
अगर प्रेम जैसा कुछ होता तो स्त्री को पुरुष से ही क्यों हो रहा है, पुरुष को स्त्री से ही क्यों हो रहा है? और एक उम्र के ही व्यक्ति से क्यों हो रहा है? पुरुष से भी करना है तो अस्सी साल वाले से क्यो नहीं करते जाकर? क्यों नहीं करते हो? ये सारी आशिकी समवयस्क लोगों में ही क्यों होती है? या अधिक-से-अधिक पाँच-दस साल का अन्तर। बोलो? बात नहीं समझ में आ रही? ये सारी आशिकी रिप्रोडक्टिव पीरियड में ही क्यों होती है? नहीं बात समझ में आ रही? और उसी से जुड़ी जो बाकी चीज़ें हैं, अकेलापन और बाकी सब जो कुछ भी होता है, ये साइड इफेक्ट्स ही होते हैं, लोनलिनेस और ये सबकुछ। ये सब बस एक चीज़ है, एक चीज़ है, अन्त में प्रकृति चाहती है, तुम बच्चा पैदा कर दो।


आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मैं जे कृष्णमूर्ति जी की कमेंट्रीज ऑन लिविंग (जीने पर टीकाएँ) पढ़ रहा था तो उसमें वो कह रहे थे कि ‘दे आर नॉट पॉजेजर्स ऑफ वेल्थ, बट आर पॉजेस्ड बाई वेल्थ (वे धन के स्वामी नहीं हैं, बल्कि धन उनका स्वामी है)।‘ तो आपने भी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! कुछ ही महीने हुए हैं आपसे यूट्यूब के माध्यम से जुड़े हुए। 'वैराग्य शतकम' का इक्कीस्वाँ श्लोक मुझे सता रहा है, मेरे वजूद पर सवाल उठा रहा है। मैं कॉर्पोरेट में काम कर रहा हूँ तीन साल से, आप समझ ही गए होंगे मैं पापियों के…

“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।

स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।

लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।

एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…

सही काम आनंद पाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए किया जाता है क्योंकि वही सही है। सही काम करते समय सुख मिले या बोरियत, दोनों को समान रूप से स्वीकार करना ही आनंद है। पढ़ाई, विशेषकर गणित, केवल परीक्षा का विषय नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन की भाषा है, जो दुनिया को समझने की क्षमता देती है. गलतियाँ स्वाभाविक हैं और उनसे सीखना चाहिए, लेकिन बेईमानी कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती। सच्ची सफलता पूर्णता में नहीं, बल्कि ईमानदारी में है।

मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।

सच्चा जीवन समाज के दबाव या तथाकथित “पैशन” के पीछे चलने से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर दोनों प्रकार की गुलामी से मुक्त होने से शुरू होता है। अक्सर जिसे अपनी पसंद या पैशन समझा जाता है, वह भी सामाजिक संस्कारों का परिणाम होता है। जब व्यक्ति स्वयं को गहराई से समझकर स्वतंत्र निर्णय लेता है, तब उसका कर्म स्वाभाविक, सार्थक और समाजोपयोगी बनता है। भय और सुरक्षा की मानसिकता से ऊपर उठकर भी गरिमापूर्ण, संतुलित और आर्थिक रूप से पर्याप्त जीवन जिया जा सकता है।

मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।

तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।

शरीर है, तो उसे रोटी–कपड़ा देना पड़ेगा, वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। रुपए–पैसे की बात थोड़ा अलग रखकर देखो कि जीवन जीने का एक सार्थक तरीका क्या है। सही उद्देश्य क्या है, उसको पकड़ो। उसको पकड़ने के बाद फिर विचार करो कि काम तो सही पकड़ लिया, अब इसमें पैसा कैसे बनाया जाए। अध्यात्म और पैसा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं हैं। अध्यात्म बस यह सिखाता है कि पैसा कहीं तुम्हारा मालिक न बन बैठे। पैसा ज़िंदगी के लिए होना चाहिए, ज़िंदगी पैसे के लिए नहीं; ज़िंदगी सच्चाई के लिए होनी चाहिए।

जिनके पास कुछ करने को नहीं है, वो कुछ तो करने की कल्पना करेंगे न। अब आदमी को पता नहीं होता कि सूनापन चीज़ क्या है; वो पैदा कहाँ से हो रहा है। तो उसको भरने के लिए फिर तरह-तरह की कोशिशें करता है, अपनी स्थिति अनुसार। आप स्त्री हो, तो डिमांड पुरुष की करोगे; आप पुरुष हो, तो स्त्री की करोगे। आप ग़रीब हो, तो पैसे की करोगे। ऐसा लगेगा कि अलग-अलग चीज़ों की डिमांड हो रही है। पर वो जो आपकी डिमांड है, माने डिज़ायर है, वो वास्तव में आ रही है एक ही जगह से, वह है हमारा अस्तित्वगत अज्ञान, उसी को अहंकार बोलते हैं।

बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।

मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।

आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो।

वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

हम साइकोसोमैटिक बीइंग्स होते हैं न, हम तो कुछ खाते भी हैं, तो उसका भी असर मन पर पड़ता है। पड़ता है न? और वो शरीर की ही बात है। आप कुछ उल्टा-पुल्टा खा लीजिए, असर पड़ेगा। नशे का भी यही सिद्धांत होता है, आप कुछ ले लीजिए उससे दिमाग़ चक्कर खाना शुरू कर देगा। उसी तरीक़े से ये जो सेक्सुअल यूनियन होता है, ये भी एक फिज़िकल चीज़ है, जिसका मन पर असर पड़ता है। ये भी मन पर निशान छोड़ता है। तो आप इमोशनली भले ही नहीं अटैच हो रही हों, पर क्या आपने परखा है कि इसका मन पर क्या असर पड़ता है?

आकाश के अणु-अणु में ये बात बसी हुई है कि 'All is already and always perfect', सब कुछ सदा और सर्वथा पूर्ण है। हमें ये विचार है कि कुछ कमी है, और इस कमी को पूरा करने के लिए हम सुख की तरफ़ जाते हैं। ये मानना कि कुछ कमी है — यही कमी है। जहाँ देखा कि मान रहे हो कि कुछ कमी है, वहीं समझ लो — माया है। माया क्या है? कमी का आभास। प्रतीत होती है कि कुछ कम है, कुछ कम है। जबकि हवा में और रोशनी में, हर जगह लिखा हुआ है कि सब परफेक्ट है, पूरा है।

शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो।

जब जीवन को चुनौती दिए बिना स्वयं को स्वतंत्र मान लिया जाता है, तो वह अध्यात्म नहीं, पलायन होता है। सच्ची ज़िंदगी जीना माने टूटना — 'आग का दरिया है, डूबकर जाना है।' अध्यात्म बड़े योद्धाओं के लिए होता है। बड़ी लड़ाई उठाइए, तब गीता को दिल से महसूस कर पाएँगे। आप कितने स्वतंत्र हो पता तो तब चलेगा न जब आप बेड़ियों को चुनौती दोगे। जो चुनौती नहीं दे रहा है उसे पता क्या!

धर्म के साथ कई तरह की परंपराएँ जुड़ी हैं, जिनका उद्देश्य होता है — मन को भ्रम और दुख से मुक्ति देना। ‘शिव’ परम सत्य का दूसरा नाम है। यदि तीर्थाटन करने से मन साफ़ हो रहा है, आपके मन में सच्चाई दृढ़ता से स्थापित होती है, तो तीर्थयात्रा बहुत शुभ है — चाहे वह कावड़ यात्रा हो, अमरनाथ यात्रा हो, या केदार यात्रा। लेकिन यदि शिव का अर्थ बस मानसिक तल पर कुछ मान लिया है, उस पवित्रता से प्रेम ही नहीं, तो फिर क्या ही लाभ।

जिस चीज़ को मज़ा बोलते हो और जिस चीज़ को बेमज़ा बोलते हो, जिसको सुख बोलते हो, जिसको दुख बोलते हो दोनों को समझो कि ये मामला चल क्या रहा है, और इस समझने में जो मौज है, वो आनंद है। तो दुख भी चल रहा है तो उसको समझो — दुख में भी आनंदित रहोगे, और सुख चल रहा है तब तो समझो ही समझो। कुछ भी चल रहा है, जो भी चल रहा है उसको समझो — वो आनंद है।

मात्र विशिष्ट संगीत है, जो बंधनों को काटता है। अधिकांशतः संगीत उत्तेजक ही होता है, क्योंकि वो तुम्हें नए तरीक़े के अनुभव दे जाता है। जबकि शास्त्रीय संगीत अलग आयाम का होता है, इसीलिए वो बाज़ारू नहीं होता। संगीत का सबसे सुंदर और प्रभावी मेल होता है — शास्त्रीय संगीत पर संतों के वचन। इनके अलावा, बाकी सबकुछ जो संगीत के नाम पर चल रहा है, वो तुम्हारे आंतरिक कोलाहल को ही बढ़ाएगा।

दो चीज़ें होती हैं, जिसमें इंसान फँसता है। एक — बहुत बड़ा मकान, और दूसरा — लाखों-करोड़ों की शादी, जिसमें विलासिता का प्रदर्शन करना अनिवार्य है। इन दोनों के लिए बहुत पैसा चाहिए, जिसकी ख़ातिर आप ज़िंदगी भर ग़ुलामी करते हो। अध्यात्म इन मोटे खर्चों से बचने का नाम है। अगर ये मोटे खर्चे न हों, तो आप जितना कमाते हो, ज़िंदगी उससे आधे में भी चल जाए, क्योंकि वे खर्चे जो ज़िंदगी को बिल्कुल मस्त और आनंदमय बनाते हैं, वो बहुत बड़े नहीं होते।

जिस किसी में सत्य के प्रति अर्जुन जैसी प्रगाढ़ निष्ठा होगी, उसे श्रीकृष्ण मिल ही जाएँगे। तुम्हारे भीतर वो प्रश्न उठें तो सही, जो अर्जुन में उठते थे। केन्द्रीय बात है मुक्ति और बोध की — वो अगर है, तो फिर कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। जिसे चाहिए, उसे मिल ही जाता है, चाह मूल है। हर मार्ग पर तुम्हें अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है — उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।

गुरु लोग और बड़े-बड़े पदाधिकारी भारत में और दुनिया भर से योग दिवस को अपना समर्थन दर्शाते हैं। लोग शारीरिक मुद्राओं में अपनी तस्वीरें डालते हैं — एक योगा मैट होता है, उसपर योगा करते हुए कहते हैं, "Celebrating Yoga Day!" लेकिन योग का संबंध व्यायाम और कसरत से नहीं, बल्कि मन से है। योग मन की बात है — क्योंकि मन परेशान है। और योग वास्तव में क्या है — यह जानना है, तो भगवद्गीता की ओर जाना ही पड़ेगा।

मैं ज़िन्दा हूँ और मैं अभी दुख में हूँ, ये दुख कैसे हटाया जाए — धर्म इसका विज्ञान है। मरने के बाद कोई जीवन होता है (आफ्टर लाइफ) — उससे धर्म का कोई रिश्ता नहीं है। इतना तो ज्ञानियों ने चेताया है कि “हीरा जनम अमोल है, कौड़ी बदले जाय।” तो जब तक जीवित हो, तब तक मुक्ति मिल सकती है — उसके बाद कुछ नहीं है।

लोग बोलते हैं कि समस्या कामवासना है। समस्या कामवासना नहीं है, उसमें सचमुच समय की बर्बादी नहीं होती। समय की बर्बादी होती है रोमांस में, भावना और कल्पनालोक में। जिससे बहुत आकर्षण हो, उससे इंसान की तरह दो बातें कर लो — इतने में ही नशा उतर जाएगा। कोई सार्थक काम दो अपने आपको। यह अनुभव भी किया होगा कि जिन दिनों में कोई ज़रूरी काम रहता है, उन दिनों में ये सब चीज़ें आकर्षित नहीं करतीं।

ये जो पारंपरिक बात रही है कि अध्यात्म के साथ-साथ कामवासना क्षीण हो जाती है, वो बात अपनी जगह बिलकुल ठीक है। लेकिन उसमें यह बात भी है कि फिर आपकी वासना, आपके मूल्यों का एक प्रतिबिम्ब बन जाती है, एक उद्घोषणा बन जाती है कि मुझे क्या चीज़ पसंद है। पहले आप एक साधारण आदमी थे, जिसके साधारण बल्कि निम्न तल के मूल्य थे। तो उसी तल का आप कोई साथी भी चुन लेते थे। आध्यात्मिक व्यक्ति चूँकि ऊँचाइयों का प्रेमी होता है, उच्चता का। तो इसीलिए वो फिर सेक्स (संभोग) को एक साधारण मनोरंजन की तरह नहीं इस्तेमाल करता।

अपने साथ जो चले — जानने वालों ने उसको बस एक नाम दिया है। बोले तुम्हारे साथ जो चले वो वो भी नहीं हो सकता जो तुम्हारे बगल में खड़ा हो। जो तुम्हारे साथ हमेशा चले वो सेल्फ होता है — तुम ही सिर्फ़ अपने साथ चल सकते हो। तुम्हारे अलावा कोई तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।

ये रुपए पैसे का खेल ये आदमी द्वारा आदमी का शोषण। ये एक आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो अमीर हूँ और दूसरे आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो गरीब हूँ। तुम्हें ये सारा खेल समझ में आएगा कि ये कैसे चल रहा है। खेल के शिकार मत बनो, खेल के खिलाड़ी मत बनो। थोड़ा सा बाहर निकलो और इस खेल के दृष्टा बनो। ये खेल ऐसा है कि जो इसे खेलने लग जाते हैं उन्हें ये खेल कभी समझ में नहीं आता। ये खेल उन्हें खा जाता है, इस खेल को वही समझ सकता है जो इस खेल से थोड़ा बाहर आ गया है।

इंटरेस्ट सच्चा है या नहीं — यह जाँचने के लिए पूछो: “सिर्फ़ आकर्षित हूँ या समझता हूँ?” आप जो भी क्षेत्र चुनोगे, उसमें समय, ऊर्जा और ज़िन्दगी लगेगी। काम कोई छोटी चीज़ नहीं होती, बहुत क़रीबी चीज़ होती है। वह आपकी ज़िन्दगी का पहला रिश्ता होता है। जब काम समझदारी, गहराई और प्यार से चुनते हो, तो फिर यह नहीं होता कि हर छह महीने में जी ऊब गया।

हम छोटे-मोटे उत्सव करके सोचते हैं कि हमे खुशी मिल गई; काश कि मिली होती। ये बड्डे-गड्डे में ताली बजाने से खुशी नहीं मिलती, एक समस्या ज़रूर खड़ी हो जाती है — आप अपने आप को जता लेते हो कि आपको खुशी मिल गई। इंसान को वरदान ये मिला है कि उसे खुशी मिलेगी तो ऊँची मिलेगी। और अभिशाप ये मिला है कि उस ऊँची खुशी के लिए उसे दाम भी ऊँचा चुकाना पड़ेगा। दाम ये है कि अपनी कमज़ोरियों से जूझ जाओ, उनके विरुद्ध संघर्ष करो।

सेक्स अच्छा या बुरा नहीं होता। अगर आपके जीवन में हर चीज़ के लिए उलझाव है, निर्णय नहीं ले पाते, तो आप सेक्स के बारे में भी अच्छा-बुरा, सही-गलत सोचेंगे। अगर आप सही जिंदगी जी रहे हो, हक़ीक़त के साथ हो, तो सेक्स पर सोचना नहीं पड़ेगा। होगा तो होगा, नहीं होगा तो नहीं होगा। जीवन में एक प्रवाह रहेगा, और तुम्हारे मन पर सेक्स एक बोझ की तरह नहीं रहेगा।

हमारी ज़िन्दगियाँ absurdity का ही एक endless narrative है। यह absurdity दिखाओ, लोग खूब हसेंगे। Comedy, entertainment ये सब बहुत अच्छी चीज़ें हैं यदि ये लोगों को अपनी मूर्खताओं पर, अपने prejudices पर हँसा दे। हमें ऐसी कॉमेडी की बहुत सख्त ज़रूरत है जो clarity देती हो। ऐसी कॉमेडी जहाँ उसको सुनकर सिर्फ़ आप हँसे नहीं हो, आप हल्के हो गए हो। यही तो होता है- ‘Cutting Your Own Inner Clutter.’

जिस चीज़ को देख रहे हो उसमें इतना भी नहीं आकर्षण है कि उसे साफ़-साफ़ देख लोगे, तब भी आकर्षण बना ही रहेगा। जिसको जानते ही नहीं हो न, उसको ही बहुत अधिक महत्व और सम्मान और इज्ज़त कीमत देते रहते हो। जिसको जानने लग जाओ, उसको फिर सम्यक स्थान देते हो कि इतनी ही इसकी कीमत है, इतनी ही इसको मैं जगह दूँगा, इससे ज़्यादा इसको जगह नहीं दे सकता। सही मुद्दे लेकर आओ ज़िन्दगी में भाई! इन चीज़ों की बात करने के लिए वक्त नहीं बचेगा।

हमारी धार्मिकता तो ये है कि बोल दिया, चुपचाप मान लो और जैसा कहा जाए, करो। समझो, समझाओ, जानो तब मानो — ये तो धर्म में चलता ही नहीं है। तो धर्म ने बिना समझाए आपको बोल दिया है कि ये छी!छी! चीज़ है, छिच्छी! और ये होने मत देना। धर्म ने तो बोल दिया, ‘होने मत देना’, पर वो होकर रहेगी। और जब होकर रहेगी तो आप क्या हो जाओगे? शर्मसार, आप अपराध भाव से भर जाते हो। और जैसे ही अपराध भाव से भरते हो, आपको लग जाता है आप गुनहगार हो, आप लज्जित हो जाते हो।

हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ पर कोई तर्क हो ही नहीं सकता। हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ कोई मान्यता हो नहीं सकती और कौन सी हैं वो जगह ‘मैं’। बिल्कुल हो सकता है कि ये दीवारे न हो, ये मेरी मान्यता हो, आँखों का धोखा हो, सब कुछ झूठ हो सकता है। लेकिन एक चीज तो है न, जो है और उसी की खातिर मैं बात कर रहा हूँ, मैं हूँ और मैं हूँ। मुझे मेरे होने का दुख नहीं पता चलता है। मैं दुखी हूँ। यहाँ से सारा अध्यात्म शुरू होता है। बाकी सब नकली हो सकता है। आपको सामने वाले से एक बात पूछनी है दुखी हो? और ‘हो’। दुखी हो। उसमें अस्तित्व भी आ गया तुम्हारा। अहम। हो, हो माने अस्तित्व है तुम्हारा। अहम और दुख है। हाँ यही है अध्यात्म सारा।

आम जनमानस में तो ये एक ही हैं, पर अध्यात्म की दुनिया में बाकी सारे नाम सिर्फ नाम हैं, और शिव सत्य हैं। शिव कोई चरित्र नहीं हैं; शंकर का चरित्र होता है। शंकर किसी पुराण के केंद्रीय पात्र हो सकते हैं, शिव नहीं। शंकर मन की जितनी अधिकतम ऊँचाई पर उड़ सकता है, वह हैं। और शिव हैं उस मन का आकाश में विलीन हो जाना। तो विचार का उच्चतम बिंदु हुए शंकर, और निर्विचार हुए शिव।

महाशिवरात्रि का उत्सव मनाने का सार भीतर के अंधकार को पहचानना और उसे कम करने का प्रयास करना है, यह मानते हुए कि यह त्योहार केवल एक दिन का नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता की निरंतर यात्रा है। यह रात महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विनाश की एक धारा और नए आरंभ की दूसरी धारा के मिलन का प्रतीक है। किसी भी नए आरंभ के लिए, पहले पुराने, सड़े हुए और झूठे तत्वों को समाप्त करना आवश्यक है।

शिव कोई ऐसी इकाई नहीं हैं, जो अपना कोई निजी, पृथक या विशिष्ट व्यक्तित्व रखती हो। हम सब जहाँ पहुँचना चाहते हैं, हमारी एक-एक गतिविधि जिस अवस्था को हासिल करने के लिए है, उसका नाम है—शिव। सब समय, सब स्थान मन का विस्तार हैं और शिव मन का केन्द्र हैं। शिव इसलिए नहीं हैं कि उनके साथ और बहुत सारे किस्से जोड़ दो। शिव इसलिए हैं ताकि हम अपने किस्सों से मुक्ति पा सकें। शिव कोई देवता, भगवान या ईश्वर नहीं हैं, शिव सत्य मात्र हैं।

समाज ने हमें सिखाया है कि खुश रहना चाहिए। इस सीख को हमने इतना सोख लिया है कि यह बात बिल्कुल अंदर तक पैठ गई है। और जो जितना प्रकट करे कि वह प्रसन्न है, उसके बारे में जान लीजिएगा कि वह आनंदित तो नहीं ही है, वह वास्तव में भीतर से दुखी है। प्रकृति में सुख का अर्थ होता है 'भोग'। तो जो आपको सिखा रहे हैं कि हमेशा हैप्पी नज़र आओ, वे वही लोग हैं जो आपको भोग की तरफ़ प्रेरित कर रहे हैं।

शरीर की निर्मिति ही ऐसी है कि वासना इसे सताएगी, वासना के बीज इसी में मौजूद हैं। शरीर को आराम दे दो, रोटी दे दो और इसे सेक्स दे दो, इसके अलावा इसे कुछ नहीं चाहिए। जीवन के पल-पल को ऊँचे-से-ऊँचे काम से परिपूर्ण रखो। कोई भी ऐसा काम जिसमें स्वार्थ न हो, जिसमें करुणा हो, रचनात्मकता हो, संगीत हो — ये सब ऊँचे काम हैं। खाली मत रहो, जो खाली होगा, वही फँसेगा।

महिलाओं को यह जानना चाहिए कि तन और मन में प्राथमिकता हमेशा मन की है, क्योंकि आप देह नहीं हैं, आप चेतना हैं। कोई आपकी देह के ख़िलाफ़ अपराध कर दे—बलात्कार वगैरह—तो वह निश्चित रूप से एक अपराध है, पर उससे कहीं बड़ा अपराध यह है कि कोई आपकी चेतना को सीमित और संकुचित कर दे, आपको पढ़ने-लिखने न दे, आपके पर कतर दे, आपको जीवन में अनुभव न लेने दे, या आपको घर में क़ैद कर दे। यह बलात्कार से कहीं अधिक जघन्य अपराध है।

जीवन को सँभालकर रखो तब तक, जब तक मुक्ति नहीं मिल जाती; लेकिन जीवन को सँभालने का उद्देश्य जीवन को लंबा ही करना कभी नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य जीवन की लंबाई नहीं है; जीवन का उद्देश्य जीवन से मुक्ति है।