स्वार्थी होना गलत नहीं है, गलती तब है जब आपको अपना स्वार्थ पता ही न हो। जब मन पर डर और पुराने संस्कारों की धूल होती है, तब साफ़-साफ़ नहीं समझ में आता कि अपना स्वार्थ कहाँ है। इसलिए अध्यात्म चाहिए, जो आपको बताता है कि तुम्हारे लिए अच्छा क्या है। एक बार जब जान जाओगे कि अच्छा क्या है, तब ये परवाह नहीं करोगे कि कीमत क्या देनी पड़ेगी, कौन अच्छा बोलेगा, कौन बुरा बोलेगा? क्योंकि अपने लिए कुछ अच्छा करना बहुत अच्छा काम है। यही जीने का तरीका है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये मैं अपनी पर्सनल लाइफ़ (निजी ज़िन्दगी) के बारे में पूछना चाह रही हूँ। तीन-चार साल पहले तक मैं ये सोचती रही कि शायद मैं बहुत सच्ची हूँ, मैं बहुत सही हूँ। तीन-चार सालों में ये लगा, पीछे की लाइफ़ (ज़िन्दगी) देखती हूँ, तो कभी पहले ये मैं प्राउड (गौरवान्वित) फ़ील (महसूस) करती थी कि मैं अपने पिता के काम आई, मैं अपने पति के काम आई, मैं फ़लाने के काम आई, ये आई, वो आई।
अब ये लगता है कि मैं किसी के काम नहीं आई, मैंने सिर्फ़ अपना मतलब निकाला। जहाँ मुझे पिता से मोह था तो पिता की टेंशन (तनाव) को दूर करने के लिए झूठों का सहारा लिया, जहाँ पति से मोह हुआ तो वहाँ मैनीपुलेशन (चालाकी से काम निकलवाना) हुआ, जहाँ अभी बेटे से मोह है तो उसकी ज़िन्दगी में भी बहुत मतलब मैनीपुलेशन जैसा ही लगता है।
पहले तेईस में जब शादी हुई, उसके पहले शायद ही कभी झूठ का मुझे नहीं लगता इतना सहारा लिया, पर शादी के बाद और माँ बनने के बाद और जब समाज में जो एक फ़ेक (नकली), मतलब मुझे तकलीफ़ जब आज होती है तो ये लगता है कि शायद पूरी ज़िन्दगी झूठ का आडंबर ओढ़कर ही बिताई। सोचती यही रही कि नहीं सब कुछ सही है, सच्चा है, पर कहीं मुझे सच नज़र नहीं आया। मुझे अपने आप में बहुत स्वार्थ नज़र आता है, और अभी अंदर से एक तकलीफ़ रहने लग गई है कि ये जंजाल जो अंदर है, ये कैसे?




