जब तक अपना कुछ नहीं होगा जीवन में, तब तक तो परायों पर आश्रित रहोगे ही न। अपने आप को किसी भी चीज़ से बाँधकर, जोड़कर मत देखो — जिससे भी जुड़ोगे, गुलाम हो जाओगे। क्योंकि गुलामी का मूल कारण होता है — धारणा। तुमने अपने और संसार के बारे में किसी मान्यता को सच का दर्ज़ा दे दिया है, जो सत्य तो छोड़ दो, तथ्य भी नहीं है। आज़ादी तो अकारण होती है। अपने आप को अपनी सारी मानसिक उठा-पटक से अलग रखो। अपनी निजता को अक्षुण्ण रखो, अस्पर्शित रखो।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! मैं लोगों से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता हूँ। किसी की बात से या किसी ने कहा कि देश के लिए कुछ करना चाहिए तो बात ठीक लगती है। किसी ने कहा गरीबों की मदद करो, तो मान लेता हूँ। पर मैं जो अपने जीवन का लक्ष्य बनाता हूँ, उसमें आगे नहीं बढ़ पाता हूँ। मन कहीं-न-कहीं फँस जाता है, प्रभावित हो जाता है, कुछ दिन तक प्रभाव रहता है, बाद में फिर छूट जाता है।
आचार्य प्रशांत: तो ये तो सबकी कहानी है। जब तक अपना कुछ नहीं होगा जीवन में तब तक तो परायों पर आश्रित रहोगे ही न। तुम प्रश्न पूछ रहे हो कि परायों पर क्यों आश्रित हूँ, प्रभावित क्यों हो जाता हूँ। असली सवाल पूछो न कि वो जिस पर मुझे आश्रित होना ही चाहिए, उससे मुझे क्या दुराव है? खाली तो अगर कमरा भी पड़ा हो और भले ही उसमें ताला लगा हो, पर फ़र्श पर आकर धूल बैठ ही जाती है।
पहले कॉलेज के लड़कों से बहुत बात करता था। तो उनसे एक सवाल पूछा, मैंने कहा, ‘तुम जिस मोहल्ले में रहते होगे वहाँ घर बने होंगे एक के बाद एक और बीच में कभी-कभार खाली प्लॉट होते हैं।’ बोले, ‘हाँ।’ तो मैंने कहा, ‘मोहल्लों में बीच में जो ऐसा खाली प्लॉट छूट जाता है, बताओ उसका क्या इस्तेमाल होता है?’ क्या इस्तेमाल होता है? कूड़ा डाला जाता है।




