तकनीक अपने-आप में समस्या नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उसका उपयोग कौन और किस मानसिक अवस्था से कर रहा है। यदि भीतर भय, असुरक्षा और निर्भरता है, तो तकनीक सुविधा देने के बजाय बैसाखी बन जाती है। तब संवाद कृत्रिम हो जाता है, ज्ञान सतही रह जाता है और शक्ति विनाश का साधन बनती है। बाहरी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ भीतर की परिपक्वता और विवेक भी विकसित हों; अन्यथा हर नई तकनीक हमारी कमज़ोरियों को ही और बढ़ा देती है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आशीष, और गुड आफ्टरनून सभी को। यहाँ होना मेरे लिए कई कारणों से बहुत खुशी की बात है। लेकिन शायद सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि मुझे आचार्य प्रशांत से बात करने का अवसर मिल रहा है। हम दोनों में एक समानता है, हम दोनों ने अपने वयस्क जीवन की शुरुआत आईआईटी दिल्ली से की। मुझे लगता है कि ये माहौल उससे थोड़ा अलग है, लेकिन अपने ढंग से यह भी उतना ही विशेष है। आपसे पूछने के लिए मेरे पास बहुत से प्रश्न हैं। पहले मैं कुछ समय लेकर अपने प्रश्न पूछूँगा और उसके बाद श्रोताओं को भी आपसे प्रश्न पूछने का अवसर दूँगा। मुझे पता है कि यहाँ उपस्थित बहुत से लोगों के मन में आपके लिए अनेक प्रश्न हैं।
तो आपने आईआईटी दिल्ली से शुरुआत की। फिर आप आईआईएम अहमदाबाद गए और हमारे जैसे कई लोगों की तरह आप कॉरपोरेट जीवन में गए। लेकिन फिर आपने उसे छोड़ दिया। क्यों?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि मैं जिस प्रश्न का उत्तर खोज रहा था और जिन प्रश्नों का समाधान चाहता था, वे तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा से उत्पन्न होने वाले प्रश्न नहीं थे। मुझे आभास हो गया था कि उसका स्रोत कहीं और, उससे भी पहले। तकनीक और प्रबंधन दोनों ही उपकरण हैं, मनुष्य के हाथों के उपकरण और उपकरणों का उपयोग किसी उद्देश्य के लिए किया जाता है। उद्देश्य भीतर होता है, उपकरण बाहर होते हैं।




