
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥” पूर्ण से पूर्ण आया है, इसको ऐसे समझिए कि कुछ भी कहीं से नहीं आया है — जो है, सामने है। तुम उसकी उत्पत्ति जानने की चेष्टा मत करो, क्योंकि उसकी कोई उत्पत्ति हुई ही नहीं है। हम ऐसे लोग हैं जिन्हें कुछ पता नहीं, पर दावा लगातार यही है कि पता है। शांति मंत्र तुम्हें बता रहा है कि ज़रा विनय धरो — जब नहीं जानते, तो चुपचाप कहो कि नहीं जानते, और इस ‘न जानने’ में बड़ा जानना है।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।


“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।

लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।

सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।

सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।

समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।

आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।

धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।

लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।

आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।

पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।

अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।

लोग ऋषिकेश शांति या आत्मबोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी वही तनावपूर्ण और भ्रमित जीवनशैली को बनाए रखने के लिए आते हैं। महादेव का अर्थ अंत और अहंकार की समाप्ति है, पर तीर्थ भी मनोरंजन और पलायन का साधन बन गया है। दुख से मुक्त होने के बजाय लोग उसी दुख को बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं।

बंगाल चुनाव सिर्फ़ सत्ता का संघर्ष नहीं, एक विचारधारा की थकान का भी संकेत हैं। मार्क्सवाद ने मनुष्य को वर्गों में बाँटकर यह मान लिया कि उसकी चेतना जन्म और परिस्थितियों से तय होती है। लेकिन इतिहास बार-बार दिखाता है कि इंसान कठपुतली नहीं है। अगर चेतना सिर्फ़ वर्ग से तय होती, तो स्वयं मार्क्स, विवेकानंद, कबीर या राजा राममोहन राय जैसे लोग अपने ही वर्ग के विरुद्ध खड़े कैसे होते?

आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।

आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।

आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।

मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।

आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।

अहंकार मनुष्य की मूल समस्या है। हम ज्ञान समझते हैं पर उस पर चल नहीं पाते क्योंकि अहंकार को अपनी पहचान के लिए दूसरों की आवश्यकता है। परिवार, समाज, विचारधारा से हम सौदा करते हैं - अपनी स्वतंत्रता बेचते हैं। सच्चा प्रेम स्वयं को और दूसरों को मुक्त करना है, न कि बंधन में रखना। ईमानदारी से अपने झूठ को देखना ही सत्य है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

जिसको जितना होता है, उतना पूरा नहीं लग रहा। हर आदमी अपनी चादर थोड़ा और फैलाना चाहता है, बस यही बात है। साधारण-सी चीज़ है कामना, कामना पूरी करने के लिए अगर इधर-उधर के तरीकों का इस्तेमाल करना पड़े, तो आदमी कर लेता है। उसमें दो चीज़ें होती हैं, एक तो जो आपकी व्यवस्था है या तो वो इतनी साफ़, सही और सख़्त हो कि वो गुंजाइश ही न छोड़े अवैध या अनैतिक तरीकों की, तो भी भ्रष्टाचार नहीं होगा।

भारत कोई ज़मीन का टुकड़ा तो है नहीं। जैसे भारतवासी आज के हैं, आज का भारत भी वैसा ही होगा। यहाँ हवा गंदी है, क्योंकि भीतर से हम गंदे हैं। सड़कों पर गड्ढे हैं, क्योंकि हम गड्ढे हैं। बाहर जो कुछ होता है, वो आपके भीतरी जगत का प्रतिबिंब होता है, एक अर्थ में। इंसान जगेगा, तो ये नज़ारा बदलेगा। जो तुम्हारी वास्तविक हालत है, उसको आँखें खोल करके देखो। उसको देख लोगे, तो फिर उससे आगे निकलने का रास्ता मिल जाएगा।

समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”

ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते।

गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।

टोटल जीडीपी हमारा इसलिए हाई नहीं है कि भारत अमीर हो गया है। वह इसलिए हाई है क्योंकि यहाँ जनसंख्या बहुत है और मुट्ठी भर लोग हैं, जिनके पास अंधाधुंध दौलत है। पॉल्यूशन और पॉपुलेशन, इनका चोली-दामन का साथ है। तुम्हें बहुत कम जगह मिलेंगी जहाँ पॉपुलेशन नहीं है, पर पॉल्यूशन है। इतने लोग हो जाएँगे, कैसे उनको गरिमा की ज़िंदगी मिल सकती है? न हमें वह ग़रीबी चाहिए, जिसमें एक ऐसे 8×8 के क्षेत्र में चार लोग रह रहे हों। न वह अमीरी चाहिए कि एक आदमी कार में चल रहा है और दुनिया भर पर धुआँ छोड़ता हुआ चल रहा है। सस्टेनेबिलिटी चाहिए।

जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…

लोगों को लगता है, संविधान तो हमारा दुनिया के बाकी कॉन्स्टिट्यूशन से इंस्पायर्ड है; नहीं, तुम्हारा संविधान तुम्हारी मिट्टी से उठा है। जिस देश के केंद्र में आत्मा हो, वहाँ लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रेटरनिटी अपने आप आ जाती हैं। फ्रीडम, जो कि उच्चतम आध्यात्मिक बात होती है, देखिए आपका संविधान उसको कितना महत्व देता है। भारत इस अर्थ में थोड़ा-सा विशेष राष्ट्र है। भारत का संविधान उदार है, ऊँचा है। क्योंकि हम आध्यात्मिक लोग थे, इसलिए हम इतना उदार संविधान अपना पाए।

यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।

सुभाषचन्द्र बोस के जीवन में वेदान्त कितना केंद्रीय था, ये बात आमतौर पर सामने नहीं आती है। उनका मन सदा संघर्ष की ओर था। उपनिषद उनके जीवन में आए, और एकदम एक नई शुरुआत हो गई। वो भयानक विद्रोही हो गए थे, और संघर्ष से नीचे वो कोई चीज मानते नहीं थे। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, ऐसे ही कोई ड्रेस पहन के खड़ा हो जाता है, नेताजी कहला जाता है, ऐसा नहीं होता। जान पर खेलना पड़ता है; किसी और से खून मांगने से पहले अपना खून बहाना पड़ता है। इसको साधना बोलते हैं। वेदान्त ये साधना सिखाता है।

हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि बना लेते हैं कि संघर्ष या दबाव सिर्फ़ व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दबाव और संघर्ष अध्यात्म में भी उतने ही करने पड़ते हैं, जितने कि संसार में, बस उसकी श्रेणी, उसकी गुणवत्ता अलग है। बाहर तुम दबाव झेलते हो कुछ और अतिरिक्त हासिल कर लेने के लिए, और अध्यात्म में, जिसको तुमने नाहक पा लिया है, वह दबाव बनाता है कि मुझे मत छोड़ो। भीतर वाली लड़ाई जीत लो, बाहर की सब लड़ाइयाँ तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गई हैं।

“क्या राष्ट्रवाद एक बीमारी ही नहीं है?” उस सवाल को अब आप ज़रा दूसरे तरीके से रखिए। वो सवाल ये है, कि क्या आदमी और आदमी के संबंध बीमार नहीं हैं? तो होगा राष्ट्र दस करोड़ लोगों का, चाहे सौ करोड़ लोगों का, लेकिन उसके केंद्र में तो उसके एक-एक सदस्य की, व्यक्ति की आत्म-परिभाषा बैठी हुई है। जो आप अपने बारे में सोचते हैं, उसी आधार पर आप दूसरे संबंध बनाते हैं, और उसी आधार पर फिर आप व्यापक, विस्तृत तौर पर एक राष्ट्र खड़ा कर लेते हैं।

तुम कहीं गए, तुमने किसी की चरण स्पर्श कर लिए। यह कोई सम्मान है? यह आदर है। सम्मान दूसरी बात है। सम्मान का अर्थ होता है, ध्यान से समझना। जो अपने मन की समझ नहीं रख सकता, वह किसी और को कैसे समझ जाएगा? पर दावा हमारा यह है कि हम दूसरे का सम्मान करते हैं। दूसरे का सम्मान तो तब हो जब आत्म-सम्मान हो। आत्म-सम्मान मतलब खुद को समझना। पहले अपना सम्मान कर लो। अपना सम्मान मतलब, आत्म-ज्ञान! आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान है।

दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।

भाषा तो उतनी ही सशक्त हो पाएगी, जितने शक्तिशाली उसको बोलने वाले लोग हैं। हिंदी नहीं पीछे हट गई है; हिंदी बोलने वाले सब कायर हैं। इनको अपनी हस्ती पर ही शंका होनी शुरू हो जाती है, जब सामने कोई अंग्रेज़ी बोल देता है। विचार और चेतना के तल पर ऊँचे स्तर की सामग्री सब आपको अंग्रेज़ी में मिलेगी, और हिंदी हमने छोड़ दी है गाली-गलौज करने वालों और रोस्टर्स के हाथों में। ये बीमारी अब छोटे-छोटे कस्बों में, गाँवों में भी पहुँच रही है। अंग्रेज़ी सीखना एक बात है, अंग्रेज बन जाना बिल्कुल दूसरी बात है ना।

बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।

मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

दो तरह का शोषण चलता आया है धर्म के नाम पर, एक, महिलाओं का; और एक, तथाकथित निचली जातियों और वर्णों का। और लोकधर्म की लगभग बुनियाद है ये शोषण। अब लोकधर्म अगर जात-पात, छुआ-छूत और स्त्री-शोषण, इनके बिना चल ही नहीं सकता; तो जहाँ कहीं भी स्त्रियों को उठाने की बात आएगी और जाति को हटाने की बात आएगी, लोकधर्म उससे बहुत ख़ौफ़ खाएगा। ख़ौफ़ खाएगा और उस बात को कह देगा? ये लेफ्टिस्ट बात है।

कोई आपसे बोले कि कोई आदमी आपसे मिलने आ रहा है और वो धार्मिक है, तो तत्काल बताइए, आप क्या कल्पना करते हैं? कोई ज्ञानी आ रहा है? कोई विद्वान मिलने आ रहा है? तत्काल मन में क्या छवि आती है? एक भावुक-सा आदमी आएगा। यही हमारे साथ सबसे बड़ी गलत बात हुई, हम भावना का देश बन गए, और उसी भावना को फिर हमने धर्म भी बना लिया। और भावना से जो धर्म चलता है, वो फिर अंधभक्ति का धर्म होता है। यही दुर्भाग्य हो गया भारत का, ज्ञान का कोई सम्मान नहीं। जबकि धर्म का अर्थ ही ज्ञान होता है।

आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।

आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।

अब सोशल मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दौर है; बहुत ही व्यर्थ तरीक़े का राष्ट्रवाद। आज जो जितना ज़्यादा अज्ञानी है, वो उतनी ऐंठ में घूम रहा है। एक बहुत अनपढ़ क़िस्म की भीड़ है, जो भारत के राष्ट्रीय जीवन पर छाती जा रही है। गंदी आदतें जगह बदलने से छूट नहीं जातीं। बाहर हिंदुस्तान को इज़्ज़त भी ख़ूब मिली है, पर बाहर उन भारतीयों को इज़्ज़त मिली है जो इज़्ज़त पाने के लायक़ हैं। जो वहाँ पर जाकर गंदगी मचाएँगे, उनको थोड़ी इज़्ज़त दे देंगे? हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम दोबारा हर क्षेत्र में दुनिया में चमकें। पर वो सब करना ध्यान और श्रम का काम है, नारेबाज़ी का काम नहीं है।

धर्म होता है ख़ुद को समझने के लिए, ताकि आपकी चेतना उड़ान ले सके। समझ में आ रही है बात? और यही दो कोटियों के लोग होते हैं दुनिया में; एक, वो जो अपने पुराने ढर्रों पर चल रहे हैं इन्हें आप बोल सकते हैं अधार्मिक लोग। वह पुराने ढर्रे दो तरीक़ों के हो सकते हैं — ये बात बहुत रोचक लगेगी बहुत लोगों को। जो पुराने शारीरिक ढर्रे पर चल रहा है, वो तो अधार्मिक है ही। लेकिन जो पुराने सामाजिक ढर्रे पर भी चल रहा है, वो भी अधार्मिक है। धर्म किसी ढर्रे का नाम नहीं होता, धर्म जानने का नाम होता है।

आपको क्या लगता है, यह जो अलग-अलग तरह के स्पोर्ट्स हैं, यह क्यों इतने प्रचलित हो गए? क्योंकि स्पोर्ट्स होगा तभी तो ऐड होगा। वह विज्ञापन बेचने का ज़रिया है और विज्ञापनदाता ऐसे नए-नए ज़रिए खोजते रहेंगे। चाहे वह विज्ञापन हो, चाहे बाबा जी की PR हो, चाहे आपको धार्मिक आधार पर भड़काने वाला कोई WhatsApp फ़ॉरवर्ड हो, वह सब बहुत केयरफुली क्राफ्टेड होते हैं। बहुत सतर्क रहा करिए, बहुत सतर्क; सब कुछ सिर्फ़ इसलिए है ताकि कोई आपसे अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।