आपके फ़ैसले कौन ले रहा है?

Acharya Prashant

2 min
248 reads
आपके फ़ैसले कौन ले रहा है?
अध्यात्म यह नहीं सिखाता कि बाहरी प्रभावों से बचो, बल्कि यह सिखाता है कि उनके दास मत बनो। जानकारी, विचार और अनुभव बाहर से ही आते हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनके आधार पर निर्णय लेने का अधिकार आपके विवेक का है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब जीवन बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने विवेक से संचालित हो। मन बाहरी प्रभावों पर आश्रित हो सकता है, लेकिन आप केवल मन नहीं हैं । यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: जो भी विचार आते हैं इस मन में, वो आते तो बाहर से ही हैं। कोई-न-कोई बाहरी प्रभाव होता है, जिसके फलस्वरूप मन में कोई विचार उठता है। कोई भी विचार पूर्णतया आंतरिक तो हो नहीं सकता। विचार का स्रोत कुछ-न-कुछ बाहर हो रहा है, वहीं पर है। तो करें क्या? यह तो मन का एक नियम ही है।

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल ठीक, मन का बिल्कुल यही नियम है कि वो पूर्णतया बाहरी पर आश्रित है। मन का नियम बिल्कुल यही है कि उसका अपना कुछ नहीं। वो जो पाता है, बाहर से ही पाता है। लेकिन, विनीत, तुमसे यह किसने कह दिया कि तुम मात्र मन हो? तुमसे ये किसने कह दिया कि मन के अलावा तुम्हारा और कोई अस्तित्व नहीं?

मन निश्चित रूप से ग़ुलाम है। जो भी तुम देखोगे, वो बाहर से आएगा। जो भी तुम सुनोगे, वो बाहर से आएगा। जो भी जानकारी तुम एकत्रित करोगे, वो भी बाहर से आएगी। पर उस सबको समझने की क्षमता भी क्या बाहर से आएगी? ना। वो पूर्णतया तुम्हारी है, अत्यंतिक है, आंतरिक है, और वही तुम हो।

प्रभाव बाहरी ही होंगे, पर तुम बाहरी नहीं हो। प्रभावों को आने दो बाहर से, पर तुम ख़ुद को तो बाहर से मत लाओ।

बात समझ में आ रही है?

जानकारी बाहर से ही आएगी। पर हम सिर्फ़ जानकारी बाहर से नहीं लेते, हम निर्णय भी बाहर से ही ले लेते हैं। हमें इन्फ़ॉर्मेशन और डिसीज़न का अंतर नहीं पता, ठीक-ठीक। जानकारी बाहर से लेने में कोई बुराई नहीं, क्योंकि जानकारी बाहर से ही आ सकती है। पर हमारे जीवन के निर्णय क्यों बाहर से आ रहे हैं? वो निर्णय हमारे अपने विवेक से क्यों नहीं निकल रहे? बात समझ में आ रही है?

आने दो सारी जानकारी बाहर से, पर उस जानकारी के मालिक तुम हो। वो जानकारी ही तुम्हारे ऊपर चढ़ के नहीं बैठ सकती। ये विचार, जो बाहर से आ रहे हैं, तुम्हारे मालिक नहीं बन सकते। इन विचारों को भी जानने की क्षमता तुम में है। ठीक है? और वही सबसे महत्त्वपूर्ण है, वही केंद्रीय है। उसको मत खो देना।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories