
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आज का सत्र इसी सूत्र पर केंद्रित रहा कि – "बाहर घनघोर कर्म और भीतर आराम।" एक आलसी व्यक्ति के जीवन में एक बिल्कुल उल्टा सूत्र चलता है – बाहर आराम रहता है, भीतर घनघोर कर्म रहता है। तो मैंने ये अनुभव किया है, कि भीतर चल रही उथल-पुथल से तंग आकर जब आलस के विरुद्ध कर्म करने बाहर उतरते हैं, तो जो भीतर हो रही उथल-पुथल है, वो और ज़्यादा बढ़ जाती है। तो भीतर के राक्षस और ज़्यादा एक तरह से हावी हो जाते हैं।
तो वो स्थिति एक ऐसी स्थिति होती है जब हम बाहर तो कर्म कर ही रहे हैं, अपनी जो शारीरिक आलस की वृत्ति है, उसके ख़िलाफ़ तो बाहर कर्म चल ही रहा है। भीतर भी बहुत ज़्यादा कर्म चल रहा है। तो बाहर-भीतर दोनों ही तरफ़ बहुत ज़्यादा गति चल रही है। तो ऐसी स्थिति में कई बार हिम्मत हार जाता है इंसान और वापस से नीचे गिर जाता है। तो इसमें कैसे अपने आप को रिटेन करके रखें?
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं, कभी ये नहीं पूछते, "कैसे अपने आप को रिटेन करें? कैसे बस उस एक आफ़त के क्षण से गुज़र जाएँ?" ये प्रश्न अभी थोड़ा गड़बड़ है।
आप कहीं जा रहे हैं अपनी गाड़ी में, दो बातें पूछ रहा हूँ, बताइएगा ज़्यादा ख़तरनाक कौन-सी बात है: सड़क ख़राब है, इंजन ख़राब है? कौन-सी चीज़ है जो बर्दाश्त की जा सकती है, जिसको लाँघा जा सकता है? कौन-सी चीज़ है जो सब उखाड़ के रख देगी? आप कहीं जा रहे हैं, ज़िंदगी की यात्रा है, शरीर की गाड़ी है, सड़क ख़राब है ये ज़्यादा गड़बड़ बात है, या इंजन ख़राब है ये ज़्यादा गड़बड़ बात है?
प्रश्नकर्ता: इंजन ख़राब है।
आचार्य प्रशांत: तो इंजन का निरीक्षण करवाना होगा। इंजन ठीक हो, तो दुर्गम राहें भी पार करी जा सकती हैं। हम क्या करते हैं कि ख़राब इंजन होता है, तो इंजन के अनुकूल राह खोजने लग जाते हैं। और इंजन के अनुकूल राह ले कहाँ जा रही है? इसका कुछ पता नहीं।
हमारी सारी कामनाएँ कहाँ से आती हैं? हमारी अपूर्णता से, अपूर्णता माने ख़राबी। तो आप कहाँ को जा रहे हो, इसका फैसला क्या चीज़ करती है? आपके इंजन की ख़राबी। “इंजन ख़राब था, इसलिए हमने फ़लानी राह चुन ली।” ये कौन सा तर्क है? इंजन ठीक करिए न, और उसकी विधि आज हमने बड़े विस्तार में देखी। क्या? आत्मनिरीक्षण।
मैं कुछ कह रहा हूँ, मैं क्यों कह रहा हूँ? मैं चल रहा हूँ, मैं जा रहा हूँ, मैं कोई अनुभव कर रहा हूँ, मुझे कोई भाव आ रहा है, कोई विचार आ रहा है, कोई कामना है। ये मैं क्या कर रहा हूँ? ये मेज़ मान लीजिए मेरे जीवन का क्षेत्र है, इसमें ये सब क्यों मौजूद है, कुछ वजह? ये साफ़ क्यों नहीं हो सकती मेज़? या इस पर कुछ और बहुत सुंदर, उपयोगी, खूबसूरत क्यों नहीं मौजूद हो सकता? ये आत्मनिरीक्षण कहलाता है। राह बाद में आती है, इंजन पहले आता है न। ख़राब सड़क वग़ैरह ठीक है, इंजन ख़राब नहीं चलेगा।
नहीं बन रही बात?
प्रश्नकर्ता: इंजन वाक्य का, मतलब व्यावहारिक तौर पर क्या अर्थ है? इंजन क्या अर्थ रखता है?
आचार्य प्रशांत: मन। मन क्या पकड़ के बैठा हुआ है? मन किस बात से घबराता है? मन ने मान्यता क्या उठा रखी है? मन ने किस बात को बिल्कुल सत्य जैसा स्थान दे रखा है, ये बात तो बदल ही नहीं सकती? कौन सा मुद्दा है जिस पर मन विचार करने को तैयार नहीं है? मुद्दे पर रोशनी ही डालने को तैयार नहीं है? कह रहे हैं “नहीं, इस बात पर हम कुछ नहीं सोच सकते, फ़लानी बात तो बिल्कुल अकाट्य सत्य है।”
प्रश्नकर्ता: उन बातों को पिनपॉइंट करना है, जिन पर बिल्कुल ही नहीं जाना चाहता मैं?
आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ उन बातों को नहीं, पिनपॉइंट तो कैसे करेंगे आप? उसके लिए पहले पता होना चाहिए न पिन कहाँ रखनी है? इतना पता ही होता, तो फिर सब ठीक ही हो गया होता।
जो कुछ भी चल रहा है जीवन में, उसका सतत् निरीक्षण करना होता है। पिनपॉइंटेड निरीक्षण नहीं करना होता, फुल बॉडी स्कैन चाहिए।
जब पता ही नहीं है कि बीमारी क्या है और कहाँ से आ रही है, तो आप कैसे सिर्फ़ अपनी नाक की स्कैनिंग करा रहे हो? इडियोपैथी जानते हैं क्या होती है? जहाँ पर बीमारी तो है, पर ये नहीं पता कि वो बीमारी क्या है, कहाँ से आ रही है। सिम्पटम है, लक्षण है, बीमारी का आकार, प्रकार और मूल पता नहीं चल रहा। तो फिर क्या करते हैं? फिर जितने तरीक़े के टेस्ट हो सकते हैं, सब कराए जाते हैं।
तो सतत् अवलोकन ऐसा होता है, लगातार चलता रहे। अपने आप को देखते रहो। देखते रहो, क्या चल रहा है? क्या कर रहे हो? क्या बोल रहे हो? कहाँ अपने आप को धकेले दे रहे हो? किन बातों में निवेशित हो रहे हो? किस बात से बिल्कुल घबरा के भग ही जाते हो? क्या इरादे बना रखे हैं? योजनाएँ क्या हैं? यही सब।
प्रश्नकर्ता: जी, धन्यवाद आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज के जो पूरे श्लोक की जो चर्चा हुई, उसमें ये बात थी कि भीतर कर्म चलता रहे, लेकिन अंदर आराम रहे। तो हम में एक उत्कंठा सी उठती है इस चीज़ को नकल कर लेने की। आपने कई बार चेताया है कि बुद्ध पुरुषों की, संतों की, उनके आचरण की अंधी नकल नहीं कर लेनी है। लेकिन ये वृत्ति होती है, कि "अरे, कुछ पता चला तो अब हम वैसा ही करेंगे।"
उदाहरण के लिए, किसी ने कल मुझसे कुछ बोला, तो अगर मैं इस बात को अच्छे से नहीं समझूँगा, तो ऐसा होगा कि अंदर मुझे गुस्सा आ रहा होगा, लेकिन बाहर मैं ऐसे करूँगा कि कुछ नहीं हुआ। तो वो नहीं करनी है, वो नकल नहीं करनी है अंधी।
तो इसमें फिर सवाल मेरा ये है कि अंदर और बाहर का जो डिवीज़न, उसमें मुझे ऐसा लगता है कि एक जो दो पार्ट हैं एक तरह से, तो उनके बीच में एक ट्रांज़िशनल स्प्रिंग टाइप की चीज़ है। कि उनमें कुछ तो इंडिपेन्डेन्स है, कि थोड़ा बहुत अगर बाहर वाला हिस्सा हिलता है, कुछ होता है, तो अंदर वाला प्रभावित नहीं होता। लेकिन एक सीमा जो कि सबकी अलग-अलग होती है, एक सीमा से ज़्यादा अगर बाहर कुछ होता है, तो फिर वो एक तरह से फिक्स जॉइंट की तरह चलता है, दोनों एक साथ ही प्रभावित होते हैं।
तो इनको सॉर्ट ऑफ़ डी-कपल कैसे किया जाए? विधि नहीं मैं पूछ रहा हूँ। विधि तो आपने बताई है, कि प्रक्रिया को प्रक्रिया की तरह देखना है, एक ये बात बताई आपने। और गुणों वाली बात बताई, कि गुण ही गुण से बरत रहे हैं, वो बात। और कृष्णमूर्ति साहब की बात, कि टेक नथिंग पर्सनल, वो बात।
तो फिर यहाँ पर सवाल है कि ये चीज़ मतलब एक बाइनरी तो ऐसा हो नहीं सकता कि हम अचानक से क्वान्टम जम्प लेके अभी ऐसे हैं कि जुड़े हुए हैं दोनों और अचानक से मुक्त हो गए और दोनों कम्प्लीटली डी-कपल्ड हो गए, अंदर-बाहर। तो क्वान्टम जम्प वाली स्थिति तो होती नहीं, हमें तो साधना, अभ्यास करना होता है।
तो वहाँ पर मतलब किया क्या जाए? हमारे जैसे एज़ अ साधक, हमारे एंड से क्या?
आचार्य प्रशांत: अभी तो आपने बोला कि विधि मैंने बता दी है, क्या पूछना है फिर?
प्रश्नकर्ता: तो वही मतलब उन विधियों का, उन्हीं विधियों पर चलना है या फिर?
आचार्य प्रशांत: तो मैंने विधि इसलिए बताई है कि उस पर नहीं चलना है?
प्रश्नकर्ता: नहीं-नहीं, मतलब उनका तो पालन करना है। लेकिन सवाल बहुत ज़्यादा स्पष्ट नहीं है, बट स्थिति ऐसी है कि ये बात कैसे और गहराई में और गहरी होती जाए, समझ गहरी हो।
आचार्य प्रशांत: आत्मनिरीक्षण का अर्थ होता है, अपनी मान्यता को देखना। आपकी मान्यता ये है कि जो भी विधि बताई गई है, वो उपयोगी तो होगी नहीं।
प्रश्नकर्ता: पालन नहीं करेंगे, ये दिक़्क़त होती है। उपयोगिता की बात बाद में आती है।
आचार्य प्रशांत: पालन न करना, ये सब तो फिर अपनी ईमानदारी की बात है और ईमानदारी की कोई विधि नहीं होती। ये तो अपनी ईमानदारी की बात है न।
कम्प्लीट डी-कप्लिंग या बाइनरी जैसी कोई चीज़, वो होगी कोई अंतिम स्थिति। आपने एक सीमा की बात करी, कि एक सीमा तक तो ऐसा हो पाता है कि बाहर की आफ़त, भीतर की आफ़त न बने। फिर वो नहीं होता, फिर एक वो दोनों आपस में जॉइंट होकर चलने लगते हैं। एक सीमा कहा न? तो उसी सीमा को आगे बढ़ाना होता है। वो सीमा अनंत तक आगे जा सकती है। कुछ हद तक सबका ऐसा होता है कि बाहर की जो चीज़ें हैं, वो भीतर तुरंत नहीं प्रभावित करतीं। पर आम आदमी की वो सीमा बहुत जल्दी आ जाती है। ज्ञानी की वो सीमा आगे बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है, और संभावना है कि अनंत तक चली जाए।
विधि लेकिन एक ही है — आत्मनिरीक्षण।
बाहर जो भी कुछ हो रहा है, उससे भीतर अगर कुछ बदले, तो बदल के क्या हो जाए? कोई विकल्प तो होना चाहिए न। बाहर कुछ हुआ, उससे आप कह रहे हो भीतर भी बदलाव आना चाहिए। बाहर हलचल हो गई, गड़बड़ हो गई, उद्वेग हो गया, कुछ हो गया बाहर, उससे भीतर भी कुछ बदलाव आना चाहिए। एक चीज़ बदल सके, उसके लिए उसके पास विकल्प तो होना चाहिए कि बदल के कोई दूसरी चीज़ बन सके। जब दूसरी चीज़ बनने की कोई संभावना ही नहीं है, तो बदल के जाओगे कहाँ पर? क्या करोगे? कुछ नहीं और हो ही नहीं सकते। कोई प्लान बी है ही नहीं भाई, तो अच्छा है, बुरा है, जो है, जैसा है, यही है। तो अब भीतर फिर सोच-विचार के लिए कोई स्थान बचता नहीं है न।
जब अहम् की जो मूल स्थिति है, उस पर विचार की ज़रूरत नहीं रह जाती, तब विचार अपना उपयोगी काम कर सकता है। नहीं तो फिर विचार इसी में लगा रहता है कि "हाय! मेरा क्या होगा?" ज़्यादातर लोग जो विचार करते हैं न, वो विचार बस यही होता है, "हाय! मेरा क्या होगा?"
जब आप इस शंका से, इस तकलीफ़, इस चिंता से मुक्त हो जाते हो कि "मेरा क्या होगा?" आप कहते हो, "मेरा जो होना था, हो चुका है।" जब आप इस चिंता से मुक्त हो जाते हो कि "मेरा क्या होगा?" तब आप सही चिंतन कर पाते हो। अब विचार अपना सही काम कर पाता है। नहीं तो हमारा विचार कोई विचार होता है? हमारे विचार में तो एक यही रोना लगा रहता है, "अब मैं क्या खा लूँ? मैं क्या पहन लूँ? अब मेरा क्या होगा? कल आफ़त आ गई तो बचूँगा कि नहीं बचूँगा? कहीं कोई नुकसान न हो जाए। कहीं से चार रुपये ज़्यादा कैसे झटक लाऊँ?" यही चलता रहता है।
ये कोई विचार है? भीतर से ऐसा हो जाना है कि ठोक-बजा के देख लिया, जाँच लिया, परख लिया। सौ राहें हैं ही नहीं, एक ही राह है और जो राह एक है, उस पर हम पहले ही चल रहे हैं। तो अब कुछ भी हो जाए, यहाँ से हटने का तो सवाल है नहीं। अगर प्राण भी जाने होंगे, तो वो इसी राह पर जाएँगे। दूसरी कोई राह हमें दिखाई नहीं देती न। समझ में आ रही है बात?
ये जो "दूसरी से मुक्ति" है, आज हमने कई बार बोला, इससे बड़ी राहत नहीं होती ज़िंदगी में। दूसरी राह हमें अब दिखाई नहीं देती। दूसरी राह दिखती है न, तो सारी ऊर्जा एकदम बंट जाती है। सारी ऊर्जा भीतर की तो पचास राहों को ही नापने-जोखने में चली जाती है, अभी ये राह दिख रही है, अभी वो राह दिख रही है, अभी ये कर लूँ, वो कर लूँ। फिर जो सही राह है, उस पर चलने के लिए ऊर्जा बचती नहीं है। जब बचती नहीं है, तो सही राह पर लड़खड़ाते हो। जब लड़खड़ाते हो, तो और ज़्यादा लगता है कि कोई दूसरी राह को न पकड़ लूँ। जितना दूसरी राह का ख़्याल करते हो, उतना और ज़्यादा लड़खड़ाते हो। सही राह पर भी अगर सफलता से आगे बढ़ना है, तो ज़रूरी है कि दूसरी राहें दिखाई देनी बंद हो जाएँ। दूसरी राहें दिखेंगी, तो मन बंटेगा। मन बंटेगा, तो लड़खड़ाओगे।
कल हम कह रहे थे ना एनआईटी जमशेदपुर वालों से, लिव फ़ॉर समथिंग यू कैन डाई फ़ॉर, यही है,
एक राह पकड़ ली, अब दूसरा हिसाब कुछ नहीं। इसी को हमने एक दिन कहा था कि यही संत कबीर की "सती" होती है।
वास्तव में पतिव्रता होना इसको ही बोलते हैं। एक पति पकड़ लिया, अब दूसरे का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। "पति" माने वो नहीं होता कि एक पुरुष मतलब नर, "पति" माने, एक स्वामी, एक मालिक। एक मालिक पकड़ लिया अब पचास मालिक थोड़ी ही करेंगे, अब हो गया। कोई दूसरी राह दिखाई नहीं देती, परगमन थोड़ी करेंगे। स्पष्ट है?
प्रश्नकर्ता: जी आचार्य जी, अभी मैं एक-दो दिन पहले मधुशाला पढ़ रहा था, तो उसमें भी ये लाइन आती है, "एक पकड़ तू राह चलाचल," कहाँ जाएगा मन?
आचार्य प्रशांत: नहीं,नहीं मधुशाला का उल्लेख नहीं होना चाहिए, जिस संदर्भ में हम बात कर रहे हैं। इसलिए नहीं कि उसमें मदिरालय की बात है, इसलिए कि वो एक कवि की कृति है और उसमें कहीं से भी वो गहराई नहीं है जो भगवद्गीता में, अष्टावक्र गीता में होती है। तो उसमें बस ऐसे तुक जोड़ने से कोई लाभ नहीं है।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।