कोई आप पर तभी छा सकता है, जब आपने उसे इजाज़त दी हो। कोई चिल्ला सकता है, हाथ उठा सकता है, क्योंकि आपने उसे अधिकार दिया है। और अधिकार उसने बदले में आपको कोई लाभ देकर खरीदा है। तन कर खड़ा होना है तो दूसरों से स्वार्थ का रिश्ता कम करें। ज़रूरतें घटाएँ, निर्भरता घटाएँ। जितना हो सके, दुनिया को दीजिए। बाँटते चलिए, बटोरते नहीं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: देखिए! जिससे जो सुख मिल रहा है, उसको पकड़े-पकड़े आप उससे मिलने वाले सुख से, दुख से मुक्त नहीं हो पाएँगे। दोहराऊँ? जिससे जो सुख मिल रहा है, उस सुख को पकड़े-पकड़े उससे जो दुख मिलता है उससे नहीं छूट पाएँगे। आप कह रही हैं कि आप अगर उनको कुछ समझाती हैं तो वो प्रतिक्रिया करते हैं, लड़ाई-झगड़ा।
उन्हें कैसे लगता है कि उन्हें हक है आपसे ज़ोर से, चिल्लाकर, हक के साथ धमका कर बोल देने का? वो हक उनको किसने दिया? वो हक उन्हें कौन दिए जा रहा है? और हम किसी को अपने जीवन पर अधिकार यूँ ही तो नहीं दे देते, उनसे कुछ लाभ मिल रहा होगा तो ही उन्हें अधिकार दे रखा है। उनसे आपको जो भी लाभ मिल रहा है सबसे पहले आप उससे हाथ धोइए। नहीं? और ये तो बात मात्र अध्यात्म की ही नहीं है, नैतिकता की भी है। किसी में अगर आपको दोष दिख ही गया है तो सबसे पहले उससे मिलने वाले लाभ को रोकिए। नहीं?
आपका एक पड़ोसी है साहब, वो आए दिन आपको तोहफ़े देता रहता है। ठीक है? मस्त तोहफ़े देता है जैसे कि आमतौर पर कोई पड़ोसी देता नहीं। कभी कुछ, कभी कुछ। महँगे तोहफ़े। और आपको एक दिन पता चल जाता है कि ये सब काली कमाई के हैं। ये आदमी जो बगल में रहता है, घूसखोर है या अंडरवर्ल्ड से है, कुछ और है, जो भी है, उसकी कमाई गड़बड़ है। अब आप चाहते हैं कि उसको रोकें, या आप चाहते हैं कि उसकी पुलिस में शिकायत करें।




