ये जितनें धूर्त हैं, ये कभी ये नहीं बताने आएँगे कि हम जितनें मूर्खतापूर्ण रास्तों पर चले हैं उनका हमने क्या कष्ट भोगा है, क्या अंजाम सहा है, उल्टे ये तुमको बताने आएँगें कि सही रास्ते न, अरे रे रे रे; काँटे ही काँटे बिछे हैं। तुम ऐसे रास्ते का ज्ञान दे रहे हो जिस रास्ते पर तुम कभी चले ही नहीं, तुम होते कौन हो? मत करो फ़ालतू लोगों की संगति वो तुम्हें कुछ नहीं भी बोलेंगे न तो उनके मुँह पर कुछ ऐसा होगा कि तुम थोड़े बिगड़ जाओगे; सिर्फ़ उसकी शक्ल देखने भर से बिगड़ जाओगे।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे कि आपने डिफ्रन्ट लेयर्स की बात करी है आपकी शिक्षा पिछले कुछ महीनों से मैं सुन रहा हूँ और चीजें समझ में भी आई हैं और उसमें काफ़ी इम्प्रूवमेन्ट (सुधार) भी हुआ है और उसके साथ-साथ मैं गीता और उपनिषद् भी पढ़ने लगा हूँ और ये प्रोसेस को हम स्पीड-अप कैसे कर सकते हैं? मैं आपसे कोई विधि नहीं माँग रहा हूँ सिर्फ़ आपसे ये इनपुट चाहता हूँ कि ये जो प्रोसेस है जो मैं कर रहा हूँ उसको मैं और स्पीड और तत्परता से कैसे कर सकता हूँ?
आचार्य प्रशांत: उदाहरण, संगति; भरोसा बढ़ जाता है। ऐसों की कहानियों के करीब रहो जो आपके करीब थे या आपसे पहले थे, हो चूकें हैं, जो जीतें हैं, आपके साथ हैं और लड़ाई में हैं। भरोसा बढ़ जाता है क्योंकि हमारा भरोसा टूटता भी तो दूसरों के तानों और आक्षेपों से ही है न! तो जब हम दूसरों के प्रति वल्नरेबल (असुरक्षित) हैं ही तो दूसरों का ही इस्तेमाल अपनी ताकत के लिए क्यों न करें? तो सही संगति, सही उदाहरण, कान में सही शब्द पड़ें।
लोग जिम जातें हैं, उसके पीछे एक वजह ये भी होती है, घर में उतनी मशीनें रख भी ली तो झूठ बोल लेंगे, बेईमानी कर लेंगे। वहाँ तुम जाते हो किसी मशीन पर बैठने और अपने आप से बता रहे हो तीस किलो उठाऊँगा और तुमसे पहले जो करके गया है वो पिन लगाकर गया है सत्तर किलो में, तो फिर बड़ी लाज आ जाती है और खासतौर पर तब जब दोनों




