भीतरी ताकत पैदा करके ही बाहरी लड़ाई में उतरना || आचार्य प्रशांत, बाइबिल पर (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बाइबिल में एक दृष्टान्त है, एक कहानी है, उससे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ।
“जीसस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया कि स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के समान है जिसने अपने खेत में अच्छे उपजाऊ बीज बोया। पर जब सभी लोग सो रहे थे तो उसका एक बैरी आकर गेहूँ के बीच जंगली बीज बोकर चला गया। जब अंकुर निकले और बालें लगीं, तो जंगली दाने भी दिखाई दिये। इस पर उस गृहस्थ के दासों ने आकर उससे कहा, हे स्वामी, क्या तूने अपने खेत में अच्छा बीज नहीं बोया था? तो फिर जंगली दाने के पौधे उसमें कहाँ से आ गये? उसने उनसे कहा, यह किसी बैरी का काम है।
दासों ने उनसे कहा, तेरी क्या इच्छा है कि हम जाकर इन जंगली बीजों को बटोर लें? तो उसने कहा, ‘ऐसा नहीं करो। जंगली दानों को उपजने दो। और जंगली दाने के पौधे बटोरते हुए यह हो सकता है कि तुम गलती से गेहूँ को भी उखाड़ लो। कटनी तक दोनों को एकसाथ बढ़ने दो और कटनी के समय मैं काटने वालों से कहूँगा कि पहले जंगली दानों के पौधे बटोरकर जलाने के लिए उन्हें गट्ठे में बाँध लें और फिर गेहूँ को मेरे खेत में इकट्ठा कर दें।”
आचार्य जी, प्रश्न यही है कि जो दुर्गुणी है, गलत है उसको उपजने का भी मौका क्यों दिया? जब अवसर था कि उसको बीज रूप में ही हटाया जा सकता है।
आचार्य प्रशांत: इसका उत्तर तो कहानी में ही निहित है। बात सिर्फ़ दुर्गुणों को हटाने की नहीं है। बात ये है कि तुम्हारे सद्गुण भी अभी कितने मज़बूत हैं भाई। दुर्गुणों को हटाने में जो उथल-पुथल होगी, क्या तुम्हारे सद्गुणों में इतनी गहराई है कि उस उथल-पुथल को झेल जाएँ? तो सुनने में ऐसा लगता है जैसे ये कहानी दुर्गुणों को तात्कालिक, आवधिक संरक्षण देने के बारे में है। लेकिन ये कहानी वास्तव में उन ज़हरीले पौधों या झाड़-झंखाड़ के बारे में नहीं है जो गेहूँ के साथ खेत में खड़े हो गये हैं। ये बात वास्तव में गेहूँ की ही है। गेहूँ है, वो जिस पर तुमको ध्यान केन्द्रित करना है। और दूसरे झाड़ हैं, वो जो उसके बगल में ही खड़े हैं जिस पर ध्यान केन्द्रित करना है।







