सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: मैं एक सुशील बहू थी और अब लोग ख़ुश नहीं हैं मुझसे।
आचार्य प्रशांत: उनका बिहेवियर इसलिए चेंज हो रहा है क्योंकि आपके पास ताकत नहीं है। और अगर चाहते हो कि दुनिया तुमसे एक प्रकार से व्यवहार करे तो उसका तरीका तो... दुनिया दो ही चीज़ों पर चलती है, जूता और पैसा।
प्रश्नकर्ता: मैं जहाँ रहती हूँ वहाँ पर देखती हूँ कि हर किसी को सब कुछ दिखता है लेकिन डिसऑनेस्ट है बहुत ज़्यादा।
प्रश्नकर्ता: आपकी बातें भी उन तक पहुँचाती हूँ तो सर वो अपने आप को बहुत होल्ड बैक करते हैं।
आचार्य प्रशांत: यह है समस्या।




