सुंदर और मज़बूत रिश्ते कैसे बनाएँ?

Acharya Prashant

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सुंदर और मज़बूत रिश्ते कैसे बनाएँ?
रिश्ते प्राथमिक नहीं होते, इंसान प्राथमिक होता है। जो अपने लिए ही अच्छा नहीं, वो किसी और के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता, भले ही वह कितनी भी कसमें-वादे कर ले। अच्छा रिश्ता सस्ती चीज़ नहीं है, वो उन्हीं को मिलता है, जिन्होंने पहले ख़ुद पर मेहनत की हो। जिसमें अपने अंधेरे और भीतर की पशुता का सामना करने का साहस है, वही ख़ुद और दूसरों के साथ स्वस्थ रिश्ता बना सकता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: हमारा अब जो टॉपिक है, जिसके बारे में हम प्रशांत जी से बात करने की कोशिश करेंगे, वो ये कि युवा अपने संबंधों को लेकर आज किस मानसिकता से आगे बढ़ता है, उनमें इंडल्ज होता है। अभी हाल ही का उदाहरण देख लीजिए। अभी मेरठ का एक केस सामने आया था, जिसमें एक महिला ने, एक पत्नी ने अपने पति की हत्या कर दी, अपने प्रेमी के साथ मिलकर। उसे इस बात का कोई ग़म नहीं। वो हत्या करने के बाद घूमने गई उसके साथ जगह-जगह, शहर-शहर घूमी। लौट कर आई, बड़े आराम से, बिना किसी स्ट्रेस के, बिना किसी रिमोर्स के उसने सबका सामना किया।

और अब सवाल इस बात पर उठ रहा है कि आज के रिश्ते महिला और पुरुष के बीच में, या हमारे युवा जो है जैसे रिलेशनशिप में जाते हैं, वो किस सोच के साथ उन रिश्तों में आगे बढ़ते हैं?

आचार्य प्रशांत: नहीं सोच कुछ नहीं होती, हार्मोन्स होते हैं। असल में समस्या सारी ये है कि हम भी ध्यान तब देते हैं और शोर तब मचाते हैं, जब किसी बेचारे की हत्या ही हो जाती है। जब खून बह जाता है ना, सिर्फ़ तब हमें लगता है कि कुछ बुरा हो गया।

जिस शादी में पत्नी अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति को मार रही है, जब वो शादी हुई थी तब हम में से किसी ने गौर नहीं किया कि शायद ये शादी ही गड़बड़ है। उस शादी से पहले अगर उनका कोई और रिश्ता चला था, तब हम में से किसी ने गौर नहीं किया कि शायद उस रिश्ते का जो भी प्रेम-प्रसंग पहले रहा होगा शादी से पहले अगर था, तो उस प्रेम-प्रसंग का भी आधार गड़बड़ है। ये हमने कभी नोट नहीं किया।

प्रश्नकर्ता: आचार्य प्रशांत जी, देखिए ये तो एक केस है जो सबके सामने आया है। पर पर्सनल लेवल पर आप भी कई लोगों से मिलते होंगे, कई लोगों को जानते होंगे। और कहा जाता है कि करीब 60% रिश्ते जो हैं, वो ऐसे हैं, जिसमें दोनों व्यक्ति खुश नहीं हैं, मगर बंधन में बंध गए हैं। तो उन्हें समझ में आ रहा है, कि अब ये क्या हो गया।

पर रिश्ते में जाने से पहले क्या सोच होनी चाहिए?

आचार्य प्रशांत: आपको बुरा तभी लगता है, दुख तभी उठता है, जब आप बंध चुके होते हो। और कई बार मामला इतना आगे आ चुका होता है, कि अब पलटा नहीं जा सकता है, इररिवर्सिबल हो जाता है। तो इसीलिए हम बात का संज्ञान, कॉग्निज़ेन्स ही बहुत देर से लेते हैं, पहले तो ये समझना ज़रूरी है। फिर यही रह जाता है, “अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।” और महिलाएँ ख़ास तौर पर, आप तो समझेंगी, आप एक रिश्ते में आ गए हो और वहाँ बच्चे भी पैदा हो गए हैं। अब कैसे रिवर्स करोगे, क्या करोगे?

आपको पहले तो ये देखना होगा कि आप जवानी में एक रिश्ता बनाने जा रहे हो, कुछ आप जानते भी हो अपने बारे में, ज़िंदगी के बारे में? या बस दो ताक़तें आपके ऊपर काम कर रही हैं — एक शारीरिक हार्मोनल, और एक सामाजिक माने फिल्मी, परंपरागत। जहाँ आपको बता दिया गया है कि ज़िंदगी में एक विपरीत लिंगी तो होना ही चाहिए, लड़की या लड़का होना चाहिए और वो होगा तभी तुम्हारी ज़िंदगी सार्थक मानी जाएगी। और इतने साल के हो गए, तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए — सामाजिक बातें। तो आप बस शरीर और समाज के गुलाम बन करके किसी इंसान को ज़िंदगी में ला रहे हो, या आप कुछ जानते-समझते हो अपने बारे में?

अब जानने-समझने की तो बात ऐसी है, कि हमें यही नहीं पता कि अपने लिए एक शर्ट का चुनाव कैसे करें। हमें यही नहीं पता, कि टीवी पर कौन सा शो देखना है। हमें यही नहीं पता, कि राजनीति में आपने नेता कौन सा चुनना है। अपने लिए बाइक कौन सी चुननी है, गाड़ी कौन सी चुननी है, किस जगह पर जाकर के रहना है, कौन सी किताब चुननी है पढ़ने के लिए, हम कुछ नहीं जानते। हम 22 साल के हैं, हम 25 साल के हैं, कई बार तो हम बस 15 साल के होते हैं और हम तभी कह देते हैं कि हम रिश्ता बनाने चले जा रहे हैं।

तो ये जो आत्म-अज्ञान है ना, ख़ुद को बिल्कुल नहीं जानना; उसके बावजूद बड़े आत्मविश्वास के साथ जाकर के फ़ैसले कर लेना, रिश्ते बना लेना, और बिल्कुल इररिवर्सिबल फ़ैसले भी कर लेना — करियर चुन लेना, पार्टनर चुन लेना, ये जो चीज़ें होती हैं बहुत घातक होती हैं। और यही चीज़, कभी तो देखिए हत्या वग़ैरह हो गई, चाहे वो पत्नी द्वारा पति की हत्या हो या इतनी दहेज हत्याएँ होती हैं, वो हो। हत्या हो गई तो सुर्खियों में आ जाती है।

हत्या हमेशा हो ज़रूरी नहीं होता। लेकिन गलत निर्णय आपने ले लिया, तो आपको उसको ढोना पड़ता है बहुत लंबे समय तक। और बाहर-बाहर से लोगों को यही लगेगा कि चल रहा है, ठीक है। कोई नौकरी पकड़ ली है, कोई इंडस्ट्री, कोई फ़ील्ड पकड़ लिया है और ये उसमें जॉब कर रहे हैं, ठीक ही है, सैलरी मिल रही है। या कि पत्नी कोई पकड़ ली है, पति पकड़ लिया है, देखो दो-तीन बच्चे भी हो गए हैं, सब चल रहा है ठीक ही है।

जो चल रहा है, वो ठीक ही नहीं है, वो भी एक प्रकार की आत्महत्या ही है। भीतर से ख़ुद को बर्बाद करना, उसको आत्मघात क्यों न मानें। और भीतर से ख़ुद को बर्बाद करने में गलत तरीक़े के रिश्तों का सबसे बड़ा योगदान होता है। और रिश्ते में बस यही नहीं आता कि इंसान से रिश्ता — आपका अपने काम से रिश्ता, आपका अपने घर से रिश्ता, आपका अपनी जगह से, देश से रिश्ता, राजनीति से रिश्ता, धर्म से रिश्ता, ये सब। कोई भी रिश्ता बनाने वाले हम ही होते हैं। तो इसीलिए कोई भी रिश्ता बनाने से पहले साफ़-साफ़ पूछना पड़ेगा, “इस रिश्ते से मैं चाह क्या रहा हूँ? और क्यों चाह रहा हूँ? और जो चाह रहा हूँ, वो इस रिश्ते से मिलना संभव भी है क्या, किसी भी हालत में?” तो ये चीज़ रिश्ते की शुरुआत में ही स्पष्ट हो जानी चाहिए।

मान लीजिए, नहीं स्पष्ट हुई, हम में से परफेक्ट तो कोई भी नहीं होता। मान लीजिए, भूल हो ही गई। जब भूल हो ही गई तो लगातार रियैलिटी चेक करते रहते हैं। आपकी गाड़ी होती है आप ख़रीद लेते हो, उसके बाद भी डैशबोर्ड में आ जाता है न, टायर में हवा कम है, टेम्परेचर बढ़ रहा है। कितने ही सारे और इंडिकेटरस होते हैं जो बता देते हैं कि ये गलत है, वो गलत है, एग्जॉस्ट में प्रॉब्लम है, इंजन में प्रॉब्लम है, कैमरा में प्रॉब्लम है, सब बता देते हैं वो। तो वैसे ही अगर आपने शादी भी कर ली है, तो ये क्यों मान रहे हैं कि अब हमेशा के लिए कुछ ऐसा है जो बिल्कुल अब सुचारू ही चलेगा, जन्म-जन्म का बंधन है।

भाई, दो इंसान हैं, दोनों की अपनी-अपनी ज़िंदगी है, दोनों की अपनी-अपनी चेतना है, देखते भी तो रहो कि ये रिश्ता जा किस दिशा में रहा है। देखते भी तो रहो, कहीं ऐसा तो नहीं तुमने अपनी उम्मीदों के लिए उसको पकड़ लिया, उसने अपनी उम्मीदों के लिए तुम्हें पकड़ लिया। और उम्मीदें पूरी न वो कर सकता है, न तुम कर सकते हो, और दिखे कि ये आपस में ऐसी उम्मीदें पूरी नहीं हो रही हैं तो फिर साफ़-साफ़ बातचीत करो कि “भाई, ये मामला अटक रहा है यहाँ पर।”

प्रश्नकर्ता: मगर जब हम किसी भी रिश्ते में एंटर करते हैं, तो यही सोच कर करते हैं कि ये हमारे आने वाले कल को सुगम बनाएगा, सुचारू चलेगा। इसी होप के साथ कोई भी एक रिलेशनशिप के अंदर जाता है।

आपने बताया कि अगर वो सही नहीं चल रहा, तो उसकी सर्विसिंग होनी चाहिए, जैसे किसी भी कार की होती है या किसी भी ऑटोमोबिल की होती है। अब उस सर्विसिंग के जो पॉइंट्स होंगे, वो कौन से होने चाहिए? आप किन बातों पर लगातार गहन करें कि आपका रिश्ता जो है, सुचारू चलता रहे?

आचार्य प्रशांत: उम्मीद और डर। दूसरे वाले को आप कितनी अपनी उम्मीदों में बाँधना चाहते हो; कितना ज़्यादा आप चाहते हो कि वो आपके हिसाब से अपनी ज़िंदगी जिए। कितना ज़्यादा आप उम्मीदों के कारण उस पर आश्रित होते जा रहे हो क्योंकि आप जिससे जितनी ज़्यादा उम्मीद रख रहे हो न, आप उस पर उतने डिपेंडेंट हो रहे हो, आश्रित हो रहे हो। और आप जिस पर आश्रित होते जाते हो, कभी आप उसको खुला नहीं छोड़ सकते। उसको आप स्वतंत्र जीने नहीं दोगे।

ये माइक है, ये अभी मेरे बड़े उपयोग का है। देखिए, मैंने कैसे इसको ऐसे पकड़ रखा है, आपने भी पकड़ रखा है। अब माइक अगर इंसान होता और माइक कहता, "भाई मुझे जाने दो बाहर, मुझे पानी पीना है, मुझे टॉयलेट जाना है।" तो हम छोड़ थोड़ी देते उसको, हम कहते, "अभी तू मेरा काम कर।" रिश्ते भी हमारे ऐसे ही हो जाते हैं, हम ऐसे पकड़ के रखते हैं। और ये प्रेम की पकड़ नहीं है — ये आश्रयता, डिपेंडेंसी की पकड़ है, ये स्वार्थ की पकड़ है। डिपेंडेंसी एंड सेल्फ-इंटरस्ट।

“उससे जो मैं रिश्ता बना रहा हूँ, कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं उससे कुछ पाने के लिए उस पर डिपेंडेंट हो गया हूँ।” और ये होते ही फिर एक फियर, भय उठता है कि अगर वो चला गया, तो मेरा क्या होगा? ये इसलिए नहीं कि उससे मुझे बहुत प्यार है। इसलिए नहीं कि अगर वो चला गया, तो उसका नुकसान हो जाएगा। इसलिए कि अगर वो चला गया, तो मेरे स्वार्थों की पूर्ति कौन करेगा फिर।

प्रश्नकर्ता: पर आपने हमारी कॉन्वर्सेशन की शुरुआत में ये बात कही थी, कि जब भी हम किसी रिश्ते में बँधने जाएँ, चाहे वो हमारा किसी मनुष्य के साथ हो, चाहे वो हमारा नौकरी के साथ हो, चाहे वो किसी भी तरह का संबंध हो। उसमें हम सबसे पहले सवाल ये पूछें कि, “मुझे इससे चाहिए क्या?”

अब अगर हम किसी चाहत के साथ ही किसी रिश्ते में एंटर करते हैं, तो फिर एक्सपेक्टेशंस तो मैंडेटरी हैं। आपके दिमाग़ में, आपके मन में, आपकी इच्छाओं में वो चाहत होगी कि पूरी हो।

आचार्य प्रशांत: आपको उससे चाहिए क्या, मैंने कहा और साथ ही साथ कहा कि, ये भी तो देख लो कि जो तुम चाह रहे हो, पूरा कर भी सकता है कि नहीं।

बृहदारण्यक उपनिषद् है, ऋषि याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से कहते हैं कि — "सुनो मैत्रेयी, साफ़ जान लो कि पत्नी पति से यदि प्रेम करती दिखती है तो पति की खातिर नहीं, अपने खातिर।"

तुम्हें चाहिए क्या, सचमुच उससे? आपको जो लगता है न, आप सोचते हो, "मुझे एक इंसान चाहिए," इंसान नहीं चाहिए। आपके भीतर एक छिपी हुई, दबी, गहरी अपूर्णता है, जो आप उससे पूरा करना चाहते हो। और कोई भी इंसान वो चीज़ किसी दूसरे इंसान को देने के लायक, क़ाबिल होता ही नहीं है। पर हम उम्मीद कर लेते हैं और कल्पना कर लेते हैं कि ये इंसान मेरी ज़िंदगी में आ गया, तो मेरे भीतर जो एक लंबी छटपटाहट है, बेचैनी है, ये उसका इलाज कर देगा। वो उसका इलाज नहीं कर सकता।

तुमने उम्मीद पाल ली है और आत्मज्ञान है नहीं, तुमने कभी अपने भीतर झांक कर देखा नहीं, तो तुम्हें पता भी नहीं कि तुम भले ही सोच रहे हो, कि ये इंसान ज़िंदगी में आएगा तो ये होगा, वो होगा, पर वास्तव में तुम किसी भी इंसान से जो चाह रहे हो वो है – भीतर की बेचैनी का इलाज। और तुम्हारे भीतर की बेचैनी का इलाज वो इंसान कर ही नहीं सकता है।

इतना ही नहीं, तुमने एक गलती और करी है, तुमने उस इंसान से साफ़-साफ़ बोला भी नहीं है कि तुम मुझसे क्या चाह रहे हो। जो कोर्टशिप पीरियड होता है, जब प्रेम प्रसंग चलता है तो तुमने सिर्फ़ ऊपरी-ऊपरी, गुलाबी, फ़्लफी बातें करी हैं। तुमने कभी कोई गहरी बात करी ही नहीं है।

तुम्हारी जो सारी बात है, वो बस वही चॉकलेट और टेडी बियर के तल पर रह गई है। तुमने कभी उससे जाकर के कोई हार्दिक, आत्मिक बात करी नहीं है और क्यों नहीं करी है, उसमें भी स्वार्थ है। क्योंकि अगर असली बात कर दी उससे और सब कुछ जो उससे चाह रहे हो, उसके सामने उड़ेल कर रख दिया, तो रिश्ता ही टूट जाएगा। क्योंकि वो इंसान कहेगा "तुम इस-इस चीज़ के लिए मुझे ज़िंदगी में ला रहे हो।" और आपको जो पता होता है, जो आपके अपने इरादे होते हैं, कोई बहुत अच्छे तो होते नहीं हैं दूसरे से। ठीक है न?

जब मामला ही हार्मोनल है, तो तुम और किस चीज़ के लिए दूसरे के पास गए हो? ऊपर-ऊपर से मुस्कुरा रहे हो, सभ्य-सुसंस्कृत बन रहे हो, लेकिन जो इरादा है वो तो पाशविक है, वैहशी है, और वो कभी बोलोगे नहीं। सामने वाला भी हो सकता है, वैसे ही इरादे रखे हुए बैठा हो, पर वो भी कभी बोलेगा ही नहीं। तो ईमानदारी की बहुत ज़रूरत होती है, कि जो चाह रहे हो सामने रख दो। पहली बात, इससे बात साफ़ हो जाती है। दूसरी बात, तुम्हें भी ये देखने का मौका मिल जाता है कि ये सब हो भी गया तो क्या होगा। लेकिन इन सबसे ज़्यादा ज़रूरी ये है, अपने आप से पूछना कि इंसान चाहे पति/पत्नी, प्रेमी की तलाश में हो, चाहे पैसे की तलाश में हो, प्रतिष्ठा की तलाश में हो, जिस भी चीज़ की तलाश में आदमी भटकता है, वो चीज़ जिनके पास है भी, क्या वो भटक नहीं रहे हैं?

तो सचमुच तुम्हारा जो भटकाव है, वो किस चीज़ के लिए है, ये जानना ज़रूरी है। पैसा निःसंदेह ज़िंदगी में चाहिए, एक सीमा तक उसकी उपयोगिता है, एक तल पर उसकी उपयोगिता है। पर तुम्हारे भीतर जो बेचैनी और खोखलापन बैठा है, क्या दुनिया भर का पैसा भी उसको भर पाएगा? ये पूछना ज़रूरी है।

ठीक है, इंसान हम सबको चाहिए, कंपैनियनशिप, संगति चाहिए होती है और आप जवान होते हो, सेक्शुअल नीड्स भी होती हैं, वो ठीक है। उसके लिए किसी को आदमी/औरत की ज़रूरत है, वो सब ठीक है।

लेकिन ये पूछना भी ज़रूरी है, कि वो इंसान ज़िंदगी में आ गया, तो भी जो यहाँ (अपने हृदय की ओर इंगित करते हुए)हौलो बैठा रखा है मैंने, और जो एक अव्यक्त छटपटाहट है, क्या ये इंसान उसको भर भी पाएगा? ये अपनी तो ठीक कर नहीं पाया, ज़िंदगी, क्या मेरी ठीक कर पाएगा? पर हम सब यही सोचते हैं कि, अमुक आदमी मेरी ज़िंदगी में आ गया तो बिल्कुल चाँद-तारे बिखर जाएँगे, और गुलाबी फ़िज़ा होगी, इंद्रधनुष वाली। उसकी अपनी ज़िंदगी कैसी है? क्या वो अपना कल्याण कर पाया है? क्या वो अपने लिए भी अच्छा हो पाया है? जब वो अपने लिए अच्छा नहीं हो पाया, तो हमारे लिए क्या अच्छा होगा।

प्रश्नकर्ता: तो बेसिकली किसी भी रिश्ते में एंटर करने से पहले एक एनालिसिस, कि ये व्यक्ति मुझे क्या दे सकता है। साथ ही मुझे किस चीज़ की ज़रूरत है, और क्या सामान्य बातें हैं जिनके परे होकर मुझे किसी भी तरह की संतुष्टि मिलेगी। सामान्य बातें वो ये, कि मेरी सेक्स की चाहत, मुझे प्रेम की चाहत, मुझे कंपनी की चाहत। उसके अलावा, मुझे ये क्या देगा? क्या मुझे इस रिश्ते से प्राप्त होगा? एनालिसिस ऑफ़ दिस।

आचार्य प्रशांत: ये कुंडली देखने जैसी बात नहीं है, कि सिर्फ़ रिश्ते से पहले करनी है, ये एक जीने का तरीक़ा है। अगर मैं आमतौर पर सजग नहीं हूँ अपने प्रति, तो सिर्फ़ रिश्ता बनाने के मौके पर सजग नहीं हो पाऊँगा। ये ऐसी चीज़ नहीं है कि "डू दिस एट दिस टाइम" कि अब आप एक रिलेशनशिप में जाने वाले हो, तो सेल्फ ऑब्जर्वेशन कर लो बैठकर के। ऐसे नहीं हो पाएगा। सेल्फ ऑब्जर्वेशन एक वे ऑफ लाइफ़ है, जीने का तरीक़ा है। या तो आप उसमें जी रहे हो, उसके साथ हो, उसका आपने लगातार अभ्यास किया है। आपका प्रेम बन गया है स्वयं को जानना, तब तो रिश्ते में भी ये संभव हो पाएगा। नहीं तो अगर आपने पूरी ज़िंदगी ही बेहोशी में बिताई है, आपका पूरा अभ्यास ही ऐसा रहा है कि जिधर को भीड़ जा रही है, और जिधर को शरीर जा रहा है, पीछे-पीछे मैं भी चल दूँ। अगर आपने पूरा अभ्यास ही यही किया है, तो रिश्ते में भी आपके यही हो के रहेगा और रिश्ते के मौके पर आप कुछ अलग नहीं हो जाओगे।

प्रश्नकर्ता: तो एक अच्छा रिश्ता किस आधार पर होना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: एक अच्छा इंसान पहले बनना पड़ेगा, अच्छा इंसान नहीं है तो अच्छा रिश्ता कहाँ से आ जाएगा। अच्छा रिश्ता सस्ती चीज़ नहीं होता। वो उनको ही उपलब्ध होता है, जिन्होंने सबसे पहले अपने ऊपर मेहनत करी होती है और अच्छे इंसान बने होते हैं।

हमको क्या लगता है, कि हमारी उम्र हो गई है तो हमें प्रेम मिल जाएगा। प्रेम उम्र से नहीं मिलता है। प्रेम बहुत मेहनत से, अभ्यास से, ज्ञान से मिलता है।

प्रेम ऐसी चीज़ नहीं होती है कि, "आई टू हैव फॉलन इन लव।" वो सिर्फ़ एक हार्मोनल कलाबाज़ी होती है, और वो जानवरों में भी होती है। बस जानवर इतने बेईमान नहीं होते कि बोलें कि, "प्यार हो गया है।"

आपको पहले ख़ुद को देखना पड़ेगा, और ये जो ख़ुद को देखने वाली बात है, ये और प्यार बहुत क़रीब की चीज़ें हैं। अपनी ज़िंदगी में झाँकने की हिम्मत रखना, साफ़-साफ़ देख पाना और प्यार, इश्क़, आशिक़ी, ये बहुत क़रीब की बातें हैं। किसी ऐसे इंसान के साथ मत जुड़िए, जिसको आप पाएँ कि वो अपनी निजी ज़िंदगी में ही बहुत बिखरा हुआ है। जो अपने ही विचारों और भावनाओं के प्रति बहुत अंधेरे में है। जो जानता ही नहीं कि उसकी इम्पल्सेस, इंस्टिंक्ट्स कहाँ से आ रही हैं। जिसको पता ही नहीं कि उसके थॉट्स हैं, उनका बेसिस क्या है। क्यों उसने कोई बात सोचनी शुरू कर दी है। जो इंसान अपने लिए ही अच्छा नहीं है, वो किसी और के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता, भले ही वो कितनी भी कसमें-वादे उठा ले। वो खूब कह ले, गाना सुना दे, दिखने में हैंडसम हो सकता है, प्रिटी हो सकता है, लेकिन वो किसी के लिए अच्छा नहीं हो सकता।

अच्छा तो अपने लिए भी और दूसरे के लिए भी वही होगा, जिसमें अपने अंधेरे और अपने कचरे का सामना करने का साहस रहा है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य प्रशांत जी, हम आईक्यू (इंटेलिजेंस कोशेंट) की बात करते हैं। मुझे आपसे समझना है, कि एक इमोशनल आईक्यू होना एक व्यक्ति में कितना ज़रूरी है। अगर इमोशनल आईक्यू, जो है, उसके बारे में हम पढ़ें, उसके बारे में हम समझें, तो क्या हमारा जीवन किसी लेवल पर संपूर्ण है, महसूस हो सकता है?

आचार्य प्रशांत: देखिए, जिसको हम ईक्यू बोलते हैं (इमोशनल कोशेंट) या जिसको हम एसक्यू (स्पिरिचुअल कोशेंट) बोलते हैं, ये दोनों एक ही बातें हैं। आईक्यू में हम कुछ ऐसा परख लेते हैं, जिसका संबंध टैलेंट से है ज़्यादा।

प्रश्नकर्ता: नॉलेज से है।

आचार्य प्रशांत: आईक्यू में नॉलेज भी नहीं उतना परखा जाता। आईक्यू इज़ मोर अबाउट योर बेसिक शार्पनेस, सेरीब्रल शार्पनेस। लेकिन ईक्यू और एसक्यू मूलतः एक ही बातें हैं। ये प्रतिभा, टैलेंट की बातें नहीं हैं, ये फैसले की बातें हैं। टैलेंट ऐसी चीज़ नहीं है जो आपको फैसले से मिलता है, टैलेंट तो जन्मजात होता है।

ईक्यू क्या है?

ईक्यू है, ये फ़ैसला कर पाना, ये हिम्मत दिखा पाना कि मैं अपने इमोशंस, अपनी भावनाओं के प्रवाह में बह नहीं जाऊँगा। मैं जानना चाहता हूँ, कि मेरा इमोशन आ कहाँ से रहा है। अपने इमोशन को देख पाना ही इमोशनल कोशेंट है। जो जितना ज़्यादा देख पाता है, निष्पक्ष होकर, तटस्थ होकर देख पाता है, आप कह सकते हैं उसका ईक्यू उतना ज़्यादा है।

तो दो तरह के लोग हुए – एक, जिनको इमोशन उठा, उससे पहले फीलिंग, वो फिर इमोशन बनी, तो उनको ही आवेग उठा भीतरी। ठीक है? उससे पहले थॉट, और ये सब हो रहा है, और वो कह रहे हैं "ये तो मेरा थॉट है, मेरी फीलिंग है, मेरा इमोशन है, और चूँकि ये मेरा है, इसीलिए मैं इसके अनुसार काम करूँगा।" ये एक तरह के लोग होते हैं।

तो ये जो ईक्यू की स्केल होगी, उसका एक एंड ये हो गया। कि भाई, मुझे ग़ुस्सा आ रहा है, तो मुझे ग़ुस्सा आ रहा है न! ठीक है, मुझे ग़ुस्सा आ रहा है तो मैं किसी को थप्पड़ मार दूँगा। या कि मुझे कोई चीज़ अच्छी लग रही है, तो लग रही है न! मेरी लाइक्स-डिसलाइक्स हैं, मेरी पसंद-नापसंद है, मैं पसंद करता हूँ, करती हूँ, बस हो गया दैट्स इट! मैं जवाबदेह नहीं हूँ कि मुझे कोई चीज़ क्यों अच्छी लगती है, बुरी लगती है। ये वो वाला एंड है, ये कंप्लीट इग्नोरेंस का एंड है, जहाँ आपको पता भी नहीं है कि आपको कुछ पसंद है तो क्यों पसंद है। कुछ नापसंद है तो क्यों नापसंद है, और इतना क्यों नापसंद है कि ग़ुस्सा ही आ जाता है।

आपको कुछ नहीं पता है। आपको नहीं पता है कि किसी को देखते ही आपको क्यों लग गया "ये अच्छा आदमी है!" आपको बस लग गया, आप बोलते हो "गट फीलिंग है, इन्ट्यूशन है।" और आपको पता भी नहीं वो गट फीलिंग, इन्ट्यूशन आ कहाँ से रही है। ठीक है? ये समझ लीजिए, ज़ीरो ईक्यू का एंड हो गया।

और हाई ईक्यू, जब आप दूसरे एंड की तरफ़ जाते हैं, वो होता है जहाँ आप कहते हो "नहीं-नहीं भाई, एक आवाज़ मुझे अगर अच्छी लग रही है, तो उसके पीछे कोई कारण है, और वो कारण कोई बहुत गहरा आत्मिक कारण नहीं है, कारण संस्कारगत है, कंडीशंड कारण है। मैं ऐसे माहौल में रहा हूँ बचपन से, जहाँ ऐसी आवाज़ों को मुझसे कहा गया कि अच्छी हैं। तो आगे चलकर के उनसे मिलती-जुलती आवाज़ें मुझे कहीं भी सुनाई देती हैं, तो मुझे लगता है, यहाँ कुछ अच्छा ही हो रहा होगा।

मैं कहता हूँ, मेरा फेवरेट स्पोर्ट क्रिकेट है, क्रिकेट के लिए जान दे सकता हूँ, मैं इतना ज़्यादा पैशनेट हूँ। मुझे पता भी नहीं, मेरा वो पैशन आ कहाँ से रहा है। आप अर्जेंटीना में पैदा हुए होते तो, ये पैशन थोड़ी आ जाता। पर आप सोचते हो, ये पैशन आपका है। वो आपका नहीं है, वो स्थितिगत है, संयोगगत है, वो रैंडम है।

और सारी गड़बड़ तब होती है, जब आप एक रैंडम चीज़ को अपना बना लेते हो, आत्मिक बना लेते हो, इंटिमेट बना लेते हो। है वो रैंडम और एक्सटर्नल, और उसको आपने न सिर्फ़ इंटरनल बना लिया, बल्कि उसको आपने अपने सिस्टम से उठा हुआ मान लिया। वो सिस्टम से नहीं उठा है, वो प्रकृति का संयोग है। वो आपकी भीतरी व्यवस्था से नहीं उठा है।

प्रश्नकर्ता: तो आइडेंटिफ़ाई करना ज़रूरी है।

आचार्य प्रशांत: इमोशन का जो वेग होता है न, जो उसका फ्लो आता है, वो ऐसा होता है जैसे सुनामी आई हो, वो बहा ले जाता है। तो बहुत ताक़त चाहिए कि आँसू गिर रहे हैं बहुत ज़्यादा, या कुछ बहुत अच्छा लग रहा है, या बहुत डर लग रहा है, ठीक उस वक़्त भी कहना "ये डर आ कहाँ से रहा है? क्या खोने से डर रहा हूँ? क्या मैं हमेशा से डरा करता था? ये मुझे डर किसने सिखाया? क्या सब लोग डरते हैं? उनमें और मुझमें फ़र्क़ क्या है?" और जब आप ये देखना, पूछना शुरू कर देते हो, तब आप अपने इमोशंस के गुलाम नहीं रह जाते।

द एक्सटेंट टू व्हिच यू आर लिबरेटेड फ्रॉम योर इमोशन्स इज़ योर ईक्यू। और इमोशंस से लिबरेट होने का मतलब, इमोशंस को मारना नहीं होता, इमोशंस को जानना होता है। इमोशंस बहुत प्यारी बात हो जाते हैं, जब आप उनको जानना शुरू कर देते हो।

प्रश्नकर्ता: तो बेसिकली आप ये कह रहे हैं कि अपने आप से जुड़ो। अपने अंदर से जुड़ो। और सेल्फ-अवेयरनेस लाओ। ताकि आपके रिश्ते जो हैं, सुगम रहें, सुचारु रूप से चलें।

आचार्य प्रशांत: रिश्ते प्राथमिक नहीं हैं। पहले मैं भीतर से ठीक चलूँ, तो मेरे रिश्ते ठीक चलेंगे। और अगर कभी ऐसा मैंने कर मारा न, कि मैं तो भीतर से ठीक नहीं हूँ पर मैं रिश्ते ठीक चला रहा हूँ, तो अब कोई एक्सप्लोजन होने वाला है। जैसे घरों में होता है न, ऐसा लगता है रिश्ते बहुत बढ़िया हैं, सब एक-दूसरे से बिल्कुल आदर-सम्मान से बात कर रहे हैं, एक-दूसरे के प्रति वो स्नेह भी अभिव्यक्त कर रहे हैं, सब कुछ अच्छा है इस घर के भीतर।

लोग तो भीतर से ठीक हैं ही नहीं, तो वो आपस में रिश्ता कैसे ठीक चला रहे हैं। अब कोई विस्फोट होगा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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