विधि तो एक ही है, जो भीतर बैठ कर के बोलता रहता है, मैं हूँ, मैं हूँ, उसके झूठ को बार बार रंगे हाथों पकडते रहो। इरादा नेक हो तो हर चीज़ विधि बन जाती है। घर पर जाएँगें अपने भाई बहनों को देखेंगे कहेंगे मैं कैसे कह दूँ मेरी शक्ल मेरी है, ये मेरा भाई है नालायक, इसकी शक्ल भी मेरे जैसी है। फिर दादा को देखेंगे कहेंगे कैसे कह दूँ कि मेरी जो चपटी नाक है, यह मेरी है, ये तो दादा की नाक है। तो जब मेरा सब कुछ किसी और का है तो मैं कहाँ हूँ या तो मैं कह दूँ, ‘मैं हूँ ही नहीं या मैं कह दूँ कि सब मैं ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ,’ जैसे मुनि अष्टावक्र कहते हैं न, या तो मैं कुछ नहीं हूँ या फिर मैं सब कुछ हूँ।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: जैसे आपने एक बार बताया था, अपने की फर्स्ट रिएक्शन देखना है हमें अपना जो पहला रिएक्शन होता है, जब हमें विचार करने का टाइम नहीं मिलता है। तो जैसे अभी हमने बिल्कुल क्लियर बात कर ली की है, जो हमें दिख रहा है, वो फ्लक्स है।
चाहे दिखने में हमें एक डेफिनेट शेप दिख रही है। लेकिन है वो फ्लक्स तो वो रिएक्शन तो अंदर से जैसे। अब नहीं वो रिएक्शन जो अभी सोचने से भी वैसा रिएक्शन नहीं आ रहा। कई बार अभी भी सोच के देखा मैंने, लेकिन आमतौर पर आता है वो रिएक्शन। तो उसको हम कैसे समझेंगे कि जैसे हमें लॉजिकली क्लियरली समझ में आ गया। ये वो रिएक्शन का आना बस। उसको हम यही मान लेंगे कि हाँ, ये देह के लिए है।
आचार्य प्रशांत: तीव्रता। बुखार होते हैं न। एक सौ छह डिग्री वाला बुखार भी होता है, एक सौ दो डिग्री वाला भी होता है, निन्यानवे वाला भी होता है, शीतल होता जाता है।
प्रश्नकर्ता: तो किस विधि से हम रिमाइंड करवाए बार बार अपने आप को पूरे दिन…




