भारत में जाति केवल सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ चुकी मानसिक संरचना बन गई है। इसलिए संविधान, कानून और समाज-सुधार के प्रयास इसे समाप्त नहीं कर पाए। जन्म-आधारित जाति का आधार वैदिक दर्शन नहीं, बल्कि बाद की विकृत धार्मिक व्याख्याएँ हैं। जाति तभी समाप्त होगी जब धर्म अपने मूल वेदान्त और अद्वैत स्वरूप की ओर लौटे, जहाँ मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, सत्य से होती है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न कास्ट-बेस डिस्क्रिमिनेशन के ऊपर है। उसके रिलेटेड मैं कुछ आर्टिकल्स पढ़ रहा था जो रिसेंटली हुए हैं। जैसे हमने एक एग्ज़ाम्पल देखा कि चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया पर जूते फेंके गए, और वो इसलिए था क्योंकि वो एक दलित समाज, तथाकथित दलित समाज से आते हैं। साथ ही साथ एक आईपीएस ऑफ़िसर, जो कि फिर से दलित समाज से आते हैं, उनके साथ बहुत सारा मेंटल हरेसमेंट किया गया उन्हीं के सीनियर्स के द्वारा, और उनको टेंपल्स में अलाउ नहीं करा, ऑल बिकॉज़ ही वाज़ अ दलित। एक हमने न्यूज़ देखी है, जहाँ पर रायबरेली में एक युवक थे, उनको मॉब-लिंचिंग में उनकी डेथ हो गई।
आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हमने दो सौ साल तक एक ऐसे साम्राज्य के अंदर अपनी रीढ़ तोड़ी, जहाँ पर उन्होंने हमें डिवाइड-ऐंड-रूल पॉलिसी के तहत वर्गीकृत करा। हमने देखा कि कैसे वो डिवाइड-ऐंड-रूल पॉलिसी से किसी को कोई पहचान दे देते थे और उस पर हम पर रूल करते थे। सर, अब तो हमें 75 इयर्स हो रहे हैं आज़ादी के। क्यों भारत में जाति कभी जाती ही नहीं है?




