प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी! ये मेरा पहला सत्र है आपके साथ में, और पहली बार भी। बात करने का मौक़ा भी मिल गया। तो मैं बहुत खुश हूँ इस बात को ले के। सवाल इस प्रकार जब मैं आयी थी यहाँ पर तो मैं लेकर नहीं आई थी। मेरा एकमात्र उद्देश्य था कि बस एक बार आपसे मुलाकात हो जाए। उसका कारण भी रहा है कि वही होता है ज़िन्दगी चलते-चलते। वो जब अज़ीब सी होने लगती है।
मैं किस तरीक़े से इस परिस्थिति को रखती हूँ आपके आगे। मैं एक अच्छी विद्यार्थी थी, अच्छा बच्चा। उसके बाद शून्य ज्ञान के साथ जैसे आप आगे बढ़ते हैं। लेकिन एक स्वतन्त्र महिला मतलब मैं मान सकती हूँ कि बारहवीं के बाद मैंने कमाई शुरू कर दी तो कोई निर्भरता नहीं थी। परिवार बहुत अच्छा था। बहुत खुला रखा है उन्होंने हमेशा हर चीज़ के लिए। करते-करते ज़िन्दगी में फिर वही शादी-ब्याह, बच्चे — वो ज़िन्दगी जी। और फिर जूता पड़ता है ज़ोर से। वो वाले कथानक हुए।
फिर एक पलटा और ये हमेशा अच्छा पक्ष होता है मतलब मैं उसमें से सकारात्मक ढूँढते हुए आगे बढ़ी। अन्त में मैंने शुरू किया मतलब फिर मैंने नौकरी करी। बहुत सारे खंड मैं कर ली। फिर मैंने व्यापार कर लिया। उसमें शुरू-शुरू में बहुत मज़ा आया। मैं एक अच्छी ऐशो-आराम की ज़िन्दगी जी रही हूँ, सबकुछ हो गया।
अब मुझे कुछ भी पसन्द नहीं है मतलब मुझे जो भी आसपास हो रहा है। या जो मैं कर रही हूँ मुझे एक बहुत सुन्दर जगह दिख रही है मतलब मैं प्रकृति के साथ में हूँ। लेकिन मैं वहाँ भी उस विशेष गतिविधि का आनन्द नहीं ले पा रही हूँ मुझे हर काम अर्थहीन लग रहा है।
और फिर मैंने ये सब जब खुराफात दिमाग में होने लगी। तो मैंने सोचा कि पढ़ते हैं क्योंकि ऐसा भी समय होता है कि कभी आपके आसपास उस स्तर के लोग होते हैं जिनसे आप मार्गदर्शन ले पाते हो। आपको ठीक लगते हैं। आप आगे बढ़ते हो, जैसे चाहे वो मेरी नौकरी से सम्बन्धित रही हो या मेरे व्यापार से सम्बन्धित। लेकिन अन्ततः मैं उस अवस्था पर हूँ जहाँ मुझे किसी का मार्गदर्शन भी बेमतलब लग रहा है।




