प्रश्नकर्ता: जैसे हम साँस ले रहे हैं, तो हम सोचते हैं कि हम ही कर रहे हैं। जबकि सहज हो रही है ये चीज़ें; हमारा कोई अपना एफर्ट (परिश्रम) नहीं है। अपनेआप बहुत सी चीज़ें हो रही हैं। लेकिन आपके यूट्यूब के कुछ लेक्चर्स में सुना था। हो सकता है वो सिचुएशन अलग ही बता रहे होंगे आप। लेकिन मुझे कंफ्यूजन (भ्रांति) हो रहा है। तो कृपया स्पष्ट कीजिए कि जब हम जीवन में किसी मुश्किल परिस्थिति में फँस जाते हैं तो फिर सोचते हैं भगवान जी करेंगे सबकुछ।
तो उस समय आपने बताया कि हमें ही करना है, भगवान अलग नहीं हैं। और मतलब सिचुएशन-सिचुएशन (परिस्थिति-परिस्थिति) में वही फ़र्क है कि सीता के आँसू हैं तो ठीक है, कैकेयी के आँसू हैं तो ग़लत चीज़ के लिए है।
तो 'मैं' जब सही डायरेक्शन (दिशा) में जा रहा है, जो चीज़ों के लिए काम करने की ज़रूरत है, ख़ुद से स्टेप लेना है, तो लो। वहाँ यह मत सोचो कि मैं कुछ नहीं कर सकता। और जहाँ अपनेआप हो रहा आराम-आराम से, वहाँ ज़्यादा मैं-मैं मत करो। वहाँ मेरी समझ यह है। (प्रश्नकर्ता हँसती हैं)
आचार्य प्रशांत: (मुस्काते हुए) जो सही काम है वो अपनेआप आराम-आराम से कभी नहीं होगा। कभी नहीं होगा!
सही काम तो संघर्ष से ही होता है। अपनेआप आराम-आराम से प्राकृतिक काम हो जाएँगे; नींद आ जाएगी, भूख लग आएगी। आप पानी गिरा देंगे, पानी बह निकलेगा आराम-आराम से अपनेआप; पोछा लगाने में तो मेहनत ही करनी पड़ती है।




