जवान हो, नाराज़ हो? देश बदलना चाहते हो? तो सुनो ये बात

Acharya Prashant

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जवान हो, नाराज़ हो? देश बदलना चाहते हो? तो सुनो ये बात
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्वेश्चन नहीं है, एक ऑब्जरवेशन है। तो फाउंडेशन बहुत सारे वीडियोज़ इंस्टाग्राम पर डालती है और हम जो सोशल मुद्दे होते हैं उस पर भी डालते हैं। तो जो नॉर्मल वीडियोज़ होते हैं, उसमें दो सौ से पाँच सौ कमेंट्स आते हैं। और जब ये सोशल मुद्दों वाले कमेंट्स होते हैं कोई-कोई, तो उसमें करीबन दस हज़ार कमेंट्स आ रहे हैं। सौ से दो सौ डायरेक्ट मैसेजेस आ रहे हैं। और जो जेन ज़ी हैं, वो ही सबसे ज़्यादा ये कमेंट्स और डीएम्स कर रहे हैं।

वो लिखते हैं कि, "अरे, हम तो बहुत ही डिसअपॉइंटेड हैं कि कुछ किया नहीं गया है या कुछ कर नहीं रहे हैं। तो प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़ कुछ करिए।" और मतलब, ये जो मैं बोल रही हूँ, वो एक-दो कमेंट्स नहीं हैं। दस हज़ार कमेंट्स आए हैं।

आचार्य प्रशांत: “देश की हालत बहुत ख़राब है। लेट्स डू समथिंग। एक्शन!”

देश में कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट तो नहीं है, कि कहीं और से बनकर आई चीज़ है और तुम्हारे पास जब आई, तो तुम्हें पता चला, "अरे, यह माल ख़राब आ गया है।" देश सुधारने की ज़रूरत है या पहले समझने की ज़रूरत है कि ख़राब हो कैसे गया। ख़राब तो हम ही ने किया है न। पर वो समझना है ही नहीं, क्योंकि समझने में फिर हम वैसे नहीं रह जाएँगे जैसे हम हैं। तो तलाश यही रहती है, इंतज़ार यही रहता है कि किसी तरीके से बाहर कुछ रोमांचक, उत्तेजक हो रहा हो, तो बाहर की दिशा में झट से दौड़ लगा दें। लगाओ दौड़, रुकना नहीं है, ठहरना नहीं है, समझना नहीं है।

एक बात भूल ही जाते हैं हम। कुछ भी सुधारना नहीं होता, जो बिगाड़ने वाला होता है उसको रोकना होता है। सुधार अपने आप में कोई नया-नया कर्म नहीं होता, सुधार बस पिछले कर्म के केंद्र की शुद्धि का नाम है। जिस केंद्र से तुम आज तक कर्म करते आए हो, अपने पूरे पिछले समय में, उस केंद्र से काम करना बंद कर दो। सुधार तो हो ही जाए। कुछ सुधारने की ज़रूरत थोड़ी है। ब्रह्मांड अपने आप में बहुत सुधरी हुई जगह है, मनुष्य की ही दुनिया बिगड़ी हुई है। एक जंगल भी सुधार नहीं माँगता; नदी, पर्वत, समुद्र, कुछ भी नहीं है जो सुधार माँगता हो। तो आपने सोचा कभी कि मनुष्यों की व्यवस्था को ही सुधार की ज़रूरत क्यों पड़ती है? क्योंकि मनुष्य अपने सारे काम, अपनी सारी चाल गलत केंद्र से चलता आया है। उस केंद्र को बदले बिना चाल की दिशा बदलने से स्थिति और ख़राब ही होगी, सुधरेगी नहीं।

आप क्या सोच रहे हो? देखो, मैं बताता हूँ। पक्षी यहाँ फँसा हुआ है, यहाँ इस तल पर। ठीक है? यहाँ उसकी जगह कहाँ है? आकाश में। वह फँसा हुआ है इस धरातल पर। उसकी जगह कहाँ है? आकाश। वो पारंपरिक रूप से ऐसे चलता रहा है, बाएँ की तरफ़। अभी वो कह रहा है, "नहीं, आज तक हमने जो करा वह गलत था, अब हम दाएँ चलेंगे।" हो गया आज़ाद हो गया या ग़ुलामी और गहरी हो गई?

पर आप लोगों को भी बड़ी उत्तेजना हो जाती है कि कुछ नया हो रहा है। नया हो रहा है क्या? क्या नया हो रहा है? क्या नया हो रहा है? केंद्र वही है। और यह नासमझी नहीं है, ये बेईमानी है। यह दाएँ से बाएँ का परिवर्तन सिर्फ़ इसलिए करा जा रहा है ताकि उड़ान ना भरनी पड़े। यह बेईमानी है। ऐसा नहीं है कि सचमुच उम्मीद है कि दाएँ से दिशा बदल के बाएँ की तरफ़ चले जाएँगे, तो कोई वास्तविक परिवर्तन आ जाएगा। ऐसी कोई वास्तविक उम्मीद है नहीं क्योंकि ऐसे वास्तविक परिवर्तन हमने बहुत करके देख लिए। बस एक चीज़ पर अहंकार का हठ है, ऊपर नहीं उठना है। ऊपर न उठने के लिए वो दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे, 360 डिग्री हर दिशा में चल के देख लेगा। इसलिए नहीं कि उसे उम्मीद है, इसलिए कि उसे हठ है कि ऊपर नहीं उठना है।

यह सब कुछ जो हो रहा है, यह ऊपर न उठने की साज़िश भर है। ऊपर नहीं उठना है। एक दिशा से दूसरी दिशा में चले जाएँगे; एक भीड़ का हिस्सा थे, अब दूसरी भीड़ का हिस्सा बन जाएँगे। जिसको सचमुच कुछ बदलना होता, वो यहाँ सत्रों में मौजूद होता न। तुम जो कुछ कर रहे हो, वो तुम्हारी साज़िश है कि कुछ बदले नहीं। और बदले तो अधिक से अधिक क्या बदले? कि कुर्सी वही पुरानी रहे, तंत्र वही पुराना रहे, कुर्सी पर बैठने वाला बदल जाए। कुल इतना बदलना चाहते हो तुम। और कुर्सी पर बैठने वाले बदल के तो हमने बहुत देख लिए। बदलते ही रहते हैं, उससे क्या बदल गया? कल जिसको कुर्सी पर बैठाते हो, दो-चार साल बाद उसी को तुम ही गाली देते हो। आज जिनको कुर्सी से उतारना चाहते हो, उनको कुर्सी पर बैठाया किसने है? तुम ही ने तो बैठाया है।

तुम नहीं बदलोगे, तो कुर्सी पर जिसको भी बैठाओगे, वो तुम्हारे ही जैसा तो होगा। पर यह नहीं समझ में आना, कहेंगे, "चलो बदलो।" अरे, बदलेंगे बाद में। पहले यह बताओ, जिस स्थिति को बदलना चाहते हो, वो स्थिति किसने पैदा करी? वो तो हम ही ने पैदा करी। माने तुम वही हो जिसने वह स्थिति पैदा करी और इतनी खराब स्थिति पैदा करी कि अब उसे बदलने की नौबत आ गई है। तो मतलब समझो कि तुम अभी भी जो स्थिति पैदा करोगे, दो साल बाद उसको भी बदलने के लिए फिर कोई और आकर के आंदोलन कर रहा होगा।

“देखो न, वो लोग क्या कर रहे हैं, महान काम कर रहे हैं।” और सारा अध्यात्म यही बताने के लिए है कि कोई कर्म महान होता नहीं, कोई कर्म महान नहीं होता। कर्ता की दिशा होती है, बस उसी पर ध्यान रखना होता है। अहंकार अपने मिटने की दिशा में बढ़ रहा है या जो कर रहा है, उससे और फूल जाएगा। सब जेंन ज़ी हाथ उठाएँ, चलो! वाह रे! सुना करो क्या नहीं कहा जा रहा।

भूलना नहीं कि अहंकार की सबसे बड़ी प्रवृत्ति होती है सेल्फ प्रिज़र्वेशन। वचन भी कर्म होते हैं। कोई भी बात अगर कही जाती है, तो आत्मरक्षण हेतु ही कही जाती है। इसीलिए सुना करो क्या नहीं कहा जा रहा। अहंकार जो कुछ भी कहता है, इसीलिए कहता है कि उससे आत्मरक्षा हो सके उसकी। उसकी पहली वृत्ति ही क्या है? आत्मरक्षा। तो वो जो भी कह रहा है, वो अपने आप को बचाने के लिए ही कह रहा है। तो सुना करो, वो क्या नहीं कह रहा है। जब वो कर्म की बात करे, तुम कर्ता सुनना। वह कर्म की बात कर ही इसीलिए रहा है ताकि कर्ता की बात न करनी पड़े।

और कर्ता की बात कितनी भी करवा लो, अहंकार श्रेष्ठ किसको मानेगा? और उसी का प्रमाण है कर्मकांड। भारत में धर्म का अर्थ ही बन गया कर्मकांड। इसीलिए अध्यात्म को इतना संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि ऐसा नहीं है कि लोकधर्म ने वेदांत को ठुकरा दिया है। आप लोकधर्मी के पास भी जाइए। उससे कहिए, "उपनिषद्?" तो कहेगा, "हाँ-हाँ, उपनिषद् हमारे धर्म ग्रंथ हैं।" ठुकरा नहीं दिया है। उसे निचले स्थान पर रख दिया है। असली चीज़ क्या है? कर्मकांड। कर्म ऊपर है, कर्ता नीचे है। उपनिषद् किसकी बात करते हैं? कर्ता की। बोले, "कर्ता की बात नीचे है, कर्म की बात ऊपर है। ऐसा कर्म करो। इस दिन ऐसे खीर बनाना, ऐसे जाकर के तुम पेड़ पे खीर चढ़ा देना।” ये कर्मकांड। “इस दिन जाकर नदी में घुस जाना, इस दिन जाकर के कुएँ में तैर जाना।” कर्मकांड।

वहाँ कर्ता को अपमानित नहीं किया गया। जहाँ कर्ता की... “हाँ, उपनिषद् अच्छी चीज़ है। उपनिषद बढ़िया है ठीक है। उपनिषद् बढ़िया है, लेकिन सर्वोपरि क्या है? कर्म। नहीं, आचार्य जी भी ठीक हैं, कर्ता की बात करते हैं। लेकिन जो कर्म करके दिखाए, वो श्रेष्ठ है। वो सबसे ऊपर है।” तुमने किससे जाकर के कहा कि आचार्य जी का साथ दो? तुमने किससे जाकर कहा? तुमने कहाँ जाकर शोर मचाया कि दुनिया का सबसे ज़रूरी काम तो कर्ता को देखना है? वह काम आचार्य जी कर रहे हैं। तुमने किससे जाकर कहा कि आचार्य जी का साथ दो? किसी से नहीं कहा। पर कर्म तुम्हारी दृष्टि में भी श्रेष्ठ है, क्योंकि सब के सब कर्मकांडी बैठे हो यहाँ पर।

ये कभी प्रश्न कौंधा? कभी कौंधा? आपने जलसा-जुलूस निकाल करके कब जाकर के किसी सेठ जी को, बाबा जी को, नेता जी को, अभिनेता जी को घेरा कि तुम चलो और आचार्य जी का साथ दो? कभी घेरा? और साथ दो माने साथ कोई मुझे जुलूस तो निकालना नहीं है। साथ दो माने आओ, गीता में बैठो। कभी घेरा किसी को? क्योंकि आप भी वही हो, जैसी परंपरा रही है कि कर्म श्रेष्ठ है और कर्ता की बात बाद में कर लेंगे। बात मैंने तार्किक न बोली हो तो बताइएगा। ये कितनी विचित्र बात नहीं है? इतनी जगह होती हैं जहाँ हज़ारों लोग रोज़ इकट्ठा होते हैं, न जाने कितनी ऐसी जगह हैं। हर शहर में होती हैं वो जगह, हर प्रांत में होती हैं वो जगह। आप वहाँ कभी जाकर कहते हो कि ये सब छोड़ो, उठो, चलो वहाँ गीता सत्र हो रहा है, वहाँ चलकर बैठो। आप कभी बोलते हो क्या? नहीं बोलते। क्योंकि आपका भी जो अपना हिडन वैल्यू सिस्टम है, वो कर्मवादी ही है।

"अरे, आचार्य जी, बस मंच से प्रवचन ही देते रहोगे या कुछ करके भी दिखाओगे?" सुना न ये?

"अरे, आचार्य जी, बस एसी हॉल में बैठकर ज्ञान ही बघारते रहोगे या कुछ करके भी दिखाओगे?"

ये "करके भी दिखाना" माने क्या होता है? करके भी दिखाना माने क्या? एक्सप्लेन। एक्सप्लेन, क्या करके दिखाना है? "करके दिखाना" माने क्या होता है? अहंकार सुनना ही नहीं चाहता, जानना ही नहीं चाहता है कि ये देश-दुनिया बिगाड़ी किसने। वो बस कह रहा है, "चलो, कुछ करके दिखाते हैं, सब सुधर जाएगा।" और क्यों कुछ करके दिखाते हैं? ताकि बाहर जब कुछ करके दिखाएँ, तो भीतर जो है वो बचा रहे।

क्या करके दिखाओगे? कौन करके दिखाएगा? हम करके दिखाएँगे? व्यवस्था को दोष देने वाले हम। और अभी पढ़ रहा था कि भारतीय रेल से करोड़ों रुपए के जानते हो क्या चोरी हुए हैं? कंबल और तकिए। पेपर लीक होते हैं, बिल्कुल होते हैं। एक बात बताना, पेपर लीक के ख़िलाफ़ वो भी आक्रोश जताते हैं क्या, जिन्होंने वो लीक्ड पेपर ख़रीदा था? वो भी आकर कहते हैं, "व्यवस्था मुर्दाबाद, व्यवस्था मुर्दाबाद"? वो भी कह रहे हैं क्या? एक भी इंसान दिखा दो जिसने ख़रीद लिया, ख़रीद के फायदा भी निकाल लिया और उसके बाद भी वो शोर मचा रहा हो कि पेपर लीक नहीं होना चाहिए। एक भी इंसान ऐसा दिखा दो।

बीसियों शताब्दियों की आपकी जो मानसिक ग़ुलामी है, हम उसको तोड़ने का काम कर रहे हैं। कोई आज की किसी सामाजिक-राजनैतिक स्थिति को बदलने का काम नहीं है ये। तुम्हें दिखाई नहीं देता किस काम का क्या महत्त्व है, कोई तुलना नहीं कर पाते। कुछ वक्तव्य होते हैं जिनको काटा नहीं गया, तो वह देश और दुनिया को तबाह करके रख देते हैं। खासकर तब जब वो वक्तव्य धर्म ग्रंथों के ही हों और उनका अर्थ विकृत कर दिया गया हो। कम से कम भारत की तबाही तो धर्म ग्रंथों के विकृत अर्थ के कारण ही हुई है। वो जो पूरी धारा रही है तबाही की, हम उस धारा को रोकने का काम कर रहे हैं। हम कोई ऐसा काम नहीं कर रहे हैं कि जो बस आज ही उपयोगी रहेगा। हम वह काम कर रहे हैं जो आज से पाँच सौ हज़ार साल बाद भी उपयोगी रहेगा। यह महत्त्व है हमारे काम का।

और यह बात किसी टकराव की नहीं है, यह बात ऊँचे को ऊँचे का सही स्थान देने की है। आम को आम और चाकू को चाकू बोलना होता है न। बोला था न, धूमिल ने, ज़मीन को ज़मीन और आसमान को आसमान बोलना होता है न। या शालीनता दिखाओगे वहाँ पर; विनम्रता दिखाओगे, कहोगे कि सब एक बराबर है।

जिन्होंने यह कह दिया, देखो, न जाने कब किसने यह कहा था, पर जिन्होंने भी यह कह दिया, उन्होंने कुछ ऐसा काम कर दिया कि ये यहाँ वैश्य बैठे हो, उधर शूद्र बैठे हो, इधर महिलाएँ बैठी हों, वह आज भी उनके कथन का दंश भुगत रहे हैं। अब बोलो, उस कथन से लड़ूँ कि नहीं लड़ूँ? और बताओ कि उस कथन से लड़ने से ज़्यादा ज़रूरी कोई काम है? और कितनी ताक़त होगी उस कथन में कि कोई बात आज से दो हज़ार साल पहले कही गई थी, पर उस बात ने आज भी भारत के दसियों करोड़ लोगों को जकड़ रखा है। सोचो, वो कितना जबरदस्त कथन होगा। कितनी उसमें ताक़त है और उससे लड़ना कितना ज़रूरी है।

"उस पेड़ पर चढ़ो; उस नदी में कूदो; फलाने दिन इस तरह की यात्रा निकाल दो; ऐसा तिलक लगाओ, ऐसे सिंदूर पहनो, यह वाली माला।" और न जाने क्या-क्या होता है। मैं तो अब उस इकोसिस्टम से ही दूर हूँ, तो मुझे तो बहुत पता भी नहीं चलता, आप बेहतर जानते हैं। दही में गन्ने का रस मिला के इमली के पत्ते पर रख के, जामुन का तड़का लगा के, पता नहीं क्या और क्या करते हो बताओ न, क्या-क्या करके आए हो? जैसे आप इस खतरनाक यात्रा पर निकले थे मेरी ओर आने के लिए कल या आज, तो घर वालों ने आपको क्या-क्या गंडे-ताबीज़ बाँध के भेजे? "सीधे जा रहे हो तुम राक्षस के पास, मौत के मुँह में। मेरा पिया सही-सलामत घर वापस आ जाए। वो दुराचार्य, कहीं कोई टोना न कर दे इसके ऊपर।"

पक्का पता है अभी सबकी जेब झाड़ी जाए, दो-चार के तो नींबू-मिर्च गिरेगी ही गिरेगी। निकलते हुए अम्मा ने पीछे से डाल दी थी, बुरी नज़र से बचेगा। यह होता है, यह अंजाम होता है इस तरह के वक्तव्यों का।

भारत में धर्म का मतलब ही बन गया कर्म। आप बड़े-बड़ों से जाकर पूछेंगे, धर्म माने क्या? वो बोलेंगे, कर्म। और कर्म से आशय क्या होता है? यही। इंटीग्रेटेड सिस्टम का मतलब होता है कि तुम किसी एक हिस्से को दोष नहीं दे सकते, तुम नहीं कह सकते कि व्यवस्था का एक हिस्सा ही अलग से या विशिष्ट रूप से सड़ा हुआ है। वास्तव में तुम किसी एक हिस्से की ओर उँगली दिखा करके ख़ुद को बस यह जताना चाहते हो कि तुम सड़े हुए नहीं हो। तुम उधर को उँगली दिखा करके यह जताना चाहते हो कि तुम सड़े हुए नहीं हो।

भाई, यह लोकतंत्र है। यहाँ पर ईश्वर का भेजा प्रतिनिधि राज नहीं करता। तुम्हें जिस व्यवस्था से इतनी समस्या है, वो व्यवस्था तुम ही ने चुनी है। तो बताओ, सड़ा हुआ कौन है? अजीब! तुम आज किसी को वोट दो और दो साल बाद आंदोलन करो और कहो कि उखाड़ना है, उखाड़ना है। तो पहले तुम जवाब दो, तुमने वोट क्यों दिया था? पहले तुम जवाब दो। भाई, डिक्टेटरशिप तो है नहीं, बाकायदा तुम जाते हो, तुम ही वोट डाल कर आते हो। तुम ही अपनी सरकारें चुनते हो और फिर तुम कहते हो। तो तुम जवाब दो न कि।

कितना जवाब माँगू? अगर यह प्रश्न चला गया कि लोकसभा चुनाव में क्या करा था, तो मुझे तुमसे यह भी पूछना पड़ेगा कि ज़िंदगी के हर चुनाव में क्या करा था। और इसीलिए तुम इस मुद्दे पर आना ही नहीं चाहते कि चुनने वाला कौन है? क्योंकि तुमने सिर्फ़ किसी व्यक्ति को या मंत्री को गलत नहीं चुना है। तुमने अपनी ज़िंदगी में सब कुछ गलत चुना है। इसीलिए तुम उस मुद्दे को बिल्कुल अवॉइड करना चाहते हो, तुम कहते हो, "वो बात मत करो।" तुम कह रहे हो, बदलना है।

मैं कह रहा हूँ, अगर बदलना है, तुम्हें सब कुछ बदलना पड़ेगा। तुम्हें तो ख़ुद को ही बदलना पड़ेगा। तुम्हें अपनी नौकरी भी बदलनी पड़ेगी, क्योंकि सब चुनने वाले तो या तुम ये कह रहे हो कि तुम्हारा बस एक चुनाव गलत हो गया है, बाक़ी सारे चुनाव सही हैं। चुनने वाले तुम ही हो। और अभी भी ये तुम ही चुन रहे हो कि कुछ बदलना है। तो जैसे तुम्हारे सारे चुनाव गलत थे, वैसे ही बदलने का चुनाव भी गलत है। पर इतना गहरे जाना नहीं चाहते, तुम कह रहे हो, "नहीं-नहीं, आप कहाँ बातों में इतना दूर-दूर तक ले जा रहे हैं। असली बात तो ये है कि सिर्फ़ एक जगह गलती है, उसको बदल देते हैं तो ठीक हो जाएगा।" मैं कह ही नहीं रहा कि एक जगह गलती नहीं है। हाँ, जिस जगह की ओर तुम उँगली दिखा रहे हो, वहाँ भी सब सड़ा हुआ है। बिल्कुल सड़ा हुआ है, मानता हूँ। लेकिन जिधर को तुम उँगली नहीं दिखा रहे, वो जगह ज़्यादा बड़ी है और ज़्यादा केंद्रीय है।

और सारी सड़न की शुरुआत उस जगह से होती है, जहाँ को तुम उँगली नहीं दिखा रहे। वो सारी सड़न तुम्हारे ही भीतर से शुरू हुई है। तुम किसी और को क्या बदलने जा रहे हो? पर अहंकार अपनी ओर नहीं देखना चाहता। वह किसी एक क्षेत्र में बदलाव करके सोचता है, अब ज़िंदगी बदल जाएगी, दुनिया बदल जाएगी, भारत स्वर्ग हो जाएगा। ऐसे नहीं होगा। बल्कि तुम यह सब करके अगर कहीं कोई सार्थक बदलाव का काम हो भी रहा है, तो तुम उस काम में भी बाधा डालते हो। तुम्हारा काम सिर्फ़ अनुपयोगी नहीं है, घातक है। जो ऊर्जा, जो समय जाना चाहिए था सही काम में, वो काम, ऊर्जा, समय सब डिसिपेट हो रहा है। एक व्यर्थ दिशा में बह रहा है।

साधारण प्रवृत्ति होती है न दोषारोपण की। और जब मैं कह रहा हूँ, दोषारोपण मत करो, तो इससे मेरा आशय यह बिल्कुल भी नहीं है कि जो उस तरफ़ है वो बेगुनाह है। वो बिल्कुल गुनहगार है। बेशक वो गुनहगार है, पर तुम यह भी तो बता दो उस गुनहगार को उस ऊँचे आसन पर बैठाया किसने? बताओ न।

तुम घर का दरवाज़ा खुला छोड़ दो और बंदर घुस के आया, भीतर से वो फ्रिज में से खाना खा गया, चीज़ें तोड़फोड़ गया। ये तुमने कर दिया, जेन ज़ी। अब मम्मी घर आएगी तो बंदर को चाँटा मारेगी या तुमको? जल्दी बताओ। तो मैं किसको मारूँ? और तुम लगे हुए हो एंटी-बंदर आंदोलन चलाने में। मैं पूछ रहा हूँ, बंदर के लिए दरवाज़ा किसने खोला? वो तुम बताना नहीं चाहते, वो तुम बात नहीं करना चाहते। क्योंकि फिर बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। फिर दरवाज़ा कैसे-कैसे खुलता है? किसके-किसके लिए खुलता है और कब-कब खुलता है? सारी बातों के तुम्हें जवाब देने पड़ेंगे, इसीलिए तुम कह रहे हो, "बंदर को मार देते हैं।"

बंदर ने तो जो तबाही करी है, वो करी ही है, मैं भी मान रहा हूँ करी है। पर बंदर के लिए दरवाज़ा खोलने वाले तुम हो। और तुम सौ तरह के अलग-अलग बंदरों के लिए अलग-अलग समय पर दरवाज़ा खोलते ही रहते हो। मैं जवाब तुमसे चाह रहा हूँ। वो जवाब तुम देना नहीं चाहते, तुम कह रहे हो, "नहीं, हम ठीक हैं। वी आर इंडिविजुअल्स। हम इंटेलेक्चुअल्स हैं। हम रेशनल्स हैं। हम देख लेंगे अपनी ज़िंदगी। अभी तो बस सिस्टम के एक हिस्से में सड़न पैदा हो गई है, हमें उस हिस्से को एड्रेस करना चाहिए।"

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, बट जो पास्ट में मूवमेंट्स हुए हैं, जैसे इंडिया का फ्रीडम मूवमेंट रहा है, जैसे राजा राममोहन राय का मूवमेंट रहा है, जिससे सती प्रथा खत्म हुई, इससे तो चेंज आया है न सर।

आचार्य प्रशांत: नहीं, देखो, वहाँ पर भी सबसे पहले एजुकेशन रखी गई थी सामने। सिर्फ़ नियम बना देने से चेंज नहीं आ गया है, एजुकेशन हुई है, तब चेंज आया है। वरना भूलना नहीं कि लोकतंत्र है, यहाँ पर तुम कोई लेजिसलेशन ला ही नहीं सकते लोगों की सहमति के बिना। लोग एजुकेटेड नहीं हैं, तो तुम्हारा लेजिसलेशन चलेगा ही नहीं। चलेगा ही नहीं। यह तुम्हें किसने, कौन से इतिहास में तुम्हें पढ़ा दिया गया है? राजा राममोहन राय वाज़ अ ग्रेट एजुकेटर। ब्रह्म समाज क्या था? इसीलिए विद्या अविद्या दोनों ज़रूरी है।

तुम्हें क्या लगा? राजा राममोहन राय लॉन्ग मार्च किया करते थे? वो पढ़ा रहे हैं, बैठा के लोगों को। और पढ़ाने में उन पर बड़े-बड़े फिर इल्ज़ाम भी लगे। वो जो बदलाव ला पाए, वह प्राथमिक तौर पर एजुकेशन के कारण ला पाए। जहाँ एजुकेशन नहीं है, वहाँ कोई बदलाव नहीं ला सकते आप।

गांधी जी ने भी कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफ़ा ही दे दिया था। अपनी ज़िंदगी के आख़िरी पंद्रह बीस साल उन्होंने मालूम है ना, क्या करा है? वह जब आए तो बोले, "पॉलिटिकल एक्शन करूँगा।" ठीक है? शुरू करा उन्होंने, चंपारण गए। उसके बाद हम जानते ही हैं, एक के बाद एक, एक और फिर छोड़ दिया। बोले, "ये लोग जब तक नहीं सुधरेंगे, तब तक कोई बात नहीं बनेगी।" बोले, "मैं गाँव जा रहा हूँ, इनको पहले जीने की तमीज़ सिखाऊँगा। भीतर से गंदे हैं, बाहर से गंदे हैं; जाति प्रथा, छुआछूत, अस्वच्छता, इन सब में हमारे गाँव बिल्कुल अटे पड़े हैं।"

बात आ रही है समझ में?

उसके बिना बोले कि, "उसके बिना कौन सी आज़ादी? क्या फायदा?" और टैगोर गांधी से भी एक कदम आगे निकल गए। बोले, देखो, इंसान जब तक जागा हुआ नहीं है न, तब तक उन्होंने कहा, कि ऐसी आज़ादी जो चरखा कात कर आती है, मैं उसकी कोई कीमत नहीं मानता। वह भी कर्मकांड हो जाएगी एक तरह का।

पूरी जो भावना रहती है न, वो यह रहती है कि “सती प्रथा तो शायद पुर्तगालियों ने आकर भारत में लागू कर दी थी। भारतवासी अच्छे लोग थे। पुर्तगाली, ब्राज़ीली और चीनी, इन तीनों ने मिलकर एक साझी अंतरराष्ट्रीय साज़िश करी और आकर भारत की औरतों को जलाना शुरू कर दिया। भारत के लोगों को ये बात बहुत बुरी लगी। तो फिर भारत के लोगों ने आंदोलन करा और पुर्तगालियों को पुर्तगाल भेज दिया। और इस तरह भारत से सती प्रथा बंद हुई। बच्चों, बजाओ ताली।”

आई कहाँ से थी सती प्रथा? कहाँ से आई थी?

और अगर तुम उस केंद्र को नहीं हटाओगे जो औरत को पति के साथ चिता पर जलाता था, तो तुम ले आओ कितने भी नियम। वही केंद्र अब औरत को दहेज के लिए किचन में जलाएगा।

बस तुमने नियम ला दिया, तो जलाने का तरीका बदल जाएगा, औरत अभी भी जलेगी। और भूलना नहीं कि जितनी औरतें सती में जलीं, उससे ज़्यादा औरतें दहेज के लिए किचन में जलीं क्योंकि तुमने केंद्र तो बदला ही नहीं न। बिना शिक्षा के कुछ नहीं बदलता। आदमी जब तक भीतर से वैसा ही है जैसा है, तुम बाहर कर लो जितने आंदोलन करने हैं। जिसको जलना है, वो अभी भी जलेगा।

प्रश्नकर्ता: सबसे पहले तो नमस्ते आचार्य जी। आपको देख के सामने से मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। आपकी किताबें पढ़ती हूँ, आर्टिकल पढ़ती हूँ। बट सामने से देख के काफी अच्छा लग रहा है। क्वेश्चन पूछने का मौका मिला तो और भी प्रसन्न हूँ।

तो मैंने अपनी ग्रेजुएशन जो है, वो जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से करी। तो अब हमारी यूनिवर्सिटी में जो हमारा प्रोटेस्ट करने का तरीका है और जो पॉलिटिक्स को लेकर के एक्टिविटी वहाँ पे होती है, मैंने भी करा अपने ग्रेजुएशन में। भूख हड़ताल करना हो, मार्च पर जाना हो या प्रोटेस्ट करना हो। तो अभी जो सिचुएशन चल रहा है एजुकेशन सिस्टम को लेकर के, तो अगर मैं आपसे पूछूँ कि एक सही तरीका क्या होगा प्रोटेस्ट करने का? एक सही तरीका या सही मार्ग क्या होना चाहिए, तो आपके नज़रिए में?

आचार्य प्रशांत: एक माइक उधर हो, एक माइक इधर हो…

प्रश्नकर्ता: डिबेट?

आचार्य प्रशांत: …और ले दना-दन। बस यही है।

नहीं, डिबेटिंग नहीं हो रही है यहाँ पर।

प्रश्नकर्ता: देन?

आचार्य प्रशांत: यहाँ क्या हो रहा है? आप बताइए न देन।

प्रश्नकर्ता: कन्वर्सेशन।

आचार्य प्रशांत: कन्वर्सेशन भी नहीं हो रहा है। आप यहाँ सीखने बैठे हो, बस यही है। यही है जो हम यहाँ कर रहे हैं, इससे बड़ा प्रोटेस्ट इतिहास में नहीं हुआ है।

*प्रश्नकर्ता: थैंक यू। आई गॉट माय आंसर्स।

*आचार्य प्रशांत: *आप प्रोटेस्ट के नाम पर जो करते आए हो, वो बच्चों का खेल है। असली प्रोटेस्ट यह है, जहाँ इतिहास की धारा ही बदल दी जा रही है। पर आपके लिए प्रोटेस्ट है ही सिर्फ़ तब, जब नारे लगे, ढपली बजे; किसी को विलेन घोषित किया जाए। कहा जाए कि "यू कॉज़ मी हर्ट एंड नाउ यू शैल पे फॉर इट।" आपके लिए प्रोटेस्ट तब है। यह है वास्तविक प्रोटेस्ट। यह है आंदोलन, यहाँ हो रही है क्रांति। पर चूँकि यहाँ क्रांति उन नामों, उन रंगों, उन लक्षणों के साथ नहीं हो रही है, जिनके आप अभ्यस्त हैं, तो आपको समझ में ही नहीं आता कि यह क्रांति है। आप अभी इसको डिबेट बोल रही थी, कन्वर्सेशन बोल रही थी। यह कन्वर्सेशन नहीं, रिवोल्यूशन है।

कोई सड़क पर जाकर के नारे लगाए, तो आपको लग जाता है कि कुछ बदला। यहाँ घरों के भीतर ज़िंदगियाँ बदल रही हैं, तो कहीं छपता नहीं न। कोई मीडिया वाला घुसेगा नहीं किसी किचन में और जाकर के नहीं पूछेगा कि आपकी ज़िंदगी बदली क्या? तो इसीलिए आपको पता ही नहीं लगता। और मीडिया वाला भी क्यों नहीं पूछेगा? क्योंकि अगर यह ज़ाहिर हो जाए कि असली क्रांति तो घरों के भीतर आ रही है, तो मीडिया वाला जो कुछ कर रहा है अपनी मीडिया बाज़ी के नाम पर, उस पर सवाल खड़ा हो जाएगा कि जब असली क्रांति व्यक्ति के भीतर आती है, तो तुम सड़कों पर कहाँ क्रांतियाँ खोजने निकल पड़े, बंधु?

मुझे सड़कों वाली क्रांति से कोई समस्या नहीं है। पर भूलना नहीं कि सड़क पर जो बंदा आता है, वो घर से ही तो निकल कर आता है न। अगर मैंने उसको घर में ही नहीं बदला, तो वो सड़क पर क्या बदल गया?

जो घर में वैसा ही है जैसा वो सदा से घर में रहा है। जो घर में आज भी वैसा ही है जैसा हज़ार साल से वो अपने घर में रहा है। वो सड़क पर क्या बदल जाएगा? तो सड़क वाली क्रांति का क्या मोल है फिर, अगर घर में ही क्रांति नहीं हो रही तो? और घर में क्रांति कैसे होगी, अगर दिल में नहीं हो रही है तो। जो दिल में क्रांति होती है, उसी का नाम आत्मज्ञान होता है।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर, जब हम रिवोल्यूशन की बात करते हैं, तो मार्क्स का नाम सबसे पहले आता है कि उन्होंने कैपिटलिज़्म के अगेंस्ट मार्क्सिज़्म, रिवोल्ट करने के लिए बोला था वर्कर्स क्लास को। जिसको उन्होंने बोला था, डिक्टेटरशिप ऑफ द प्रोलिटेरियट। बट फिर बाद में वह रिवोल्यूशन कभी आया नहीं, क्योंकि शायद इसलिए क्योंकि वर्कर्स को अपनी स्लेवरी में ही मज़ा आ रहा था। क्योंकि वो इसलिए परेशान नहीं थे क्योंकि वो एक्सप्लॉइटेड हैं। वो इसलिए परेशान थे क्योंकि वो कैपिटलिस्ट नहीं हैं।

सर, बाद में इन्हीं के जो आगे ब्रांचेस आईं, जैसे कि लेनिन आए, फिर उसके बाद यहाँ पे माओ आए। फिर ग्राम्शी ने भी बोला था कि रिवोल्यूशन इसलिए नहीं आया क्योंकि मेंटल लेवल पर नहीं आया। तो सर, लेकिन सबको नाम तो रिवोल्यूशन ही बोला गया। इवन हिटलर ने भी जब आए थे, उन्होंने पावर दी थी, तो उनको भी सब एक मसीहा की तरह ही देख रहे थे और उसको भी रिवोल्यूशन बोल रहे थे। सर, उस टाइम पर वो चीज़ें सही लगती हैं। तभी तो लोगों ने उनको इतना सपोर्ट किया। तो सर, एक्चुअल रिवॉल्यूशन कभी आया भी है या फिर कभी आएगा भी, या सिर्फ़ मेंटल रिवॉल्यूशन का कोई फेस ही नहीं है?

आचार्य प्रशांत: रिवॉल्यूशन कोई एक पक्षीय चीज़ थोड़ी होती है। रिवॉल्यूशन कोई ऐसी चीज़ थोड़ी होती है कि पानी की सप्लाई है, टंकी से पानी चलेगा आपके घर आएगा, आप उसे भर लोगे। रिवॉल्यूशन में जो रिवोल्यूशनरी मासेस हैं, उनकी पूरी सहभागिता चाहिए होती है ना। सबसे बड़ा है रिवॉल्यूशन, उपनिषद् हैं। तो क्या हो गया आपको पढ़ना ही नहीं है तो कुछ हो जाएगा? कुछ हो जाएगा क्या?

मार्क्स भी क्या है? फिलॉसफर है। और मार्क्स ने जो फिलॉसफी दी है, उससे कहीं ज़्यादा बेहतरीन, उम्दा, गहरी फिलॉसफी बहुत पहले दी जा चुकी है। बहुत अच्छी, बहुत सुंदर फिलॉसफी दी जा चुकी है। रिवोल्यूशन कहाँ आ गया उससे। क्योंकि हम रिवोल्यूशन को बाहर की कोई बात मानते हैं, बाहर परिवर्तन ला देंगे और बाहर के किसी नेता का अनुगमन करके बाहरी परिस्थितियाँ बदल देंगे, यह रिवॉल्यूशन है। बाहर के किसी नेता का अनुगमन करके बाहरी परिस्थितियाँ बदल देंगे, यह रिवॉल्यूशन है।

वास्तविक रिवोल्यूशन लाने वाली फिलॉसफीज़ आईने तो कब से मौजूद हैं। महात्मा बुद्ध हैं, बहुत बड़ी क्रांति हैं। पर नहीं हो पाए सफल। क्यों नहीं सफल हो पाए? क्योंकि उन्हें कोई अपनी ज़िंदगी थोड़ी रिवोल्यूशनाइज़ करनी थी। आपकी ज़िंदगी में रिवॉल्यूशन आएगा नहीं, तो आपको तय करना है, वन वे स्ट्रीट थोड़ी है रिवॉल्यूशन। कि बुद्ध की टंकी से पानी चला, आपने भर लिया, ऐसे थोड़ी हो जाती है क्रांति।

मार्क्स ने जो बात बोली, वो अच्छी बात है लेकिन बड़ी एकतरफ़ा और बड़ी आधी बात है। उसको सीधे-सीधे बोला जाए, तो आप ही उससे इंकार कर दोगे कि ये कैसी बचकानी बात है, मैं ही नहीं मानती। वो बोल रही है कि इंसान अपनी क्लास का ग़ुलाम होता है। आपकी पूरी चेतना क्लास कॉन्शियसनेस होती है। आप जिस वर्ग में पैदा हुई हैं, जिस देश में, जिस काल में पैदा हुई हैं, जैसी आपकी परवरिश हुई है, वैसी ही आपकी चेतना हो जाएगी। और अब आप पूरी ज़िंदगी अपनी चेतना के अनुसार ही व्यवहार करोगे। यह कोई बात है? और दो जो अलग-अलग क्लासेस हैं, उनमें सदा एक वर्ग संघर्ष रहेगा। आप जिस क्लास की हो और यह जिस क्लास के हैं, वो दोनों क्लासेस अगर मैच नहीं कर रही, तो आप में और उनमें सदा एक क्लास स्ट्रगल रहेगी। यह कोई बात है?

अभी राजा राममोहन राय किसी ने कहा और कहा आपने कि सती के उन्मूलन के लिए उन्होंने इतना काम करा। तो क्या वो स्त्री थे? वो स्त्री थे क्या? वो तो अलग क्लास के हैं और ब्राह्मण हैं, और एजुकेटेड हैं। उनकी तो क्लास दूसरी है। मार्क्स के हिसाब से तो राजा राममोहन राय को ब्राह्मणवादी सोच का होना चाहिए था और स्त्रियों का शोषक होना चाहिए था। मार्क्स से आप पूछते राजा राममोहन राय, तो मार्क्स कहते, "यह ब्राह्मण है, यह पुरुष है और यह पढ़ा-लिखा है और इसके पास पैसा भी है, तो इसको तो निश्चित रूप से स्त्रियों और शूद्रों का शोषक होना चाहिए।" ऐसा हुआ क्या?

मार्क्स ख़ुद मार्क्सिज़्म के ख़िलाफ़ एक प्रमाण है। मार्क्स ख़ुद पढ़े-लिखे हैं। तो मार्क्स तो ख़ुद ही फिर एक्सप्लॉइटर क्लास को बिलॉन्ग करने चाहिए न। मार्क्स ने ख़ुद कभी लेबर नहीं किया, मार्क्स लेबर क्लास के तो हैं ही नहीं। मार्क्स को तो कमा-कमा करके उनके दोस्त देते थे, मार्क्स बैठ के किताब लिखते थे। तो मार्क्स को तो ख़ुद फिर एक्सप्लॉइटर होना चाहिए। पर मार्क्स तो एक्सप्लॉइटर नहीं थे। तो मार्क्स की जो पूरी बात है क्लास कॉन्शियसनेस की, वो एक सीमित कॉन्टेक्स्ट में तो फिर भी लागू होती है। वो सीमित कॉन्टेक्स्ट क्या है? उस शताब्दी का यूरोप का जो कैपिटलिस्ट फैक्ट्री प्रोडक्शन मॉडल था, वहाँ पर बस उतने पर मार्क्स की बात लागू होती है, उसके आगे मार्क्स की बात लागू ही नहीं होती।

संत रविदास हैं, कबीर साहब हैं। एक जूतों का काम कर रहे हैं, एक जुलाहे हैं। तो इनमें इतनी ऊँची चेतना कहाँ से आ गई? मार्क्स के हिसाब से तो नहीं आनी चाहिए थी। भाई, वो जिस क्लास को बिलॉन्ग करते थे, उनको ऐसे ही काम करना चाहिए था। तो उन्होंने प्रीस्टली क्लास का काम कैसे कर दिया? मनुष्य के भीतरी अहंकार बैठा है और उसके पास चॉइस होती है। यह बात मार्क्स को समझ में ही नहीं आई। उन्होंने कहा, "नहीं, भीतर चॉइस-वॉइस कुछ नहीं होती। यू आर अ प्रोडक्ट ऑफ योर सोशल कंडीशंस।"

तो फिर मैं आपके सामने क्या कर रहा हूँ? मैं भी क्या कर रहा हूँ? बताओ न।

मेरी तो फिर जो सोशल कंडीशंस ये हैं कि हाँ, मैं भी पढ़े-लिखे घर की पैदाइश हूँ, ब्यूरोक्रेट थे। उसके बाद मैं भी पढ़-लिख गया और मैं भी ब्राह्मण हूँ और पुरुष हूँ। तो मैं फिर यह सब क्या कर रहा हूँ? मार्क्स के हिसाब से तो मुझे होना ही नहीं चाहिए, मार्क्स के हिसाब से मैं असंभव हूँ। या फिर जो दूसरा निष्कर्ष निकलेगा, वह यह है कि मैं भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था का एजेंट हूँ, जो छुप करके स्त्रियों को बर्बाद कर रहा है। यह दूसरा निष्कर्ष निकलेगा।

पर फिर अगर यह निष्कर्ष मुझ पर निकलेगा, तो यही निष्कर्ष फिर मार्क्स पर भी निकलेगा। यह भी तो हो सकता है कि तुम ख़ुद उस पढ़े-लिखे वर्ग के एजेंट थे, जिसने मार्क्सिज़्म के माध्यम से जो बेचारी वर्किंग क्लासेस थीं, उनको बरगलाया। मार्क्स की थ्योरी ख़ुद मार्क्स पर भारी पड़ेगी। बात आ रही है समझ में?

हाँ, बाहरी जितनी भी स्थितियाँ होती हैं, उनका हम पर प्रभाव पड़ता है, बिल्कुल पड़ता है। लेकिन हमारे भीतर भी कोई बैठा हुआ है चुनने वाला। इसीलिए एक ही परिस्थिति का अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग असर मिलता है, क्योंकि भीतर बैठा है कोई जो चॉइस करता है। मार्क्स के पूरे दर्शन में उस भीतर वाले के लिए कोई जगह ही नहीं है। कोई जगह नहीं है। बात आ रही है समझ में?

एक सिंपलिस्टिक मॉडल है, जिसमें कह दिया गया है, ये क्लास, ये क्लास, ये एक्सप्लॉइटर होती है, एक्सप्लॉइटेड होता है। इनमें ऐसे होगा, फिर रिवॉल्यूशन आ जाएगा और फिर अल्टीमेटली ऐसा-ऐसा हो जाएगा। और जो रिवॉल्यूशन वो चाहते थे, वो रिवॉल्यूशन भी कभी नहीं आया। इंटरनल रिवॉल्यूशन तो छोड़ दो, एक्सटर्नल रिवॉल्यूशन भी कभी नहीं आया।

जब एक्सटर्नल रिवॉल्यूशन भी नहीं आया तो जो बाद के जितने मार्क्सिस्ट थे, उन्होंने पैचवर्क करा, पैबंद लगाए। जिन्होंने फिलॉसफी पढ़ी है या मार्क्सिज़्म पढ़ा है, वो जानते हैं। तो उन्होंने, फॉर एग्ज़ाम्पल, वैनगार्ड इंटेलेक्चुअल की बात करी। उन्होंने कहा, "देखो, वर्किंग क्लासेस में रिवोल्यूशन लाने के लिए भी जो इंटेलेक्चुअल क्लासेस हैं, उसमें से किसी को निकल के आना पड़ेगा।" अब यह कौन-सी बात हुई? यह तो मार्क्स ने कभी बोला नहीं था। पर यह बाद में पैचवर्क किया गया। हाँ, इस तरह के बहुत सारे पैचवर्क हैं। जैसे-जैसे मार्क्सिज़्म दिखता गया कि फेल हो रहा है, तो बाद के मार्क्सिस्ट इंटेलेक्चुअल्स ने उसको जस्टिफाई करने के लिए कई तरीके के ऐड-ऑन्स लगाए, अपेंडिक्स लगाए मार्क्सिज़्म की किताब के पीछे और पन्ने जोड़े, ताकि रहे कि नहीं-नहीं, थ्योरी अभी साबुत है।

किसी भी थ्योरी में अगर मनुष्य की सार्वभौम चेतना और चुनाव के लिए स्थान नहीं है, तो वो एक मैकेनिस्टिक थ्योरी है। उसमें फिर मनुष्य को नहीं डिस्क्राइब किया जा रहा। उसमें मशीनों को और ऑर्डर को डिस्क्राइब किया जा रहा है। प्रेम, उदाहरण के लिए, मार्क्सिज़्म में डिफाइन ही नहीं हो सकता। प्रेम की कोई डेफिनेशन ही नहीं हो सकती वहाँ पे। क्योंकि वहाँ तो बस क्लास रिलेशंस हैं। प्रेम कैसे डिफाइन करोगे?

और मनुष्य पुरुष और स्त्री के बीच का जो होता है, वो तो तुम फिर भी कर लो। जो मार्क्सिस्ट फ्रेमवर्क है, उसमें मैन-वुमेन रिलेशनशिप को भी ट्रांज़ैक्शनल मानकर, तो फिर भी आप चलो डिफाइन कर लोगे। लेकिन किसी संत का उसके प्रियतम के प्रति जो प्रेम होता है, उसको तुम मार्क्सिज़्म में कैसे एक्सप्लेन करोगे? "पिया मोरे जागे, मैं कैसे सोई री।" अब इसका एक मार्क्सिस्ट एक्सप्लेनेशन दे दीजिए। है ही नहीं। रूमी जो गा रहे हैं, उसका बताइए क्या है? क्या कहा जा रहा है? कुछ नहीं है। उपनिषद् जिसकी ओर इशारा कर रहे हैं, "तत्त्वमसि" उसका क्या है? कुछ नहीं। ये सब ऐसे ही है, बेकार की बात है हटा दो ये सब।

वास्तविक रिवॉल्यूशन दो वर्गों के संघर्ष में नहीं होता। वास्तविक रिवॉल्यूशन आत्म-संघर्ष में है। हाँ, उस आत्म-संघर्ष के बाद अगर किसी बाहर वाले से संघर्ष करना पड़े, तो कोई बात नहीं। देख लेंगे, झेल लेंगे, लड़ लेंगे। पर ख़ुद से संघर्ष किए बिना कोई बाहर संघर्ष करने निकल पड़ा है, तो खुद को ही धोखा दे रहा है। असली क्रांति यहाँ (अपने भीतर की ओर इंगित करते हुए) से शुरू होती है और यहाँ से वह घृणा के तौर पर नहीं शुरू होती। यहाँ से वह बाहरी बदलाव की माँग के तौर पर नहीं शुरू होती। वो यहाँ से शुरू होती है ख़ुद को बदलने की चाह से। मैं वैसा क्यों हूँ जैसा मैं हूँ? और जब आप वैसे नहीं रहते जैसे आप रहे हो, तो फिर आपने जैसा तंत्र बाहर बना रखा था, आप उसको भी वैसा नहीं रहने देते जैसा वह रहा है। यह है बाहरी क्रांति।

बाहरी क्रांति आवश्यक है, पर बाहरी क्रांति को भीतरी क्रांति का अनुगमन करना होगा। भीतर से बदले बिना आप बाहर कुछ बदल ही नहीं सकते।

हाँ, कॉस्मेटिक चेंजेस कर लोगे। वो आत्म-प्रवंचना है या सेल्फ डिसेप्शन है।

प्रश्नकर्ता: तो सर, इस पूरी बात से हम ये समझ सकते हैं कि बिना प्यार के रिवोल्यूशन पॉसिबल ही नहीं है फिर तो?

आचार्य प्रशांत: यही है, यही है। बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया।

प्रश्न कर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। तो ये बात तो समझ में आई है कि कोई भी चेंज अगर आना है, तो बिना आत्मबोध के पॉसिबल नहीं है। टुडे द सिचुएशन इज़ कि हमारा जो हमारे पास जो टूल है, वो दिया हुआ है, वो डेमोक्रेसी। डेमोक्रेसी में एवरी माइंड इज़ मेज़र्ड इक्वली, जो कि रियल केस नहीं है। अगर देखें इंडिया का, तो एक लार्ज पॉपुलेशन अभी भी अनएजुकेटेड है। आत्मबोध तो छोड़िए, नॉर्मल उनके पास बेसिक राइट्स के लिए लड़ रहे हैं। फॉर देम देयर इज़ अ ह्यूज डिपेंडेंसी ऑन द पावर या सत्ता, जो क्या पॉलिसी चेंजेस लाएँगे, उससे उनकी लाइफ़ पे इफ़ेक्ट पड़ता है। बट उन्हीं को पावर दी हुई है उन्हें चुनने की। तो ये एक बहुत बड़ा ऐसा लगता है विशियस साइकिल है।

जैसे गीता का ज्ञान है, अभी भी बहुत एक लिमिटेड तबके तक ही पहुँचा हुआ है। उस क्लास तक पहुँच भी नहीं पा रहा है। तो ये साइकिल ब्रेक होने का, यू नो, क्या फैक्ट है? कैसे ये चेंज?

आचार्य प्रशांत: ज्ञान कम लोगों तक पहुँचा हुआ है, क्योंकि ज्ञान के अपने पाँव नहीं होते न, पाँव आपके पास हैं। और ज्ञान बहुत लोगों तक पहुँच सकता है, उसका प्रमाण आपके सामने खड़ा है। और मैं आपसे पूछ रहा हूँ कि ये बताइए, एक आदमी अगर एक करोड़ लोगों तक पहुँच सकता है, तो आप सौ लोगों तक भी क्यों नहीं पहुँच सकते? और आप में से प्रत्येक व्यक्ति अगर सौ लोगों तक भी पहुँच गया होता, तो क्रांति कब की आ गई होती। और यह मत कहिएगा, सौ मुश्किल है, क्योंकि मैं खड़ा हूँ आपके सामने करोड़ करके।

(श्रोता ताली बजाते हैं)

ये ताली किसके लिए बज रही है? करोड़ के लिए बज रही है या इस शर्म पर बज रही है कि सौ भी नहीं करे? ज्ञान अपने पाँव से चल के फैलेगा क्या? मसल आपके पास है, मुँह आपके पास है, टाँगें आपके पास हैं, फैलाना आपको पड़ेगा न। और लोकतंत्र, बिल्कुल आप ठीक कह रहे हो, बिना ज्ञान के बहुत अंधा हो जाता है। क्योंकि लोकतंत्र का मतलब है, इंसान चुनेगा। अब जो चुनने वाला है, वही अगर अंधा है तो उसका चुनाव तो अंधा होगा ही न। जो चुनने वाला है, उसको आँखें दिए बिना, उसके मुँह पर पानी मारे बिना, उसने जिसको चुना मैं उसके ख़िलाफ़ नारे लगाऊँ, तो यह तो बात अलोकतांत्रिक हो गई। फिर तो हम कह रहे हैं कि डेमोक्रेसी ही हटा दो।

अगर लोकतंत्र रखना है, तो उसको सही चलाने का एक ही तरीका है कि जो वोटर है, वह जागृत होना चाहिए और उसको जागृत करा जा सकता है। नींद, बेहोशी में तो वैसे भी दुख है, जागृति कठिन भले ही है पर स्वभाव है और संभव भी है। एक आदमी जान लगाए, तो काफ़ी कुछ हो सकता है। सब ने मिलकर लगाई होती, तो बड़ी से बड़ी क्रांति आ चुकी होती अब तक, दो साल पहले आ गई होती।

और सड़क पर निकलने से मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है। निकलेंगे सड़क पर, पर अंधों को सड़क पर छोड़ोगे तो दुर्घटनाएँ ही होंगी। पहले आँखें तो खोल दूँ, उसके बाद बोलूँगा न कि निकलो सड़कों पर। या बेहोश लोगों को बोलूँ कि जाकर स्लीप वॉकिंग करो सड़कों पर, जैसे सब कर रहे हैं, तुम भी करो। यह बोलूँ? जिस सिस्टम को आप बदलना चाहती हैं न, आपके उस सिस्टम में स्टेक्स हैं। नहीं तो सौ लोगों को आप कब का ला चुकी होती। बस इतनी सी बात है।

हम बाहर-बाहर से यह दिखाते हैं, रिवॉल्यूशन, रिवॉल्यूशन, क्रांति, क्रांति, सिस्टम को तोड़ दो, उखाड़ दो, और उस सिस्टम को अपहोल्ड किसने कर रखा है, यह बात बिल्कुल छुपा जाते हैं। आपके अपने स्टेक्स हैं उस सिस्टम में। जो निकला है क्रांति करने, वह उसी सिस्टम की रोटी खा रहा है। जो निकला है क्रांति करने, सिस्टम न हो तो उसको बीवी नहीं मिलेगी। वही सिस्टम उसके लिए तमाम तरीके के इंतज़ाम करता है, व्यवस्थाएँ बनाता है, इंस्टिट्यूशंस बनाता है। यह स्ट्रक्चर देता है कभी फैमिली का, कभी पंडित जी का, कभी बैंक्वेट हॉल का। उस सिस्टम से आपको इतना कुछ मिला हुआ है। आप कहाँ से क्रांति कर लोगे उस सिस्टम के ख़िलाफ़? कैसे कर लोगे?

फ्रांस में क्रांति हुई थी, तो वहाँ पर एक मस्त नज़ारा देखने को मिलता था। किसी जगह हुआ होगा, क्रांति वहाँ कोई एक साल की बात नहीं थी लंबी। तो किसी शहर की बात, वो वहाँ जो क्रांतिकारी जा रहे थे, तो वो दुकानों में आग लगा रहे हैं। तो कैसे कर रहे हैं? कपड़ों की दुकान में आग लगानी है। तो पहले गए, बढ़िया वाले जो कपड़े पड़े थे पहले पहन लिए और फिर आग लगा दी। फिर गए मीट की दुकान में आग लगाने, तो वहाँ जितना उनको अपने हिसाब से खाया गया मीट, जितना जेब में भरा गया, सब ले लिया। फिर आग लगा दी।

तुम जहाँ आग लगा रहे हो, वहाँ स्टेक्स हैं तुम्हारे। स्टेक्स हैं। क्या तुम कभी आग लगा भी पाओगे पूरी तरीके से? लगा भी पाओगे क्या? तुम जिस मंत्रालय के ख़िलाफ़ विद्रोह करना चाहते हो उसी में तुम्हारा बाप नौकरी करता है और उसी बाप ने जो घूस खाई है, उससे तुम्हारी बहन का दहेज जाने वाला है। तुम कहाँ से क्रांति कर लोगे? पर तुम यह बात सामने नहीं लाना चाहते कि अभी भी तुम उस बाप के पाँव छूते हो। तुम अपने उसी बाप के पाँव छूते हो, जो तुम्हें पता है उसी मंत्रालय में काम करता है, जो भ्रष्ट है। और उसी मंत्रालय में वो घूस खाता है और उसी घूस से वो तुम्हारी बहन का दहेज देगा। और बहन का दहेज इसलिए देगा और तुम स्वीकार करोगे, क्योंकि दहेज देने के बाद प्रॉपर्टी में बहन का हिस्सा नहीं रहेगा और वो प्रॉपर्टी तुम क्रांतिकारी ख़ुद खाओगे। और तुम निकले हो सड़क पर क्रांति करने!

जिस व्यवस्था के खिलाफ तुम क्रांति कर रहे हो, उस व्यवस्था में तुम्हारे बहुत बड़े-बड़े स्टेक्स हैं बेटा। तुमने घर पर घोषित कर दिया कि, "बापू जी, क्योंकि तुम उसी मंत्रालय में काम करते हो जो भ्रष्ट है, तो इसीलिए आज से तुम्हारी कमाई का एक पैसा नहीं लूँगा। और तुमने यह जो पूरी मेरे लिए विरासत छोड़ी है, मैं इसको डिसओन करता हूँ।" तुमने घर पर कर दी क्रांति? बताओ न।

सब सरकारी मंत्रालयों को तुम भ्रष्ट बोलते हो। भ्रष्ट है, अभी बिल्कुल माना। और उन्हीं से तुम्हारे घर की रोटी चलती है। सबसे पहले तो रोटी खाना बंद करो। रोटी खानी बंद करी? नहीं। निकलने से पहले, "और मम्मा, आज ना खूब सारे पराठे खिला देना, आज क्रांति करने जा रहा हूँ।" और वो पराठे उसी मंत्रालय की घूस के हैं, जहाँ अब तुम आग लगाने जाना चाहते हो। अंधविश्वासी तुम ख़ुद भी हो, मुहूर्त देखकर घर से निकलोगे झंडा लेकर। और अगर उसी अंधविश्वास के दम पर सरकारें बनती और गिरती हों, तो तुम कर लोगे क्रांति।

मैं इंकार नहीं कर रहा कि सार्थक क्रांतियाँ नहीं हो सकतीं, और मैं बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ कि सार्थक क्रांतियाँ उबल करके सड़कों पर नहीं आ सकतीं। पर ऐसी क्रांति जो सड़क तक ही सीमित हो, न घर तक पहुँचे, न हृदय से शुरू हुई हो, ऐसी क्रांति किसी काम की नहीं होती।

नेता जनता का शोषण करते हैं। नेता भी दूर की बात है, जनता भी दूर की बात है। बाप माँ का शोषण करता है, करी क्रांति घर पर? जीजा बहन का करता है या बहन जीजे का शोषण करती है। करी क्रांति? घर परकाम वाली बाई आती है। किसी और जात की है। किसी और जात की है। तो कहते हैं, "बाकी सब जगह कर देना, पर घर के मंदिर में हम ख़ुद पोछा लगा देंगे।" घर पर करी क्रांति? सड़क पर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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