
प्रश्नकर्ता: सर, आपने ये जो सिस्टम की बात करी मतलब जिसमें सभी कुछ आ गया: इन्फ़ॉर्मेशन, पावर, पॉलिटिक्स, कैपिटल, हायरार्की, रिलिजन, सारा कुछ। ये सिस्टम के जब बाहर की बात सोचते हैं, तो वो बिल्कुल एण्ड ऑफ़ रियालिटी जैसा लगता है एकदम डेथ-लाइक लगता है कि यार, यही जाना है अभी तक; सिस्टम ने ही मुझे सब कुछ बताया: मेरी एम्बिशन, मेरे फ़ीयर, सब कुछ सिस्टम से आ रहा है।
अगर मैं सिस्टम के बाहर जाऊँ, तो लगता है सब कुछ ख़त्म हो जाएगा, एक। दूसरा जब सिस्टम के बाहर जाता हूँ, तो फिर वो स्टेक्स जो आप बोल रहे थे, सिस्टम ख़ुद ही आपको स्टेक्स देता है ना। तो आप ख़ुद ही फिर नेगोशिएट करते हो कि कुछ बेटर स्टेक्स निकाल लूँ क्या कि जैसे आपने बोला कि, ख़ुद ही एक्सप्लॉइटर बन जाता हूँ ना। वो शायद बेटर है सिस्टम से बाहर निकलने से, कि ख़ुद एक्सप्लॉइटर बन जाओ।
ये, सर मैं आपको एक-डेढ़ साल से सुन रहा हूँ। आपके साथ मतलब, मैंने संस्था में जब आपको सुन के सिर्फ़ दो महीने हुए थे। मुझे बस एक्सप्लोर करना था कि यार कहाँ से आ गए ये, और ये कैसे ऐसा बोल पा रहे हैं। मैंने आपके साथ इंटर्नशिप करी, मैंने संस्था को देखा और मुझे समझ में आया, कि “यार, ये काम बहुत अलग है, शायद यही सही है।”
जो लगता भी है कि ये सही है, वो भी आप ही के कारण लगता है। क्योंकि आपने ही इन्फ़ॉर्मेशन दी, कि भाई, ये है दुनिया। इसीलिए ये काम सही है, इसलिए मैं कर रहा हूँ। आपसे दूर आता हूँ, तो लगता है कि “यार, वो काम ही है करने लायक़।” आपके क़रीब आता हूँ, तो लगता है कि बेटर स्टेक्स नेगोशिएट कर लूँ क्या, कि कम से कम आराम से रह सकूँ। तो ये चीज़ में ना, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ उसको सॉल्व कैसे करूँ?
आचार्य प्रशांत: कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं हमारे भीतर जो बाहर से जब इशारा मिले ना तभी जगती हैं, हम जिए भी ऐसे हैं। अभी हम इतनी देर से कंडीशनिंग की बात कर रहे थे, जैसे हम कंडीशन हो जाते हैं ना बहुत आसानी से, वैसे ही जो फ़्रीडम भी है कंडीशनिंग से, “प्रभावों से आज़ादी” उसके लिए भी बाहर कोई दिखे जो आज़ाद हो, तो ही भीतर कुछ खटकता है, कुछ ट्रिगर होता है।
आप अगर पैदा ही जेल में हुए हो वहाँ सब वही हैं कैदी लोग, उन्हीं को देखा है। वहीं भीतर ही वो अपना उत्सव-त्योहार भी मना लेते हैं, भीतर ही अपनी खटपट कर लेते हैं, छोटी-मोटी लड़ाइयाँ भी कर लेते हैं, भीतर ही कोई कमा लेता है, कोई थोड़ा अमीर, कोई थोड़ा ग़रीब भी हो जाता है, और ये सब कुछ जेल के भीतर चल रहा है। आपको अपने आप तो कभी ललक उठने ही नहीं वाली है कि मुझे बाहर जाना है जेल से, आपके सारे स्टेक्स जेल के ही भीतर हो जाएँगे, आप अच्छे कैदी बनिए, आपको पुरस्कार मिलेगा। सब कुछ जेल में हो जाएगा, आपका खाना-पीना, शादी-ब्याह, बच्चे, जीना-मरना, सब जेल के अंदर ही चल रहा है।
आपको क्यों लगेगा कि जेल से बाहर मुझे जाना भी है?
उसके लिए आपको कभी थोड़ा आसमान की ओर देखना पड़ेगा, “अच्छा, एक आज़ाद पंछी दिखा, ये दीवारों से बाहर का है क्या?” तो जैसे कंडीशनिंग होती है ना अपने आसपास वालों को देख के, वैसे ही आज़ादी के लिए भी किसी आज़ाद के आस-पास जीना पड़ता है, संस्था हमने इसीलिए बनाई थी। उसके बिना होता नहीं है, उसके बिना सिर्फ़ शब्द रह जाते हैं, कॉन्सेप्ट रह जाते हैं। क्योंकि आप बहुत वनरेबल हो — असुरक्षित। आप अभी यहाँ से बाहर निकलोगे, दस चीज़ें आपके ऊपर छा जाएँगी, बाहर निकलने की भी ज़रूरत नहीं है, अभी यहाँ आप मोबाइल खोलोगे, पचास चीज़ें आपके ऊपर आ जाएँगी। हमारे सारे द्वार-दरवाज़े खुले रहते हैं ना।
ये जो सारी सेंसेस हैं इनसे बहुत कुछ भीतर जाता रहता है और हमारे पास उसके विरुद्ध कोई सुरक्षा, कोई डिफ़ेन्स होती नहीं है। और जो भीतर जाता है, वो भीतर सिर्फ़ जाता नहीं है मेहमान की तरह वो बस के बैठ जाता है। हमने कहा ना, अहंकार बड़ा सूना-सूना, अपने आप को मानता है बहुत अकेलापन उसको है। तो भीतर जो भी कुछ जाता है, अहंकार उसको पकड़ लेता है और कहता है “यही तो सच है, यही तो ठीक है, तू आजा,” और इसको मैंने बना लिया, मेरा सच। अब आप फँस गए, अब आप क्यों आज़ादी की माँग करोगे? जैसे ग़ुलामी बाहर से आती है ना, वैसे ही आज़ादी के लिए भी प्रेरणा तो आरंभिक बाहर से ही आएगी। और जिस आरंभ की मैं बात कर रहा हूँ, वो आरंभ बड़ा लंबा खींचता है।
क्योंकि बाहर से आज़ादी की प्रेरणा आ रही होगी, भीतर आपने क्या बैठा रखी है? ग़ुलामी। तो वो जो बाहरी प्रेरणा है उसको भी बहुत-बहुत लंबे-लंबे साल लग जाते हैं, आपके भीतर वाले को हराने में।
संस्था में थे; एक पोस्टर देखा होगा कि “तुम्हें आग से बचाने के लिए, मुझे आग से नहीं तुमसे लड़ना पड़ता है।” आग लगी हुई है और जलने का ख़तरा है, और मुझे तुम्हें आग से बचाना है, तो मैं आग से नहीं लड़ता मैं तुमसे लड़ता हूँ, क्योंकि तुम उतारू हो जल मरने के लिए। तुम कह रहे हो, “मुझे आना ही नहीं बाहर।” तो भीतर जो बैठा है उसके विरुद्ध फिर बाहर भी किसी को बैठाना पड़ता है, जो लगातार आपको टोकता चले, लगातार आपके सामने एक दूसरी हक़ीक़त रखता चले, ऐन अल्टरनेट रियालिटी।
नहीं तो जो आपने देखा है, जाना है, और जो आपके मन के भीतर है, आपके लिए वही एकमात्र सच्चाई बन जाती है, सोल रियालिटी। और जब वही एकमात्र सच्चाई है, तो विद्रोह की क्या बात है, आज़ादी की क्या बात है, यही है। कोई अल्टरनेटिव ही नहीं है। जब कोई बाहर दूसरा आता है, तो विकल्प दिखाते हुए कहता है, “विकल्प है, और मैं रहा, मुझे देखो; अगर मैं ऐसा हो सकता हूँ तुम भी हो सकते हो। मुझ में, तुम में कोई मूलभूत फ़र्क़ तो है नहीं,” तो तब होता है।
नहीं तो ये यही चलता रहेगा कि “आचार्य जी, मैं अपने पुराने, साधारण, सामान्य, संसारी जीवन में जब रहता हूँ, तो फँस जाता हूँ।” तो मैं पूछूँगा, “वहाँ रहते ही क्यों हो?” कह रहे हो ख़ुद ही अपने मुँह से कि फँस जाते हो, तो तुमसे किसने कहा है कि तुम वहीं जाकर बसो? ये तो अपना फ़ैसला होता है, ये करना पड़ता है उसके बिना नहीं है।
ये मुग़ालता बिल्कुल मत पालिएगा, ये बहुत ज़्यादा आध्यात्मिक लोगों को रहता है, कि “हम अपना पुराना ही माहौल चलाते रहेंगे। जहाँ रहते हैं, वहीं रहते रहेंगे। जिनकी संगति कर रखी है, उन्हीं की संगति रखेंगे। जो व्यापार कर रखा है, वही व्यापार; जो नौकरी, वही नौकरी; जो धारणाएँ, वही धारणाएँ; जिसको आदर्श मानते हैं, वही आदर्श; जो टीवी पर देखते हैं, वही टीवी; जो एक्टर पसंद है, वही पसंद; जो खिलाड़ी पसंद है, वही पसंद, सब कुछ हम अपना भीतर-बाहर पुराने जैसा रखेंगे, लेकिन हमारी आध्यात्मिक जागृति हो जाएगी।” नहीं होने वाली, नहीं होगी। मैं कह रहा हूँ, नहीं होगी, हो रही होगी तो मैं रोक दूँगा। नहीं हो सकती भाई, होगी तो बहुत नक़ली चीज़ हो जाएगी कोई, नहीं हो सकती।
जिन्हें भीतरी बदलाव चाहिए, उन्हें बाहरी बदलाव के लिए तैयार रहना पड़ेगा। वो क़ीमत है, वो चुकानी पड़ती है।
बाहर-बाहर सब पुराने ही रखोगे, लोग कपड़े बदलने को नहीं तैयार होते। दस साल पहले ऐसे पहनते, कपड़े ऐसे ही थोड़ी तुम चुन लेते हो। कोई बुर्क़ा पहन रहा है, कोई स्कर्ट पहन रहा है, यूँ ही पहन रहा है क्या, उसमें कुछ बात है भाई। फ़र्क़ है — कंडीशनिंग का, माहौल का, संस्कार का फ़र्क़ है। वो किसी चीज़ को अभिव्यक्त करते हैं, वो प्रतीक हैं, रिप्रेज़ेंटेटिव हैं जो तुम्हारे कपड़े पहन रखे हैं। और तुम कह रहे हो, मुझे कपड़े तक अपने नहीं बदलने। ज़िंदगी भर कुर्ता-पायजामा पहना है या फ़लानी चीज़ पहनी है या कुछ है, मैं वही पहनूँगा। तो फिर तो हो चुका बदलाव।
मैं नहीं कह रहा कि कुर्ता ही बदल लेने से बदलाव हो जाएगा। मैं कह रहा हूँ, बदलाव के रास्ते में कुर्ता भी बाधा बन सकता है, अगर तुम अड़ गए कि मैं बाहरी चीज़ें नहीं ही बदलूँगा। जब भीतरी बदलाव आता है, तो बाहरी बदलाव की भी माँग करता है, और जो बाहरी बदलाव से बचेंगे उनका भीतरी बदलाव बाधित हो जाएगा, ऑब्स्ट्रक्ट।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। ऐसा क्यों है कि ये दुख और अनुभव की वजह से कुछ लोगों में ज़्यादा वॉइड (खालीपन)क्रिएट होता है, और फिर वो सवाल करना चाहते हैं। लेकिन कुछ लोगों में ये वॉइड ज़्यादा क्रिएट नहीं होता और वो ये सवाल नहीं करना चाहते हैं, तो ऐसा कैसे है?
आचार्य प्रशांत: अगर इसका उत्तर निकल आए, तो सब लोगों को ऐसा कर दिया जाए कि सवाल करने लगे ना। आपने प्रश्न पूछा सबने नहीं पूछा, इसका क्या जवाब है? जवाब है, आपकी मर्ज़ी। ये आख़िरी शब्द होता है, चॉइस, जिस चेतना की आप बात कर रहे हैं ना उस चेतना का स्वभाव है, चुनना। तो मुक्ति भी चुननी पड़ती है। ठीक वैसे जैसे अभी बहुतों के पास प्रश्न होंगे, बहुत लोग चुन रहे हैं कि पूछेंगे, बहुत लोग चुन रहे हैं कि नहीं पूछेंगे। इसका कोई उत्तर नहीं होता ये अपने चुनाव की बात है, 'मेरी मर्ज़ी'। "मैं चाहे ये करूँ, मैं चाहे वो मेरी मर्ज़ी।"
तो कोई मुक्ति चाहता है, कोई मुक्ति क्यों नहीं चाहता? ये तो आपकी बात है भाई, आप चाह रहे हो ना आप बताओ, मुझसे क्यों पूछ रहे हो? कोई कह रहा है, “नहीं, मुझे तो बंधनों में ही रहना है,” कह रहा है, “आचार्य जी, मैं बंधनों में क्यों रहना चाहता हूँ?” अच्छा, कौन रहना चाहता है? “मैं,” तो तू बता ना; मुझसे क्यों पूछ रहा है। हाँ, तू मुझसे ये पूछ सकता है, कि “क्या करें? किधर देखें? मार्ग क्या है?” तो शायद मैं उसमें कुछ दो-चार बातें कहूँ। पर तुम मुझसे पूछ रहे हो कि तुम कोई निर्णय क्यों कर रहे हो? तो तुम जानो। और अगर तुम नहीं जानते, तो कौन जानेगा?
तो एक तरीक़े से सॉवरेन होती है, स्वयंभू होती है। क्या? चेतना, है ना? वो अपना “मेरी मर्ज़ी।” तो इसीलिए जो लोग फिर छटपटाने लग जाते हैं मुक्ति को, वो कहते हैं कि “अपनी मर्ज़ी से तो शायद हम फँसे ही रहते, और कोई तरीक़ा भी नहीं है कि हम में ये छटपटाहट किसी तरीक़े से उठाई जा सकती।” तो अगर ये उठ रही है तो ग्रेस है, अनुग्रह है। कारण नहीं है, ग्रेस है। कोई कारण होता, तो हम एक फ़ॉर्मल प्रोसेस, एक प्रक्रिया बना देते ना कि सभी लोगों में सेल्फ़ इन्क्वायरी की ललक उठे। अगर हमें कारण पता ही चल जाए कि ऐसे होता है, तो फिर हम एक प्रक्रिया बना देंगे।
पर उसका कोई कारण पता नहीं चल सकता। तो इसलिए फिर, जिनमें वो जिज्ञासा उठती है, वो बस हाथ जोड़ के कहते हैं कि “ये तो अनुकंपा है, अनुग्रह है, ग्रेस है। कारण इसका कुछ नहीं बताया जा सकता, मर्ज़ी है।
प्रश्नकर्ता: और ऐसा भी होता है कि मतलब, जब उन लोगों को दुख महसूस होता है, तो वो बाबा के पास चले जाते हैं। लेकिन ये जो सेल्फ़ इन्क्वायरी वाली चीज़ होती है, यहाँ पर वो नहीं आना चाहेंगे।
आचार्य प्रशांत: बाहर कुछ भी हो, कोई भी हो, आप उसके पास जा सकते हो, क्योंकि सारी समस्या भीतर है ना। आपको पता है समस्या भीतर, समस्या हटानी तो है नहीं तो बाहर कहीं भी चले जाओ। अम्यूज़मेंट पार्क में चले जाओ या बाबा के आश्रम में चले जाओ, एक ही बात है। दोनों बाहर की चीज़ें हैं, दोनों में जाकर ही लगता है कुछ मौज आ गई। दोनों में मनोरंजन हो जाता है, बस एक में जो मनोरंजन होता है, उसको आप बोलते हो “सामाजिक है,” दूसरे में कहते हो “नैतिक है, उच्च कोटि का मनोरंजन है।” तो बस वही, मनोरंजन है।
बाहर मनोरंजन है और भीतर जो है, समाधान है। भीतर नहीं जाना तो बाहर —
“आतम ज्ञान बिना नर भटके, कोई मथुरा कोई काशी”
बाहर कहीं भी भटकते रहो। चाहे वो मथुरा-काशी हो, और चाहे फिर आप कैलिफ़ोर्निया चले जाओ, लॉस एंजेलेस चले जाओ, मार्स पर चले जाओ। बाहर तो बाहर है। बाहर आप किसी भी दिशा चले जाओ कहीं भी पहुँच जाओ।