
प्रश्नकर्ता: मेरा ब्रेकअप हुआ है और मेरी प्रेमिका ने तो दो-तीन महीने में एक दूसरा पकड़ लिया है। अब मुझे ख़्याल आते हैं कि वो और वो जो दूसरा वाला है, उनका क्या चल रहा होगा? और ये ख़्याल, ये कल्पनाएँ अब मुझे जीने नहीं दे रही हैं। मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: सचमुच दुनिया में बहुत ग़म है। तुम एक काम करो, बिल्कुल मज़ाक में नहीं बोल रहा हूँ। ठीक है? ये तुम्हें मैं रामबाण इलाज बता रहा हूँ।
जितनी तुम कल्पनाएँ करना चाहते हो, सब कर डालो एक बार में बैठकर, और सहज हो जाओ। तुम क्या कल्पना की बात कर रहे हो? तुम्हें और कुछ नहीं कल्पना आ रही है, यही आ रही है कि सेक्स कर रही होगी उसके साथ। क्योंकि तुमने भी लड़की पकड़ी तो सेक्स के लिए ही थी। अब तुमने किया कि नहीं किया, पता नहीं, पर दूसरे के साथ कर रही है, ऐसा तुम्हें ख़्याल आ रहा होगा, यही तुम्हारे दिमाग़ में ब्लू फ़िल्म चल रही होगी। उससे तुम परेशान हो रहे हो, इतनी सी बात है।
तो तुम वो पूरी चला डालो और उसको रिवाइंड कर-करके पाँच-सात बार, एक ही रात में ख़त्म कर दो। काहे के लिए उसको थोड़ा-थोड़ा अपने आप को कचोटने दे रहे हो। जो भी ज़हर है, पूरा ही पी लो। उसमें ऐसा कुछ है नहीं, थोड़ी देर बाद अपनी कल्पनाओं में पाओगे कि दो जिस्म बचे हैं बस उनके चेहरे नहीं हैं। क्योंकि जिस्म जब दो होते हैं न तो चेहरे तो उनके होते भी नहीं। चेहरे का मतलब होता है, यूनिकनेस, कुछ अलग।
कुछ नहीं अलग होता, दो शरीर बिल्कुल वैसे ही मिलते हैं जैसे आज से एक करोड़ साल पहले भी दो शरीर मिले थे। उनमें कुछ अलग नहीं है, कुछ यूनिक नहीं है। शरीर, शरीर होता है। तुम्हारी प्रेमिका का शरीर हो, तुम्हारे पुरखों का शरीर हो, सब शरीर एक से होते हैं। और सब शरीरों का काम होता है वो सब करना जो तुम्हारी कल्पनाओं में आ रहा है। उसमें कुछ अलग नहीं है, कुछ ख़ास नहीं है। तुम उसकी कल्पना का विरोध मत करो। विरोध तुम जितना कर रहे हो, वो कल्पना तुम्हारे लिए उतनी ही अर्थपूर्ण हो जाती है। शांति से बैठकर पूरा ही स्वीकार कर लो। हाँ, ये बिल्कुल सही बात है।
“अभी वो बैठे होंगे, उन्होंने पहले डिनर किया होगा। डिनर करके गाड़ी से लौट रहे होंगे। फिर फॉन्डलिंग शुरू कर दी होगी, अब वो वापस जाएँगे। वापस जाकर थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करेंगे, फिर बिस्तर में घुस जाएँगे, फिर सेक्स करेंगे।” इससे ज़्यादा तो वैसे भी कुछ होता नहीं है। तो इसमें तुम इतना क्यों घबरा रहे हो? पूरा ही सोच लो, और कई-कई बार सोच लो, इतना सोच लो कि ऊब जाओ। मुक्त हो जाओगे।
इससे ज़्यादा कुछ कर लेंगे? इससे ज़्यादा क्या करेंगे वो? ऐसा तो होगा नहीं कि अचानक यहाँ से कूद लगाई और जाकर जुपिटर पर बैठ गए, और वहाँ ग्रेविटी ज़्यादा है, इसीलिए सेक्स में ज़्यादा मज़ा आया होगा। जैसे दो छिपकलियाँ कमरे के अंदर होती हैं, जैसे दो तिलचट्टे होते हैं, जैसे सड़क पर दो कुत्ते होते हैं, वैसे ही दो इंसान होते हैं वासना के क्षण में, कर लो पूरी कल्पना। उसमें कल्पना करने जैसा कुछ भी नहीं है। कल्पना तो ऐसी चीज़ की, की जाती है जो तथ्य के रूप में मौजूद न हो, तब कल्पना की ज़रूरत पड़ती है। उसमें कल्पना भी क्या करनी है। सेक्स इज़ अ फैक्ट ऑफ़ लाइफ़। सामने है, हर जगह है, चल रहा है, चलता ही जा रहा है।
तुम्हारी एक्स-गर्लफ्रेंड ने कर लिया, तो उसने कौन सा कमाल कर लिया? कोई अद्भुत बात हो गई? और वो तुम्हारे साथ भी कर रही होती, तो भी वही सब कर रही होती जो किसी और के साथ कर रही होगी। तो तुम हो कि कोई और है, सच पूछो तो एक ही बात है। दो बॉडीज़ हैं, फेसलेस बॉडीज़। ज़बरदस्ती का आइडेंटिफिकेशन मत करो। हर आदमी को ये बात समझ नहीं आएगी, बहुत लोग कहेंगे, ऐसा थोड़ी होता है, ये कैसी बातें कर रहे हो।
पर तुमने अगर मेरे साथ थोड़ा सुना है, पढ़ा है, अध्यात्म, उपनिषद्, गीता थोड़ा तुम्हारे भीतर उतरी है, तो मनुष्य क्या है? मनुष्य की पहचान क्या है? त्रिगुणात्मक प्रकृति क्या है? (सत, रज, तम) और किस तरीक़े से वो हमें संचालित करती है, ये सब समझ में आया होगा। तो फिर समझ पाओगे कि मैं तुम्हें क्या कह रहा हूँ। कुछ विशेष नहीं है बेटा यहाँ पर। क्या विशेष हो जाना है, बताओ न क्या विशेष हो जाना है?
तुम्हें आज ये समस्या आ रही है कि तुम्हारी लड़की चली गई। कल को तुम्हारी जान चली जानी है। क्या समस्या? संतों ने कहा है न,
एक दिन ऐसा आयेगा, कोई काहू का नाहि। घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहि।।
~ संत कबीर
घर की नारी को तुम बचाने की कोशिश कर रहे हो, जो तन की नाड़ी है, ये पल्स, ये भी नहीं रहेगी एक दिन। और ये सिर्फ़ तुम्हारी कहानी नहीं है, हम में से हर एक की कहानी है। इसमें विशिष्ट क्या है? व्हाट इज़ सो यूनिक, स्पेसिफिक अबाउट इट? और सूत्र तुम्हें दे रहा हूँ, नॉन रेजिस्टेंस का।
प्रकृति का विरोध नहीं किया जाता, रेजिस्ट मत करो — अविरोध। जो हो ही रहा है, उसके दृष्टा हो जाओ, “हाँ, ठीक है, ये तो प्रकृति में सदा से होता आया है, अभी भी हो रहा है। मैं काहे को लेकर इसको इतना छटपटा रहा हूँ, मैं क्यों ऐसी बात को महत्त्व दे रहा हूँ जो सार्वजनिक है।” और ये बात सिर्फ़ प्रेमी-प्रेमिका की नहीं है। जो भी तुम्हें भविष्य की कल्पनाएँ बहुत भयानक लगती हों न, उनसे भागा मत करो। बैठकर पूरा सोच ही लिया करो, कि “हाँ, ठीक है,” हो जाने दो।
वर्स्ट केस सिनेरियो क्या है? ये सब हो भी जाएगा, तुम पाओगे कि जो चीज़ तुम्हें बहुत डराती है, वो इतनी भयानक नहीं है कि वो तुम्हारी हस्ती को उखाड़ दे। उसको सिर्फ़ कल्पना में रखोगे, उसका विरोध करते रहोगे, तो वो भयानक लगती रहेगी। स्वीकार कर लो, हाँ, ठीक है, कब तक इसे अस्वीकार करें, आज नहीं तो कल तो ऐसा होना ही है। मौत जैसी बात है, कि क्या उसको अस्वीकार करें। कल नहीं भी आई, हमने टाल दी कल तो परसों आएगी। उसको अस्वीकार क्या करना है?
मज़ाक बना लो अपना। यही सब, तभी तो दिया है न, कि गधाराम बड़ा प्रेमी-प्रेमी बना करते थे, देखो, अभी क्या चल रहा है। अपने दुख को काटने के लिए अपना ही चुटकुला बनाना अच्छा एक ज़रिया होता है। क्योंकि दुख गंभीरता माँगता है। दुखी आदमी को देखना वो कितना गंभीर रहता है। देखा है कभी दुखी आदमी को? एकदम गंभीर रहता है।
अपना दुख काटना हो तो गंभीरता हटा दो, अपने ही ऊपर हँसना शुरू कर दो, दुख चला जाएगा।
और हँसा ऐसे ही जाता है कि बहुत सीरियस हो रहे थे साहब अपने अफेयर में। ये देखो क्या चल रहा है। हँसो अपने ऊपर। और इतना ही नहीं, अपने सब दोस्तों को भी बता दो। उनको ख़ासतौर पर आग्रह करो कि सब मेरे ऊपर हँसो, सब मेरा चुटकुला बनाओ।
प्रश्नकर्ता: 20 साल की हो गई हूँ। बहुत जी लिया अब जिया नहीं जा रहा।
आचार्य प्रशांत: सामने होती तो अभी कान मरोड़ दिए जाते। 20 साल की हो, कहीं और जिया नहीं जा रहा। क्यों?
प्रश्नकर्ता: क्योंकि आईआईटी पटना में हैं, मैकेनिकल ब्रांच में हैं। वहाँ मन नहीं लग रहा, सीजीपीए बस सात आई है।
आचार्य प्रशांत: अरे भैया, सात, अबव एवरेज होती है।
प्रश्नकर्ता: लेकिन मेरा फ्रेंड सर्किल है, उसमें सबसे कम आई है मेरी। कोडिंग सिखा रहे हैं, मुझे कोडिंग नहीं करनी।
आचार्य प्रशांत: तो मत करो।
प्रश्नकर्ता: कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखाई देता, रोती हूँ। सुसाइड के ख़्याल आते हैं। स्ट्रेस से बीमारी हो गई है, नींद नहीं आती। कॉलेज की दो महीने की छुट्टी में एक महीना रोते-रोते निकाल दिया।
आचार्य प्रशांत: अरे भाई, इतनी किताबें हैं, 20 साल की हो, कुछ खेलना शुरू करो, पढ़ो, घूमो। छुट्टी है तो रो क्यों रही हो बैठकर के? उत्तर भारत में कहीं इतनी गर्मी है, घूमते-घूमते पहाड़ों पर चले जाओ। यही वो उम्र है जब बहुत सस्ते साधनों से जा सकते हो, साधारण कमरों में रह सकते हो। थोड़ा भारत को समझो। हैं! 20 साल!
प्रश्नकर्ता: मुझे बहुत टेंशन हो गई है, मैं मर जाऊँगी। क्योंकि मैं आईआईटी पटना में हूँ और मेरी सीजीपीए सबसे कम आ गई।
आचार्य प्रशांत: कितनी कम आ गई?
प्रश्नकर्ता: 7 आई है।
आचार्य प्रशांत: 10 की स्केल पर 7, हे भगवान! फर्स्ट ईयर में तो मेरी भी इतनी आई थी। पढ़ाई करो, घूमो, खेलो। इतनी किताबें जो मैंने ही सुझाई हैं, उसको पढ़ क्यों नहीं रहे हो? डूब मरने से अच्छा है स्विमिंग सीख लो। आत्महत्या के ख़्याल आते हैं, डूब मरेंगे, इससे अच्छा पानी में ही डूबना है तो स्विमिंग सीख लो न। यही टाइम है स्विमिंग सीखने का।
देखो भाई, न तो अपना विक्टिमाइजेशन करना चाहिए, न अपना ग्लोरिफिकेशन करना चाहिए। ठीक है? और अहंकार में ये दोनों ही टेंडेंसी साथ-साथ चलती हैं। वो कभी अपने आप को ग्लोरिफाई करता है कि मैं कितना महान हूँ। वो कभी अपने आप को विक्टिमाइज करता है कि मैं महान तो हूँ, पर दुनिया ने मुझे क़द्र नहीं दी। जो है सो है। जो भी स्थिति है, उसमें अब देखो, बेहतर क्या कर सकते हो। आईआईटी का कैंपस है, उसमें फैसिलिटीज़ मिली हैं उनका फायदा उठाओ।
कोई भी स्थिति आ जाए, ज़िंदगी में अपने आप को विक्टिम मत बनाना ज़बरदस्ती। और वही विक्टिम बनाने में ही एक चीज़ होती है, अपने आप को शहीद बनाना। वो विक्टिमाइजेशन से जुड़ी हुई बात है, जो विक्टिमाइजेशन को ग्लोरिफाई कर देती है। “आई एम द ग्लोरियस शहीद।” न तो सेल्फ ग्लोरिफिकेशन, न ही सेल्फ विक्टिमाइजेशन। कुछ नहीं करना है, काम करना है। काम करो, मौज करो।