अगर तुम्हें प्रेम है, तो क्या तुम तय करके किसी से दूर हो सकते हो? यह तो ह्रदय की बात होती है। क्या तुम तय कर सकते हो कि कल से इससे बात नहीं करनी? क्या तुम साँस लेना छोड़ सकते हो तय करके? हमारे रिश्ते नफ़ा-नुक़सान के आधार पर होते हैं, तभी तो हम तय करके उन्हें तोड़ते हैं। जो तय करके टूटी दोस्ती है, वह तय करके हुई भी होगी। और तय करके जो कुछ भी होता है, वह स्वार्थ के कारण ही होता है!
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आचार्य प्रशांत: ग्यारहवीं-बारहवीं में था तो देखूँ, ’लड़के-लड़कियाँ साथ घूम रहे हैं, ये सब हो रहा है। तो एक था जानने वाला, वो एक लड़की के साथ खूब घूमा करे। हँसी-ठिठोली, उठना-बैठना, मोटरसाइकिल लिये था, उसपर लड़की को बिठाकर घुमाये, शाम को जाओ कहीं तो अपने दोनों खड़े होकर आइसक्रीम खा रहे हैं, ये सब और एक ही स्कूल। फिर एक दिन मैंने देखा कि ये अलग, वो अलग कोई बातचीत नहीं।‘ तो मैंने पूछा, मैंने कहा कि क्या हुआ? वो उधर है, तुम यहाँ क्या कर रहे हो?
तो बोला, ‘हमारा ब्रेकअप हो गया।‘
मैंने कहा, ‘ये क्या होता है?’
बोला, ‘हमने तय किया है कि अब हम अलग-अलग हो जाएँगे।‘
मुझे समझ में ही नहीं आयी बात, मुझे आज तक समझ नहीं आयी। ये ब्रेकअप होता क्या है? तुम्हें अगर प्रेम है तो क्या तुम तय करके किसी से दूर हो सकते हो? कर कैसे लोगे? ये तो बात तो आत्मा की होती है, ह्रदय की होती है, तुम तय थोड़े करोगे कि कल से इससे बात नहीं करनी है? क्योंकि हमारा ब्रेकअप हो गया है। ये क्या होता है? ब्रेकअप के बाद तुम अपनेआप को रोक कैसे लेते हो? अगर रोक लेते हो तो इसका मतलब कभी कुछ था नहीं।




