जो स्वतंत्र होता है, वो परेशान नहीं करता। सास-बहू का झगड़ा इसीलिए होता है क्योंकि हम उन्हें आश्रित, दुर्बल और मजबूर बना देते हैं। अन्यथा न सास को बहू से लड़ने का शौक है, न बहू को सास से। ये उनकी पराधीनता और बेबसी का सूचक है। इसलिए उन्हें सशक्त बनाओ और उन्हें जीवन में कुछ ऐसा सार्थक दो, जो लड़ाई-झगड़े से ज्यादा आकर्षक हो।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न मेरे निजी जीवन से है। मेरे शादी को नौ साल हो गए हैं और पाँच साल की एक बेटी है; और इन नौ सालों में मैं एक चीज़ से उलझा हुआ हूँ — और वो है सास-बहू का झगड़ा।
एक महीना भी ऐसा नहीं गया कि सास-बहू का झगड़ा नहीं हुआ हो, वो चलता ही रहा है। जब माँ को समझाने जाता हूँ, तो वो मुझे ‘जोरू का गुलाम’ कहती है, जब बीवी को समझाने जाता हूँ, तो वो मुझे ‘माँ का लाड़ला’ कहती है। और इसी द्वंद्व में मैं हमेशा उलझा रहता हूँ, जिसके कारण न मैं अपने कैरियर पर फोकस कर पता हूँ और मानसिक शांति भी भंग होती है। कई बार तो ऐसा होता है कि आत्महत्या करने का विचार आ जाता है।
मेरी बहन विवाहित थीं, फिर डिवोर्स (तलाक) हो गया और अपने आप में वो इंडिपेंडेंट (स्वतंत्र) जी रही हैं, उनका हमारे जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं है। आचार्य जी, सास-बहू में झगड़े होने का मूल कारण क्या है और इसका समाधान क्या है? मेरा दोष क्या है?
आचार्य प्रशांत: मेरा दोष क्या है? न मेरी बीवी, न मेरे कोई सास, पर जिसको देखो वो मेरे पास लेकर आता है यही आस! मेरा दोष क्या है कि मुझे ये सब झेलना पड़ रहा है, ये बताओ? नहीं, मैं सिर्फ शिकायत नहीं कर रहा, मुझे अपने सौभाग्य पर सचमुच नाज़ होता है! जितना आप लोग अपनी गृहस्थी का वर्णन करते हैं, उतना मैं अपने आप को बोलता हूँ, ‘येस! बच गया भाई, बच गया, एकदम बच गया!‘




