वासना गलत है तो भगवान ने बनाई क्यों? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, आध्यात्मिक साहित्य हैं या पढ़ते-पढ़ते आ रहे हैं, उसमें साधु-संत ने कामवासना को ग़लत बताया और नियंत्रण की सलाह दी। तो यदि ये ग़लत है तो ये काम है ही क्यों? और हमें यौनांग मिला ही क्यों?
आचार्य प्रशांत: उसी में एक बात और कहते हैं। कहते हैं, 'भगवान ने क्यों बनाई?' अगर ये चीज़ इतनी बुरी होती तो भगवान इसको बनाते ही क्यों?' मैं भगवान की बात इसलिए ला रहा हूँ क्योंकि किसने बनाई ये जानना ज़रूरी है, ये समझने के लिए कि क्या है।
प्राकृतिक चीज़ है, ये प्रकृति ने दी है; भगवान इत्यादि से नहीं आई है। क्यों है? शरीर को है। तुम सिर्फ़ ये नहीं पूछते न कि क्यों है! तुम कहते हो, 'अगर बुरी है तो मुझमे क्यों है।' तुम में नहीं है, शरीर में है। ग़लती इसमें नहीं है कि वासना वगैरा है। ग़लती इसमें है कि तुम सोच रहे हो कि तुमको है; तुमको नहीं है, शरीर को है।
तुम्हारा प्रश्न ये है कि ये अगर ग़लत चीज़ है तो है ही क्यों। वो अपनेआप में चीज़ ग़लत नहीं है, शरीर के लिए है और शरीर के लिए उपयोगी है क्योंकि शरीर को आगे बढ़ना है। शरीर को आगे बढ़ना है तो उसके लिए उसे वासना चाहिए। शरीर के लिए है और शरीर के लिए ठीक है। तुम्हारे लिए ग़लत है क्योंकि तुम शरीर नहीं हो। और तुम शरीर के चक्करों में जब फँस जाते हो तो दुःख पाते हो।
शरीर तो एक यंत्र है, एक उपकरण है जिसको अपना काम करना है। प्रकृति ने उसको बना दिया है, उसको अपना काम पूरा करना है, काम पूरा करके उसकी एक्सपायरी (ख़त्म होना) हो जानी है। वो बनी-बनाई चीज़ है, प्रकृति की फैक्ट्री से आती है, पहले से ही उसमें एक्सपायरी डेट लिखी होती है और चली जाती है; ये शरीर का काम है।


