
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आशीष, और गुड आफ्टरनून सभी को। यहाँ होना मेरे लिए कई कारणों से बहुत खुशी की बात है। लेकिन शायद सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि मुझे आचार्य प्रशांत से बात करने का अवसर मिल रहा है। हम दोनों में एक समानता है, हम दोनों ने अपने वयस्क जीवन की शुरुआत आईआईटी दिल्ली से की। मुझे लगता है कि ये माहौल उससे थोड़ा अलग है, लेकिन अपने ढंग से यह भी उतना ही विशेष है। आपसे पूछने के लिए मेरे पास बहुत से प्रश्न हैं। पहले मैं कुछ समय लेकर अपने प्रश्न पूछूँगा और उसके बाद श्रोताओं को भी आपसे प्रश्न पूछने का अवसर दूँगा। मुझे पता है कि यहाँ उपस्थित बहुत से लोगों के मन में आपके लिए अनेक प्रश्न हैं।
तो आपने आईआईटी दिल्ली से शुरुआत की। फिर आप आईआईएम अहमदाबाद गए और हमारे जैसे कई लोगों की तरह आप कॉरपोरेट जीवन में गए। लेकिन फिर आपने उसे छोड़ दिया। क्यों?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि मैं जिस प्रश्न का उत्तर खोज रहा था और जिन प्रश्नों का समाधान चाहता था, वे तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा से उत्पन्न होने वाले प्रश्न नहीं थे। मुझे आभास हो गया था कि उसका स्रोत कहीं और, उससे भी पहले। तकनीक और प्रबंधन दोनों ही उपकरण हैं, मनुष्य के हाथों के उपकरण और उपकरणों का उपयोग किसी उद्देश्य के लिए किया जाता है। उद्देश्य भीतर होता है, उपकरण बाहर होते हैं।
मैं देख सकता था कि इन दोनों परिसरों में और अपने यूपीएससी बैच, उस कैडर में भी मेरे आसपास बहुत से अत्यंत योग्य और बेहद प्रतिभाशाली लोग थे। वास्तव में, उनमें से बहुत से लोग, मैं विनम्रतापूर्वक कहूँगा, मुझसे भी अधिक प्रतिभाशाली थे। इसलिए, जहाँ तक उपकरण रखने, उसे और धारदार बनाने या उसका कुशलतापूर्वक उपयोग करने की बात थी, ऐसे लोग मौजूद थे जो यह काम मेरी ही तरह, बल्कि शायद मुझसे भी बेहतर ढंग से कर सकते थे।
लेकिन तकनीक या प्रबंधन का उपयोग किस लिए किया जाना था? यही सवाल मुझे परेशान कर रहा था। मनुष्य मूलतः चाहता क्या है? भीतर से उसकी प्यास किस चीज़ की है? क्योंकि तकनीक का विकास लगातार होता रहा है और तकनीकी तथा आर्थिक दृष्टि से आज हम अपने पूरे इतिहास की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध हैं। फिर भी हम लड़ते हैं। फिर भी हमारे भीतर अशांति बनी हुई है। फिर भी मानसिक रोग और तरह-तरह की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। भीतर से हम आज भी लगभग वैसे ही हैं जैसे गुफाओं के युग में थे। है न? जबकि बाहर की दुनिया में इतना कुछ बदल चुका है।
इसलिए मैंने अपने जीवन को उस दिशा में समर्पित करने का निर्णय लिया, जो शायद कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण थी और जिस पर शायद उतने लोगों का पर्याप्त ध्यान नहीं जा रहा था जितना जाना चाहिए था। तब मुझे इतनी भी स्पष्टता नहीं थी, हालाँकि आज भी मैं यह दावा नहीं करूँगा कि मेरे पास बहुत स्पष्टता है। उस समय सब कुछ काफ़ी धुँधला था, फिर भी मैंने उस धुँध में अपना रास्ता खोजने की कोशिश की। संघर्ष किया, ठोकरें खाईं। आज भी वही कर रहा हूँ।
प्रश्नकर्ता: आप बहुत विनम्र हैं। तो क्या यह एक क्षणिक एहसास था या यह क्रमिक प्रक्रिया थी?
आचार्य प्रशांत: यह सब धीरे-धीरे हुआ और यह प्रक्रिया आज तक जारी है। तो यह प्रश्नों की एक श्रृंखला थी, उसके बाद प्रयोग, उसके बाद अवलोकन, उसके बाद अंतर्दृष्टि, फिर नए प्रयोग। रास्ते में कई मोड़ आए जहाँ से अनेक रास्ते खुलते थे, कभी एक राह चुनी, फिर लगा कि यह सही नहीं है तो दूसरी राह पकड़ ली या वापस लौट आया। ऐसे कई प्रयोग हुए। अब तक सफ़र लंबा रहा है।
प्रश्नकर्ता: तो यह एक प्रक्रिया है।
आचार्य प्रशांत: यह निश्चित रूप से एक प्रक्रिया है।
प्रश्नकर्ता: हमारी चर्चा का विषय है, कॉन्टेम्प्लेटिव थॉट फ़ॉर अ वर्ल्ड इन अ क्राइसिस ।
आचार्य प्रशांत: यस।
प्रश्नकर्ता: आज हमारे सामने जो बड़े संकट हैं, जलवायु परिवर्तन, असमानता, उनके बारे में आप क्या सोचते हैं? इनकी जड़ क्या है?
आचार्य प्रशांत: आज हमारे सामने जो बड़े संकट हैं, वे भीतर की हमारी क्षुद्रता और बाहर हमारे हाथों में आ चुकी अपार शक्ति, इन दोनों का मेल हैं। इन दोनों को एक साथ रख दीजिए। इन्हें दशकों और सदियों तक एक-दूसरे को बढ़ाते रहने दीजिए, और परिणाम होगा एक बड़ा संकट। भीतर से हम वैसे ही छोटे बने रहे हैं, भीतर से हम अब भी बहुत आदिम हैं उसी गुफा-मानव की तरह जिसका मैंने उल्लेख किया था। भीतर से हम अब भी वहीं हैं, लेकिन बाहर से हमारे पास अपार शक्ति है। अब हम केवल इस पृथ्वी पर ही नहीं, जल्द ही अपने उपग्रह पर और शायद दूसरे ग्रहों पर भी अधिकार रखने लगेंगे। हम एक बहुत समृद्ध, बहुत जानकार, बहुत अधिक जुड़े हुए और बहुत अधिक समन्वित समाज बन चुके हैं। यह सब हमारे पास है और यह सब वास्तव में बहुत बड़ी बात है। विशेषकर जब आप देखें कि नदियों की शक्ति में कोई परिवर्तन नहीं आया है और न ही अन्य प्रजातियाँ बौद्धिक या आर्थिक रूप से इतनी विकसित हुई हैं। तो आज मानव जाति अत्यधिक शक्तिशाली है और अंदर से उतनी ही छोटी है, जितनी वह पहले थी। यह दोनों का ख़तरनाक संयोजन है।
प्रश्नकर्ता: तो इस भीतर के कमज़ोर स्व को मज़बूत कैसे करें, ताकि वह इनका सामना कर सके?
आचार्य प्रशांत: कितना सटीक और सुंदर प्रश्न है। देखिए, सबसे पहले मैं बाहरी प्रगति के महत्त्व को नकार नहीं रहा हूँ। ठीक है? मैं समझता हूँ कि तकनीक महत्त्वपूर्ण है, प्रबंधन महत्त्वपूर्ण है, नीति महत्त्वपूर्ण है। मैं उसी पृष्ठभूमि से आता हूँ। मैं जानता हूँ कि विज्ञान ने हमें क्या दिया है और उसके प्रति मेरे मन में गहरा, बहुत गहरा सम्मान है। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि बाहर की दुनिया में हम जो कुछ कर रहे हैं, वह आवश्यक तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं। निस्संदेह, जो कुछ वहाँ हो रहा है उसकी हमें ज़रूरत है। समस्या उस बिंदु के ऊपर है जिसे हम संबोधित कर रहे हैं, समस्या अंदर है। यदि मनुष्य अपनी भावनाओं, अपनी प्रेरणाओं और अपनी इच्छाओं के स्रोत को नहीं जानता, तो वह अपने भीतर की भूख को और-और बढ़ाने के लिए हर संभव साधन का उपयोग करेगा। और यह भीतर की भूख कभी तृप्त नहीं होती।
बाहर हम जो पहले से कर रहे हैं, उसके साथ-साथ हमें जन-आधारित आत्म-शिक्षा की भी आवश्यकता है। चार या पाँच वर्ष की आयु के बच्चे से लेकर नब्बे या यहाँ तक कि सौ वर्ष के वृद्ध तक, हम सभी को स्वयं के विद्यार्थी बनना होगा। और यही वह एक बात है, जिसकी हमारे पालन-पोषण में पूरी तरह उपेक्षा हुई है। हमारे स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हमें हर विषय के बारे में पढ़ाया जाता है सिवाय उस एक के, जो हम स्वयं हैं।
तो फिर होता यह है कि जो कुछ भी हमें सिखाया जाता है और जिससे हमें सशक्त किया जाता है, वह सिर्फ़ एक उपकरण बन जाता है, बल्कि एक हथियार बन जाता है, इस आंतरिक चाह को पूरा करने के लिए जिसे हमने कभी समझा ही नहीं।
हम इस प्रश्न पर तो बात करते हैं कि मुझे वह कैसे मिल सकता है? मुझे वह कैसे मिल सकता है? लेकिन चाहने के प्रश्न पर नहीं। और यह चाह कोई तकनीकी चीज़ नहीं है, यह भीतर की एक गुणात्मक उपस्थिति है जिसकी कभी जाँच-परख ही नहीं होती। कोई सीटी स्कैन, कोई एमआरआई कभी उस चाह को नहीं दिखा सकता, जो हमारे भीतर बैठी है और जिसकी चाहत का कोई अंत नहीं। और फिर भी उसी भीतर बैठे चाहने वाले की वजह से इस धरती पर मनुष्य द्वारा रची गई हर चीज़ चलती है।
क्या ऐसा कुछ है जो इंसान ने बनाया हो और जो इच्छा को पूरा करने के लिए न हो? नहीं, नहीं, मैं इच्छा को नीचा नहीं दिखा रहा हूँ। मैं जो पूछ रहा हूँ, वह यह है कि अगर यह मेरी इच्छा है और मुझे अपनी एकमात्र क़ीमती ज़िंदगी उस इच्छा को पूरा करने में लगानी है, तो क्या मुझे यह जानना चाहिए कि वह इच्छा कहाँ से उत्पन्न होती है? क्या यह चाह वास्तव में मेरी अपनी है? क्या मैं स्वयं भी वास्तव में अपना हूँ? जिसे हम स्व कहते हैं, क्या वह वास्तव में मेरा है? वह क्या है, जिसका अस्तित्व है, जिसे हम चेतन मनुष्य कहते हैं? वह वास्तव में क्या है? यही वे प्रश्न हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि इन पर कभी विचार नहीं हुआ, विचार हुआ है। लेकिन हमें जो चाहिए, वह यह है कि हर कक्षा में, हर घर में, हर बातचीत में इन पर चर्चा हो। यही सबसे महत्त्वपूर्ण बातचीत है जो इस ग्रह को करनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता: और मुझे पता है कि, जैसा कि आपने कहा, आप मानते हैं कि हमें आत्म-शिक्षा की आवश्यकता है, जो जन-आधारित हो। मुझे पता है कि आपने वह किया है और आप वह कर रहे हैं। इसके बारे में थोड़ा बताइए। यह कैसे हो रहा है? आप वहाँ क्या कर रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: तो देखिए, क्योंकि नियमित, औपचारिक और आधिकारिक व्यवस्था आत्म-शिक्षा को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करती, इसलिए हम जो कर रहे हैं वह उसी में एक अतिरिक्त प्रयास है। है न? तो यह मुख्य रूप से एक नाइट स्कूल है, यह एक ऑनलाइन नाइट स्कूल है। इसलिए हम नियमित सत्र आयोजित करते हैं, महीने के तीस दिन तक नियमित। यहाँ आने से पहले भी मैं आज रात की परीक्षा को अंतिम रूप दे रहा था और पाँच घंटे के समय-अंतर को देखते हुए, इस समय जब हम यहाँ बात कर रहे हैं, भारत में विद्यार्थी वही परीक्षा दे रहे होंगे। इसलिए हम हर दिन रात 9:00 बजे मिलते हैं, हम ऑनलाइन मिलते हैं। कुछ लोग प्रत्यक्ष रूप से भी एकत्र होते हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं होती। किसी सभागार में अधिकतम 200, 500 या ज़्यादा से ज़्यादा 2000 लोग ही मुझसे एक साथ मिल सकते हैं। बाक़ी सभी, यानी जिनकी संख्या हमने बताई, एक लाख से भी अधिक, वे सब मुझसे ऑनलाइन जुड़ते हैं।
हम जीवन के बारे में बात करते हैं। दार्शनिक कृतियों के संदर्भ में, पूर्व की दार्शनिक परंपराओं, विशेषकर भारतीय परंपराओं की बात करें तो हम उपनिषदों, भगवद्गीता और संतों की रचनाओं अर्थात भक्ति परंपरा का अध्ययन करते हैं। फिर हम आचार्य नागार्जुन के दर्शन का अध्ययन करते हैं, विशेष रूप से माध्यमिक बौद्ध दर्शन और शून्यता सप्तिका। इसके बाद पूर्व से ही लाओत्सु की ताओ ते चिंग का अध्ययन करते हैं और साथ ही पश्चिम की दार्शनिक कृतियों का भी, उदाहरण के लिए अस्तित्ववादी साहित्य, उसकी कहानियाँ, नाटक और अन्य रचनाएँ, हमारे विद्यार्थियों को यह सब बहुत रोचक लगता है। लेकिन यह सब केवल वह आधार है, जिस पर खड़े होकर हम जीवन की पूरी संरचना को समझने का प्रयास करते हैं। यह सब वह संदर्भ है, जिसके माध्यम से हम स्वयं को समझने की कोशिश करते हैं।
तो प्रश्न है, मैं कौन हूँ? इसलिए हमारी प्राथमिक रुचि उन ग्रंथों में नहीं है, वास्तव में वे ग्रंथ तो हमारे सामने एक दर्पण रखने के लिए हैं। उनका उद्देश्य हमें वापस स्वयं तक ले आना है। तो अगर आप मुझसे पूछें कि क्या हमारे यहाँ वेदांत, सांख्य या बौद्ध दर्शन के विद्यार्थी हैं? हाँ, हैं। निश्चित ही हैं, लेकिन उससे भी अधिक सटीक उत्तर यह होगा कि वे आत्मज्ञान के विद्यार्थी हैं। इसीलिए जन-आधारित आत्म-शिक्षा, दर्शन, ज्ञान, साहित्य और आध्यात्मिक ग्रंथों के माध्यम से स्वयं का अध्ययन। लेकिन उद्देश्य यह देखना है कि मैं क्या कर रहा हूँ, क्योंकि यदि मैं यह स्पष्ट रूप से नहीं देखूँगा तो मैं और करता जाऊँगा, और करता जाऊँगा, और करता जाऊँगा। और इस ग्रह में अब उसे और सहने की क्षमता नहीं बची है।
प्रश्नकर्ता: मैं वास्तव में इस प्रयास की गंभीरता से बहुत प्रभावित हूँ और आप स्वयं भी इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं। मुझे याद है, आपने कल रात बताया था कि आपने आईआईटी दिल्ली में पढ़ाया था, लेकिन वहाँ लोग केवल कक्षा का ऑडिट कर रहे थे और यह आपको स्वीकार्य नहीं था। इसके बारे में हमें बताइए। यह किसी प्रायोगिक विज्ञान जैसा लगता है जहाँ लोग एक समूह में मिलकर बहुत अनुशासन और गंभीरता के साथ सीखते भी हैं और उसका अभ्यास भी करते हैं। यहाँ तक कि परीक्षाएँ भी होती हैं। ज़रा बताइए, ऐसा क्यों है?
आचार्य प्रशांत: तो इसकी प्रक्रिया कुछ इस तरह होती है। सबसे पहले हम किसी श्लोक या सूत्र को लेते हैं, फिर उसकी व्याख्या में प्रवेश करते हैं। हम समझने की कोशिश करते हैं कि उसमें क्या कहा गया है, उस समय वह किस संदर्भ में कहा गया था और आज के समय में उसका क्या अर्थ है। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग डेढ़ घंटे लगते हैं। उसके बाद आता है अधिक जीवंत हिस्सा, खुला संवाद, यानी प्रश्नोत्तर। इसमें प्रतिभागी यानी विद्यार्थी, अपने खुले प्रश्न लेकर आते हैं, यह प्रश्न जीवन के किसी भी क्षेत्र से हो सकते हैं। बस एक ही शर्त होती है, वह बात आपके लिए सचमुच महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए। यानी हम यह तय नहीं करते कि प्रश्न किस विषय पर होना चाहिए, लेकिन यह आप पर है कि आपका प्रश्न गहराई लिए हुए हो। फिर वह जहाँ से भी आए उसका स्वागत है।
ये प्रश्न अर्थशास्त्र, संबंधों, राजनीति, धर्म संक्षेप में जीवन के हर महत्त्वपूर्ण पक्ष से उठते हैं। फिर वे प्रश्न हमारे सामने आते हैं। हम उनके उत्तर देते हैं और उन्हें सामने रखे ग्रंथ से जोड़ने का भी प्रयास करते हैं। और जब यह हो जाता है तब अवलोकन का चरण शुरू होता है। फिर विद्यार्थी आगे आते हैं और जो कहना चाहते हैं, खुलकर कहते हैं। बस एक ही शर्त होती है, वह प्रामाणिक हो। यदि आप कुछ बिल्कुल अप्रत्याशित भी कहते हैं, तो हमें उससे कोई आपत्ति नहीं। लेकिन यदि बात सतही हो, पर्याप्त गहरी न हो या ईमानदार न हो तो हमें उससे आपत्ति है। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है, अब विद्यार्थियों को पता है कि यह वह स्थान है जहाँ वे सचमुच स्वयं होकर रह सकते हैं। इसलिए वे अपनी झिझक और संकोच छोड़ देते हैं और जो उनके हृदय में है, उसे खुलकर कह देते हैं।
और यह क्रम फिर लगभग 1:00 से 2 घंटे तक चलता है और फिर हम सत्र समाप्त करते हैं। क्योंकि तब तक रात के लगभग 2:00 बज चुके होते हैं। अगर हमने रात 10:00 बजे शुरुआत की हो, तो तब तक इतना समय हो ही जाता है। और शुरू करने से पहले, यहाँ तक कि मेरे आने से भी पहले, लोग भजन गाते हैं। वे बहुत गाते हैं क्योंकि ज्ञान का संग्रह सुंदर गीतों से भरा हुआ है। और फिर हम एक गाना चुनते हैं और इसे सामूहिक रूप से गाया जाता है। जाहिर है कि वे लोग नेतृत्व करते हैं, जो गाना जानते हैं। बाक़ी लोग शामिल हो जाते हैं। तो सब मिलकर एक सत्र चार घंटे से अधिक समय तक चलता है और यह चीज़ सप्ताह में तीस दिन होती है। ऐसा नहीं है कि मैं वहाँ सप्ताह में तीस दिन उपस्थित रहता हूँ। मैं वहाँ चौदह या पंद्रह दिन उपस्थित रहता हूँ। बाकी दिनों में उनकी परीक्षाएँ होती हैं।
प्रश्नकर्ता: मुझे यह बहुत अच्छा लगता है। एक शिक्षाविद् होने के नाते, मुझे अच्छा लगता है कि आप विद्यार्थियों की परीक्षा भी लेते हैं।
आचार्य प्रशांत: हाँ, बिल्कुल। हमारी परीक्षाएँ बहुत कठोर होती हैं। वे एमसीक्यू-आधारित होती हैं, जिनमें पाँच नहीं, बल्कि छह विकल्प होते हैं, यानी विकल्प एफ तक। छहों विकल्पों में कभी एक सही हो सकता है, कभी दो, कभी सभी छह सही हो सकते हैं और कभी एक भी सही नहीं होता। अंक सिर्फ़ गलत विकल्प चुनने पर ही नहीं कटते, बल्कि सही विकल्प न चुनने पर भी कटते हैं। यानी हर एक प्रश्न इस तरह बनाया जाता है कि वह जीवन की तरह हो। आप जानते हैं, इतने सारे विकल्प और आपको सही विकल्प या विकल्पों का चयन करना होता है। और जीवन आपको न केवल गलत विकल्प चुनने के लिए दंडित करता है, बल्कि सही विकल्प न चुनने के लिए भी दंडित करता है। तो यही प्रश्नों का उद्देश्य है। हमारे विद्यार्थियों को यह बहुत पसंद है, कई बार उन्हें नकारात्मक अंक भी मिलते हैं। कभी-कभी औसत अंक -10% तक पहुँच जाते हैं। लेकिन हम सब इसका आनंद लेते हैं।
प्रश्नकर्ता: क्योंकि यह कठिन है।
आचार्य प्रशांत: मुझे प्रश्न-पत्र बनाना अच्छा लगता है। उन्हें उन प्रश्नों का उत्तर देना अच्छा लगता है और यह हम सभी के लिए एक सुंदर यात्रा है।
प्रश्नकर्ता: तो यह भी रोचक है कि यह प्रक्रिया बहुत गंभीर और अनुशासित है। फिर भी इसमें बहुत आनंद है। और इसमें तकनीक का भी उपयोग हो रहा है। मैंने वह ऐप देखा और यह जानकर प्रभावित हुआ कि उसे आपकी टीम के एक सदस्य ने बनाया है। उन्होंने मुझे कल रात दिखाया था। मेरे पास अभी भी कई प्रश्न हैं, लेकिन यहाँ बहुत से लोग भी आपसे प्रश्न पूछना चाहते होंगे। इसलिए अब मैं श्रोताओं के लिए यह संवाद खोलना चाहूँगा। कृपया अपना हाथ उठाएँ और हम आपके पास माइक लाएँगे।
प्रश्नकर्ता: जी, बहुत धन्यवाद। आपने जो कहा, वह बहुत प्रभावशाली है। मेरा प्रश्न यह है कि आप ऐसी संस्कृति में यह बात लेकर आ रहे हैं, जहाँ स्वयं या व्यक्ति के बारे में खुलकर बात करने को प्रोत्साहित नहीं किया जाता। मैं इसलिए यह पूछ रही हूँ क्योंकि मेरा अपना अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा है। भारत में पली-बढ़ी, फिर यूरोप आई और यहाँ आकर समझ में आया कि आपको यह कहना सीखना पड़ता है कि आप स्वयं क्या चाहते हैं, न कि सिर्फ़ वही जो दूसरे आपसे चाहते हैं। तो यह कैसे संभव है, स्वयं की खोज? आपकी बात बहुत सुंदर है, लेकिन एक समूह-केंद्रित समाज में यह कैसे विकसित होती है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, मैडम, स्व ही एकमात्र ऐसा केंद्र है जिसे छिपाया नहीं जा सकता। इसलिए अलग-अलग संस्कृतियों के पास स्वयं से निपटने, या यूँ कहूँ, स्वयं से जूझने के अपने-अपने तरीके होते हैं। क्योंकि स्वयं ऐसी सत्ता है, जो आपके समूचे व्यक्तित्व में प्रकट होती है। आपके हर शब्द में, हर कर्म में, हर निर्णय में, हर जगह वही केंद्र सक्रिय होता है। वही सब कुछ संचालित कर रहा होता है, इसलिए वह किसी न किसी रूप में हर समय अभिव्यक्त होता ही रहता है। क्योंकि वह हर हाल में अभिव्यक्त होता ही है, इसीलिए वही तो जीवन का केंद्र है। जीवन को चलाने वाला केंद्र वही है जो कहता है, "मैं हूँ।" है न? वही अहम् केंद्र, जिसे आप ईगो कहते हैं। वही "मैं हूँ" का बोध। है न? इसीलिए वही तो सब कुछ है।
हम तो बस उसकी ईमानदार अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करते हैं, अभिव्यक्ति तो वैसे भी हो ही रही होती है। कृपया इसे समझिए, आपने अभी जो कुछ कहा वह भी आपके स्वयं की ही अभिव्यक्ति थी। यह माइक स्वयं के हाथों में एक उपकरण है, तथ्य यह है कि हम यहाँ उपस्थित हैं। हम में से प्रत्येक के द्वारा किया गया एक चुनाव है। जो वस्त्र हम पहन रहे हैं, वह भी आत्म द्वारा किया गया एक चुनाव है और आत्म के बारे में कुछ दर्शाता है। तो आत्म हर जगह है, यह इमारत आत्म है, यह इस बात की अभिव्यक्ति है कि हम कौन हैं।
हमारी परंपराएँ, हमारी शिक्षा-व्यवस्था, हमारी संस्कृति, जो कभी स्व को अभिव्यक्त होने के लिए प्रोत्साहित करती है और कभी उसे दबाने की कोशिश करती है, यह पूरी संस्कृति भी उसी की रचना है। इसलिए स्व को वास्तव में दबाया नहीं जा सकता। हालाँकि स्व दर्पण में न देखने की कोशिश कर सकता है। स्व हर जगह मौजूद है, लेकिन स्व की एक विशेषता यह है कि उसका रुख बाहर की ओर होता है। जैसे ये आँखें स्वयं को नहीं देख सकतीं और कान अपनी ही ध्वनि नहीं सुन सकते। वे केवल बाहर से आने वाली चीज़ों को ग्रहण करते हैं। ठीक उसी तरह स्व हर जगह उपस्थित है, लेकिन उसके पास यह चुनाव होता है कि वह अपनी ओर देखना चाहता है या नहीं।
हम जो अपने सत्रों में कर रहे हैं, अपने शिक्षा कार्यक्रम में, वह है स्व को एक दर्पण प्रदान करना। स्व को एक दर्पण प्रदान करना। आप सब कुछ देख रहे हैं और जो आप देख रहे हैं, वह आपकी अपनी रचना है, क्योंकि आप अपने चारों ओर ख़ुद को देखने के इतने शौकीन हैं तो क्यों न आप सीधे ख़ुद को देखें? तो हम जो शिक्षा-व्यवस्था विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं, वह केवल दर्पण है। बस एक दर्पण। इसमें कुछ नया जोड़ना नहीं है। यह केवल ईमानदारी की बात है कि आप अपने ही चेहरे को दर्पण में देखें और वास्तविकता का सामना करने के लिए तैयार रहें। और अगर आपको वहाँ कोई मैल या गंदगी दिखाई दे, तो बस उसे पोंछकर साफ कर दीजिए, बस इतना ही।
प्रश्नकर्ता: क्या आप मेरी आवाज़ सुन पा रहे हैं? मैं भारत से अक्षय सावंत हूँ। पिछले तीन वर्षों से आपने जो ज्ञान-विचार साझा किए हैं, उनसे मुझे बहुत लाभ मिला है। धन्यवाद, आचार्य जी।
मेरा सवाल है, आपने अपूर्णता के बारे में बहुत बात की है और आप जानते हैं जब से हम पैदा होते हैं हम इस अपूर्णता का अनुभव करते हैं। और वास्तव में यह हमारे अंदर का छोटा "मैं" है। मैं भी आपकी तरह इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से हूँ। तो मेरे प्रश्न का संदर्भ यह है, क्या यह अधूरापन ही हमें विकास की ओर प्रेरित नहीं कर रहा? चाहे वह वैज्ञानिक विकास हो या आध्यात्मिक विकास, क्योंकि हमें हमेशा भीतर एक खालीपन महसूस होता है और हम हर चीज़ में अधिक-से-अधिक पाने की इच्छा रखते हैं। लेकिन आध्यात्मिक रूप से भी हम जानते हैं कि कुछ कमी है और यही हमें उस ज्ञान की ओर प्रेरित करता है। तो अगर आप इस पर थोड़ा बात कर सकें।
आचार्य प्रशांत: आप बिल्कुल सही हैं। लेकिन यह दो बहुत अलग दिशाएँ हैं, बहुत, बहुत अलग दिशाएँ। मुझे एक आँकड़ा उद्धृत करने दें। दुनिया की सबसे अमीर 1% आबादी 16% कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार है। हम जानते हैं कि वे साल के पहले 10 दिनों में अपना कार्बन कोटा समाप्त कर देते हैं। हमें यह भी पता है कि जब दुनिया की शीर्ष 10 सबसे धनी आबादी की बात आती है, तो वे 50% उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं।
कृपया मुझे बताएँ, जब आप समृद्धि की बात करते हैं, जब आप बाहरी उपलब्धियों की बात करते हैं, तो पैसा क्या करता है? क्या यह आपको संतुष्ट करता है? या यह आपको और भूखा बनाता है? पैसे के साथ क्या आपको संतोष होता है कि आपके पास पैसा है या आप और अधिक उपभोग की एक लापरवाह यात्रा पर निकल पड़ते हैं?
वह अधूरापन, जिसके बारे में आप बात कर रहे हैं वह वास्तविक है। यह अनुभव का विषय है। हम इसे अकेलेपन, बेचैनी और भीतर उठने वाले एक अस्पष्ट खालीपन के रूप में अनुभव करते हैं। हम में से हर कोई ऐसा अनुभव करता है। है न? हमें नहीं पता कि भीतर हमें क्या कचोट रहा है, लेकिन कुछ तो है, कुछ तो है। जब हम अकेले होते हैं, तो हम सहज महसूस नहीं करते। जब हम भीड़ में होते हैं, तब भी हम सहज महसूस नहीं करते। जब हम हारते हैं, तो हमें अच्छा नहीं लगता, और जब हम जीतते हैं तो हम इसके बारे में बहुत सुरक्षित महसूस नहीं करते। तो यह है। लेकिन वह खालीपन, क्या वह बाहरी उपलब्धियों से सफलतापूर्वक भर जाता है? यही सवाल है, यही तो प्रश्न है। और अनुभवजन्य प्रमाण इसे पूरी तरह नकारते हैं।
देखिए, आप लोगों को समृद्ध बना दीजिए। ऐसा नहीं होता कि वे कहें, "अब जब हम समृद्ध हो गए हैं, तो हमें किसी और आयाम में आगे बढ़ना चाहिए।" आप उन्हें समृद्ध बनाते हैं और वे और भी अधिक समृद्ध होना चाहते हैं। वे और भी अधिक चाहते हैं। आप किसी व्यक्ति को उपभोग के साधन देते जाइए। वह यह नहीं कहेगा, "अब मेरे लिए इतना काफ़ी है।" वह कहेगा, "अब जब मेरे पास इतना है तो क्या मुझे इसका तीन गुना मिल सकता है?" इसलिए यह दिखाने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि केवल बाहरी रास्ता काम नहीं करता। और यह नैतिक या धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं आ रहा है। यह डेटा-आधारित साक्ष्य से आ रहा है।
यही नेचर ऑफ द सेल्फ है। बाहर की जो चीज़ें तुम अपने भीतर भर रहे हो, वे उसी डायमेंशन की नहीं हैं। हमें अपनी इस भूख की समझ नहीं है, लेकिन भूख महसूस तो होती है इसलिए हम उसे तरह-तरह की चीज़ों से भरने की कोशिश करते रहते हैं। यह सोचकर कि शायद इनमें से कोई-न-कोई चीज़ हमें तृप्त कर दे। परिणाम यह है कि ग्रह वनों की कटाई और कमी का सामना कर रहा है, लेकिन भूख का समाधान कहीं नहीं हुआ है। अब दूसरी ओर, आपने कहा कि हम भौतिक उपलब्धियों की ओर बढ़ते हैं और यह अधूरापन ही हमें आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी प्रेरित करता है। लेकिन यह दो बहुत अलग दिशाएँ हैं। आध्यात्मिक आयाम, वास्तविक अध्यात्म, न कि परंपरागत नियमों और कर्मकांडों वाला। वास्तविक अध्यात्म तो बस अपने प्रति ईमानदार होने का नाम है। मैं कौन हूँ? मैं वास्तव में क्या चाहता हूँ? मैं अपने सामने और दुनिया के सामने क्या प्रस्तुत करता हूँ? और भीतर से वास्तव में क्या हूँ?
सवाल है, क्या मैंने जो बनने का निर्णय लिया है, उससे अंदरूनी लाभ हो रहा है? यह एक सामान्य समझदारी वाला सवाल है। वास्तव में, यह सवाल सबसे गहरी प्रकार के स्वार्थ से जुड़ा है। हम यहाँ निस्वार्थता की बात नहीं कर रहे हैं, हम यहाँ वास्तविक स्वार्थ की बात कर रहे हैं। क्या मैं वास्तव में आंतरिक रूप से वही बनकर लाभान्वित हो रहा हूँ, जो मैंने चुना है? और क्या मेरे पास कोई विकल्प नहीं है? क्या मैं बना रहूँ? क्या मुझे मजबूरी में इसी तरह बने रहना है? क्या मुझे ऐसा करना ही चाहिए? तो यही सवाल है और यही आध्यात्मिक दिशा है। यह बाहरी दिशा के समान नहीं है। ये दोनों, ये दोनों एक-दूसरे के पूरक भी नहीं हैं।
फिर से, मैं यहाँ किसी भी प्रकार के त्याग या किसी भी प्रकार के न्यूनतावाद की वकालत नहीं कर रहा हूँ। नहीं, यह बात नहीं है। ईशावास्य उपनिषद् में बहुत ख़ूबसूरत तरीके से कहा गया है, "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा।" इसका अर्थ है, विवेकपूर्णता से उपभोग करें। इसका शाब्दिक अर्थ होगा कि त्याग के बाद उपभोग करना।
एक बार जब आपने आंतरिक अज्ञानता का त्याग कर दिया, अब उपभोग करें। क्योंकि अब यह अंधापन नहीं है, जो उपभोग कर रहा है। अब यह प्रकृति का प्रकृति से व्यवहार है, और आप इसे सही मायने में उपभोग भी नहीं कह सकते। यह सिर्फ़ सामंजस्य है। एक लहर दूसरी लहर से मिलती है, छोटी लहर बड़ी लहर में समाहित हो सकती है। इसे उपभोग कहना सही नहीं होगा। लेकिन अगर आप इसे उपभोग कहते भी हैं, तो इस तरह का उपभोग पूरी तरह से उचित है। उचित है, लेकिन कृपया सबसे पहले अपनी अज्ञानता को अलग रखें। फिर यह सुंदर है।
प्रश्नकर्ता: तो एक तरह से आप कह रहे हैं कि हमने गाड़ी को घोड़े के आगे रख दिया है। हमें इसमें अधिक समय बिताना चाहिए था और इससे विज्ञान, प्रौद्योगिकी के साथ एक अधिक सामंजस्यपूर्ण संबंध बनता है।
आचार्य प्रशांत: यह बहुत सुंदर है। यह बहुत सही है, बहुत सही। तो यह नहीं है कि तकनीक एक समस्या है। तकनीक के निर्माता और उपयोगकर्ता नहीं जानते कि क्या बनाना है और इसका उपयोग किस लिए करना है। तकनीक बहुत अच्छी चीज़ है। हम कुछ मायनों में एक विलक्षण प्रजाति हैं। यहाँ यह प्रकृति का प्राकृतिक उपकरण है, हमारे पास एक विशेष मस्तिष्क है। जाहिर है विज्ञान और तकनीक को प्रगति करनी चाहिए, इसमें सुंदरता है। लेकिन क्या हम जानते हैं कि हमें किस प्रकार की तकनीकों की आवश्यकता है और उन्हें कहाँ लगाना है? उनके साथ क्या करना है? तो यही सवाल है।
प्रश्नकर्ता: सबसे पहले, आपका धन्यवाद। मैं लंबे समय से महिलाओं की एक बड़ी समर्थक रही हूँ और उन कई समस्याओं पर आवाज़ उठाती रही हूँ, जिन पर हमें अक्सर आवाज़ उठाने का अवसर नहीं मिलता। इसके लिए आपका धन्यवाद। और मेरा एक बहुत छोटा-सा प्रश्न है। हमें किस उम्र से शुरुआत करनी चाहिए? और मैं आपके थॉट प्रोसेस से सहमत हूँ कि हम शुरू नहीं कर रहे हैं और हम लोगों की शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा खो रहे हैं, जो दिया जाना चाहिए था और पहले दिया जाता था, लेकिन अब नहीं।
किस उम्र से शुरू होना चाहिए? और छात्रों में मास एजुकेशन के लिए क्या किया जा सकता है? क्योंकि दुनिया पागल हो रही है। इसलिए अगर हम इसे शुरू करें, अगर हम इसे स्नातक या स्नातकोत्तर के बजाय पहले करें, तब तक मेरे विचार पहले से ही बन चुके होते हैं और मेरे आसपास के समाज के अनुकूल हो चुके होते हैं। तो इसे बहुत कम उम्र में शुरू करना सबसे अच्छा है। इस पर आपके विचार क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: सुंदर प्रश्न। और उन सभी के लिए, जो यहाँ बच्चों के संपर्क में हैं, हाँ, माता-पिता, अभिभावक, शिक्षक, बड़े भाई-बहन कोई भी, यहाँ संकेत है। अगर आपका बच्चा पूछ सके, "यह (पानी की बोतल को इंगित करते हुए) क्या है?", आपको समझना होगा कि बच्चा अब यह भी पूछ सकता है, "यह (अपनी ओर इंगित करते हुए) क्या है?" यदि आपका बच्चा अब इतना जिज्ञासु और बुद्धिमान है कि पूछे, "माँ, यह क्या है?" तो यह संकेत देता है कि बच्चे में अब इतना संज्ञानात्मक विकास हो चुका है कि वह अब यह भी पूछ सकता है, "माँ, मैं कौन हूँ? लेकिन उँगली को रास्ता दिखाना होगा।
अहंकार की प्रवृत्ति स्वयं से बचने की होती है और उसकी भरपाई के लिए वह अपने चारों ओर हर चीज़ में उलझ जाता है, ताकि स्वयं को व्यस्त रख सके, उद्देश्यपूर्ण महसूस कर सके और यह महसूस करता रहे कि वह समझदारी से किसी काम में लगा हुआ है। इसलिए बच्चा बहुत कम उम्र से ही यह प्रवृत्ति दिखाने लगता है। "यह (टेबल की ओर इंगित करते हुए) क्या है?" और वह इसे उठाकर उसके मुँह में डाल देता है। और बच्चा अब दुनिया के बारे में जिज्ञासु हो रहा है। वही भावना, जो दुनिया के बारे में जिज्ञासु हो सकती है, वह स्वयं के बारे में भी जिज्ञासु हो सकती है।
तो अब उँगली को मार्गदर्शन देने का समय है। अब बच्चे के सामने आईना रखने का समय है और कहना है, "अरे, तुमने यह सब बहुत देख लिया है। और यह सब निश्चित रूप से अद्भुत है। लेकिन क्या तुम देखने वाले को नहीं देखना चाहोगे? क्या आप जानने वाले को नहीं जानना चाहेंगे? उस तितली में बहुत सुंदरता है और मैं समझता हूँ कि तितली आकर्षक है। लेकिन बच्चे, तुम भी बहुत आकर्षक हो, अब चलो तुम्हें देखते हैं।" यही समय है।
प्रश्नकर्ता: तो धन्यवाद, आचार्य जी। यह देखकर बहुत अच्छा लग रहा है कि इतने अलग-अलग स्थानों से इतने लोग यात्रा करके आपको सुनने आए हैं। भारत में बड़ा होते हुए मुझे बार-बार बताया गया कि सबसे कठिन काम अपने भीतर के स्व पर विजय पाना है। लेकिन मैं कभी इसका महत्व नहीं समझ पाया। और अब, जब मैंने जीवन में दूसरी चीज़ों का भी अनुभव किया है, तो धीरे-धीरे मुझे इसका महत्त्व और अधिक समझ में आने लगा है।
तो जितना अधिक आप इनर सेल्फ पर ध्यान केंद्रित करते हैं, उतना ही आप पूँजीवादी दृष्टिकोण और समाज से, और उन चीज़ों से जो आप ख़ुद बनाना चाहते हैं, अलग होते जाते हैं। या जितना अधिक आप इसके पूँजीवादी हिस्से पर ध्यान केंद्रित करते हैं, बाहरी स्व को बनाते हैं, आप आंतरिक स्व पर कम-से-कम ध्यान केंद्रित करते हैं और यह आपको कुछ तरीकों से शांत भी करता है। यदि आप अपने आप पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं, तो इस पर आपके क्या विचार हैं? क्या यह एक समझौता है, जिसे आंतरिक स्व और बाहरी उपलब्धियों के प्रबंधन के बीच सँभालने की आवश्यकता है, या क्या हम दोनों को अधिकतम कर सकते हैं, या हमें इसे कैसे प्रबंधित करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: बहुत अच्छा सवाल है। देखिए, पूँजी भी स्व के लिए एक विषय ही है। स्व ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं का एकमात्र विषयता है। पूँजी एक विषय है, पूँजी की कमी भी एक विषय है। और अहंकार ख़ुद को देखने से बचने के लिए इन सभी वस्तुओं के साथ ख़ुद का मनोरंजन करना चाहेगा।
जब आप किसी वस्तु को देखते हैं, तो उसके प्रति आपका व्यवहार दो तरह का हो सकता है। एक, आप उसे बहुत मूल्यवान समझकर उसके पीछे भागने लगें। दूसरा, आप उसे बुरा मानकर उससे दूर भागने लगें और उसे पूरी तरह छोड़ देना चाहें। आओ, इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ। पूँजी तो बस पूँजी है, पूँजी एक वस्तु है, पूँजी एक संसाधन है। उसका इस्तेमाल बस समझदारी से करो। समझदारी से करोगे तो जीवन सुंदर होगा और बिना समझदारी के करोगे तो अपना ही नुकसान करोगे। गरीबी में न कोई वैभव है, न कोई चमत्कार, न कोई आध्यात्मिकता और न ही कोई पवित्रता। है न? यह दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। लेकिन जब हम इन्हें एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ा कर देते हैं, तब ज्ञान के पूरे क्षेत्र को बहुत नुकसान पहुँचता है। जब हम कहते हैं, "आध्यात्मिकता और पूँजी साथ-साथ नहीं चल सकते", तो यह सही नहीं है। बिल्कुल सही नहीं है।
याद रखिए, पूँजी भी बस एक वस्तु है, एक संसाधन है। ठीक वैसे ही जैसे एक कार। आपको बस यह समझना है कि आपको कार की ज़रूरत है भी या नहीं, और अगर है तो कितनी कारों की ज़रूरत है। और अगर आपको कार की ज़रूरत है, तो उसे कहाँ चलाना है। यही आपको करना है। और अगर आप कार को गलत तरीके से चलाते हैं, या अनावश्यक संख्या में कारें रखते हैं, या आप अपनी कार को डिवाइडर से टकरा देते हैं, तो यह कार की गलती नहीं है।
लेकिन अगर आप पाते हैं कि एक ड्राइवर अपनी लापरवाह ड्राइविंग के लिए कार को दोष दे रहा है, तो संभावना है कि वह अपनी लापरवाही को बनाए रखना चाहता है।
वह वही लापरवाह ड्राइवर बना रहना चाहता है, जो वह है, और इसीलिए वह कार को दोष दे रहा है। पूँजी में स्वयं कुछ भी गलत नहीं है। इस ब्रह्मांड में किसी भी चीज़ में कुछ भी गलत नहीं है। ब्रह्मांड में कोई भी चीज़ अपने आप में न अच्छी है न बुरी, न सही है न गलत, न पवित्र है न अपवित्र। यह सारे लेबल्स बेवजह हैं। इन्हें अहंकार ने सिर्फ़ आत्मरक्षा के लिए गढ़ा है। इसलिए इन लेबल्स को छोड़ दो। बस एक ही बात पर ध्यान दो। "मैं कौन हूँ? मैं क्या बन गया हूँ? जिसे मैं अपना 'मैं' कहता हूँ, उसमें कितना वास्तविक है और उसमें कितना सिर्फ़ संस्कार है? मैं इतना डरा हुआ क्यों हूँ, और मैं अपने डर को इतनी सुंदर शक्ल देने की कोशिश क्यों कर रहा हूँ? मैं सम्मान क्यों चाहता हूँ? सम्मान पाने या सम्मानित कहलाने के बदले मैं आख़िर क्या पाना चाहता हूँ?"
तो यह असली सवाल है। इसके बजाय, आध्यात्मिकता और धर्म के बहुत सारे क्षेत्र इस चीज़ के बारे में हो गए हैं, "इस चीज़ को छोड़ो, या पैसे छोड़ो, उसे उठाओ, उस जगह यात्रा करो, इस तरीके से जियो, इस तरीके से सोचने से बचो, यह सोचने के लिए अच्छे विचार हैं। यही वह सोच है जिससे आपको बचना है।"
और याद रखिए, यह सब केवल साधन हैं। विचारों का महत्त्व विचारक से है और कर्मों का महत्त्व कर्ता से। दृश्य तो देखने वाले के लिए होता है, उसके केंद्र में जो है उस पर ध्यान केंद्रित करो, न कि क्रिया पर, न कर्म पर, न चुनाव पर। चुनने वाले पर ध्यान केंद्रित करो।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आज आपके साथ होना मेरे लिए सम्मान की बात है। मैं पिछले दो वर्षों से गीता समागम से जुड़ा हूँ और नीदरलैंड्स में रहता हूँ। मेरा प्रश्न यह है कि आप जो कार्य कर रहे हैं, वह अद्भुत है। लेकिन हम जलवायु परिवर्तन के जो प्रभाव देख रहे हैं और जिस तरह वह दुनिया भर के लोगों को प्रभावित कर रहा है, यह बहुत बड़ा है। और शायद हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम उस क्रांति को ला सकें, जिसे हम लाने की कोशिश कर रहे हैं। तो आगे का रास्ता क्या है?
आचार्य प्रशांत: आगे का मार्ग वही है, जिस पर हम अब तक चर्चा करते आए हैं, जन-आधारित आत्मज्ञान की शिक्षा। साथ ही, कृपया यह भी याद रखें, यदि आपको दूरी तय करनी है तो आपको समय की आवश्यकता है। आपको यह देखने के लिए समय की आवश्यकता नहीं है कि आप पहले से कहाँ खड़े हैं। तो कृपया यह मत समझिए कि हमारे पास समय कम है। समय तब चाहिए होता है जब कोई काम पूरा करना हो, जब कुछ अतिरिक्त करना हो।
लेकिन जलवायु संकट की पूरी समस्या ही यह है कि हम पहले से ही बहुत-सी अतिरिक्त और अनावश्यक चीज़ें करते आए हैं। तो यह कुछ और करने के बारे में नहीं है। यही कारण है कि यह सभी 30 सीओपी विफल हो गए हैं। यही कारण है कि आज पीपीएम की स्थिति 30 साल पहले की तुलना में और भी ख़राब है। क्योंकि हम सोचते हैं कि समाधान कुछ और करने में है, या जलवायु संकट हम पर एलियंस द्वारा थोपा गया है। "अब चलिए, इसे लड़ने के लिए कुछ करते हैं।"
नहीं, महोदय। जलवायु संकट आपकी अपनी करनी है। यह जो निरंतर कुछ करते रहने की प्रवृत्ति है, उसे थमना होगा। और थमने में समय नहीं लगता। किसी मंज़िल तक पहुँचने में समय लगता है, गति प्राप्त करने में समय लगता है। पर जहाँ हो, वहीं ठहर जाने में कितना समय लगता है? जलवायु आपदा को टालने के लिए अतिरिक्त कदमों की आवश्यकता नहीं है। जो आवश्यक है वह यह है कि हम बस वही करना बंद कर दें, जो हम कर रहे हैं। और मुझे बताइए, क्या वास्तव में बस रुकने में बहुत समय लगता है? बस रुक जाओ।
अब इसके लिए वास्तव में जो चाहिए, वह है नियत। और कृपया याद रखें, अगर आप जलवायु संकट को रोकने के लिए अधिक करने के बारे में सोचते हैं तो करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, और ऊर्जा स्वयं उत्सर्जन है। इसलिए उत्सर्जन को रोकने के नाम पर हम कहते हैं कि हमें अधिक करने की आवश्यकता है और अधिक करने में हम अधिक उत्सर्जन करते हैं। तो यह सब, आप जानते हैं बहुत समझदारी नहीं है।
प्रश्नकर्ता: सबसे पहले तो मुझे लगता है कि आप बहुत महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं। और मैं इस समय लीडरशिप कोचिंग पर काम कर रहा हूँ। इसलिए मेरा काम भी कुछ हद तक उसी दिशा में है, जिसमें आप शिक्षा के बड़े स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। हाँ, लेकिन मेरा ध्यान ऐसे महत्त्वपूर्ण लोगों पर है, जो प्रभावशाली पदों पर हैं, सबसे अहम फ़ैसले लेते हैं और निर्णयों का सबसे अधिक दबाव भी उन्हीं पर होता है। यानी वे ऊपर से पूरे सिस्टम को प्रभावित करते हैं, जबकि आप जड़ों से शुरुआत कर रहे हैं। है न? उल्टी दिशा में जाते हुए हमें शायद बीच में कहीं मिलना चाहिए। उम्मीद है कि इसे साथ में काम कर सकें।
मेरे विचार में तीन ऐसे सेतु हैं, जिनका निर्माण होना आवश्यक है। तो मैं उन तीनों का उल्लेख करना चाहूँगा। पहला सेतु पुरुषत्व और स्त्रीत्व के बीच है, यथार्थ का अनुभव करने, दुनिया में रहने और उसमें अपना योगदान देने के उनके तरीकों के बीच। दूसरा फ़ासला पश्चिमी और पूर्वी दृष्टिकोण के बीच है जो दुनिया को देखने और अनुभव करने का तरीका है। और तीसरा फ़ासला पुरानी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बीच है, जो कमी और शक्ति पर आधारित थी, और नई अर्थव्यवस्था, डिजिटल अर्थव्यवस्था और एआई-मूल दुनिया के बीच है, जहाँ अधिक प्रचुरता संभव है।
शायद सवाल यह है कि आपके विचार में हम इन पुलों को वर्तमान में जिस तरह से बना रहे हैं, उससे अधिक ठोस तरीके से कैसे बनाना शुरू कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: यह एक बहुत व्यापक प्रश्न है, जो पुरुषत्व को स्त्रीत्व से, पुराने को नए से, पश्चिमी को पूर्वी से जोड़ता है। मैं एक आसान-से सवाल से इसका जवाब देना चाहूँगा। यह कौन है, जो पुल पार करेगा? और पार करते समय क्या यह वास्तव में बदलने का इरादा रखता है? मैं इस पुल के इस तरफ़ वही व्यक्ति रह सकता हूँ, जैसा मैं उस पार जाने पर रहूँगा। तो क्या वास्तव में नियत है? और बिना उस नियत के कुछ भी नहीं हो सकता। बिल्कुल भी नहीं। यह पुल सभी बहुत उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक ईमानदारी का तथ्य। क्या मैं वास्तव में बदलने का इरादा रखता हूँ? अन्यथा मैं सभी प्रकार की बौद्धिक, तकनीकी और आध्यात्मिक प्रथाओं को लागू कर सकता हूँ और शब्द-जाल का उपयोग कर सकता हूँ, और फिर भी मैं वहीं रहूँगा, जो मैं रहा हूँ।
आपको पता है, हम जेवन्स पैराडॉक्स के बारे में जानते हैं। है न? हम सोचते रहे हैं कि हम, उदाहरण के लिए, उत्सर्जन, प्रदूषण और सभी प्रकार की गंदी चीज़ों को तकनीक और नीति के माध्यम से नियंत्रित कर सकते हैं। और टेक उन चीज़ों में से एक है, जिसका आपने अपने प्रश्न में उल्लेख किया। क्या टेक सफल होता है? 150 साल से भी पहले, हाँ, जेवंस ने क्या पता लगाया? कि जैसे ही यूके में स्टीम इंजन अधिक कुशल हो गए, कोयले की खपत केवल बढ़ गई। हमने कंप्यूटरों के संदर्भ में भी वही चीज़ देखी है। कंप्यूटरों की प्रोसेसिंग स्पीड आज बहुत बेहतर है। लेकिन आज कंप्यूटिंग में जो बिजली की खपत होती है, वह 1980 या 1990 के दशक की तुलना में कई गुना अधिक है। एआई, डिजिटल चीज़ें, सर्वेलेंस, यह सब कई गुना अधिक बिजली खपत कर रहे हैं, भले ही प्रोसेसिंग पावर कई गुना बढ़ गई हो।
वही चीज़ें हम एलईडी बल्बों के साथ देखते हैं, वे केवल थोड़ी बिजली खपत करते हैं। लेकिन अब इमारतों को मनोरंजन के रूप में रोशन किया जा रहा है, जिससे बिजली की कुल खपत बढ़ गई है। वही बात ऑटोमोबाइल्स पर भी लागू होती है। आज का ऑटोमोबाइल बहुत अधिक ईंधन-कुशल है। लेकिन दक्षता केवल इनपुट को कम महँगा बनाती है और इससे माँग बढ़ती है, क्योंकि माँग करने वाला स्वयं यहाँ बैठा है। इसलिए स्वयं को जानना आवश्यक है।
वही बात ईवीज़ पर भी लागू होती है। ईवीज़, वे अधिक कुशल हैं। हाँ, वे हैं। लेकिन फिर वाहनों की संख्या के बारे में क्या, जो बढ़ रही है? और उसके लिए सड़कों की आवश्यकता होगी, और उसके लिए कोबाल्ट, लिथियम, निकेल की खदानें खोदनी होंगी, और उसके लिए जंगलों को साफ़ करना होगा। और यह शहरीकरण को भी बढ़ावा देगा। तो तरीके काम नहीं करेंगे। नीतियाँ भी काम नहीं करेंगी, क्योंकि जो सुबह नीति बनाएगा वही शाम को नीति को दरकिनार करने का तरीका ढूँढ़ लेगा। नीति-निर्माता और उपभोक्ता एक ही इकाई हैं। नेता को सत्ता में वोटर ने नहीं, बल्कि उपभोक्ता ने चुना है, क्योंकि वोटर ही उपभोक्ता है। इसीलिए वोटर कभी भी ऐसे नेता को सत्ता में नहीं लाएगा, जो उपभोग को दबाने वाली नीतियाँ बनाए। या शायद नीतियाँ होंगी, लेकिन उनके लिए उपाय खोज लिए जाएँगे।
नियत ही एकमात्र मार्ग है। और उसके लिए मैं फिर दोहराऊँगा जन-आधारित आत्म-शिक्षा आवश्यक है।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुराने तरीके, ध्यान या आत्मबोध के पुराने तरीके, बेकार हैं। इसका यह भी मतलब नहीं है कि नई-नई नीतियाँ बनाने के तरीके और तकनीक बेकार हैं। इनमें से कुछ भी बेकार नहीं है। यह सब बहुत-बहुत आवश्यक है। उपनिषद् विद्या और अविद्या, सांसारिक ज्ञान और आंतरिक बोध के साथ की बात करते हैं। इन दोनों का साथ-साथ चलना ज़रूरी है। अभी संतुलन नहीं है, ध्यान भी नहीं है। हमने एक पक्ष पर बहुत ज़्यादा काम किया है और दूसरे पक्ष पर बहुत कम। बस यही बात है।