“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥” पूर्ण से पूर्ण आया है, इसको ऐसे समझिए कि कुछ भी कहीं से नहीं आया है — जो है, सामने है। तुम उसकी उत्पत्ति जानने की चेष्टा मत करो, क्योंकि उसकी कोई उत्पत्ति हुई ही नहीं है। हम ऐसे लोग हैं जिन्हें कुछ पता नहीं, पर दावा लगातार यही है कि पता है। शांति मंत्र तुम्हें बता रहा है कि ज़रा विनय धरो — जब नहीं जानते, तो चुपचाप कहो कि नहीं जानते, और इस ‘न जानने’ में बड़ा जानना है।
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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
~ शान्तिपाठ, ईशावास्योपनिषद्
प्रश्नकर्ता: सर, आप जब अभी शांति मंत्र समझा रहे थे — “पूर्णमदः पूर्णमिदं”, पूर्ण से ही पूर्ण आया है तो इसके विपरीत एक बात उठी मेरे मन में जब आप ये समझा रहे थे, कि इज़ इट जस्ट नॉट ओनली लॉजिकल फुलफिलमेंट ऑफ फाइनल क्वेश्चन? क्योंकि हम हमेशा प्रश्न पूछते रहेंगे यह चीज़ किससे है, यह किससे आई है, यह किससे आई है तो अंतिम प्रश्न भी यही बनेगा। उसके लिए यह तर्क रख दिया कि इनफ़िनिट से इनफ़िनिट प्लस हो सकता है, इनफ़िनिट से इनफ़िनिट माइनस हो सकता है, इसलिए पूर्णमदः पूर्णमिदं।




