
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न कास्ट-बेस डिस्क्रिमिनेशन के ऊपर है। उसके रिलेटेड मैं कुछ आर्टिकल्स पढ़ रहा था जो रिसेंटली हुए हैं। जैसे हमने एक एग्ज़ाम्पल देखा कि चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया पर जूते फेंके गए, और वो इसलिए था क्योंकि वो एक दलित समाज, तथाकथित दलित समाज से आते हैं। साथ ही साथ एक आईपीएस ऑफ़िसर, जो कि फिर से दलित समाज से आते हैं, उनके साथ बहुत सारा मेंटल हरेसमेंट किया गया उन्हीं के सीनियर्स के द्वारा, और उनको टेंपल्स में अलाउ नहीं करा, ऑल बिकॉज़ ही वाज़ अ दलित। एक हमने न्यूज़ देखी है, जहाँ पर रायबरेली में एक युवक थे, उनको मॉब-लिंचिंग में उनकी डेथ हो गई।
आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हमने दो सौ साल तक एक ऐसे साम्राज्य के अंदर अपनी रीढ़ तोड़ी, जहाँ पर उन्होंने हमें डिवाइड-ऐंड-रूल पॉलिसी के तहत वर्गीकृत करा। हमने देखा कि कैसे वो डिवाइड-ऐंड-रूल पॉलिसी से किसी को कोई पहचान दे देते थे और उस पर हम पर रूल करते थे। सर, अब तो हमें 75 इयर्स हो रहे हैं आज़ादी के। क्यों भारत में जाति कभी जाती ही नहीं है?
आचार्य प्रशांत: आप ये उम्मीद क्यों कर रहे हो कि जाति चली जाएगी? आपकी उम्मीद के पीछे का तर्क क्या है?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ऐसा लगता है कि कॉन्स्टिट्यूशन ने हमें ये दे रखा है कि हम सब इक्वल हैं। फिर भी हमें ऐसे इंसिडेंट्स देखने को मिल रहे हैं। इससे पहले तो हम चलो एक ऐसे रूल पर थे जो हमें राज कर रहे थे।
आचार्य प्रशांत: नहीं तो आम आदमी या कोई भी आदमी वो कॉन्स्टिट्यूशन पर थोड़ी ही चलता है। कॉन्स्टिट्यूशन तो आम आदमी अपने हाथ की चीज़ मानता है, जिसमें तमाम तरीके के संशोधन, कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट्स होते रहते हैं। वो तो हमारे हाथ की चीज़ है, वो तो हम मानते हैं हम ही ने बनाया है, और बहुत सारे लोग हैं जो माँग करते हैं कि संविधान को पूरा ही रद्द कर दो, नया संविधान भी चाहिए। तो वो सब तो चलता रहता है। तुम्हें क्यों लग रहा है कि संविधान ने कुछ अधिकार वग़ैरह दे दिए हैं, या कुछ बातें बोल दी हैं कि इक्वलिटी है, जस्टिस है, फ़्रेटरनिटी है; इस तरह की बातें हैं तो जाति चली जाएगी।
संविधान आम आदमी के लिए कोई बहुत बड़ी चीज़ तो है नहीं। ऐसे नहीं चली जाएगी जाति, और उसके बड़े गहरे कारण हैं। जाति मिट्टी में, हवा में रच-बस चुकी है। उसका संबंध रोज़गार से हो गया है, रोटी से हो गया है, ख़ून से हो गया है। हमारी हस्ती, हमारी मौलिक पहचान से उसका संबंध बन गया है। इसलिए वो जाने का नाम नहीं ले रही।
बहुत अच्छा डॉक्यूमेंट है संविधान, पर किसी डॉक्यूमेंट में कुछ बातें लिख देने से जो ज़मीनी हक़ीक़त है वो इतनी आसानी से नहीं बदल जाती। हमने कहा कि मिट्टी बन गई है जाति, मिट्टी के भीतर घुस गई है जाति। आप जो कुछ भी कर रहे हैं न, चाहे वो संविधान की बात हो, चाहे वो कोर्ट के जजमेंट्स हों, चाहे वो किसी तरीके के समाज-सुधार की कोशिश हो; वो सारे काम मिट्टी के ऊपर किए जा रहे हैं। वो सब तंबू हैं जो मिट्टी के ऊपर गाड़े जा रहे हैं। वो सब सजावट है जो मिट्टी के ऊपर की जा रही है। जैसे मिट्टी के ऊपर किसी ने रंगोली बना दी हो, मिट्टी के ऊपर रंगोली बना देने से मिट्टी के तत्त्व तो नहीं बदल जाते न? या बदल जाते हैं?
तो जाति इस देश की चेतना की मिट्टी में घुस चुकी है। बहुत सारे रोज़गार ऐसे हैं जहाँ पर अपनी जाति वालों को ही महत्त्व दिया जाता है, और उन रोज़गारों में आप पाएँगे कि कुछ चुनिंदा जातियों के लोग ही मौजूद हैं।
शादी तो हम जानते ही हैं, एंडोगैमी। अभी भी 90–95% जो विवाह हैं, वो सजातीय होते हैं। तो अपनी ही जाति में देखकर करा जाता है वो सब कुछ। लोग अभी भी गाँवों को, मोहल्लों को जाति के आधार पर पहचानते हैं, ‘बामन टोला ये है, यहाँ पर ये लोग रहते हैं।’ हर तरह की छोटी जातियाँ, उपजातियाँ, सबके नाम रहते हैं उसके आधार पर उनका रहता है। यहाँ तक कि त्योहार भी बँटे हुए हैं कि ये त्योहार प्रमुखतः इस जाति का है।
मिट्टी के भीतर घुसी हुई है जाति। हमारी चेतना के भीतर घुसी हुई है जाति। वोट भी जाति देखकर डलता है। वो तो आप लोग सुनते ही हो न, ‘वी डोंट कास्ट आवर वोट; वी वोट आवर कास्ट।’ है न?
तो हमने कहा कि इस देश की चेतना में घुस गई है जाति। कैसे घुस गई है, उसको समझना पड़ेगा। आप दो-चार जिन इंसिडेंट्स की बात कर रहे हैं, वो लगातार होते रहते हैं। और जब भी वो होते हैं, तो आपके भीतर विरोध आ जाता है, आक्रोश आ जाता है, थोड़ी जिज्ञासा आ जाती है। ये सब क्या हो रहा है? पर वो सब आपके भीतर बस उन ख़ास घटनाओं को लेकर आता है। मिट्टी के ऊपर रंगोली थी वो बिगड़ गई। मैंने रंगोली बनाई थी, कोई आकर उस पर पाँव रख कर उसको बिगाड़ गया; आपको बुरा लग जाता है। पर रंगोली के नीचे मिट्टी ही ख़राब है, ये आप नहीं देख पाते हो। और गाहे बगाहे हर साल पाँच-दस-पंद्रह ऐसी घटनाएँ सुर्खियों में आ जाती हैं, जिसमें जातिवाद का भद्दा चेहरा हमको दिख जाता है, तो हमको फिर बुरा लगता है हम सवाल करते हैं। लेकिन मूल समस्या तक हम कभी नहीं पहुँचते।
मूल समस्या है, फिर कह रहा हूँ, इस देश की चेतना में जाति घुस गई है। चेतना में कैसे जाति घुस गई? ऐसे घुस गई कि मनुष्य एक चैतन्य प्राणी है, और सबसे बड़ी चीज़ फिर एक चैतन्य जीव के लिए उसकी चेतना होती है। पशु के लिए सबसे बड़ी चीज़ होता है उसका शरीर। इंसान के लिए सबसे बड़ी चीज़ होती है उसकी चेतना। समझ में आ रही है बात?
आपके शरीर को कोई ‘गंदा’ बोल दे, आपको कम बुरा लगेगा। कोई बोले ‘तू गंदे तन का है,’ आपको कम बुरा लगेगा। कोई बोल दे ‘तू गंदे मन का है,’ आपको ज़्यादा बुरा लगेगा। ठीक कह रहा हूँ कि नहीं? कोई आपको बोले कि ‘तू दिखने में भद्दा है,’ आपको कम बुरा लगेगा; बुरा लगेगा पर कम लगेगा। पर कोई बोल दे ‘तू मन से बहुत कुटिल है,’ तो आपको ज़्यादा बुरा लगेगा। क्योंकि हम शरीर से ज़्यादा चेतना के जीव हैं। हमारी चेतना पर कोई आक्षेप करे हमें ज़्यादा बुरा लगेगा, चेतना हमारी पहली पहचान है। और चेतना को आधार देने के लिए, चेतना को ऊँचाई देने के लिए जो रास्ता होता है, जो ज़रिया होता है, जो ढाँचा होता है; उसको कहते हैं धर्म।
मनुष्य क्योंकि एक चैतन्य जीव है, इसीलिए मनुष्य के पास सदा धर्म होता है, सदा। उनके पास भी होता है जो अपने आप को एथिस्ट आदि बोलते हैं, धर्म उनके पास भी होता है; बस उनके धर्म में ईश्वर के लिए जगह नहीं होती पर धर्म उनके पास भी होता है। वो भी धार्मिक ही हैं।
धर्म माने, जानना कि क्या सही है। धर्म माने, ‘मैं ये हूँ और मेरे लिए ये सही है।’ धर्म आपको बताता है कि कैसे जीना है। तो मनुष्य चूँकि पशु नहीं है, मनुष्य के पास क्योंकि चेतना है तो इसलिए मनुष्य के लिए धर्म का बहुत महत्त्व है। भले ही कोई उस धर्म को ऊपरी तौर पर माने कि न माने, लेकिन ये हमारी अस्तित्वगत विवशता है कि हम सब धार्मिक प्राणी हैं। हमें होना पड़ेगा क्योंकि हम कॉन्शियस हैं, हमारे पास चेतना है।
जाति हमारी चेतना में इसलिए घुस गई है क्योंकि काल का कुछ ऐसा विचित्र प्रवाह रहा है भारत में कि जाति धर्म का हिस्सा बन गई है। और धर्म चेतना के लिए बहुत ज़रूरी होता है। जाति अगर धर्म का हिस्सा बन जाए, तो फिर जाति चेतना में बहुत गहरे तक बैठ जाएगी। ये हुआ है भारत में, इसलिए इतनी आसानी से नहीं जाएगी। क्योंकि धर्म तो कोई छोड़ने वाली बात नहीं होती न? मनुष्य क्यों छोड़े धर्म को? पशुओं को धर्म की ज़रूरत नहीं होती, मनुष्य को होती है। और धर्म से मेरा आशय ये नहीं है कि जिसको हम हिंदुइज़्म, बुद्धिज़्म, क्रिश्चियनिटी, इस्लाम आदि बोल देते हैं; मैं उस धर्म की बात नहीं कर रहा हूँ।
धर्म माने, जानना। मनुष्य को धर्म चाहिए क्योंकि मनुष्य को निर्णय करने पड़ते हैं: क्या सही, क्या गलत, क्या पाप, क्या पुण्य, किधर जाऊँ, किधर न जाऊँ। पशुओं को ऐसे निर्णयों की ज़रूरत नहीं होती। पशुओं के लिए इंस्टिंक्ट काफ़ी होती है, वो उस पर चल लेते हैं, पर मनुष्य को बैठकर निर्णय करने पड़ते हैं। क्योंकि मनुष्य को सही-गलत, पाप-पुण्य का निर्णय करना पड़ता है, इसलिए मनुष्य को धर्म चाहिए। और इसलिए मनुष्य के लिए धर्म बहुत–बहुत ज़रूरी होता है। तो इसलिए इंसान एक धार्मिक प्राणी है।
और अगर धर्म में ही जाति घुस गई हो, तो फिर जाति को भी इंसान यहाँ सर के ऊपर रखेगा, क्योंकि धर्म तो सर के ऊपर रखने वाली चीज़ होता ही है न। धर्म वो चीज़ है जिसे यहाँ सर के ऊपर रखा जाना चाहिए; विशुद्ध धर्म को, असली धर्म को। वो इस बात का हक़दार होता है कि उसको सर के ऊपर रखा जाए, उसके सामने सर झुकाया जाए। असली धर्म चीज़ ही यही होती है, क्योंकि वो हमें जीने का तरीका बताता है, वो हमें आँख देता है, वो हमें रोशनी देता है, हमें समझ देता है।
तो धर्म तो होता ही है बढ़िया चीज़। धर्म के बिना आदमी अंधा है; पशु है, इधर-उधर जा रहा है, विवेक नहीं है, कोई फ़ैसला नहीं कर पा रहा। तो इसलिए इंसान को धर्म चाहिए। लेकिन अगर इतिहास में कुछ ऐसा हो गया हो कि जाति और धर्म को एक साथ गूँथ दिया गया हो। जैसे कई बार आटे में नमक मिलाकर गूँथ दिया जाता है, वैसे ही अगर काल में कुछ इस प्रकार की घटना घट गई हो, और घटती आ रही हो कि धर्म में, आटे में जाति के नमक को मिलाकर उन्हें इकट्ठा गूँथ दिया गया और इस तरह गूँथ दिया गया कि उनको अलग करना मुश्किल हो जाए; तो अब धर्म के साथ-साथ आदमी किस चीज़ को सर पर रख लेगा? जाति को भी। समझ में आई बात?
इसलिए भारत से जाति नहीं जाती, क्योंकि भारत में जाति कोई ‘सामाजिक व्यवस्था’ नहीं रह गई। वो एक ‘धार्मिक व्यवस्था’ बन गई है। और धर्म तो सर पर रखने वाली चीज़ होता ही है न? कौन धर्म छोड़ेगा? जो धर्म छोड़ेगा वो तो पशु हो जाएगा। मैं फिर कह रहा हूँ, मैं साधारण जो आयोजित, व्यवस्थित, ऑर्गनाइज़्ड रिलिजन होते हैं मैं उनको धर्म नहीं बोल रहा। मैं धर्म, ‘D,’ कैपिटल 'D’ वाले धर्म की बात कर रहा हूँ। मैं धर्म को एक व्यवस्था के तौर पर नहीं, एक सिद्धांत के तौर पर कह रहा हूँ; उसको नहीं छोड़ा जा सकता।
तो धर्म को तो आप यहाँ (सिर की ओर इंगित करते हुए) रखोगे ही। और धर्म के आटे में अगर जाति का नमक मिला है, तो धर्म के साथ-साथ आपने यहाँ क्या रख लिया? जाति भी रख ली। तो इसलिए आम हिंदुस्तानी जाति को यहाँ रखकर ढो रहा है, क्योंकि उस तक जो धर्म पहुँचा है, वो जाति से अभिन्न होकर पहुँचा है। हमारे लिए धर्म और जाति एक बात है, इसलिए जाति नहीं जा रही।
किसी से अगर बोलो कि जाति को त्याग दो, तो ये उसके लिए धर्म त्यागने जैसी बात हो जाती है। कोई अगर जाति-विरुद्ध आचरण करता है, तो ये लगभग धर्म-विरुद्ध आचरण जैसी बात हो जाती है; इसलिए जाति नहीं जा रही है भारत से। और जब तक ये घपला चलता रहेगा, जब तक ये विसंगत जोड़ी बनी रहेगी; ये जो मिश्रण किया गया है, मिलावट करी गई है, दो ऐसी चीज़ों को आपस में जोड़ दिया गया है जिनका आपस में सच में कोई रिश्ता नहीं, जब तक ये रिश्ता बना रहेगा तब तक जाति जाएगी भी नहीं।
माने जब तक हमें असली धर्म नहीं पता चलेगा, तब तक हम उसी धर्म को ढोते रहेंगे जिस धर्म में जाति एक अनिवार्यता है। समझ में आ रही है बात ये? यहाँ तक स्पष्ट हुआ है?
जाति अगर सामाजिक होती तो समाज-सुधार ने हटा दी होती; जाति अगर क़ानूनी होती तो संविधान ने हटा दी होती। भारत से जाति इसलिए नहीं जा रही है क्योंकि वो सामाजिक नहीं है, वो क़ानूनी नहीं है, वो धार्मिक है। और धर्म तो यहाँ (हृदय की ओर इंगित करते हुए) रखने की चीज़ है, धर्म यहाँ (हृदय) बैठाने की चीज़ है। तो हमने फिर जाति को भी यहाँ (हृदय की ओर इंगित करते हुए) और यहाँ (सिर की ओर इंगित करते हुए) बैठा लिया है। आम आदमी सोचता है जाति का संबंध तो धर्म से है न, धर्म थोड़ी छोड़ सकते हैं। तो इसलिए जाति को नहीं छोड़ता वो।
आइसोलेटेड इवेंट्स नहीं हैं कि तुम कह देते हो कि वहाँ पर उसको ये कर दिया, फलाने को जाति के कारण शोषित कर दिया या ऐसा कर दिया। ये धारा है पूरी एक, और ये धारा बहुत पीछे से बहती हुई आ रही है, बहुत पीछे से। जहाँ से बहती हुई आ रही है जानना चाहोगे? शुरू करूँ?
तो ऋग्वेद है, सबसे पुराना वेद हमारा। उसमें दसवें मंडल में पुरुषसूक्त आता है, पुरुषसूक्त। ठीक है? उसके मंत्र हैं, सोलह मंत्र हैं। और पुरुषसूक्त उस ‘आदिपुरुष’ की बात करता है, जो लगभग ब्रह्म के समतुल्य है। बड़ा गहरा अर्थ रखते हैं वो मंत्र। तो एक पुराने प्रथम पुरुष की बात हो रही है, जो सृष्टि के भीतर भी है और सृष्टि से दस अँगुल बाहर भी है। जो इमिनेंट भी है, ट्रान्सेंडेंटल भी है। ठीक है? और फिर कहा जा रहा है कि वो जो पुरुष है, उसी से सब कुछ निकला है, और वो सब कुछ दे देने के बाद भी इस सृष्टि से परे है। आगे का है। जैसे उपनिषदों में आता है न, क्या? कि उससे सब कुछ हटा दो फिर भी शेष रहता है। कौन सुनाएगा? बुदबुदाओ नहीं, जिसको आता है पूरा खड़े होकर बोलो।
‘पूर्णात्पूर्णमुदच्यते;’ पूर्ण से पूर्ण ही उदित होता है। ये भी पूर्ण है, वो भी पूर्ण है। ‘पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।’ पूर्ण से पूर्ण को निकाल दो, तो भी पूर्ण ही शेष रहता है। ठीक है? उसी तरीके से ये जो बात है ये हमें उपनिषदों से पहले, ये हमें पुरुषसूक्त में दिखाई देती है, बड़ा वो महत्त्वपूर्ण सूक्त है।
तो उसमें है कि जो ये पुरुष है, यज्ञ में इसकी आहुति दी जाती है, सैक्रिफ़ाइस। हालाँकि पूरी आहुति देने के बाद भी ये पुरुष पूरा का पूरा शेष रह जाता है और शेष ऐसे ही नहीं रह जाता कि उतनी ही इतनी सृष्टि है, सृष्टि से आगे का भी है। ये ट्रान्सेंडेंटल भी है। तो उसी से सब कुछ निकलता है। उसकी ये जो श्वास है, उससे वायु निकलती है। उसकी इंद्रियों से आँखों वग़ैरह से चाँद-सूरज निकलते हैं। ये सब बातें सिंबॉलिक हैं, मतलब समझने का है। उसी से सब जानवर निकल रहे हैं और नदियाँ, पहाड़ वग़ैरह निकल रहे हैं। तो ये सब उन सोलह मंत्रों में बात आती है।
उन्हीं मंत्रों में से एक मंत्र है, जो कहता है कि उसी पुरुष के मुख से ब्राह्मण, बाहों से क्षत्रिय, जाँघों से वैश्य और चरणों से शूद्र आते हैं, (स्रोत: ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 90 - पुरुषसूक्तम्)।
सब कुछ बोलने के बाद, जहाँ पर ये है कि उसी से पूरी सृष्टि आती है, सृष्टि में जितनी भी गणनाएँ करी जा सकती थीं सब कुछ आ गया है वहाँ पर, और फिर उसी में से एक ये है कि ये आता है। इसमें कहीं भी ये नहीं है कि ये जो वर्ण है, ये जाति-आधारित है, पहली बात। और ये भी कहीं भी नहीं है कि इनमें से कोई वर्ण दूसरे वर्ण से श्रेष्ठ है, दूसरी बात।
ना तो ये कहा गया है कि जो ब्राह्मण है, उसका बेटा ही ब्राह्मण होगा। और न ये कहा गया है कि एक वर्ण दूसरे वर्ण से श्रेष्ठ होता है। कुछ भी नहीं। तो कहानी लेकिन शुरू यहाँ से होती है वर्ण की। ठीक है? अभी तक जो वर्ण-व्यवस्था है वो पूरे तरीके से सिर्फ़ ‘डिवीज़न ऑफ़ लेबर’ है, पूरी तरह फ़्लूइड है और फ़्लेक्सिबल है।
जो एक तरह का काम करेगा, वो ब्राह्मण कहलाएगा। जो दूसरे तरह का काम करेगा, वो क्षत्रिय कहलाएगा। तीसरा काम करेगा तो ये, और चौथा काम जो सेवा का, सर्विस का करेगा, वो शूद्र कहलाएगा। ये ‘डिवीज़न ऑफ़ लेबर’ है। इसमें कहीं भी हेरिडिटी कुछ नहीं हो गया। इसमें कुछ भी अनुवांशिक नहीं हो गया, हेरिडिटरी नहीं हो गया। विरासत में आपको जाति मिल जाएगी ऐसा कुछ नहीं है। अभी तो ‘जाति’ शब्द भी नहीं है, अभी ‘वर्ण’ है शब्द। ठीक है? ये अभी शुरुआत हो रही है।
ये ठीक है, ये तो समाज को चलाने के लिए ‘डिवीज़न ऑफ़ लेबर’ करा गया है। और उसमें ये भी निहित है कि आप जैसा काम कर रहे हो उससे आपका वर्ण निर्धारित हो जाएगा। काम पहले आता है वर्ण बाद में आता है। यही बात हमें श्रीमद्भगवद्गीता में मिलती है, जब आप ये तीन अध्याय हैं जो आप तीनों कर चुके हो। अभी छठे अध्याय पर चल रहे हैं। तो 4.13, 5.18, 6.32; इन पर कई बार मैं चर्चा कर चुका हूँ। सत्रों में भी करी है, दूसरे तरफ़ और भी लोग जो इंटरव्यू लेने आए हैं, उनसे भी कई बार बात करी है।
जहाँ श्रीकृष्ण साफ़-साफ़ बोल रहे हैं, गीताकार साफ़-साफ़ कह रहे हैं, कि जन्म के आधार से वर्ण नहीं तय होता, गुण-कर्म से तय होता है। उसमें कहीं भी ऐसा नहीं है कि आप कहाँ पैदा हुए, उससे आपका वर्ण तय हो जाएगा। कहीं भी ऐसा नहीं है। आप कहीं भी पैदा हो सकते हो और आपका कुछ भी वर्ण हो सकता है। आपका वर्ण आपका ‘गुण’ तय करेगा। गुण माने, ये जो प्रकृति के त्रिगुणात्मक पिंड हो तुम, तो तुम्हारा जो प्राकृतिक रुझान है ये किस तरफ़ को है और उसके बाद ‘कर्म’ माने तुमने जो चुनाव किए। तुमने जो चुनाव किए, ये तय करेगा कि तुम्हारा वर्ण क्या है। माने, तुम्हारा वर्ण तुम्हारे हाथ में है तुम देख लो तुम्हें क्या करना है।
तो अभी तक भी जो वर्ण-व्यवस्था है वो चल रही है, बिल्कुल ठीक तरीके से चल रही है लगभग। अभी तक हमें कोई समस्या ऐसी दिखाई नहीं देती। लेकिन ये जितनी बातें हैं, ये अभी विद्वानों के लिए हैं। ये बातें सब अभी दर्शन के तल पर हैं। ये बातें सब अभी ऋषियों के घेरों में हैं। ये बातें अभी आम जनता तक नहीं पहुँची हैं। और आम जनता क्या करती थी तब? औद्योगिक थी? नॉलेज-इकॉनमी थी, कि जो पढ़ोगे–लिखोगे उसी से पैसा कमाओगे? क्या करती थी? खेतीहर थी। और जो बाक़ी व्यवसाय थे, उदाहरण के लिए लोहे का किसी को कुछ काम करना है या ताँबे का कुछ काम करना है, या पशुपालन का कुछ काम करना है, घोड़े कोई तैयार करता है, ये सब भी काम है अगर, तो इनमें भी शिक्षा की कोई बहुत ज़रूरत नहीं थी; स्किल-बेस्ड थे ये सारे काम, नॉलेज-बेस्ड नहीं थे।
कोई घड़े बना रहा है, कोई बाल काट रहा है, कई तरह के काम होते हैं किसी भी इकॉनमी में। पर उस समय जो इकॉनमी थी वो ज़्यादा स्किल-बेस्ड है, तो लोगों को एजुकेटेड होने की बहुत ज़्यादा ज़रूरत ही नहीं थी, कम शिक्षा में भी काम चल रहा था। तो वेद उस समय के सारे ज्ञान का संकलन थे एक तरह का एनसाइक्लोपीडिया थे। ठीक है?
वेद की पहुँच से आम जनता अछूती थी, क्योंकि उन्हें उसकी उतनी ज़रूरत ही नहीं थी। समय आगे बढ़ता है जो बात वेद कह रहे हैं, उसको आम जनता तक ले जाना है। आम जनता तक लेकिन कैसे पहुँचा दोगे उपनिषदों को? कैसे इतनी गुरु-गंभीर बात ऐसों को बता दोगे, जिनमें से ज़्यादातर को पढ़ना-लिखना भी नहीं आता, जिन्हें कुछ समझ में नहीं आता और जिन्हें कोई ज़रूरत भी नहीं दिखाई दे रही? कैसे कर दोगे?
तो फिर समझिए कि ईसा से दो सौ साल पहले से लेकर के सौ-दो सौ साल बाद तक रचना होती है धर्मसूत्रों की। ये धर्मसूत्र आम आदमी को आचरण सिखाने के लिए लिखे गए, आचरण, दर्शन पढ़ाने के लिए नहीं। ये माना गया कि दर्शन की आम आदमी को न ज़रूरत है, न उसकी दर्शन में कोई रुचि है। और जिनकी रुचि है वो आ जाएँ। क्योंकि जब हम वेदों को देखते हैं, उनमें न जाने कितने मंत्र हैं जो ऐसों द्वारा लिखे गए हैं जो ब्राह्मण नहीं हैं। तो आपकी अगर सचमुच दर्शन में या अध्यात्म में रुचि है तो आप आ जाइए ऋषियों की तरफ़। जो नहीं आ रहे लेकिन उन तक भी कोई बात तो पहुँचानी है, तो इस उद्देश्य से धर्मसूत्रों की रचना की गई।
धर्मसूत्र दर्शन पढ़ाने के लिए नहीं थे, उनमें दर्शन नहीं मिलता। वहाँ पर कोड ऑफ़ कण्डक्ट मिलता है; कैसा करना चाहिए, कैसा नहीं करना चाहिए। सबके लिए, गृहस्थ है तो उसको कैसा आचरण करना चाहिए, राजा को कैसा करना चाहिए, राजा के जो अधीनस्थ लोग हैं उनको कैसा करना चाहिए, जो संन्यासी है उसको कैसा आचरण करना चाहिए, इस तरह के संक्षेप में मिलता है। सूत्र हैं वो इसलिए अभी, सूत्र हैं बस। सूत्र माने, जो चीज़ छोटे में बता दी गई।
तो उसमें फिर आप स्तम्भसूत्र, और ये कल भी मैंने आपके सामने नाम लिया था, ये सब आते हैं: बौद्धायनसूत्र, गौतमसूत्र, ये सब आते हैं। लेकिन उनमें भी अभी बस यही कहा गया था कि ब्राह्मण हो तो ऐसा-ऐसा आचरण करो, क्षत्रिय हो तो ये आचरण करो, ये हो तो ये करो और ये हो तो ये करो। उनमें भी अभी तक मामला हेरिडिटरी नहीं हुआ है। उनमें भी अभी तक मामला ऐसा नहीं हुआ है कि तुम शूद्र के घर में पैदा हुए हो तो शूद्र हो, अभी वहाँ भी नहीं हुआ है ऐसा। समझ में आ रही है बात? नहीं हुआ है।
वहाँ से और जब हम आगे चलते हैं तो ये जो सूत्र हैं, धर्मसूत्र, ये बन जाते हैं धर्मशास्त्र। अब कुछ नया होना शुरू हो रहा है, एकदम नया। अब सूत्र और शास्त्र में अंतर ये है कि सूत्र में बात छोटे में है, और शास्त्र में उस छोटी-सी बात को आधार बनाकर के पूरी एक व्यवस्था खड़ी कर दी गई है लॉ एंड ऑर्डर की। एक पूरी लॉ-बुक बना दी गई है। अब बस एक पॉइंटर नहीं है कि तुम्हें ऐसा कंडक्ट करना है, बस एक सूचक नहीं है, अब वो एक पूरी लम्बी-चौड़ी विस्तृत व्यवस्था है। अब वहाँ से आती हैं स्मृतियाँ; स्मृतियाँ। उसमें है मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, नारद, पराशर, ये सब।
नई चीज़ अब ये होता है कि जैसे मनुस्मृति है, तो जो ऋग्वेद का पुरुषसूक्त है, वो मनुस्मृति में भी मौजूद है। बिल्कुल वैसे-का-वैसा ही। पुरुषसूक्त है, वो वहाँ भी मौजूद है। कौन-सा वाला हिस्सा? कि पुरुष के मुख से ब्राह्मण और बाहों से क्षत्रिय, वो वाला हिस्सा वहाँ भी मौजूद है। वो मंत्र वहाँ मौजूद है। लेकिन उसके साथ में ये सब भी मौजूद है, कि ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है। जो बात ऋग्वेद ने कभी नहीं कही। और ये भी मौजूद है कि अगर ब्राह्मण की बात नहीं मानोगे तो दण्ड क्या मिलेगा, ये भी मौजूद है उसके साथ में ही बिल्कुल। कि शूद्र अगर वेद सुन ले तो उसको कैसा दण्ड मिलना चाहिए। सम्पत्ति के अधिकार सबके अलग-अलग कर दिए। समझ में आ रही है बात?
तो अब ये एक नई चीज़ शुरू हो गई, जो वेद ने कभी बोली ही नहीं है। वेद जो बात बोल रहा है वो आध्यात्मिक है, वेद उस दिशा से आते हैं। वेद ‘ब्रह्म’ की ओर इशारा करना चाहते हैं। पुरुषसूक्त को आध्यात्मिक साहित्य में ऊँचा स्थान मिलता है। वो सचमुच मिस्टिकल है। लेकिन वो जो उसमें बात है, जो ट्रुथ है, उसको को-ऑप्ट कर लिया सामाजिक व्यवस्था ने, क्योंकि ये स्मृति है, वेद श्रुति है। मनुस्मृति है; वेद श्रुति है।
वेद की बात को स्मृति ने पकड़कर के सामाजिक व्यवस्था के हिसाब से गोल-गोल घुमा दिया, और अब ये कह दिया कि ब्राह्मण ऊपर होता है, जो ब्राह्मण के घर में पैदा हुआ है वही ब्राह्मण है। वही जो अभी आप जैसा-जैसा हाल-चाल देख रहे हैं, वो हाल-चाल मनुस्मृति में मौजूद है। और मनुस्मृति आती है ईसा के 300 साल बाद से लेकर 600 साल बाद तक के किसी काल में आती है, विद्वानों में उसमें थोड़ा-सा मतभेद है। समझ में आ रही है बात?
तो अब ये गड़बड़ यहाँ से अब शुरू हो चुकी है, बल्कि बड़ा रूप ले चुकी है। इसके बाद लेकिन जो होता है वो और रोचक है।
अब शुरू हो चुका है पौराणिक काल। अब शुरू हुआ है पौराणिक काल। मनुस्मृति भी बुक ऑफ लॉ है, बुक ऑफ गॉड नहीं है अभी तक। मनुस्मृति भी एक सामाजिक व्यवस्था दे रही है, मनुस्मृति भी ये नहीं कह रही कि ये धार्मिक व्यवस्था है। लेकिन जब पौराणिक काल शुरू होता है; अब पुराण लिखे बहुत अच्छे उद्देश्य से गए थे, उद्देश्य ये था, वही जो स्मृति का उद्देश्य होता है कि आबादी तेजी से बढ़ रही है, फैल रही है लोगों तक धर्म की बात पहुँचाओ कथाओं के माध्यम से। तो पुराणों में हमें इसीलिए ज़्यादातर कथाएँ मिलती हैं, एक के बाद एक कथाएँ, कहानियाँ, कथाएँ, कहानियाँ। उनका उद्देश्य अच्छा था, उद्देश्य ये था कि आम आदमी की शायद जो बौद्धिक क्षमता है उससे बाहर की बात है दर्शन। वेदान्त है, सांख्य है, न्याय, वैशेषिक, योग; ये माना गया कि आम आदमी के बूते के नहीं है समझने के। तो कैसे आम आदमी तक कुछ पहुँचाए? तो उसके लिए कथाएँ-कहानियाँ रची गईं, कि उस तक कुछ तो मॉरल इसका एसेंस पहुँचेगा। कुछ तो उस तक हम नैतिक बातें पहुँचा पाएँगे। तो इसलिए जो इस कोटि के लोग थे उनके लिए पुराण रचे गए।
लेकिन जाने-अजाने वहाँ कुछ और नया हो गया। क्या नया हो गया? अब पुराण कहते हैं, पुराणों ने भी वही पुरुषसूक्त लिया, बिल्कुल वैसे-का-वैसा ऋग्वेद से लिया; वो पुराणों में भी मौजूद है। पुराणों ने उसमें एक बात और जोड़ दी जो मनुस्मृति में भी नहीं जोड़ी गई थी। पुराणों ने उसमें जोड़ दिया कि ये सब जो बातें हैं, जो इनको न माने, वो अधर्मी हो गया है और अब उसको पाप लगेगा; और इनसे जो औलादें पैदा होंगी, वो अंत्यज हैं।
तो जो बात आध्यात्मिक थी, उसको विकृत करके मनुस्मृति में हम पाते हैं कि वो सामाजिक हो गई, और वही चीज उठकर के पुराण में जाकर के धार्मिक हो गई। तो जो सामाजिक व्यवस्था थी उसको धर्म बना दिया गया, और सामाजिक व्यवस्था में भी जो विकार था, उसको जो है धर्म बना दिया गया। बात समझ रहे हैं?
अब ये बहुत रोचक बात है कि वही बात पुरुषसूक्त में मौजूद है बिल्कुल वैसे-का-वैसा। और जो पुरुषसूक्त में मौजूद है न, वो अन्य वेदों में भी मौजूद है। वो ऐसा नहीं कि बस ऋग्वेद में ही मौजूद है। आरण्यक है, ब्राह्मण है, अन्य वेदों के भी हैं, उनमें भी मौजूद है। पर उस समय तक उसमें कोई विकार, मिश्रण, इस तरह मिलावट कुछ नहीं है। पर वही बात जब मनुस्मृति में आती है, तो उसमें दो-चार बातें और जोड़ दी जाती हैं। और जो दो-चार बातें जोड़ी गई हैं, वो कहाँ से जोड़ी गई हैं? वो जो तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था थी, उसको पुरुषसूक्त में जोड़ दिया। और फिर वही बात आगे चलकर और जब पुराणों में आती है, तो उसमें और चीजें भी जोड़ दी गईं। और सीधे-सीधे अब जाति शुरू हो गई है, और अब दूसरी जाति में जाना अधर्म हो गया है, पाप हो गया है, जिसके लिए आपको नरक भी मिल सकता है। और वो बात आम भारतीय के ख़ोपड़े में आज तक बैठी हुई है। इसलिए भारत से जाती नहीं जा रही है।
समझ में आ रही है बात?
आप कहीं दूसरी जाति में शादी कर लोगे तो जो पैदा होगा वो वर्णसंकर होगा। भाई, क़ानून तोड़ सकते हो, समाज भी छोड़ सकते हो, भगवान को कैसे छोड़ोगे। जब स्वयं भगवान ने बोल दिया कि दूसरी जाति में जाओगे तो अन्त्यज पैदा करोगे और पाप लगेगा, जब स्वयं भगवान के मुँह से ऐसा कहलवा दिया गया, तो अब जाति कैसे जाएगी? बात आ रही है समझ में? अभी कहानी पूरी नहीं हुई है, अभी बहुत मज़ेदार है और कहानी आगे। ये रोचक किस-किस को लग रहा है मामला?
(सारे श्रोता हाथ उठाते हैं)।
इसलिए मैं आपसे बोला करता हूँ कि श्रुति और स्मृति का भेद समझो। स्मृति माने, तत्कालीन समाज विचार, कि समाज में क्या चल रहा था। और जो समाज में चल रहा होता है, दुनिया के किसी भी समाज में वो बहुत अच्छा नहीं होता, क्योंकि लोग तो लोग होते हैं, गड़बड़। इसीलिए तो ऋषि समाज छोड़कर के जंगलों की ओर गए थे और पहाड़ों की ओर गए थे। और फिर ऋषियों को जो रेवलेशन उनको आया, उसको बोला जाता है? श्रुति। और समाज में जो सब चल रहा था, उससे स्मृतिकारों ने जो ग्रंथ लिखे, उन्हें बोला जाता है, स्मृति।
इसमें निश्चित रूप से श्रुति का स्थान ऊँचा है, और माना भी जाता है। क्योंकि स्मृति तो सामाजिक व्यवस्था है, उसमें कुछ नहीं। और स्मृति को भी कुछ सम्मान तभी तक मिलता है जब तक वो श्रुति का अनुगमन करती है। जहाँ वो श्रुति को काटना शुरू कर दे, वहाँ स्मृति को है कि हटाओ इसको, ये बात ऐसे ही है। जिसने लिखा है उसका व्यक्तिगत विचार है, उसको हम धार्मिक बात नहीं मान सकते। आ रही है बात समझ में?
तो अब पौराणिक काल के साथ जाति बिल्कुल वो भयावह रूप ले चुकी है जो हम आज देख रहे हैं, आज से भी ज़्यादा, क्योंकि आज तो थोड़ा मामला ठंडा पड़ा है। बिल्कुल भयानक रूप ले चुकी है, पौराणिक काल में अब। अब यहाँ से शुरू होता है आगे भक्तिकाल। और भक्ति ने क्या करा, कि भगवान के लिए तो सब बराबर हैं, लेकिन समाज में जो चल रहा है उसको बहुत सशक्त तरीके से किसी डायनामाइट से नहीं उड़ाया।
उदाहरण के लिए रामानुजाचार्य थे, तो उन्होंने मंदिरों के दरवाज़े खुलवा दिए। सब जातियों के लोग बराबर हैं भगवान के लिए, लेकिन समाज में तो अलग-अलग ही रहेंगे। तो सुधार तो हुआ, क्योंकि बहुत-सारे जो भक्तिकालीन हमें संत मिलते हैं, वह स्वयं तथाकथित निचली जातियों के हैं। तो इस अर्थ में सुधार तो हुआ, कि तुम किसी भी जाति के हो, तो भी तुम्हारा सीधे भगवान से अपना रिश्ता हो सकता है। ये सुधार की बात है, बहुत अच्छी बात है। लेकिन फिर भी तुम्हारी जो जाति है, वो तो रहेगी। वो जाति ही नहीं हट सकती। हाँ, ठीक है, तुम्हारा भगवान से सीधा रिश्ता बन सकता है, लेकिन जाति तो तुम्हारी फिर भी चिपक कर रहेगी, वो नहीं हटेगी। तो जाति नहीं जाती।
एकमात्र जो इसमें आशा की किरण थी वो थी, अद्वैत; जहाँ पर ये साफ़ देखा जाता था कि देहगत किसी भी प्रकार का भेद मिथ्या है। लेकिन अद्वैत भी जाति के आगे विफल हो गया। ये मामला बड़ा मज़ेदार होता जा रहा है, अद्वैत कैसे हार गया जाति से? अद्वैत भी जाति से हार गया। कैसे? ये कैसे हो सकता है?
आदि शंकराचार्य ने जो बौद्धिक मॉडल दिया, उस मॉडल में जाति के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन वो जिए ही बहुत कम, और उनका जो पूरा कार्यकाल था और कार्यक्षेत्र था, वो धर्म और दर्शन से संबंधित ही रहा। वो समाज-सुधारक कभी नहीं बन पाए, सोशल एक्टिविज़्म की दिशा में हम उनको ज़्यादातर मौन पाते हैं, साइलेंट। हालाँकि उन्होंने जो मेटाफ़िज़िक्स दी है हमको, जो उन्होंने हमें थ्योरिटिकल मॉडल दिया है, उसमें जाति जैसी चीज़ हो ही नहीं सकती। एकदम ओवररूल करता है वो, कि जाति कहाँ से आ गई!
लेकिन वो जिए ही बहुत कम, और जितना जिए, उनका ज़्यादा समय यात्रा में, शास्त्रार्थ में बीता और लेखन में बीता। तो समाज-सुधार की दिशा में हम नहीं पाते, या हमें ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि उनकी ओर से कोई विशेष प्रयास किया गया हो। शायद यदि उनकी आयु थोड़ी लंबी होने पाती, तो हम पाते कि इस दिशा में भी वो कुछ सार्थक कर पाए। लेकिन फिर भी, उन्होंने हमें जो एक सिस्टम बनाकर दिया, जो व्यवस्था बनाकर दी; कि ये रहा वेदान्त और वेदान्त को ऐसे देखा जाना चाहिए। वो बहुत बढ़िया है और उसमें जाति के लिए कोई जगह नहीं है।
लेकिन जब आप उस व्यवस्था पर ग़ौर करते हो, तो आप एक ऐसी बात पाते हो जहाँ पर मामला सब अटक जाता है। वो ये है कि वास्तविकता के दो तल होते हैं अद्वैत में। अद्वैत दर्शन में दो तल होते हैं। तीन होते हैं, अभी हम दो की बात कर रहे हैं। तीसरा जो सबसे नीचे का होता है, वो होता है, प्रातिभासिक।
जो ये तल है, समाज का, व्यवहार का, तथ्यों का, ज़िंदगी का, संसार का, इसको बोलते हैं, व्यावहारिक। और जो सत्य का तल होता है उसको बोलते हैं, पारमार्थिक।
तो शंकराचार्य तो चले गए और बेचारे बहुत कम उम्र में चले गए। अद्वैत की परंपरा उनके बाद भी लागू रही, चलती रही। लेकिन तब तक पौराणिक मामला बहुत सशक्त हो चुका था, और अद्वैत की जगह द्वैत छा चुका था बिल्कुल; माने भक्ति छा चुकी थी। और भक्ति से जुड़ी हुई जो सामाजिक व्यवस्था थी, वो पूरी भारत पर छा चुकी थी। तो हम पाते हैं कि फिर जो अद्वैत की परंपरा चली आगे, उन्होंने भी एक तरीके से जाति को स्वीकार कर लिया।
आदि शंकराचार्य के बाद भी और आए हैं बहुत, जैसे वाचस्पति मिश्र थे। ठीक है? और कैसे स्वीकार करा गया? ऐसे स्वीकार करा गया, कि पारमार्थिक तल पर तो बिल्कुल जातिगत भेद हो ही नहीं सकता, लेकिन व्यावहारिक तल पर तो हो सकता है न। पारमार्थिक तल पर नहीं हो सकता, लेकिन व्यावहारिक तल पर तो हो सकता है न। और इन दोनों तलों को एक करने का कोई प्रयास हमको तो देखने को नहीं मिला। जो मैं आपसे कहा करता हूँ, कि जब भी ज़मीन पर कोई फ़ैसला लेना हो, तो आसमान से पूछकर लेना; ये बात हमें फिर देखने को नहीं मिली। ज़मीन और आसमान को अलग-अलग कर दिया गया। कहा, यहाँ पर है जात; वहाँ भले ही नहीं है, यहाँ तो है। तो अद्वैत भी हार गया जात से। तो इसलिए जाति नहीं जाती। जबकि अद्वैत वो अकेला दर्शन था जिसके सामने जाति का कोई वजूद ही नहीं।
होना तो ये चाहिए था कि जब पारमार्थिक तल पर नहीं है तो व्यावहारिक पर क्यों हो? पर उल्टा तर्क दिया गया। कहा गया, पारमार्थिक पर नहीं है, व्यावहारिक पर तो हो सकती है न। और ये नहीं कि जाति का समर्थन किया जा रहा है, बस उसको एक सोशल फ़ैक्ट की तरह मान लिया गया है और उसको चलने दिया गया है। जैसे एक सोशल इनर्शिया हो, कि अब चीज़ चल रही है तो चल रही है। चीज़ चल रही है तो चल रही है।
बात आ रही है समझ में?
यहाँ (ऊपर) सत्य, यहाँ (नीचे) समाज, अद्वैत में। हम कहते हैं कि व्यवहार इसलिए होता है, आपका सामाजिक जीवन, आपका लौकिक जीवन, पार्थिव जीवन इसलिए होता है ताकि आप सत्य तक पहुँच सकें। हम कहते हैं, तथ्य सत्य का द्वार होते हैं। इस तल (नीचे) पर इसलिए हो, ताकि इस तल से उठकर यहाँ (ऊपर) आ सको। इनको (दोनों तलों को) जोड़ने की बहुत ज़रूरत होती है न, इनको जोड़ा नहीं गया। इनको जोड़ दिया गया होता तो जाति कब की मिट जाती। अद्वैत वेदान्त के सामने जाति टिक ही नहीं सकती। वहाँ जो फ़िलॉसॉफ़िकल मॉडल है, उसमें देह ही नहीं है तो देह की जात कहाँ से आ जाएगी? उसमें जीव की ही सत्ता नहीं है, तो जीव की जात कहाँ से आ जाएगी?
बात आ रही है समझ में?
ये चला है। तो जब धर्म का मतलब ही जाति बन गया हो, तो उस देश से फिर जाति कैसे हटाओगे? तो जाति हटाने का फिर तरीका भी क्या है? कि वेदान्त को सामने लेकर के आओ, और वेदान्त माने है अद्वैत। वेदान्त को अद्वैत से इक्वेट करो। और अद्वैत को इक्वेट करो कि पारमार्थिक तल और व्यावहारिक तल को भी एक करना है, उनको भी इक्वेट करो। तब जाकर जाति जाएगी।
और ये कोई आर्टिफ़िशियल इक्वेशन नहीं है, यही असली है, यही वास्तविक है। बस ये दबी रही। वेदान्त माने अद्वैत और अद्वैत माने परमार्थ को ही तो महत्त्व देना है, व्यवहार तो बस साधन है।
व्यवहार साधन है; परमार्थ साध्य है। ये तरीका है जाति को मिटाने का।
बात आ रही है समझ में? सिर्फ़ दर्शन नहीं चाहिए, संघर्ष चाहिए। परमार्थ को और व्यवहार को एक करने का हौसला चाहिए। खुली घोषणा चाहिए कि अगर परमार्थ और व्यवहार अलग-अलग हैं, तो ये पाखंड है और पाखंड हम नहीं चलने देंगे।
कुछ समझ में आ रहा है या ज़्यादा भारी हो गया? नहीं आ रहा। मैं आपको पुरुषसूक्त का दिखाता हूँ कि उसका प्रोग्रेशन कैसा हुआ है।
अब ऋग्वेद में पुरुषसूक्त में जो बात आई है वो उधरत करे देता हूँ। वो बस इतनी सी है कि ‘उसके मुख से’ उसके माने पुरुष के, ‘उसके मुख से ब्राह्मण, उसकी बाहों से क्षत्रिय, जाँघों से वैश्य और फीट से चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए।’ अब उसके बाद मनुस्मृति है, जो ईसा के 100–200 साल बाद के समय की है, उसमें बिल्कुल यही मंत्र मौजूद है। लेकिन साथ ही-साथ इसके साथ में कुछ वैधानिक बातें जोड़ दी गई हैं, कानूनी बातें, लीगल प्रिस्क्रिप्शंस। जो कि कहते हैं, जैसे कि पहले अध्याय में सत्तासी से लेकर इक्यानबे तक, और दसवें में चौथे और पाँचवें नंबर पर, जो कहते हैं कि ‘कास्ट जन्म से होती है।’ ये बात ऋग्वेद में कहीं नहीं है। सबके कर्तव्यों का निर्धारण पहले ही करा जा चुका है, अलग-अलग वर्णों के। और निंदा की गई है वर्ण-संकर की। और इस बात को मनुस्मृति में सामाजिक नियम बना दिया गया।
उसके बाद हमारे पास आता है पुराण। अब यहाँ पर जो ऋग्वेद की बात है, उसको और कुछ जोड़कर आगे बढ़ा दिया गया है। तो क्या कहा गया है? ये नई चीज़ जोड़ दी गई, जो कि ऋग्वेद ने कहीं नहीं कही है: ‘शूद्रों को दूसरों की सेवा के लिए ही उत्पन्न किया गया है। ब्राह्मण स्वामी है। और अलग-अलग वर्णों के मिलने से वर्णों की हानि होती है, डिग्रेडेशन होता है।’
और ये बात अब सामाजिक नियम नहीं है, ये बात अब एक धार्मिक नियम है। सामाजिक नियम होते तो भारत ने कब के तोड़ दिए होते। इनको धार्मिक नियम बना दिया गया, जबकि श्रुति में इनका कोई उल्लेख है ही नहीं। तो ये एक तरीके से श्रुति के लिए भी अचंभे की बात होगी, कि मैंने क्या कहा था और स्मृति ने उसको क्या बना दिया! आ रही है बात समझ में?
तो जो वेदान्त के सब द्वैतात्मक भाष्य हुए, द्वैतात्मक होते ही उसमें जीव के साथ जीव का रचयिता आ गया न, यही द्वैत है न। अद्वैत तो कहता है, जीव ही मिथ्या है और ब्रह्म सत्य है। जब जीव ही मिथ्या है, तो जीव का रचयिता कहाँ से आ गया कोई। ब्रह्म पर जब माया आरोपित हो जाती है तो उसको अद्वैत कहता है, कि ब्रह्म प्लस माया बराबर ईश्वर। ब्रह्म पर माया आरोपित हो गई है, तो आपको ईश्वर जैसा प्रतीत हो रहा है। ठीक है?
पर जो सब द्वैतात्मक स्कूल्स निकले, डुअलिस्टिक स्कूल्स वेदान्तिक इंटरप्रिटेशन के, उन्होंने कहा: ‘ये जीव है, जीव का जगत है और वो इस जगत का रचयिता है, जीव का रचयिता है। तो यहाँ जो कुछ भी चल रहा है ये उसकी आज्ञा से चल रहा है। तो अगर यहाँ जाति भी चल रही है, तो उसकी आज्ञा से चल रही है। तो तुमने अगर यहाँ पर जाति तोड़ी, तो तुमने वो जो रचयिता, गॉड बैठा हुआ है न, तुमने उसकी आज्ञा को उल्लंघन किया। अब तुम पापी हो गए, अब तुम अधार्मिक हो गए।’ क़ानून की नज़र में अपराधी बनना आदमी एक बार फिर भी स्वीकार कर ले, भगवान की नज़र में अपराधी बनना कौन स्वीकार करेगा। इसलिए जाति नहीं जाती।
क़ानून की नज़र में आप अपराधी बन गए, आप कहते हो, कोई बात नहीं, मैं वीर हूँ, मैं क्रांतिकारी हूँ। पर जब ये कह दिया गया कि ये सारा खेल भगवान ने स्वयं रचा है, तो अब आप कैसे हटाओगे? ये हुआ है। और इसीलिए भारत जाति को बिल्कुल पकड़कर बैठा हुआ है और सबसे ज़्यादा वो पकड़कर बैठे हैं जिनका जाति व्यवस्था में आज तक बड़ा स्वार्थ रहा है। उनको पाओगे वो सबसे ज़्यादा विरोधी हैं जाति इत्यादि हटाने के।
इसलिए आपको ये समझना होगा कि सनातन धर्म श्रुति का धर्म है, स्मृति का नहीं। हाँ, स्मृति में भी उपयोगी बातें हैं, कुछ तो बहुत सुंदर बातें हैं, उनको हमें ले लेना है। उनकी उपयोगिता इस बात से सिद्ध होती है कि वो बातें श्रुति से मेल खाती हैं, वो ठीक है। पर बहुत कुछ ऐसा है स्मृति में जो बिल्कुल श्रुति-विरुद्ध है, उसको धर्म कैसे मान लिया हमने?
और हुआ ये है कि जो कुछ श्रुति-विरुद्ध है वही ज़्यादा आज हिन्दू धर्म में चल रहा है। हम कहते ज़रूर हैं कि हमारा धर्म वैदिक है पर वेद माने तो श्रुति। और श्रुति के केंद्र में जो फ़िलॉसॉफ़िकल कोर है, वो है उपनिषद्। उसको केंद्र बोल दो श्रुति का; उपनिषद् को श्रुति का केंद्र भी बोल सकते हो और श्रुति का शिखर भी बोल सकते हो, दोनों बातें बोल सकते हो। तो आम जो हिन्दू है वो कौन-सा उपनिषद् पर चलता है। उसके लिए धर्म का क्या मतलब होता है? कथाएँ, थियोलॉजी लेनी है उसको पुराणों से और कोड ऑफ़ कण्डक्ट उसको लेना है स्मृतियों से, मनुस्मृति आदि से। तो ये हिन्दू धर्म है। उसको उपनिषदों से कोई लेना ही देना नहीं है। बस वो कहता है, कि मेरा धर्म वैदिक है। वो अपना कोड ऑफ़ कण्डक्ट कहाँ से लेता है, जो रोज़मर्रा का उसका व्यवहार है, आचरण है, वो कहाँ से लेता है वो? वो स्मृतियों से ले रहा है। और जो उसकी देव-विषयक धारणाएँ हैं, जो उसकी थियोलॉजिकल बिलीफ़्स हैं, वो कहाँ से लेता है? वो पुराणों से लेता है। ये हमारा आज का हिन्दू धर्म है। तो इसलिए जाति नहीं जाने वाली।
हमें सामाजिक सुधार की नहीं, हमें धार्मिक सुधार की ज़रूरत है, हमें श्रुति की तरफ़ वापस लौटना पड़ेगा। बिना दर्शन के धर्म अँधा, बहरा, गूँगा, लँगड़ा है और हिंसक है।
जब तक सनातन धर्म वेदान्त दर्शन का धर्म नहीं बनेगा दोबारा, तब तक जाति नहीं जाने वाली। कुछ हो रहा है स्पष्ट? नहीं हो रहा है बहुत सन्नाटा है। चलिए अच्छी-अच्छी बातें करते हैं, कहाँ हम।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं सत्रह साल से अफ़्रीका में रहा हूँ। तो वहाँ जो लोगों से बात किया तो उन्होंने कहा कि इंडियंस आइसोलेटेड रहते हैं, मिक्स नहीं होते हैं। और उनका विशेषता मैरिज को लेकर था। वो कहते थे, यूरोपियन्स, अमेरिकन सब मिक्स होते हैं, मैरिजेस भी करते हैं, बट इंडियंस नहीं करते हैं। तो मुझे लगता है कि ये यहीं से आ रहा है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, वहीं से आ रहा है।
प्रश्नकर्ता: जाति का।
आचार्य प्रशांत: यही है, जो एंडोगेमी है न, अपने में रहो, अपने में ही विवाह करो, अपने में ही विवाह करो। क्योंकि जाति व्यवस्था चल ही न पाए अगर सजातीय विवाह की बंदिश न रहे। जाति का तो मतलब ही है, कि इसका रक्त ऐसा रहेगा, इसका रक्त ऐसा रहेगा, और ये धाराएँ कभी मिलनी नहीं चाहिए। तो उसी ने भारतीयों को कुल मिलाकर के बहुत गोलबंद भी कर दिया, दायरों में बंद कर दिया। और उसका बहुत भारी खामियाज़ा फिर भारत को भुगतना भी पड़ा है।
हम अपनी जाति से ही बाहर नहीं निकल सकते, तो हम दुनिया को क्या देखेंगे, समझेंगे, जानेंगे। जो हमारा पड़ोसी है, हम उसी की दिशा में जा नहीं सकते हैं, उससे मिलजुल नहीं सकते हैं। उसी में पाबंदी लग गई है। तो दुनिया को क्या जानेंगे। हमने नहीं जाना दुनिया को पर दुनिया ने हमको जान लिया, और फिर हज़ार साल की ग़ुलामी। क्योंकि लैंड रूट भी टू-वे होता है। तुम भी उधर को जा सकते थे; तुम उधर को नहीं गए, तो उधर वाले इधर को आ गए। और सी रूट भी टू-वे होता है। तुम भी तो उधर को जा सकते थे; तुम उधर नहीं गए, तो उधर वाले इधर को आ गए। तुम उधर क्यों नहीं गए? ‘भाई, हमें तो अपने छोटे से दायरे में रहना है।’
प्रश्नकर्ता: जबकि आचार्य जी, जो रेसिज़्म है वो यूरोप से आया। लेकिन अभी जो देखने को वहाँ मिलता है कि यूरोपियन्स बहुत अच्छे से मिक्स हो रहे हैं और काफ़ी सोशलाइज़ भी कर रहे हैं, जो वहाँ की कम्युनिटी है। बट इंडियंस के साथ वैसा नहीं हो पा रहा है। तो रेसिज़्म के बारे में आपका क्या कहना?
आचार्य प्रशांत: देखिए, ये सारी बातें एक साथ चलती हैं। भारत में कास्ट, क्लास, रेस इनको अलग कर पाना एक अरसे तक नामुमकिन रहा है। वर्ण शब्द ही आया है कलर से। अब उसको मैं क्या बोलूँ? वर्ण बोलूँ या रेस बोलूँ? उसको वर्ण बोलूँ या रेस?
वर्ण माने क्या होता है? रंग। तो क्या बोलूँ उसको? तो भारत में वो सब एक साथ चला है। पर उस सबके बीच में एक जो बहुत ठोस साझी और इनवायलेबल अलंघ्य बात रही है, वो ये है, कि ‘ये तुम्हारा दायरा है, इसको लाँघना मत, इसको लाँघोगे तो पाप लगेगा और नरक में जाओगे, ऐसा वहाँ पर पंडित जी ने बताया।’
और जहाँ तक शास्त्रों की बात है, वो ख़ुद कभी पढ़ मत लेना क्योंकि उस पर एक वर्ण-विशेष की मोनोपोली है। अभी मैं आपसे बात करता हूँ, देखते नहीं हैं कितने आरोप लगते हैं। “ये किस परंपरा से आया है?” माने बात समझ रहे हो न, कि ‘ज्ञान को दायरों के भीतर होना चाहिए। उसके बाहर निकल करके जन-सामान्य के बीच लोकतांत्रिक तरीके से, ये व्यक्ति गीता को क्यों ले जा रहा है? आपको अगर गीता पढ़नी है तो जाइए और जो एस्टैब्लिश्ड ट्रेडिशंस हैं, उनके सेंटर्स पर जाइए, वहाँ पढ़िए। जो एस्टैब्लिश्ड मठ हैं, आश्रम हैं, परंपराएँ हैं आप वहाँ जाइए, वहाँ पढ़िए।’
ये आक्षेप लगता रहा है और वही उसी बात को ले मुझसे बहुत नाराज़ हो जाते हैं, कि ‘भाई, जैसी-जैसी सीमाएँ बना दी गई हैं, तुम उन सीमाओं का पालन क्यों नहीं कर रहे? तुम क्यों इतने उद्दंड हो रहे हो? सब तोड़-ताड़ के सब आदमियों तक गीता को लेकर जा रहे हो, उपनिषदों को लेकर जा रहे हो। वो भी उनको वो अर्थ बता रहे हो जो कि ट्रेडिशनल इंटरप्रिटेशन से मैच ही नहीं करता।’
तो भारतीय होने का मतलब ही हो गया, वो जो सीमाबद्ध है। और देखिए, कितनी हमने अपनी दुर्दशा कराई इन सीमाओं का सम्मान कर-करके। देखिए। एक समय पर तो ये भी धार्मिक बात हो गई थी, कि ‘अगर समुद्र लाँघ के जाओगे तो नरक पाओगे।’ ठीक है, आप मत जाओ समुद्र लाँघ करके। कम से कम पाँच-सात अलग-अलग देशों के लोग आए समुद्र लाँघ करके, और सबने यहाँ राज करा और सबने खूब लूटा। और समुद्र ने आपको तो नहीं मना करा था, आप भी जा सकते थे। आप उनसे ज़्यादा बड़े थे, दमदार थे, जनसंख्या भी ज़्यादा थी, यहाँ रिसोर्सेज भी ज़्यादा थे, प्रकृति का दिया हुआ सब कुछ यहाँ पर ज़्यादा था।
इतना ही नहीं होता है, अगर आप जेनेटिक्स की दिशा से देखेंगे तो जितना ज़्यादा आप अपने ही छोटे दायरे में ब्रीडिंग करते हैं, उतना ज़्यादा आपके जीन्स कमज़ोर होते जाते हैं, पीढ़ी दर पीढ़ी, पीढ़ी दर पीढ़ी। और जितना आप अपने दायरों से बाहर जाकर के ब्रीडिंग करते हैं, प्रजनन करते हैं, उतना जो औलाद निकलती है वो और ताक़तवर निकलती है और उसमें नए विशेष किस्म के ट्रेट्स होते हैं। हमने हर तरीके से अपना नुकसान करा है।
प्रश्नकर्ता: ओके, थैंक यू सर।
प्रश्नकर्ता: हेलो सर। सर मतलब ये कहाँ पर लिखा है कि, कौन मतलब किसने बोला ये कि जो श्रुति में लिखा है, वो उसको मान्यता दी जाएगी और जो स्मृति है जहाँ तक वो श्रुति को फ़ॉलो कर रही है, उसको फ़ॉलो किया जाएगा, अदरवाइज़ उसको रिजेक्ट किया जाएगा?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि श्रुति के हज़ार-पंद्रह सौ साल बाद से स्मृति आना शुरू होती है। तो स्मृति स्वयं ये कहती है कि ‘श्रुति का पालन करो।’ ठीक है।
दूसरी बात, दर्शन श्रुति में ही है सिर्फ़; दर्शन, फ़िलॉसफ़ी; स्मृति में कहीं है ही नहीं। और ये चीज़ तो कहाँ लिखा है? कम से कम दस जगह लिखा है, ये आपने चैट जीपीटी से नहीं पूछा अभी तक? सामान्य ज्ञान की बातें तो उससे पूछकर आइए, ताकि मैं उस पर आगे इलैबोरेट कर सकूँ। ठीक है, ये बहुत जगह है और इस पर कोई विवाद भी नहीं है। इस पर कोई विवाद नहीं है, कि श्रुति ऊपर है कि स्मृति ऊपर है। इस पर कोई विवाद नहीं है।
किसी ने आपसे कह दिया क्या, कि “मैं तो स्मृति मानता हूँ, श्रुति क्यों मानूँ?”
प्रश्नकर्ता: नहीं-नहीं सर, मैं एक्चुअली आर्गुमेंट के लिए पूछ रही थी, अगर किसी से करें।
आचार्य प्रशांत: तो आर्गुमेंट। ये पहले उसके साथ तो निपटा लीजिए न, मेरा छोटा भाई जो है।
प्रश्नकर्ता: जी सर।
आचार्य प्रशांत: तथ्य सत्य का द्वार है और चैट जीपीटी एपी का द्वार है। पहले उससे सारा फ़ैक्चुअल वेरिफ़िकेशन कर लिया करिए ताकि उस तल के सारे शिक़वे-संदेह मिट जाएँ। फिर जो डाउट बचे वो मेरे पास लाया करिए। ठीक है? हाँ, आगे बढ़िए।
प्रश्नकर्ता: हेलो सर। मैंने एक साल कॉलेज में पढ़ाया है; सीनियर कॉलेज में। टीचिंग करी है, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हूँ। तो मैंने वहाँ देखा, कि जो जातिगत भेदभाव है, हम तो क्लास में पढ़ा रहे हैं, कि कॉन्स्टिट्यूशन ने हमें कहा है कि जातिगत भेदभाव नहीं करना चाहिए। लेकिन हम हमारे स्टाफ़ में देख रहे हैं, स्टूडेंट्स को देख रहे हैं, मतलब उनमें जाति इतनी प्रगाढ़ बैठी है। और कॉलेज भी ऐसा था, कि जो मतलब जिन्होंने कॉलेज निकाला था वो उनकी ही जाति के लोगों को प्रमोट करते थे। जैसे कि प्रिंसिपल का जो पोस्ट होता है तो उस पर भी उनकी ही जाति का होता था। और जो मतलब सारी व्यवस्था जो थी वहाँ की वो ऐसे जाति का आधार ही उनका था।
जाति-आधार था, जैसे शिक्षा-व्यवस्था होनी चाहिए थी, एक लिबरल होनी चाहिए थी, लेकिन उनका आधार ही जाति है। मतलब जैसे मैं देख रही हूँ कि जो छोटे-छोटे कॉलेजेस होते हैं, वहाँ जाति बहुत डॉमिनेंट करती है। और वो बच्चों को भी पता है, बस हमें पेपर में लिखना है कि हमें जाति-व्यवस्था नहीं माननी है, लेकिन हम बाहर ऐसे व्यवहार में तो जाति को मानना ही पड़ेगा। और जातिगत भेदभाव तो होता ही है छोटे-छोटे कॉलेजेस में।
आचार्य प्रशांत: ये अच्छा था, ये न्यूज़ कैप्सूल अच्छा था, पर इसका करें क्या?
प्रश्नकर्ता: सवाल ये है, कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था में भी जाति इस तरह घुस चुकी है।
आचार्य प्रशांत: अरे भाई, कोई भी शिक्षा धर्म से ऊपर थोड़े रखोगे।
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: पहले दस-पंद्रह मिनट यही समझाया था न कि मनुष्य धार्मिक प्राणी है। और अगर आम आदमी को कोई चीज़ आपने धर्म बताकर परोस दी, तो वो चीज़ बड़ी पक्की हो जाएगी। हमने जाति को धर्म बना दिया है, इसलिए जाति नहीं जाएगी। जब तक धर्म की सफ़ाई नहीं करोगे जाति नहीं जाएगी, क़ानून बनाने से नहीं जाएगी और इधर-उधर लोगों को नए मूल्य बताने से, सोशल वैल्यूस, इगैलिटेरियन वैल्यूस, मॉडर्न वैल्यूस, बताने से नहीं जाएगी। ह्यूमेनिटेरियन वैल्यूस बताने से भी नहीं जाएगी। किसी तरीके से नहीं जाएगी, जब तक आप धार्मिक सुधार नहीं करोगे।
प्रश्नकर्ता: तो धार्मिक सुधार शिक्षा-व्यवस्था के माध्यम से कैसे हो सकता?
आचार्य प्रशांत: नहीं हो सकता है।
प्रश्नकर्ता: वहाँ हो गया होता तो मैं यहाँ क्या कर रहा होता? आपके स्कूल-कॉलेजों ने ये सब समझा दिया होता जो अभी बोल रहा हूँ, तो मैं यहाँ क्या कर रहा होता? जो बात मैंने अभी आपको बोली, आप हज़ार लोग यहाँ मौजूद हो, कितनों ने अपने स्कूल-कॉलेज में पढ़ी है? बताइएगा?
ऐसे किया: हाथ उठाया फिर दाँत फाड़ा। तब बुला के यहाँ खड़ा कर दूँगा। हर चीज़ में मसख़री, (श्रोता को इंगित करते हुए)।
और अगर है किसी कॉलेज में ये सब पढ़ाया जा रहा है, तो आप सब जाओ वहीं एडमिशन ले लो। हमारी शिक्षा-व्यवस्था ये सब बातें नहीं लाती है आपके सामने, क्योंकि शिक्षा-व्यवस्था सेक्युलर है। वो धर्म को नहीं छूना चाहती, वो ये सब बातें आपसे नहीं करेगी। हाँ, ये हो सकता है कि किसी ख़ास विभाग में, हायर स्टडीज़ में इससे संबंधित कुछ टॉपिक्स हों। वो हों भी तो वो 0.0000001% जनता तक पहुँचेंगे, वो 30-40-50-60 विद्यार्थी जिन्होंने उस कोर्स में एनरोल कर रखा होगा। बस हो गया, और कहीं तक नहीं पहुँचनी है बात।
या किसी ने ऐसे किसी विषय पर रिसर्च करके पीएचडी ही कर ली, तो ऐसे कुछ मुट्ठीभर लोगों तक ये बात जो है वो पहुँच जाएगी, वो जान जाएँगे। 150 करोड़ लोग हैं भाई, उन तक कौन पहुँचाएगा?
हम कुछ नहीं जानते। हम शान से हिन्दू बनकर घूमते हैं। हम नहीं जानते कि हिन्दू होना, सनातनी होना वास्तव में है क्या। हम वेद-वेद कहते हैं। आप में से अगर 10% लोगों के घर में भी वेदों की प्रतियाँ मौजूद हों तो मैं बड़ी बात मानूँगा। आप में से कितने लोगों के घर में ऋग्वेद मौजूद है? हाथ उठाइएगा। ये तो 2% भी नहीं निकला। 1% भी नहीं निकला। और अभी मैंने ये नहीं पूछा, पढ़ा कितनों ने है? और ये तो अभी मैंने पूछा ही नहीं, कि समझा कितनों ने है? आधों की तो हालत ये है कि मैंने बोला पुरुषसूक्त, मैं महिलासूक्त भी बोल देता तो काम चल जाता। कोई आपत्ति करने वाला नहीं होता यहाँ पर।
हमारे लिए धर्म का मतलब है सुनी-सुनाई बात। आप ये बात समझ क्यों नहीं पा रहे हो? आपके लिए धर्म का मतलब है, परंपरा; जो चलता आ रहा है, उसे धर्म बोलते हैं। हमारा धर्म हमने इतना सतही बना डाला कि धर्म का अपमान ही हो गया। आपसे पूछें, रक्षाबंधन कब से शुरू हुआ है? वैदिक है? पौराणिक है? क्या है? आप नहीं जानते होंगे। और आप जान जाओगे तो आप कहोगे, “हैं! ये बात?” आपसे पूछें, कि ये पटाख़े कहाँ से आए दिवाली पर? आप वो भी न जानते हो। कोई पूछे, होली पर ये रंग कहाँ से आ गया? इसका क्या मतलब है? भाई वहाँ पर प्रह्लाद है और हिरण्यकश्यप है, होलिका है। ये रंग का क्या अर्थ है? आप नहीं बता पाओगे।
पर हमारे लिए यही सब है हिन्दू होने की निशानी। दिवाली आई है, कुर्ता-पजामा पहनेंगे जाएँगे और वो जो कुर्ता-पजामा बेचने वाली कंपनी है वो खूब अपना प्रचार कर रही है, “बी इंडियन, बी हिन्दू, वियर इंडियन।” कैसे कह दें हम अपने आप को सनातनी अगर हमने अपने धर्मग्रंथ ही नहीं पढ़े तो? बताइए।
पढ़ा कुछ नहीं है, मानते सब कुछ हैं। किसी ने कह दिया कि औरत इसलिए पैदा हुई है, वो ये सब करेगा। “बिल्कुल, हाँ बिल्कुल सही बात है, मान लो।” भाई, तुम इतनी निष्ठा से मान रहे हो; हम तुम इतनी श्रद्धा से सर झुकाकर किसी चीज़ का पालन कर रहे हो, सराहना करते हैं तुम्हारी। पर ये तो बता दो कि तुमने थोड़ा भी जाँचा-परखा, पढ़ा? तुम्हारी निष्ठा की दाद देते हैं कि तुम्हें जो बताया गया, तुम माने जा रहे हो, माने जा रहे हो। ख़ुद ही नहीं मान रहे, अपनी पीढ़ियों को भी सिखाए दे रहे हो। बहुत बड़ी बात है, माने जा रहे हो। पर मानने से पहले तुमने पूछा कि “साहब, ये बात आप जो बता रहे हो, ये बात धर्म कैसे हो गई? ज़रा हमारे धर्मग्रंथों में इसका उल्लेख दिखा दीजिए। और ये बात अगर धर्मग्रंथ में नहीं है तो आप इसका पालन क्यों करे जा रहे हैं?”
भारत की बहुत सारी समस्याएँ तब तक नहीं हटेंगी जब तक धार्मिक सुधार नहीं होगा। समाज-सुधार की कोशिश भी व्यर्थ जानी है धार्मिक सुधार के बिना।
ये हमारी सड़कें नहीं ठीक होने वालीं, ये हमारी अर्थव्यवस्था भी बहुत नहीं बढ़ने वाली, हमारा विज्ञान, हमारी टेक्नोलॉजी भी बहुत नहीं बढ़ने वाली, जब तक धार्मिक सुधार नहीं होगा। क्योंकि मनुष्य के केंद्र में तो धर्म ही बैठा है।
यूरोप में भी बार-बार कहा करता हूँ, टेक्नोलॉजिकल रिवॉल्यूशन से पहले थॉट-रिवॉल्यूशन आया था और उसका भी बहुत बड़ा संबंध नकली धर्म से आज़ादी से था; कि “ये चर्च ने हम पर जो फ़ालतू की बातें लाद रखी हैं, हम नहीं मानेंगे, हम नहीं मानेंगे।” तब जाकर के यूरोप वहाँ पहुँचा है जहाँ आज आप उसको देख रहे हैं। और यूरोप वहाँ पहुँचा है, वहीं से फिर अमेरिका वहाँ पहुँचा है।
भारत को आगे बढ़ाना है तो धार्मिक सुधार बहुत ज़रूरी है। ये सब पुराना कचरा लेकर के, जाति और ये और वो और हज़ार तरीके की बिल्कुल व्यर्थ की और घातक बातें और हिंसक बातें लेकर के, राष्ट्र नहीं तरक़्क़ी करने वाला। यही बातें लेकिन हम माने जा रहे हैं। आप भी यहाँ बैठे हुए हो, आप सुन रहे हो बिल्कुल, कई लोग ऐसे “हाँ बिल्कुल जी आचार्य जी” कई लोग ऐसे-से मुंडी हिला रहे हैं। पर अभी आपके ही आसपास, ख़ासकर आपका बेटा-बेटी, कोई अभी अंतरजातीय, इंटर-कास्ट का प्रस्ताव लेकर आ जाएँ कि उससे कर रहे हैं, तो देखिएगा अपनी हालत।
“नहीं, बाक़ी सब तो ठीक है, दोस्ती-यारी चलता है, पर हें हें हें। ऐसे तो ख़ानदान का खून ख़राब हो जाएगा न!” यही जब डेंगी हुआ होता है या दुर्घटना हुई होती है, तब नहीं कहने जाते कि “हमें हमारी जाति-वाले का ही ख़ून चढ़ाना।” तब कहते हो, “जिसका मिले दे दो, लंगूर का मिले वो भी चलेगा!” और ख़ासकर अगर लड़की हो, और वो भी सो-कॉल्ड लोअर कास्ट की, तब तो ऐसा होगा जैसे “ओ माय गॉड, वियर दिस स्मेल कमिंग फ्रॉम?”
भारत यहीं अटका रह जाएगा। हमारी जो दुर्दशा हुई है अतीत में, उसके पीछे यही सब है भाई। वेदों के साथ बड़ा धोखा हो गया, बड़ा अन्याय हो गया। उपनिषदों के ऋषि जीवित होते जब ये सब हो रहा था, तो सशस्त्र क्रांति कर देते। वो बोलते, “हमने क्या सिखाया है और ये समाज धर्म के नाम पर क्या चला रहा है?” और बड़ा एक रोचक स्ट्रक्चर है, इसमें ऐसा भी नहीं कि कुल चार वर्ण हैं और वर्ण तो मतलब, जातियाँ हैं; उनमें उपजातियाँ हैं, मामला कोई शूद्रों पर जाकर रुक नहीं रहा है। उसके बाद आते हैं फिर? आउट-कास्ट्स। बाप रे बाप! सबको कोई न कोई मिला है अपने नीचे दबाने के लिए। हमसे ऊपर वाला हमारे सर पर जूता रखता है तो हम अपने नीचे वाले के सर पर जूता रखेंगे। सबको कोई न कोई अपने से नीचे की जाति उपलब्ध है। “हम उनका तो छुआ पीते भी नहीं हैं; और हमारा छुआ वो नहीं पीते।”
भाई साहब, आपको पता है आप सब गंदा पानी पीते हो। एक-दूसरे का छुआ देखना बंद करो, ये जो पानी की सप्लाई आती है न, इसको साफ़ करने की कोशिश करो। कुछ आ रही है बात समझ में? ये जेन-ज़ी बैठी हुई है, ये टिंडर पर भी जाते हैं तो कास्ट देखकर के। ये कॉलेज में प्रपोज़ भी करते हैं तो पहले जाति देख लेते हैं, “हाँ, सब ठीक है।” बोलते हैं अब, “आइ फॉल इन लव!”
जो लिबरल बनते हैं, बहुत, वो ऐसे कहेंगे, “नहीं-नहीं, मैं तो बहुत देखिए फॉरवर्ड-लुकिंग हूँ, मैं बहुत इन बातों को नहीं मानता, मैं तो उन लोगों के साथ खा-पी भी लेता हूँ, मतलब उठ-बैठ भी लेता हूँ। आइ डोंट रियली, आइ मीन, डिस्क्रिमिनेट।”
अच्छा? तुम्हारी भाषा ही बता रही है कि डिस्क्रिमिनेट करते हो कि नहीं। हम लोग, वो लोग, दिल ही दिल में दरार लेकर तो बैठे ही हुए हो। भेद करा जाता है भाई, लायक और नालायक में करा जाता है; सार और असार में करा जाता है; नित्य और अनित्य में करा जाता है; शरीर और शरीर में थोड़ी ही करा जाता है। बिल्कुल भेद करना सीखो, सुसंगति और कुसंगति में भेद करना सीखो। भेद हमें चाहिए, पर तुम जहाँ विभाजन की रेखा खींच रहे हो, वो रेखा काल्पनिक है; वो व्यर्थ का भेद कर रहे हो तुम।