आत्म माने ‘सेल्फ’ की जितनी गतिविधियाँ हैं, जिनमें विचार और कर्म शामिल होते हैं, उनको जानना ही आत्म-ज्ञान है। मन क्या कर रहा है, क्या कह रहा है — इस पूरी प्रक्रिया का ज्ञान। देखो कि कोई सामने से गुज़र जाता है तो क्या विचार आता है? टी.वी. में कोई कार्यक्रम आ रहा है तो उसे किस दृष्टि के साथ देखते हो? जो कर रहे हो, वही देख लो — यही आत्म-ज्ञान है।
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प्रश्नकर्ता: आत्म-ज्ञान क्या है?
आचार्य प्रशांत: विचार और कर्म। जिसको हम ‘सेल्फ’ कहते हैं वह विचार और कर्म के आलावा कुछ और नहीं जानता। वह विचार और कर्म ही है। तो सेल्फ-अवेयरनेस का क्या अर्थ हुआ? अगर ‘सेल्फ’ का अर्थ है विचार और कर्म तो सेल्फ-अवेयरनेस का अर्थ क्या हुआ?
श्रोतागण: देखना।
आचार्य प्रशांत: देखो कि तुम दिन भर क्या सोचते हो और देखो कि दिन भर तुम क्या करते रहते हो। करने में कहना शामिल है। मनसा (मन से), वाचा (वाणी से), कर्मणा (कर्म से) – तीन होते हैं। मैंने दो कर दिया – करने में, कहना शामिल है। तो देखो कि मन में क्या उतरा है और देखो कि शरीर दिन भर क्या कर रहा है। यही है सेल्फ-अवेयरनेस। इसके अलावा सेल्फ-अवेयरनेस कुछ नहीं है। सेल्फ-अवेयरनेस बड़ी साधारण सी चीज़ है कि मैं दिन भर क्या सोचता रहता हूँ और दिन भर क्या . . .
श्रोतागण:




