तुम्हारी जिज्ञासा को ही मार दिया गया है, तुम्हारी धार को कुंठित कर दिया गया है। तुम्हारा मन कोई प्रश्न करने लायक ही नहीं बचा है, तुम डर गये हो। तुम्हें लगता है, सवाल कर देंगे तो भगवान जी नाराज़ हो जाएँगे। याद रखना कि जो मन इन कथाओं पर सवाल नहीं कर सकता, जो इन कथाओं के मर्म तक नहीं पहुँच सकता, वो फिर अपने जीवन पर भी सवाल नहीं उठा पाएगा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: धर्म का मतलब होता है — पूर्ण जानना। जिज्ञासा तो करो कम-से-कम, जहाँ जिज्ञासा ही नहीं है वहाँ जानना कैसे होगा? एक आखिरी तल आता है जब जिज्ञासा भी छोड़ देनी होती है पर शुरुआत तो जिज्ञासा से होगी। पूछो तो सही कि ये जो कुछ है, वो क्या है।
अब अभी जब सीआईआर कोर्स होता है हमारा, वो सम्पन्न हुआ। वो इस बार पौराणिक कथाओं पर था — श्रीकृष्ण की, विष्णु की जो पौराणिक कथाएँ हैं, उन पर था। तो कथाएँ बड़ी पेचीदा हैं, घुमावदार हैं, रंग-बिरंगी हैं, पर उनका सार बड़ा स्पष्ट और प्रत्यक्ष है। जिन लोगों ने उस कोर्स को अटेंड किया, उन्होंने कहा कि इस कथा का ये अर्थ था, ये तो हमें पता ही नहीं था। ये बचपन से हम सुनते आये हैं।
बड़ी प्रचलित कथा है। अब कालिया नाग की कथा है, बोले हमें तो यही पता था कि यमुना में रहता था, लोगों को परेशान करता था, श्रीकृष्ण की गेंद चुरा ली, श्रीकृष्ण गये उसको मार-पीटकर गेंद वापस ले आये। तो हमें तो यही पता था। इसके इतने गूढ़ किन्तु स्पष्ट और प्रकट आन्तरिक अर्थ हैं, ये तो हमने कभी जाना नहीं था।
तुमने इसलिए नहीं जाना क्योंकि तुम पूछते ही नहीं हो कि नाग से भगवत्ता का क्या लेना-देना और ये कौन सा नाग है जिसकी हज़ारों पत्नियाँ भी रह रही हैं उसके साथ कालिया दह में। तुम पूछते ही नहीं हो कि ये सब प्रतीक तो नहीं है। ऐसा तो नहीं है कि ये सब, कुछ और बताने के लिए कहा जा रहा है।




