छोटी बच्ची का सवाल और बड़ा भ्रम

Acharya Prashant

10 min
55 reads
छोटी बच्ची का सवाल और बड़ा भ्रम
पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है। वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो। तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, *कॉन्शियस* होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: अगर हम मिट्टी के बने हैं, तो हम बोल कैसे सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: ये बेटा, अभी तुमने जो बोला, वो तो पीछे वालों को सुनाई भी नहीं दिया। मालूम है कौन बोला? माइक बोला। अब? माइक भी तो बोलता है न; रेडियो भी तो बोलता है न; मोबाइल भी तो बोलता है न; हवाएँ भी तो बोलती हैं न। तो वैसे ही हम भी बोल देते हैं। हमारे भी ये वोकल कॉर्ड है, वो हवाएँ ही बोल रही हैं।

वरना सोचो, अगर सिर्फ़ कोई ख़ास जीवित इंसान ही बोल सकता, तो तुम्हारी आवाज़ पीछे तक सुनाई ही नहीं देती। पीछे वालों ने तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनी है, उस माइक की आवाज़ सुनी है। माइक भी बोलता है।

तो जैसे माइक बोलता है, इनएनिमेट होकर भी, जड़ होकर भी, वैसे ही ये जो जड़ शरीर है, ये भी बोलता है। बोलने से यह सिद्ध नहीं हो जाता कि आप में जड़ता के अतिरिक्त भी कुछ है। रेडियो नहीं बोलता क्या? हम भी रेडियो हैं, बोल रहे हैं। रेडियो के पास अपना कुछ होता है बोलने के लिए? मोबाइल के पास अपना होता है कुछ बोलने के लिए? आप भी बताइए, आपके पास अपना क्या है बोलने के लिए? हम रेडियो से और मोबाइल से अलग कैसे हैं?

(ज़मीन पर पैर पटकते हैं), ये बोला कि नहीं बोला? तो इसका बोलना क्या था एक ? न्यूटन्स लॉ। क्या?

प्रश्नकर्ता: न्यूटन्स लॉ।

आचार्य प्रशांत: हाँ! इसका बोलना था रिएक्शन, मैंने किया एक्शन। तो रिएक्शन में ये बोल पड़ा न, देखो, बोल पड़ा। आपका बोलना भी रिएक्शन के अलावा कुछ होता है क्या? तो ये मिट्टी ही तो है जो बोल रही है। कैसे बोल रही है? प्रतिक्रिया करके, रिएक्शन करके। वैसे हम भी रिएक्शन करके कुछ-न-कुछ बोलते रहते हैं।

दो ही तरीकों से हम बोलते हैं और दोनों तरीके एक ही हैं, पर दो करके बता दे रहा हूँ। या तो प्रतिक्रिया में, या बेहोशी में। एक ही बात है, प्रतिक्रिया भी बेहोशी में ही करी जाती है। एक आदमी है, वो रात में खर्राटे ले रहा है। आवाज़ तो हो रही है न? बोल ही रहा है। तो क्या होश ज़रूरी है बोलने के लिए? लोग हैं जो स्लीप-वॉकिंग करते हैं। वो स्लीप-वॉकिंग में भी बोल ही रहे हैं। तो क्या होश ज़रूरी है बोलने के लिए?

और बाक़ी लोग हैं, वो प्रतिक्रिया में, रिएक्शन में बोल देते हैं। उनसे कुछ बोलो, पलट के जवाब दे देंगे। तो क्या होश ज़रूरी है प्रतिक्रिया करने के लिए? तो मिट्टी भी बोलती है, होश नहीं चाहिए।

आप यह बोलते हो न कि मिट्टी जड़ है, मैं चेतन हूँ। और इस आधार पर अपना अंतर करते हो और अपने आप को श्रेष्ठ मानते हो। कहते हो, ये सब तो इनएनिमेट है, मैं एनिमेट हूँ। ये इनसेंटिएंट है, मैं सेंटिएंट हूँ। यही तो बोलते हो। वो जड़ है, मैं जड़ नहीं हूँ। मैं कॉन्शियस हूँ, मैं चेतन हूँ।

बोलने के लिए कोई कॉन्शियसनेस नहीं चाहिए। देखो, ये (ज़मीन) बोल रहा है, कोई कॉन्शियसनेस चाहिए क्या? वैसे ही, आपको आगे अगर कोई गाली दे दे, तो आप भी बोल दोगे तुरंत। हुआ है कि किसी ने गाली दी और चुप रह गए हो? पानी होता है, पानी कोई आवाज़ कर रहा होता है? नहीं। पर पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है।

वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो।

तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, कॉन्शियस होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।

अगर आवाज़ सिर्फ़ तब हो सकती जब चेतना होती, चेतना माने बोध, अगर आवाज़ सिर्फ़ तब हो सकती जब चेतना होती, तो ये पूरी दुनिया गूँगों की होती। कोई बोल न पाता।

पर हर आदमी बोल पा रहा है, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि बोलने के लिए कॉन्शियस होना ज़रूरी नहीं है। (ज़मीन में पैर को पटकते हैं) लो, बोल दिया। सारे म्यूज़िक इंस्ट्रूमेंट्स बोल रहे हैं, ख़ुद भी बोल लेते हैं। जंगल चले जाओ, वहाँ सौ तरह की आवाज़ें हो रही होती हैं, जानवरों की नहीं, ऐसे भी। तो कोई वहाँ चेतना है क्या? है क्या चेतना?

आप वैज्ञानिकों से पूछेंगे, तो वो कहेंगे कि *आउटर स्पेस में भी तमाम तरीके की आवाज़ें हैं। बस वो आवाज़ें, जो आपका जो ऑडिबल स्पेक्ट्रम है, जो आपकी रेंज है, 20 हर्ट्ज़ से 20,000 हर्ट्ज़ तक, उसके बाहर की हैं, तो आपको सुनाई नहीं देतीं। नहीं तो आवाज़ें तो पूरे यूनिवर्स में हैं। आवाज़ें लगातार; कोई भी वेव है, आप उसको ले आ लिजिए, जो आपका जो ओरल रेंज है उसके भीतर आपको सुनाई दे जाएगी। जैसे कुत्ते होते हैं, आवाज़ें आपको नहीं सुनाई देतीं, कुत्तों को सुनाई दे जाती हैं।

हर तरफ़ आवाज़ ही आवाज़ हो रही है प्रकृति में। गति माने वाइब्रेशन। वाइब्रेशन माने आवाज़। हर तरफ़ आवाज़ ही आवाज़ है पूरे ब्रह्मांड में। तो क्या आवाज़ करने के लिए कॉन्शियस होना ज़रूरी है? बिल्कुल भी नहीं।

वैसे ही हम हैं। हम भी खूब आवाज़ें कर रहे हैं। हमारे ये वोकल कॉर्ड्स वाइब्रेट करते हैं। उससे हवा वाइब्रेट करती है। उससे आवाज़ हो जाती है। फिर ये इयर-ड्रम पर पड़ती है। इयर-ड्रम वाइब्रेट करता है। जब वो वाइब्रेट करता है, तो नर्व्स सिग्नल ले जाती हैं ब्रेन तक। और ब्रेन एक सेंसेशन पैदा करता है, जिसको हम कहते हैं हियरिंग। वो सब पूरा मैकेनिकल है। उसमें कॉन्शियसनेस की क्या ज़रूरत है?

हम बोल रहे हैं, हम साँस ले रहे हैं, हम चल रहे हैं, हम कुछ भी कर रहे हैं। उसमें चेतना कहीं नहीं है, हम जड़ ही हैं। और इसका मतलब नहीं है कि आप अगर आध्यात्मिक प्रगति करोगे, तो आप जड़ से चेतन हो जाओगे। आध्यात्मिक प्रगति करने का मतलब ये नहीं होता कि आप जड़ से चेतन हो गए। आध्यात्मिक प्रगति करने का मतलब होता है, आपने सिर झुका करके अपने आप को जड़ जान लिया।

(प्रश्नकर्ता को इंगित करते हुए) सब समझ में आ गया है तुमको? पूरी बात समझ में आ चुकी है। लेकिन तुम बिल्कुल परेशान नहीं होना, बेटा, क्योंकि जितना तुम्हें समझ में आया है, इन लोगों को उससे कुछ कमी समझ में आया है।

तुम तो कहीं नहीं जा रही। अभी बच्ची हो बड़ी होओगी, ये रिकॉर्डिंग भी कहीं नहीं जा रही। खूब सुनना। जब तुम बड़ी हो जाओगी, तो ये रिकॉर्डिंग तो रहेगी ही रहेगी। इसे कई बार सुनना। ठीक है? बात समझ में आएगी। इन सबसे ज़्यादा समझ में आएगी। इसीलिए तो मैं कैमरा लगा के रखता हूँ हमेशा, ताकि कई-कई बार सुन पाओ। आई, बात समझ में?

अब ऐसे पटको पाऊँ, पटको। आवाज़ हुई? हाँ, देखो, बोली ज़मीन, बोली। अब क्या करें? अच्छा, ऐसे करो (अपनी नाक में मारते हुए) करो। कुछ आवाज़ आई थोड़ी-सी? आई होगी। अच्छा, यहाँ कान में करो। ऐसे करो। कान बोला न! देखो, कान भी बोल रहा है। कान के पास तो मुँह नहीं है। कान के पास मुँह नहीं है, पर फिर भी कान बोल रहा है। देखो, आवाज़ कर रहा है।

आवाज़ करने के लिए, बोलने के लिए, कुछ नहीं चाहिए, कंपन चाहिए। मटेरियल कोलाइडिंग विद मटेरियल ऑर मटेरियल वाइब्रेटिंग थ्रू एनर्जी, आवाज़ हो जाएगी। आवाज़ माने ये मत मान लेना कि कोई है।

जब भारत में नया-नया ट्रांजिस्टर आया था; वो बड़े-बड़े होते थे, इतने बड़े और गाँव में रख दिया जाता था। पुराने देखे हैं जो इतने बड़े-बड़े होते थे, मर्फ़ी के या फिलिप्स के। गाँव में रख दिया, गाँव वाले डर के छुप जाते थे। बोलते थे, अगर ये बोल रहा है, तो इसके भीतर कोई है। और दिखाई तो दे नहीं रहा। इतने से में घुस गया, तो ज़रूर भूत-प्रेत, चुड़ैल, डायन कुछ है। जो दो-चार उसमें इंक़लाबी क़िस्म के होते थे, वो ऐसे लंबा घेरा ले के पीछे जाकर देखते थे कि पीछे कौन है इसमें, कोई तो होगा।

वही हालत हमारी है। सिर्फ़ इसलिए कि हम बोल रहे हैं, तो हमें लगता है कोई तो होगा। अध्यात्म ये जानने का नाम है, कि तुम बोल तो रहे हो पर भीतर कोई है नहीं। कोई नहीं है। जो भीतर कोई नहीं है उसको बुद्ध ने कहा, शून्यता। और भीतर कोई नहीं है, इसको जानने को वेदांत ने कहा, साक्षीत्व। समझ में आ रही है बात? पक्का है न? बस, ठीक है।

मुझे भी बड़ा दिल तुम लोग रख ही लेते हो। जैसे ही पूछता हूँ, सब लोग कहते हैं, “समझ में आ रही है बात?” बोलो, बेटा, समझ में आ रही है न? (प्रश्नकर्ता हाँ में सिर हिलाते हुए)। “देखा, आचार्य जी, नाज़ुक हैं उनका दिल टूटने ना पाए।” समझ में आ रही है ना बात? बोलो आ रही है। आ रही है।

जैसे मैं कह रहा था न कि हम अलग नहीं होते हैं, हम उम्र में भी अलग नहीं होते हैं। देखो, जो बच्ची कर रही है, वही आप भी करते हो। उसको बात समझ में आ रही है क्या? आ रही है क्या? और उसने क्या बोला? “बेटा, आ रही है न समझ बात?” (हाँ में सिर हिलाते हुए)। हाँ भाई, आ रही है न बात समझ में?

क्यों अपने आप को अलग मानते हो? श्रेष्ठ मानते हो?सब मिट्टी है, सब एक से हैं। मूल वृत्तियाँ, आदिम वृत्तियाँ एक-सी हैं। वो डरी हुई है। उसके लिए ये कोई सहज पल नहीं है। इधर भी बड़े लोग बैठे हैं। इतने सारे इधर भी बैठे हैं, हाथ में उसके वजन के बराबर माइक दे दिया है। और सामने एक खौफ़नाक आदमी खड़ा हुआ है, काले कपड़े पहन करके और पता नहीं क्या बोले जा रहा है।

डर बहुत पुरानी वृत्ति है। तो मैं उससे पूछ रहा हूँ, समझ में आ रही है बात? तो क्या बोल देती है? “बेटा, आ रही है बात समझ में।” वो “हाँ” भी बोल रही है। तो क्या वो बोल रही है? क्या “हाँ” बोलने के लिए भी चेतना चाहिए? क्या “ना” बोलने के लिए भी चेतना चाहिए? हमारी पूरी ज़िंदगी, कभी “हाँ” बोलते हैं, कभी “ना” बोलते हैं। उसमें चेतना, कॉन्शियसनेस जैसी थोड़ी कोई चीज़ होती है? है न, बेटा?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories