पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है। वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो। तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, *कॉन्शियस* होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: अगर हम मिट्टी के बने हैं, तो हम बोल कैसे सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ये बेटा, अभी तुमने जो बोला, वो तो पीछे वालों को सुनाई भी नहीं दिया। मालूम है कौन बोला? माइक बोला। अब? माइक भी तो बोलता है न; रेडियो भी तो बोलता है न; मोबाइल भी तो बोलता है न; हवाएँ भी तो बोलती हैं न। तो वैसे ही हम भी बोल देते हैं। हमारे भी ये वोकल कॉर्ड है, वो हवाएँ ही बोल रही हैं।
वरना सोचो, अगर सिर्फ़ कोई ख़ास जीवित इंसान ही बोल सकता, तो तुम्हारी आवाज़ पीछे तक सुनाई ही नहीं देती। पीछे वालों ने तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनी है, उस माइक की आवाज़ सुनी है। माइक भी बोलता है।
तो जैसे माइक बोलता है, इनएनिमेट होकर भी, जड़ होकर भी, वैसे ही ये जो जड़ शरीर है, ये भी बोलता है। बोलने से यह सिद्ध नहीं हो जाता कि आप में जड़ता के अतिरिक्त भी कुछ है।




