प्यार है, पर क्यों है पता नहीं! (आपकी भी यही हालत?) || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, एक्चुअली (दरअसल) एक बैड एक्सपीरियंस (बुरा अनुभव) है पास्ट रिलेशनशिप (अतीत का रिश्ता)। तो उसमें ऐसे था कि मुझे उसके साथ रहना नहीं था। लेकिन मुझे उसके पीछे के रीज़न्स (कारण) नहीं पता है, क्यों नहीं रहना है। बस मुझे इतना ही पता था कि नहीं रहना है तुम्हारे साथ। मतलब, मुझे पता था कि नहीं रहना है लेकिन मुझे अंडरस्टैंडिंग (समझ) नहीं था कि मतलब क्यों नहीं रहना, ये नहीं पता था। तो ये जो गैप (रिक्त स्थान) है नोइंग एंड अंडरस्टैंडिंग (जानने और समझने) के बीच वाला, तो ये कैसे भर सकते है?
आचार्य प्रशांत: नोइंग, अंडरस्टेनिंग एक ही चीज़ होते हैं, अलग नहीं होते। जब हम कहते है कि मुझे पता है, पर मैं जानती नहीं हूँ, मुझे पता तो है मुझे कुछ काम करना है या नहीं करना है, पर क्यों करना है मैं जानती नहीं, तो इसका मतलब उसमे नोइंग भी नहीं है। फिर वो वृत्ति होती है, भावना होती है, कोई आवेग होता है। उसमे नोइंग नहीं है।
बस एक लहर है भीतरी जो आपसे कुछ करवाना चाहती है। उस लहर की अपनी एक ताक़त है। वो आपको एक तरफ़ धकेल देना चाहती है। वो आपसे कोई निर्णय करा ले जाती है। वगैरह, वगैरह। उसमें आपको ऐसा लगता है कि आपको पता है, पता कुछ नहीं होता। वो बस एक भीतरी प्रक्रिया हुई होती है; जैविक, रासायनिक। और वो प्रक्रिया अपको एक तरफ़ को फेंक रही होती है ज़ोर के साथ, आपको मजबूर कर रही होती है।
और वो जो प्रक्रिया है वो थोड़ी आपको आकर के बताएगी कि मैं एक प्रक्रिया मात्र हूँ? वो तो यही कहेगी कि फ़लाना काम करो और क्यों करना है, ये तो मुझे पता है। पता है, बस मैं समझ नहीं पा रही हूँ। नहीं हमें पता भी नहीं है। वो बस एक इंस्टिंक्ट (मूल प्रवृत्ति) है।



