हम बार-बार क्यों हार जाते हैं?

Acharya Prashant

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हम बार-बार क्यों हार जाते हैं?
समझ आ गया जैसा कुछ नहीं होता है, समझते रहना होता है, एक सतत प्रक्रिया है। दुनिया को समझना है न, तो स्वयं को समझ लो, पर्याप्त होता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम सौम्य है, मैं भुवनेश्वर, ओडिशा से हूँ। हमको पता चला कि आज के सत्र से, कि जो भी अनित्य है वो हमेशा हमको धोखा देती है एण्ड ज्ञान से हम जब उसको देखते हैं, तो हमको नित्य एण्ड अनित्य, अनित्य में भेद पता चलता है। बट फिर भी हम देखते हैं कि जो भी मार्केट में, कि बाज़ार में जो भी कुछ नया प्रॉडक्ट कुछ भी आया, तो लोग मतलब कुछ सोचे बगैर, कुछ भी किए बगैर उस पर मतलब उसके पीछे भागने लगते हैं। स्टार्ट टू हॉपिंग फ्रॉम ए टू बी एण्ड बी टू सी। वो कभी भी देखते नहीं हैं कि इसमें कुछ मिलेगा कि नहीं, नित्य है कि अनित्य है। वो धोखा बार-बार खाते हुए भी, वो वही उसके पीछे जाते हैं।

उसके लिए उनको मतलब बहुत ही, जैसे कि साइबर फ्रॉड हो गया, उनको फेस करना पड़ता है। पर स्टिल वो उसके पीछे भागते हैं। एण्ड वो हम देखते हैं कि धर्म के क्षेत्र में जो बाबा जी लोग हैं, वो भी बोलते हैं कि, “तुम इसको करो, ये वाला पत्थर वग़ैरह इसको पहन लो, वो वाला कर लो तुमको कुछ मिल जाएगा, वो मिल जाएगा।” तो मतलब जानते हैं कि इससे कुछ नहीं मिलेगा, इतना ईज़ी है कि तुम देख सकते हो कि नहीं इससे कुछ नहीं मिलने वाला है, बट स्टिल वो जानते हैं, उसके पीछे तो ऐसे क्यों होता है? ऐसे मतलब जान जाते हुए भी जाते हैं, भागते हैं।

आचार्य प्रशांत: अपनी बात करो ना, दुनिया जाती है तो जाती है, तुम क्यों जाते हो? मुस्कान (श्रोता मुस्कुराते हैं) अपनी बात आते, सब क्यूट हो जाते हैं। “झिलमिल सितारों-सा आँगन हो,” देखो-देखो चीखता हुआ मौन, और कितनी इन्होंने वाक्पटुता से, “वो दूसरे लोग ऐसे करते हैं, ऐसे भागते हैं।” मैंने कहा, तुम क्यों भागते हो? तो “रिमझिम बरसता सावन होगा” जैसे बेटा, तुमको अपने अँगना में सावन बरसाना है, वैसे ही पूरी दुनिया को बरसाना है। यही जवाब है।

दुनिया को समझना है न, तो स्वयं को समझ लो, पर्याप्त होता है।

स्वयं को समझे बिना दुनिया को लेकर प्रश्न करना क्या लाभ है? भागे हो कि नहीं भागे हो? अच्छे से मुंडी हिला दो, गर्दन को कुछ व्यायाम भी मिलेगा। भागे हो न?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: तो वैसे ही जैसे एक जीव है, वही मूल वृत्त सब जीवों में है। महामाया सब में बैठी हुई है। क्या हो जाता है जब सामने विषय कोई आता है, एकदम धोबीपाट, है न? जैसे नए-नवेले किसी 35 किलो के पहलवान को हैवी वेट खड़ा कर दिया गया हो बॉक्सिंग रिंग में टायसन के सामने। सोचो, सोचने में ही फूल खिल जा रहे हैं, बॉक्सिंग वाला लंबा कच्छा पहनकर, नॉकआउट! डेढ़ सेकंड में नॉकआउट! यही हालत होती है न विषय के सामने? डेढ़ सेकंड में नॉकआउट! तो बस।

टायसन की भी गलती नहीं है, टायसन को हराया भी बहुतों ने था। होलीफील्ड ने अच्छे से हराया था। हराया था न होलीफील्ड ने? हाँ, मेरे ख़्याल से दो बार हराया था। बात ये नहीं है कि विषय टायसन है। बात ये है कि तुमने अभ्यास कर रखा है 35 किलो के बने रहने का, तो जब विषय सामने आते हैं, तो तुमको उड़ा ले जाते हैं। ठीक बोल रहा हूँ?

और दोष हम फिर विषय को दे देते हैं, “कि मैं क्या करूँ, दैट कास्ट अ स्पेल, आई वॉज़ चार्म्ड, आई वॉज़ स्वेप्ट ऑफ़ माय फीट।” कुछ भी बात नहीं है। उस क्षण में कुछ नहीं हुआ। तुम डेढ़ जो सेकंड का वो अंतराल था, उसको क्यों तुम दोष दे रहे हो, कि उस डेढ़ सेकंड में मुझे इतनी ज़ोर का पड़ा कि मेरा नॉकआउट हो गया। तुमने जीवन भर बिल्कुल फ़ेदर वेट रहने का अभ्यास करा है, तो इसलिए विषय आकर तुम्हें ले जाते हैं। वो अभ्यास प्रतिपल होता है।

ज्ञानियों के यहाँ जाओ। क्या कहते हैं कबीर साहब? कहते हैं, कि ये जो माया है, इसको मैंने अपने यहाँ पर खाना बनाने के काम पर लगाया है, और ये आती है और कपड़ा-बर्तन करती है, चूल्हा-चौका करती है, झाड़ू-पोछा करती है, खाना बनाती है। इसको मैंने इस काम पर लगा लिया है। कहते हैं, कि खाट में बैठी थी, बहुत बड़ा फंदा लेकर के, और पूरी दुनिया को फँसा रही थी। फिर वहाँ कबीर गया, फँसा और इसका फंदा ही काट दिया। “गया कबीरा काट।।”

माया तो पापिन बड़ी, फंद ले बैठी हाट। सब जग जामे फांसियां, गया कबीरा काट।।

माया की बात नहीं है, तुम काटने वाले क्यों नहीं हो? और जैसे तुम काटने वाले नहीं हो, वैसे दुनिया नहीं काटती। दुनिया को देखो, दुनिया की मूर्खताओं को, तो अपना स्मरण आ जाना चाहिए न, “मैं भी वैसा ही तो हूँ।” थोड़ा ऊपर-थोड़ा नीचे, उन्नीस-बीस का मामला है। आ रही है बात समझ में?

तुम बड़ी लड़ाइयाँ कोई एक झक नहीं हार जाते हो, नेवर ऐट वन्स। तुमने पल-पल छोटी-छोटी लड़ाइयाँ हार कर के बड़ा गहन अभ्यास करा होता है बड़ी लड़ाई हारने का। पर जब छोटी लड़ाई तुम हारते हो या घुटने टेकते हो, तब तुम्हें ज़रा बुरा नहीं लगता। तब तुम्हें लगता है, ये तो चीज़ ही छोटी-सी थी।

जिम गए हो? ट्रेनर बोल रहा है, कि “अभी रुकिए, वेट्स नीचे नहीं रखने हैं, 15 रैप्स करिए, अभी आपके 12 ही हुए हैं।” तो वो बोल रहा होगा, “अब नहीं हो रहा।” ये तुमने अभ्यास कर लिया न हारने का, और तुमको लगता है ये छोटी-सी बात है, कुछ है ही नहीं। मर जाते तीन और कर लेते? पर तुमने अभ्यास कर लिया हारने का। ये छोटे-छोटे अभ्यास करके फिर तुम्हारे सामने जब कोई विज्ञापनदाता, कोई व्यापारी, कोई विक्रेता कोई लुभावना विषय लेकर आता है, तो तुम बह निकलते हो।

मना करा गया है, इतने बजे के बाद मत खाना, लीवर, आँते में कुछ ख़राब है। अब रात में भूख लगी, जाकर, “हीं हीं हीं, थोड़ा-सा ही तो खाना है।” फ़्रिज में रोटी रखी थी, निकाल के खा ली। अच्छा लगता है, “पापी पेट है, चोरी थोड़ी करी है, डाका थोड़ी डाला है, ख़ून थोड़ी किया है, एक रोटी ही तो खाई है वो भी अपने ही फ़्रिज से।” ये तुमने हारने का अभ्यास कर लिया।

कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने नालायकी करी और उसे कर्मफल मिलना चाहिए, और तुम भी जानते हो नालायकी। तुम्हें दिख रहा है कि उसको यदि यहीं पर फल नहीं मिलता है, तो वो और नालायक बनेगा। पर फिर वो सारी नालायकी करके तुम्हारे सामने लाल गुलाब लेकर आ जाता है, उछाल कर के दो-चार चुंबन फेंकता है, और तुम माफ़ कर देते हो, घुटने टेक देते हो। ये तुमने हारने का अभ्यास कर लिया, और दुनिया का हर व्यापारी, हर विक्रेता जानता है कि तुम हारे हुए लोग हो। उसको तुम्हें बस कुछ चीज़ें ऐसे गाजर की तरह लटकानी हैं, और तुम वहाँ चले जाओगे। दोष उसको मत देना, दोष अपनी दिन-प्रतिदिन की हारों को देना। हर छोटी-छोटी चीज़ में हारने का अभ्यास और क्या बोल कर हार को स्वीकार करना? “अरे, छोटी-सी तो चीज़ है।”

तो एक बात बताओ लाला, छोटी-सी चीज़ है तो तुम हार गए और दलील दे रहे हो कि छोटी-सी ही तो चीज़ है इसलिए हार गए। तो जब तुम छोटी-सी चीज़ में भी हार रहे हो…

श्रोता: बड़ी चीज़ में तो हारोगे ही।

आचार्य प्रशांत: तो बड़ी चीज़ में तो हारोगे ही। क्या कुतर्क कर रहे हो, कि “छोटी-सी चीज़ है, अगर हार भी गए तो इसमें इतना क्या अड़ना।” जब तुम छोटी-सी चीज़ में भी नहीं अड़ पा रहे, तुम बड़ी चीज़ में क्या अड़ोगे? पर तुम्हारा तर्क उल्टा चलता है। कहते हो, “नहीं, छोटी-सी चीज़ है इसमें।” भाई, सच्चाई की बात है न? नहीं, वो आकर के घर में ताऊ और फूफी कर रहे थे बकवास, पर हमने उपेक्षा करी। हमने कहा, छोटी-सी बात है।

क्यों उपेक्षा करी? तुम्हारे मुँह नहीं था? घरवाले जलील बातें कर रहे हैं बिल्कुल। तुम्हारे पास मुँह नहीं है? और उनके लिए भी तुम कुछ अच्छा ही करोगे अगर तुम उनकी बातों को काट दोगे, उनके अँधेरे पर थोड़ी रोशनी डाल दोगे, उनका भी भला होगा। पर तुम कहते हो, “नहीं, छोटी-सी बात है, हमने बहस में पड़ना सही नहीं समझा।” बहस में पड़ना चाहिए। “नहीं, वो फलाना हमारा व्हॉट्सऐप ग्रुप है और उस पर नालायकी चलती रहती है, हमने ग्रुप ही छोड़ दिया।” क्यों छोड़ दिया? क्यों छोड़ दिया? जिन्हें सफ़ाई करनी हो, उन्हें तो गंदी जगह ढूँढ-ढूँढ कर प्रवेश करना चाहिए, करना चाहिए न? तुम छोड़ के आ गए। क्यों छोड़ कर आ गए? रुको, अंगद की तरह पाँव जमाओ, और गर्जना करो।

पर यही तुम आदत डाल लेते हो, पीछे हटने की। देखो, बैटल ट्रिवियल वही है, व्हेन इट इज़ अ बैटल फ़ॉर द ट्रिवियल। छोटी लड़ाई का मतलब ये नहीं है कि थोड़ी-सी बहस। छोटी लड़ाई का मतलब है, छोटी बात के लिए लड़ाई। जहाँ सत्य मुद्दा हो, वहाँ कोई लड़ाई छोटी नहीं होती। मैंने तुम्हें छोटी लड़ाइयों से पीछे हटने को कहा है, और छोटी लड़ाई से मेरा आशय है बैटल फ़ॉर द ट्रिवियल। छोटे मुद्दे के लिए जहाँ कहीं भी रस्साकशी चल रही हो, वहाँ पीछे हट जाओ। हमें नहीं पड़ना इसमें।

दुकान में खड़े हों, “नहीं भैया, पहले मेरा माल तो लीजिए।” आप तुलवा लीजिए पहले, ये इतनी बड़ी बात नहीं है कि इसके लिए हम आपसे बहस करें, ले लीजिए, आप ही ले लीजिए। हमें पता है कि आप पीछे से ज़बरदस्ती आए हैं, पर आप ले लीजिए। हमें इसमें नहीं पड़ना, क्योंकि दिस वन इज़ अ बैटल फ़ॉर द ट्रिवियल।

पर जहाँ कहीं भी मुद्दा सत्य होगा, वहाँ पर लड़ाई छोटी नहीं हो सकती क्योंकि सत्य बहुत बड़ा है। वहाँ पीछे मत हट जाना यह कह के, कि “ये तो छोटी-सी बात है, इसमें हम क्यों उलझें।” उलझो, उलझना सीखो। बड़ी चीज़ के लिए लड़ी जा रही लड़ाई कभी छोटी नहीं हो सकती। कुछ आ रही है बात समझ में?

जल्दी से रिवर्स गियर मत लगा दिया करो, अड़ना सीखो और बढ़ना भी सीखो। कि जहाँ कहीं कुछ सामने आया, किसी ने थोड़ी दबंगई दिखाई, वहाँ तुरंत क्या करा? रिट्रीट? नहीं। हाँ कोई व्यक्तिगत स्वार्थ की बात हो, हट जाओ पीछे। इसमें कोई अगर कुछ हमारा कर भी गया, तो व्यक्तिगत बात थी झेल लेंगे, इसमें सत्य दाँव पर नहीं लगा था। कोई बात नहीं।

तुम्हारा डोसा रखा था, कोई आकर आधा उड़ा ले गया या पूरा भी ले गया, तुम्हें भूखा रहना पड़ेगा, ठीक है। डोसा ही तो है। छोटे मुद्दे के लिए बड़ी लड़ाई भी छोटी है, उसको छोड़ देना। भले ही उसके लिए विश्वयुद्ध हो रहा हो। छोटे मुद्दे के लिए लड़ी गई बड़ी लड़ाई को भी छोटा जान कर छोड़ देना, भले ही वो विश्वयुद्ध हो। और बड़े मुद्दे के लिए अगर छोटी-सी भी लड़ाई हो रही हो, तो तुमने सत्यद्रोह करा है कदम अपना ज़रा-सा भी पीछे खींच कर।

और कुछ?

एकदम तुमने रेलगाड़ी की तरह शुरुआत करी थी, धड़-धड़-धड़, “दुनिया ऐसी है, लोग जलील हैं, ये करते हैं, वो करते हैं।” और तब से ऐसा लग रहा है कि तुम्हें बत्ती ही नहीं मिल रही आगे बढ़ने की, एकदम वहीं रुक ही गए।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा एक फ़ॉलो क्वेश्चन भी था, कि जैसे कि जिम जाना और शुगर ज़्यादा मत खाना, ये भी तो ट्रिवियल बैटल्स हो गया न। तो इसको लड़ना है कि नहीं लड़ना है?

आचार्य प्रशांत: तुम बताओ न। जिम और शुगर दोनों का संबंध तुम्हारी देह से है। तुम्हारी देह अगर किसी ट्रिवियल काम के लिए ही है, तुम्हारी ज़िंदगी अगर ट्रिविया को समर्पित है तो क्या ज़रूरत है इस देह का ख़्याल रखने की? परसों मरेगी, कल मर जाए। निर्भर करता है, क्योंकि शुगर और जिम दोनों का रिश्ता किससे है? देह से है।

तो तुमने अपनी देह किसको समर्पित कर रखी है? तुम्हारी देह है ही इसीलिए कि दुनिया को भोगूँगा, जानवर मारूँगा, जंगल काटूँगा, बच्चे पैदा करूँगा, ये वो आग लगाऊँगा, यही है साधारण, मुझे झुनू की ज़िंदगी जीनी है। अगर इसलिए तुम्हारी देह है, तो फिर तो कोई बात नहीं। शक्कर का पूरा बोरा खा जाओ, धरती का बोझ हल्का करो, जल्दी से जल्दी विदा हो जाओ।

पर अगर तुम्हारी देह किसी सार्थक उद्यम के लिए है, तुम्हारी ज़िंदगी का कोई औचित्य है असली, तो फिर देह की लड़ाई लड़ना बनता है। फिर अपने आप से पूछा करो, कि ये जो देह है मेरी, ये क्या मेरे लिए है? नहीं। ये देह तो इस दुनिया के लिए है न। इस देह पर न जाने क्या-क्या आश्रित है। तो इस देह को अगर मैं बर्बाद कर रहा हूँ, तो फिर तो मैंने न जाने कितनों को बर्बाद कर दिया।

लाख जानवर हैं जो मेरी इस देह के भरोसे जी रहे हैं, जिनकी ज़िंदगी ये देह बचा सकती है। लाख लोग हैं जिनको रोशनी ये देह दिखा सकती है। तो ये देह मेरी निजी तो हुई नहीं, ये देह तो अब सार्वजनिक है, बहुतों की है ये देह। तो मुझे इस देह को थोड़ा बचा लेना चाहिए। फिर इस देह के लिए अड़ना सीखो। तो निर्भर करता है कि तुम्हारी देह किसके लिए है। ज़्यादातर लोगों की देह बस उन्हीं के लिए होती है। तो उनको तो मैं कहूँगा, जिम के पैसे बचाओ। क्या कर रहे हो तुम ये? तुम ₹1000 जिम में देते हो? बचाओ, बचाओ। उससे शक्कर ख़रीदो, खूब खाओ और साल ख़त्म होने से पहले खुशख़बरी सुनाओ। और कुछ? समाधिस्थ?

प्रश्नकर्ता: नहीं सर, समझ में आ गया। धन्यवाद।

आचार्य प्रशांत: लोग कितने-कितने सौभाग्यशाली होते हैं, उन्हें इतनी जल्दी समझ में आ जाता है। मुझे तो आज तक नहीं समझ में आया।

बेटा, यात्रा पर रहना, समझ कोई मुकाम नहीं होती। “ये समझ आ गया।” जैसे ट्रेन में कहते हो, कि “अब कानपुर आ गया।”

समझ आ गया जैसा कुछ नहीं होता है, समझते रहना होता है, एक सतत प्रक्रिया है।

ठीक है? समझते रहो। इतना प्यारा आशीर्वाद भी है न ये। ये थोड़ी, कि “आयुष्मान रहो,” कि “जीते रहो,” कि “फलते-फूलते रहो।” कितना प्यारा आशीर्वाद है — समझते रहो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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