहंकार का बात आ जाता है। पर मैं और लोगों के एक्साम्प्लस (उदाहरण) देती हूँ जैसे — विवेकानंद, गौतम बुद्ध। तो फिर वो कहते है, एक बार गौतम बुद्ध के बारे में बात हुई थी, तो उन्होंने मुझसे कहा कि उनकी भी तो पत्नी थी, उनका बच्चा हो गया, उसके बाद वो फिर ज्ञान के मार्ग पर गये। तो ये लोग भी जब सबकुछ कर लेंगे जीवन में, फिर जाएँगे उस मार्ग पर। तो फिर मेरे पास कोई तर्क नहीं होता है तो मुझे इसका उत्तर चाहिए।

आचार्य प्रशांत: देखिए, यहाँ बात तर्क का उत्तर देने की नहीं है। यहाँ बात सीधे-सीधे नीयत की ख़राबी की है। आप कोई भी उत्तर दे दोगे, किसी भी तर्क से समझा दोगे, जिसकी नीयत समझने की है ही नहीं वो कोई दूसरा कुतर्क उठा लेगा।

आप बहुत तरह के तर्क दे सकते हो। आप कह सकते हो कि अगर सबकुछ करने के बाद सही रास्ते पर आया जाता है तो जिन लोगों ने सबकुछ कर लिया है जीवन में क्या वो सब आ जाते हैं सही रास्ते पर। आप कह रहे हो कि गौतम बुद्ध ने विवाह कर लिया, बच्चा कर लिया, फिर वो ज्ञान के रास्ते पर चलें। तो जितने लोग विवाह कर लेते हैं और बच्चा कर लेते हैं तो वो सब चल देते हैं क्या ज्ञान के रास्ते पर? ये कैसा तर्क है! और दूसरी बात, अगर पत्नी के होने और बच्चे के होने से ही ज्ञान के रास्ते पर चला जाता है तो गौतम बुद्ध उन दोनों को छोड़ कर क्यों गये थे जंगल, साथ ले कर जाते। वो तो उन दोनों को, वो भी रात में छोड़ कर गये थे कि छोड़ो इनको, भागो। ये सब बेकार की बातें हैं।

साफ़-साफ़ समझिए कि सारी समस्या आती कहाँ से है। जब तक आप उसको नहीं समझेंगे तब तक आप फँसे रहेंगे। सारी समस्या हमारे जन्म से ही शुरू हो जाती है। जब आप ये समझेंगे कि हम कितनी गहरी और लम्बी-चौड़ी दलदल में फँसे हुए हैं, तब आपके भीतर ख़तरे में होने का भाव उठेगा, एक घनघनाता हुआ अलार्म (घंटी) बजेगा। हर बच्चा ऐसे पैदा होता है जैसे एक लम्बी-चौड़ी दलदल की सतह पर एक जीव ने जन्म लिया हो। और वो जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, उसका भार-आकार बढ़ता जाता है, वो हाथ-पाँव चलाता है, कर्म करता है वैसे-वैसे उस दलदल में और गहरा धँसता जाता है। ये मनुष्य जीवन है।

हम मुक्ति के लिए नहीं पैदा हुए हैं। हमारा जन्म ही जैसे एक षड्यंत्र है। जैसे हम पैदा ही इस तरह होते हैं कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी वैसे-वैसे तुम गहरे और धँसोगे। जैसे कि जन्म ही हुआ हो किसी क़ैदखाने में, कारागार में और वह ख़ूब अंधेरा हो, ख़ूब अंधेरा हो। और इतना अंधेरा हो कि आपको ये भी न पता लगता हो कि आप क़ैद में हैं। ये मानव स्थिति है।

हमको लागता है कि हम तो मज़े मारने के लिए पैदा हुए हैं। हमको लगता है ये दुनिया तो बड़ी अच्छी जगह है जहाँ पर हमें तमाम तरह के सुख मिलने वाले हैं। ये मूल भ्रान्ति है। जब आप इस बात को समझेंगे तब आप ये भी समझ जाएँगे कि फिर कितना श्रमसाध्य और कितना कठिन है इस दलदल से आज़ादी पाना। फिर आप जीवन को हल्के में नहीं लेंगे। फिर आप ये नहीं कहेंगे कि अरे मैंने भी तो कोशिश करी थी आज़ादी की, पर मुझे मिली नहीं। साहब, आप दलदल में हैं, आपने कितनी कोशिश करी थी? पाँच-सात बार हाथ-पाँव चलाकर के तो आप स्विमिंग पूल से भी बाहर नहीं आ सकते, दलदल से कैसे बाहर आ जाओगे!

लेकिन बहुत सारे लोगों का ये तर्क रहता है कि नहीं, ऐसा नहीं है, हम भी चाहते थे एक आज़ाद और ऊँचा जीवन जीना। हमने भी कोशिश करी, पर हम सफल नहीं हो पाये। आप समझते भी हैं कि आप कहाँ फँसे हुए हैं? और अगर आप वहाँ फँसे हुए हैं तो वहाँ से निकलने के लिए कितनी ज़्यादा मेहनत चाहिए? हम इस बात को नहीं समझते। तो हम थोड़ी-बहुत मेहनत करके सोचते हैं, अरे! मेहनत करने से तो कुछ हो ही नहीं रहा है, कुछ हो ही नहीं रहा है, कुछ हो ही नहीं रहा।

बहुत ज़्यादा मेहनत चाहिए क्योंकि हमारी हालत बहुत ज़्यादा ख़राब है। और जब मैं ये बात बोलूँगा तो भीतर से आपके एक असहमति उठेगी; क्यों? क्योंकि टीवी, मीडिया, बाज़ार, विज्ञापन, फ़िल्में, लोक-संस्कृति, परिवार ये सब हमें ये बता रहे हैं कि दुनिया तो सुख का घर है। यहाँ तो तमाम तरीक़े के सुख पाये जा सकते हैं, हँसो-खेलो, मज़े करो, नाच है, रंग है। और उस बात को मानना हमारे लिए सुविधायुक्त भी रहता है। भई, कोई आपको बताये कि आपकी सेहत बहुत अच्छी है और क्या बात है! आप तो बड़े मजबूत हो। और कोई दूसरा बोले कि साहब आपको ज़बरदस्त बीमारियाँ लगी हुई हैं। तुरंत आपका मन क्या मानने का करेगा? पहले व्यक्ति की बात आप मानना चाहेंगे। ये अलग बात है कि वो जो पहली बात है वो पूरी झूठ है। समझ रहे हैं?

तो ताज्जुब मत किया करिए जब आप अपने चारों ओर झूठ देखें। वो किसी व्यक्ति विशेष की भूल नहीं है, वो किसी एक इंसान ने गुनाह नहीं कर दिया कि वो झूठ बोल रहा है। आपसे अगर आपके घर के लोग कुतर्क करते हैं, फ़िज़ूल बहस करते हैं तो वो कोई विशेष रूप से गिरा हुआ काम नहीं कर रहे। वो वही काम कर रहे हैं जो करने के लिए प्रकृति ने उनको पैदा करा है। एक संक्षिप्त वाक्य में कहें तो हम पैदा ही ऐसे होते हैं। हम झूठे हैं तो हम पैदा ही ऐसे होते हैं। हम ओछे हैं, छिछोरे हैं तो हम पैदा ही ऐसे होते हैं। इसमें किसी ने कोई ग़लती नहीं कर दी।

आपकी उम्मीदें ग़लत हैं। आप चाह रहे हो कि अम्बेसडर कार राफेल विमान बन जाए। वो पैदा हुई थी उड़ने के लिए? वो फैक्ट्री (कारखाना) से जब निकली थी तो उसमें पंख लगे थे? हम पैदा ही ऐसे होते हैं। ग़लती अगर कहीं है तो आपकी उम्मीदों में है। आपकी उम्मीद होती है कि अब ये उड़ेगी और जब वो उड़ती नहीं है तो आप उसको लानते भेजते हो, आप कहते हो ये देखो ये ग़लत निकल गयी। मेरी किस्मत ख़राब है मुझे ऐसी अम्बेसडर मिल गयी। आपसे कह किसने दिया कि वो उड़ेगी या आप उड़ोगे या कोई उड़ेगा? हम पैदा ही ऐसे होते हैं और जब आप ये समझोगे कि हम पैदा ही ऐसे होते हैं, मैं कह रहा हूँ, तब आपको अपनी हालत की गंभीरता समझ में आएगी। तब ज़रा आप सतर्क होकर विचार कर पाओगे कि कितनी सतर्कता और कितना श्रम चाहिए। नहीं तो बहुत आसान है जीवन को यूँही सस्ती हँसी-ठिठोली में बिता देना।

वो बच्चा है, उस बच्चे को उसके माँ-बाप आध्यात्मिक शिक्षा बिलकुल नहीं देना चाहते हैं। अरे, तो इसमें आश्चर्य क्या है? वो बच्चा भी ऐसे पैदा हुआ है, उसके माँ-बाप भी ऐसे पैदा हुए हैं। आश्चर्य की बात तो तब होती जब लाखों में कोई एक घर ऐसा निकल जाए जहाँ माँ-बाप कहें कि बच्चे को बचपन से ही बोध-साहित्य पढ़ाना है। वो आश्चर्य की बात होगी। वहाँ आपको कहना चाहिए था कुछ गड़बड़ है, ये कैसे हो गया।

इस दुनिया में जब भी कोई घटिया, गिरा हुआ, मूर्खतापूर्ण काम होता देखें तो बिलकुल ताज्जुब मत माना करिए। ये दुनिया चीज़ ही ऐसी है। इसका डिजायन (बनावट) ही ऐसा है। जो लोग गड़बड़ी कर रहे हैं, वो गड़बड़ी नहीं कर रहे, वो सामान्य हैं, वो नॉर्मल हैं। अब्नोर्मल कौन हैं, असामान्य कौन हैं? जो गड़बड़ी नहीं कर रहे हैं। उनके डिजाइन में फॉल्ट (दोष) है। उनको पकड़ना चाहिए कि भाई! तू कहाँ से पैदा हुआ या तू टपका है ऊपर से? मुझे तो आज भी लगता है वो टपके हैं। और इसीलिए बेचारे अक्सर फिर जल्दी टपक भी जाते हैं।

अहंकार इसी बात में हैं कि हम न अपनी स्थिति को जानते हैं और न हम मानना चाहते हैं कि दुनियाभर के सारे दोष हममें जन्म से ही विद्यमान रहते हैं। हम ऐसी उल्टी गंगा बहाते हैं कि हम कहते हैं कि बच्चा तो मासूम होता है। बच्चा दुनियाभर के दोषों का पिटारा होता है, वो सबकुछ लेकर के गर्भ से पैदा होता है। आपको क्या लगता है ये जितने तरह की क्रूरताएँ होती हैं और मूर्खताएँ होती हैं उसको समाज सिखाता है? जिनके घरों में छोटे बच्चे होंगे वो भलीभाँति जानते होंगे कि बच्चे में ईष्या भी होती है, दम्भ भी होता है, अज्ञान का तो कहना ही क्या! मोह भी होता है, आसक्ति भी होती है। सब होता है बच्चे में। हम पैदा ही ऐसे होते हैं।

जब आप ऐसे पैदा हों और तब भी आपको लगे कि ऐसे बने नहीं रहना है तो फिर आप कहेंगे मुझे बहुत-बहुत मेहनत करनी है और मेरे पास समय बहुत कम है। मेरी हालत बहुत ख़राब है और मुझे शायद चालीस साल, साठ साल या शायद अस्सी साल दिये गए हैं। तो मुझे बहुत तेजी से आगे बढ़ना होगा, मेरे पास बर्बाद करने के लिए समय बिलकुल नहीं है। मेरी हालत ख़राब है, मैं बहुत पीछे हूँ मुझे बहुत आगे जाना है, मैं बहुत नीचे हूँ मुझे बहुत ऊपर जाना है। लेकिन हमें यह पता ही नहीं लगने दिया जाता न कि हालत कितनी ख़राब है। हमें एक झूठी ठिठोली में फँसाकर रखा जाता है, 'ऑल इज वेल' (सब ठीक है)। आ रही है बात समझ में?

प्र२: नमस्ते आचार्य जी! मेरा क्वेश्चन है कि हम कभी भी सपना देखते हैं, कभी ड्रीम करते हैं किसी चीज को अचीव (प्राप्त) करने का। और हमको पता है कि हममें कैलिबर (क्षमता) है, हम कर भी सकते हैं। लेकिन बाहर की इतनी जो नेगेटिविटी (नकारात्मकता) होती है, सामाजिक रूप से इतना दबाव होता है कि वो हमारे अंदर आने लगती है। तो हम इस चीज़ को कैसे ओवरकम (काबू) कर सकते हैं कि बाहर की नेगेटिविटी हमारे अंदर की नेगेटिविटी न बने?

आचार्य: भीतर अपने लक्ष्य के प्रति ऐसा प्रेम होना चाहिए कि बाहर की कोई आवाज़ सुनाई न दे।

प्र२: सर, लेकिन जो डेली सेल्फ-डाउट (रोज़ाना के आत्म-संदेह) होते हैं कि नहीं बाहर इतना कम्पटीशन (प्रतियोगिता) है या आज किसी ने ये बोला, तो ये जो सेल्फ-डाउटस होते हैं उनको जीत नहीं पाते।

आचार्य: जिसने बोला उसकी बात सुनने का आपके पास समय क्यों है?

प्र२: सर, लेकिन कोई आकर कहता है कि हम गाइडेंस (मार्गदर्शन) कर रहे हैं, कोई आकर कुछ कहता है।

आचार्य: कोई आया गाइडेंस देने, आपने ली क्यों?

प्र२: यस सर।

आचार्य: और कोई इसका उत्तर नहीं हैं। मैं मज़ाक नहीं कर रहा। इसके अलावा कोई समाधान है नहीं।

प्र: लेकिन सर, डेली बेसिस पर जो सेल्फ-डाउट्स आते हैं….

आचार्य: डेली बेसेस पर लोग आपके पास बार-बार आते ही रहेंगे, दुनिया पर आपका नियंत्रण नहीं चल सकता। कोई दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है, आप उसे कैसे रोक लोगे और कितनों को रोकोगे? आपका वश बस एक व्यक्ति पर चल सकता है — अपने ऊपर। ठीक है?

किसकी सुननी है, किसकी नहीं सुननी है ये बात आप तय करिए न। आप क्यों हर ऐरे-ग़ैरे को हक़ दे देते हैं कि वो आपके मन पर प्रभाव छोड़ जाए? आपको ज़रूरत क्या है सबको सुनने की? वो तभी होता है जब भीतर अपने लक्ष्य की प्रति स्पष्टता न हो। जब मैं जानता हूँ मुझे क्या करना है…

प्र२: लेकिन सर, वो सेल्फ-डाउट्स कहीं-न-कहीं आ रहे हैं।

आचार्य: क्या नाम है आपका?

प्र२: सर, मेघा।

आचार्य: देखिए दीपिका!

प्र२: मेघा।

आचार्य: देखिए सुलेखा! (श्रोतागण हँसते हैं।) अरे! चित्रा जी! नहीं-नहीं मैं भूल गया, सत्यनारायण आपका नाम हैं न। (श्रोतागण फिर से हँसते हैं।) सेल्फ-डाउट्स आये?

प्र२: नो सर।

आचार्य: क्यों नहीं आये ?

प्र२: सर, बिकॉज़ आई नो व्हॉट इज ट्रू (क्योंकि मैं जानती हूँ सच क्या है)।

आचार्य: वही बात है। (सभी श्रोतागण तालियाँ बजाते हैं।)

प्र२: थैंक्यू सर।

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