एक रुपया अपने ऊपर मत खर्च करो अगर तुम्हारी ज़िंदगी किसी बुलबुले की तरह है। पर ज़िंदगी को ही अगर मिशन बना सकते हो, तो तुमने अपने ऊपर नहीं, मिशन के ऊपर खर्च करा है। वही कन्वर्जेंस, तुम्हारी ज़िंदगी ऐसी हो जाए अगर कि तुम्हारे लिए है ही नहीं, तो फिर कर सकते हो अपने ऊपर खर्च। तुम्हारी ज़िंदगी अगर इसीलिए है कि तुम्हें व्यक्तिगत तौर पर रसास्वादन करना है, चाट-पकौड़े झाड़ने हैं, तो फिर लानत है कि तुम यहाँ बैठकर चाट उड़ा रहे हो और बगल में कोई भूखा मर रहा है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैंने अपने जीवन में गरीब और गरीबी, दोनों को काफ़ी करीब से देखा है। और फिर एक ऐसा भी समय आया कि काफ़ी पैसे भी देखे। लेकिन जब भी कुछ खर्च करने जाता हूँ, तो लगता है इतने में तो काफ़ी गरीबों के लिए एक महीने का राशन भी हो जाएगा। कोरोना टाइम में भी ये देखा कि हज़ार रुपए में एक-एक जो मेड या जो भी थे, वो लोग एक हज़ार रुपए में ही उनके महीने का पूरा राशन चल जाता।
तो हमेशा ये लगता है कि ये जो मैं खर्च कर रहा हूँ, इसमें से काफ़ी लोगों का भला हो सकता है। और वो खर्च करने में हमेशा एक अंदर से ये बार-बार क्वेश्चन आता है कि ये इतने का है, तो इस चीज़ से कैसे ओवरकम किया जाए? अब खर्च किस जगह कर रहे हैं, कहाँ कर रहे हैं; जब उच्च, जब एक मिशन के लिए खर्च करते हैं, तो वहाँ कभी सोचने में भी नहीं आता है। लेकिन जब अपने ऊपर भी कुछ खर्च करते हैं, तो उसमें बार-बार ये सवाल आने लगता है।
आचार्य प्रशांत: अपने ऊपर माने क्या?
प्रश्नकर्ता: अपने ऊपर जैसे किसी रेस्तराँ में खाना खाने गए।




