जीवन का अर्थ ही है संबंध, हो ही नहीं सकता कि आप संबंधित हो ही न। आप दूसरे व्यक्ति से जो संबंध बनाते हो न, वो संबंध अनुचित होता है, हमें वो संबंध छोड़ना होता है। संबंध खंडहर हो गया है, उस संबंध से बाहर आना है। व्यक्ति को क्या छोड़ोगे आप, व्यक्ति को आपने पकड़ कब रखा था; पकड़ का नाम तो रिश्ता होता है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, कुछ समय से मेरे रिश्तों में उलझनें चल रही थीं तो मैंने आपका एक वीडियो देखा। उस वीडियो में आपने बताया था कि जैसे घर खंडहर हो जाए तो उसे छोड़ देना चाहिए, वैसे ही अगर रिश्ते बहुत ज़्यादा खराब हो गए हों और वो वापस से सुलझ न पाएँ तो वहाँ से निकलना बेहतर है। तो आचार्य जी, आपसे एक प्रश्न था कि घर तो ठीक है, वो टैंजिबल (छूने योग्य, देखने योग्य) चीज़ें हैं, उसको छोड़कर जाया जा सकता है, लेकिन क्या रिश्ते को छोड़ा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: रिश्तों को ही तो छोड़ा जा सकता है, व्यक्ति को छोड़ना ज़रूरी नहीं है, रिश्तों को तो लगातार छोड़ते ही रहना चाहिए। देखिए, जिसको आप कहते हैं ‘सुधारना’, वो एक तरह से निरंतर पुराने को छोड़ते रहने की ही तो प्रक्रिया है। आपके चेहरे पर गंदगी लगी है, मैं आपसे कहूँ, ‘जाइए, चेहरा धोकर आइए,’ एक तरह से आप अपने पुराने चेहरे को छोड़कर ही तो आ गए न, यही किया न आपने?
मान लीजिए, आपके चेहरे पर इधर-उधर मिट्टी ही मिट्टी छपी हुई है सब तरफ़ और आपसे कहा गया, ‘जाइए, बेहतर होकर आइए,’ तो आपने क्या करा? जो पुराना चेहरा, गंदा चेहरा, धूल भरा चेहरा लिए हुए थे, आपने उसको धो दिया, आपने पुराने चेहरे को छोड़ दिया। तो व्यक्ति को छोड़ने की बात मैं नहीं करता हूँ, व्यक्ति के प्रति तो करूणा चाहिए, व्यक्ति तो मेरे काम का लक्ष्य है। व्यक्ति से प्रेम है तभी तो ये जो काम है मैं कर रहा हूँ। ये काम इसलिए थोड़ी है कि इंसान को दुख देना है या इंसान कष्ट पाए, ये काम इसलिए है ताकि इंसान दुख से मुक्त हो पाए, जीवन में उसके आनंद आए।




