प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी प्रेम प्रसंग की आप बात कर रहे थे तो मेरे कुछ मित्र हैं, मेरे एक मित्र हैं पर्टिकुलर, तो हर टाइम क्या रहता है कि कोई रिलेशनशिप में जब एंटर करतें है, तो काफ़ी उम्मीद के साथ एंटर करते हैं रिलेशनशिप में कि काफ़ी कुछ मिल जाएगा। इससे कुछ हासिल हो जाएगा और फिर पिट-पिटा करके लास्ट में ये होता है कि मेरा कट गया। ये बार-बार एक साइकिल सा चलता है। कभी उसी पर्सन के साथ, कभी मल्टीपल, अलग-अलग इंडीविजुअल के साथ में। तो ये उम्मीद क्या है? जो है मतलब मेरी समझ में नही आता कैसे कि टूटती ही नहीं, मतलब कहीं न कहीं, जब कि कितना ही क्लिष्ट एक्सपीरियंस हो जाये आदमी का?
आचार्य प्रशांत: कितनी बार ऐसा हुआ है?
प्र: एक आदमी के साथ ही हज़ार बार और फिर अलग-अलग लोगों के साथ।
आचार्य: काफ़ी समय है इनके पास फ़ालतू। कुछ करने को नहीं है जिंदगी में। देखो हर आदमी प्यासा है लेकिन मिट्टी का तेल पीने से थोड़े ही बुझेगी? मैं इनसे सहानुभूति रखता हूँ। कल्पना कर रहा हूँ, तो ही — बेचारे। कोई प्यासा आदमी जैसे द्वार-द्वार खटखटा रहा हो कि पानी पिला दो, पानी पिला दो और कोई उसको कुछ दे रहा है, कोई कुछ दे रहा है। कोई बहुत उदार मिला, उसने घी पिला दिया कि पिओ। तो प्यास बुझ तो क्या रही है उनकी और बढ़ती जा रही है। तो और दर-दर ठोकरें खा रहें हैं। चाहिए तो वो है ही सबको।
आपका जो मन है न, वो पैदा ही होता हैं आशिक, उसे कुछ चाहिए। लेकिन वो बड़ा अनाड़ी आशिक हैं, अज्ञानी आशिक। आशिकी भी है और साथ में अज्ञान भी है। तो ये तो पक्का है कि उसे कुछ चाहिए पर ये नहीं पता कि क्या चाहिए। और प्यास इतनी प्रबल है कि इंतज़ार नहीं कर सकता। तो जो चीज मिलती है वही पीना शुरु कर देता है क्योंकि प्यास बहुत लगी है न।




