समझ आ गया जैसा कुछ नहीं होता है, समझते रहना होता है, एक सतत प्रक्रिया है। दुनिया को समझना है न, तो स्वयं को समझ लो, पर्याप्त होता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम सौम्य है, मैं भुवनेश्वर, ओडिशा से हूँ। हमको पता चला कि आज के सत्र से, कि जो भी अनित्य है वो हमेशा हमको धोखा देती है एण्ड ज्ञान से हम जब उसको देखते हैं, तो हमको नित्य एण्ड अनित्य, अनित्य में भेद पता चलता है। बट फिर भी हम देखते हैं कि जो भी मार्केट में, कि बाज़ार में जो भी कुछ नया प्रॉडक्ट कुछ भी आया, तो लोग मतलब कुछ सोचे बगैर, कुछ भी किए बगैर उस पर मतलब उसके पीछे भागने लगते हैं। स्टार्ट टू हॉपिंग फ्रॉम ए टू बी एण्ड बी टू सी। वो कभी भी देखते नहीं हैं कि इसमें कुछ मिलेगा कि नहीं, नित्य है कि अनित्य है। वो धोखा बार-बार खाते हुए भी, वो वही उसके पीछे जाते हैं।
उसके लिए उनको मतलब बहुत ही, जैसे कि साइबर फ्रॉड हो गया, उनको फेस करना पड़ता है। पर स्टिल वो उसके पीछे भागते हैं। एण्ड वो हम देखते हैं कि धर्म के क्षेत्र में जो बाबा जी लोग हैं, वो भी बोलते हैं कि, “तुम इसको करो, ये वाला पत्थर वग़ैरह इसको पहन लो, वो वाला कर लो तुमको कुछ मिल जाएगा, वो मिल जाएगा।” तो मतलब जानते हैं कि इससे कुछ नहीं मिलेगा, इतना ईज़ी है कि तुम देख सकते हो कि नहीं इससे कुछ नहीं मिलने वाला है, बट स्टिल वो जानते हैं, उसके पीछे तो ऐसे क्यों होता है? ऐसे मतलब जान जाते हुए भी जाते हैं, भागते हैं।
आचार्य प्रशांत: अपनी बात करो ना, दुनिया जाती है तो जाती है, तुम क्यों जाते हो? मुस्कान




