जीवन से कचरा कैसे हटाएँ? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश (2022)

प्रश्नकर्ता: अचार्य जी, कोटि-कोटि नमन! आचार्य जी, जब से मैं अभी आपको सुन रही हूँ, अभी मुझे बस छः महीने ही हुए हैं। लेकिन बहुत सारी बातें जीवन में स्पष्ट हो चुकी हैं। आपके दो सत्र अटेन्ड किए, उनसे मुझे मेरे बहुत सवालों के जवाब स्पष्ट हो गए हैं। लेकिन इन सब चीज़ों से, जब सुना आपको, तो अब लगता है कि जैसे जीवन के लास्ट (आख़िर) के तीस साल मैंने निरर्थक कर दिया है। मुझे कुछ भी नहीं आता है। अभी बहुत कुछ सीखना है जीवन में। और बहुत सारे बंधनों में अब तक बंध चुकी हूँ। और यह चीज़ मुझे स्वीकार करने में भी तकलीफ़ हो रही है कि जिन्हें मैं सुख मानती थी अपने, वो तो मेरे बंधन हैं।
आचार्य जी, मेरा सवाल है कि सही जीवन कैसे जियें? दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या में जो कचरा मेरे दिमाग में, मन में भरते जाता है; उसको मैं अपने दिमाग से कैसे दूर करते चलूँ?
मैं ख़ुद को बहुत समझाने की कोशिश करती हूँ और समझा भी लेती हूँ; लेकिन फिर कुछ दिन बाद, कभी-कभी तो कुछ घंटों बाद ही, फिर से मतलब अपनी वही दुर्दशा कर लेती हूँ, मन की, समझा नहीं पाती ख़ुद को।
आचार्य प्रशांत: देखिए, वो जिसको आप कचरा कह रही हैं, उसकी आपको पुरानी आदत है। इतनी जल्दी आप अपनेआप को रज़ामंद नहीं कर पाएँगी कि उसे वाक़ई कचरा ही मान लें। तो तरीक़ा यह है कि अपनी दिनचर्या में से ज़्यादा-से-ज़्यादा समय उन चीज़ों को दीजिए जिन्हें आप कचरा नहीं मानती हैं। ठीक है?
हमारी दिनचर्या में बहुत सारे काम होते हैं, बहुत सारे व्यक्ति होते हैं; है न? बहुत सारी चीज़ें होती हैं। वो सब एक समान नहीं होते, उनमें अंतर होते हैं। जो चीज़ें आपको पता ही है कि निचले तल की हैं, सबसे पहले उनको आप जो समय देती हैं और जो ध्यान देती हैं और जो ऊर्जा देती हैं, उसे कम-से-कम करना शुरू करिए। और जो ऊपर वाले हैं, उन पर जो समय है, उसको बढ़ाना शुरू करिए। ठीक है?



