और वो जो नियति है वो आपके चाहने से, कहने से बदलनी नहीं है। कौन जाने जितना भी है यूज़ मी। पूरा इस्तेमाल कर लो। मेरी परवाह नहीं करो। मेरा इस्तेमाल करो। पूरे तरीके से निचोड़ लो मुझको। और वही मैं चाह रहा हूं। इसमें कुछ ऐसा नहीं है कि मेरा शोषण हो जाएगा। मैं वही चाह रहा हूं। पूरे तरीके से एक-एक बूंद निचोड़ लो। शरीर जले तो बस शरीर जले। कुछ बचा नहीं। पहले ही सब निचुड़ गया था। यमाचार्य आके खड़े हुए। उन्हें कुछ मिला ही नहीं। खाली हाथ लौटना पड़ा। कहां गया इसका सारा माल? वो मैंने बांट दिया था। पहले ही बांट दिया था।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आज कबीर साहब का भजन एक गाना चाहेंगे शुरू में कि
’प्रेम प्याला जो पिए शीश दक्षिणा दे, लोभी शीश ना दे सके नाम प्रेम का ले।’
अभी बीच में हमने वही किया। शीश तो हम नहीं दे पा रहे हैं, प्यार का दावा कर रहे हैं आपसे। यही हमें समझ में आया कि गलती तो हो गई हमसे मोहब्बत में…
आचार्य प्रशांत: नहीं नहीं गलती आपसे पहले मैंने करी होगी। शीश देने में पहले कहीं मुझसे अभी थोड़ी चूक हो जा रही है।
प्रश्नकर्ता: लेकिन मैं अपनी देख पा रहा हूं कि प्रेम में गलती हुई है मुझसे।




