
प्रश्नकर्ता: सर, एक लास्ट क्वेश्चन, “द मिथ ऑफ़ फ्री टाइम। यू शुड हैव इवन अ सेकंड ऑफ़ द सो कॉल्ड ‘फ्री टाइम’ — साउंड स्ट्रेंज, बट प्लीज़ थिंक अबाउट इट। ऑल योर साइड मस्ट बी ऑक्यूपाइड एंड लिबरेटेड, लविंग, करेजस, एन्डेवर्स।” एंड द वर्ड्स टीचर मे बी लाइक देयर आर ओके टू अंडरस्टैंड। सो, इफ आई डोंट टेक आउट टाइम, देन हाउ विल आई गेट अवेयर ऑफ़ थिंग्स, एंड हाउ विल आई नो दैट दीज़ आर द एक्शन रिक्वायर्ड फॉर लिबरेटिव, लविंग, करेजस, एन्डेवर्स।
आचार्य प्रशांत: सी, वी डोंट टेक आउट टाइम टू कंटेम्प्लेट, वी टेक आउट टाइम टू कंपेन्सेट।
आप कह रहे हैं न, “इफ आई डोंट टेक आउट टाइम, हाउ विल आई कंटेम्प्लेट?” हू कंटेम्प्लेट्स ऑन अ वीकेंड? नोबडी। वी कंपेन्सेट फॉर द वीक। पूरे वीक में हमारे साथ जो भयानक अत्याचार हुआ होता है, जिसके बदले में पैसा मिलता है, उसका दो दिन कंपेनसेशन कराया जाता है। इसलिए तो वीकेंड होता है। वीकेंड न हो तो आप मंडे रिज़ाइन कर दोगे। दो दिन दिया ही इसीलिए जाता है कि अब पट्ठा अपने ज़ख़्म वग़ैरह चाट करके, थोड़ा-सा रिकवर करके, हील होकर मंडे को फिर आ जाएगा कोड़ा खाने। और किस लिए होता है वीकेंड? तो,
फ्री टाइम मैं नहीं चाहता आपको मिले। मैं चाहता हूँ आपको काम ऐसा मिले जिसमें आपको फ्री टाइम की ज़रूरत ही न रहे।
क्यों ऐसा काम चाहिए जिसमें फ्री टाइम चाहिए? फ्री टाइम माँगने का मतलब समझो, काम ऐसा है नहीं जिसको दिली समर्पण करा जा सकता है। तो हम कहते हैं, नहीं साहब, 40 आवर्स अ वीक इज़ ऑल्सो टू मच, गिव मी 25 आवर्स अ वीक। बट व्हाई? वर द वर्क अ लव अफेयर, हू वुड वांट टू लिमिट इट टू 25 आवर्स? प्लीज़ टेल मी।
साँस लेने में हम बोलते हैं क्या कि वीकेंड चाहिए, दो दिन साँस नहीं लूँगा? दिल के धड़कने में बोलते हैं कि अब वीकेंड भी तो होना चाहिए, दिल है, जब से पैदा हुए हैं काम ही किए जा रहा है, इससे क्यों इतना काम कराते हो, इसको भी दो दिन वीकेंड दो, वेकेशन दो, ये सब दो, बोलते हो क्या? तो वर्क वो लाइवलीहुड जैसा क्यों हो जिसमें वीकेंड और वेकेशंस और ये सब हो? वो लाइफ़ जैसा भी तो हो सकता है न। लाइवलीहुड क्यों बोले हम उसे, लाइफ़ क्यों न बोलें।
मैंने काम ऐसा लिया है कि मेरे 24 घंटे भी कम पड़ते हैं। मुझे फ्री टाइम नहीं चाहिए। मेरा एंटरटेनमेंट मेरे काम में ही हो जाता है। मेरा नरिशमेंट मेरे काम में ही हो जाता है। मैंने पर्सनल लाइफ़ और प्रोफेशनल लाइफ़ डिवाइड करके नहीं रखी हैं कि काम खत्म होगा तो पर्सनल लाइफ़ शुरू होगी। एक इंटीग्रेशन है, बंटवारा नहीं है। फ्रेगमेंटेशन नहीं है कि बॉस के सामने एक चेहरा दिखाना है, बीवी के सामने दूसरा चेहरा दिखाना है। मेरा सब कुछ जुड़ा हुआ है, आई नेवर टेक ऑफ्स।
मैं पूछ रहा हूँ, ज़िंदगी ऐसी क्यों नहीं हो सकती? ज़िंदगी ऐसी क्यों नहीं हो सकती कि जिसमें फ्री टाइम की ज़रूरत ही नहीं है? और जब हमें फ्री टाइम मिलता है तो वो फ्री टाइम हमेशा किसी ऐसी चीज़ से मिलता है जो हमें पसंद ही नहीं थी पहली बात, तभी तो उससे बचने के लिए हमने फ्री टाइम माँगा था न, एक कंपेनसेशन के तौर पर। एचआर में उसको बोलते भी क्या हैं? रिन्यूमरेशन। उसका भी मतलब क्या होता है? मुआवज़ा। सोचो, शब्द ही कितना गंदा है—क्षतिपूर्ति। मैंने आपका कुछ नुकसान किया, इसलिए आपको अब मैं कंपेनसेट कर रहा हूँ, क्षतिपूर्ति कर रहा हूँ, मुआवज़ा दे रहा हूँ। काम अगर मुआवज़े की तरह है तो इसका मतलब यही है कि आप ऑफिस जाते हो चोट खाने, तभी तो मुआवज़ा मिलेगा। अब ज़िंदगी चोट खाने के लिए तो नहीं है न। कि है? बस यही बात है।
और जब हमने काम ऐसा चुन रखा होता है जिसमें से बार-बार भागने का मन करता है, 6:00 बज जाए, स्वाइप करके भागो। तो हम कितना अपना नाश कर रहे होते हैं। और ये हमें पता चल चुका होता है कि इसमें हमारे साथ बहुत ग़लत हो रहा है, लेकिन पैसा तो मिल रहा है। फिर सैटरडे, संडे आता है और उस पैसे को फूँकने का मौक़ा मिल जाता है, गिले-शिकवे दूर हो जाते हैं। संडे की रात आते-आते पेट भर जाता है, डकार मारते हैं, मंडे के लिए फिर तैयार हो जाते हैं। बात यही है कि नहीं? मतलब, ठीक है मैं हूँ तो एक्सैजरेट करूँगा ही। पर आप बताओ, मोटे तौर पर इन प्रिंसिपल बात यही है कि नहीं है?
आपको अगर कहा जाए कि बिना काम के, एक वैचारिक प्रयोग कर लो, बिना काम के या आधे काम के सेम सैलरी मिलेगी, मना करोगे क्या? आपको कहा जाए, बिना मेहनत के या आधी मेहनत से, अगर आप स्टूडेंट हो, पूरे मार्क्स मिल जाएँगे, आप मेहनत करोगे क्या? इसका मतलब क्या है? कि काम तो मजबूरी है। अगर आधे काम पर भी उतनी सैलरी मिल रही होती तो हम आधा ही काम करते। वो तो मजबूरी में और करना पड़ता है। इसका मतलब वर्क प्लेस क्या है फिर? इट्स अ प्लेस ऑफ़ कॉन्फ्लिक्ट, इट्स अ फ़ील्ड ऑफ़ वॉर।
क्या ज़िंदगी इसलिए है कि ऐसी जगह पर रहो जहाँ पर वॉर चल रहा है और उस वॉर में भी तुम्हारा हाथ कभी ऊपर नहीं रह सकता? बिकॉज़ यू आर नॉट द पे मास्टर। सो द फाइनल कॉल कैन नेवर बी योर ओन, समबडी एल्स वुड ऑलवेज कॉल द शॉट्स।
ज़िंदगी ऐसी क्यों नहीं हो सकती कि खाली समय मिला तो कहो यार, “कुछ गड़बड़ कर रहा हूँ क्या? मैं एक बहुत बड़ा मिशन, बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मेरे सामने है और उसको छोड़ के मैं खाली बैठा हूँ, ये मैं क्या कर रहा हूँ?” मुझे मालूम है, हम सबको पर्सनल टाइम बहुत पसंद होता है। मुझे मालूम है कि ये चैप्टर इट्स डिज़ टू शॉक। लेकिन हमें यह भी तो पूछना होगा न कि इतना हमें माँग रहती क्यों है खाली समय की? खाली समय बुरा है, यह मानना कठिन है। पर खाली समय हमें चाहिए क्यों है, यह देखना आसान है। यह आप देखोगे तो फिर समझ जाओगे मैं क्या कह रहा हूँ।
जो अपनी ज़िंदगी में जितने गड़बड़ चुनाव करके बैठा होगा वो उतना ज़्यादा फ्री टाइम माँगेगा।
जिसके रिश्ते ग़लत होंगे वो रिश्तों से फ्री टाइम माँगेगा। जिसका काम ग़लत होगा वो काम से फ्री टाइम माँगेगा। फ्री टाइम मत माँगो, फ्री लाइफ़ माँगो। फ्रीडम इटसेल्फ। छोटा-सा शब्द है — प्यार, लव। जब वो मौजूद होता है तो आदमी यह नहीं कहता है कि अब एक फ़ुल स्टॉप लगा दो। अब इससे ज़्यादा समय मैं नहीं दे सकता। या हमारे तुम्हारे कॉन्ट्रैक्ट में इतना ही था, अब इससे ज़्यादा नहीं करूँगा मैं। हमारा जो एसएलए था, उसके मुताबिक मुझे एन यूनिट्स डिलीवर करनी थी, मैंने कर दी, इससे ज़्यादा क्यों करूँ।
शरीर को चाहिए फ्री टाइम, वो वाला तर्क मत ले आइएगा। “क्या सोए नहीं, क्या नहाए नहीं, क्या खाएँ नहीं, क्या खेलें नहीं,” मैं उसकी बात नहीं कर रहा, यह सारा जो डिस्कशन था, जो साइकोलॉजिकल नीड है फ्री टाइम की, उसके लिए फिज़िकल वाली बात नहीं कर रहा हूँ। ऑब्वियस्ली, आप अगर कुछ खेलने गए हो तो उस समय आप काम नहीं कर रहे हो, वो ठीक है। आप खा रहे हो या सो रहे हो तो आप काम नहीं कर रहे हो, वो सब ठीक है। आप मूवी देख रहे हो, वो भी ठीक है। वी नीड टू इंक्वायर इंटू दिस कॉन्स्टेंट अर्ज टू गेट अवे। गेट अवे फ्रॉम व्हाट वी हैव चोज़न। एंड इफ देयर इज़ अ कॉन्स्टेंट अर्ज टू गेट अवे फ्रॉम व्हाट यू हैव चोज़न, व्हाई नॉट रेक्टिफ़ाई व्हाट यू हैव चोज़न, इंस्टेड ऑफ़ फाइंडिंग मिसलेनियस एंड डिवियस वेज़ टू गेट अवे? नहीं।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न बुक से है। इसमें एक कोट है, “रिलेशनशिप्स आर ग्रेट ओनली व्हेन दे हेल्प एलीवेट योर कॉन्शियसनेस। एंड दैट्स द ओनली पर्पस ऑफ़ रिलेशनशिप्स इन लाइफ़।” इसमें आचार्य जी प्रश्न ये है कि कैसे पता करें कि ये रिलेशनशिप हमें एलीवेट कर रही है या नहीं कर रही?
आचार्य प्रशांत: उसके लिए पहले पता होना चाहिए मैं कितने पानी में हूँ। यह लगभग वैसा सवाल है कि मैं कैसे पता करूँ कि जिसका मैंने हाथ थामा वह मेरे लिए शुभ था कि नहीं। इसके लिए पहले पता होना चाहिए कि डूब रहे थे पानी में और अब ज़मीन पर हो। अगर किसी को यह पता ही न हो कि वो पानी में डूब रहा है तो वो उस हाथ के प्रति कृतज्ञ भी कैसे होगा जिसने उसे खींच कर बाहर निकाला। तो इसलिए आत्मज्ञान सबसे पहले आता है न। नहीं तो आपको अच्छे से अच्छा भी रिश्ता मिलेगा तो आप उसको ठुकरा दोगे। आप कहोगे, इससे मुझे मिला क्या?
जिसको यह पता ही न हो कि वो डूब रहा था—बिल्कुल यहाँ तक पानी आ चुका था, यहाँ तक (मुँह तक)। और फिर एक रिलेशनशिप हुआ, एक संबंध हुआ और उस संबंध ने उसको बाहर निकाल दिया। इसको कभी पता ही नहीं चलेगा कि यह जो संबंध था, यह शुभ था मेरे लिए। क्यों नहीं पता चलेगा? क्योंकि सबसे पहले इसको यही नहीं पता था कि ये कितने पानी में है। आत्मज्ञान और कुछ नहीं होता—यही जानना आत्मज्ञान है कि हम कितने पानी में हैं। हम कितने पानी में हैं, यह जान लो, इसको ही आत्मज्ञान कहते हैं। और जिसको यह पता होता है वो फिर जान लेता है कि किसका हाथ थामना है और किसका नहीं थामना है।
आप इतने पानी में हो (ठोड़ी तक) और एक है बगल में, वो इतने (नाक तक) पानी में है। और दोनों रोमांस कर रहे हैं। इसका मतलब, दोनों को ही कुछ पता नहीं अपनी हालत का। और आप इतने पानी में हो और एक ऐसे ऊपर को आसमान की ओर हाथ उठाकर कह रहा है, हे ईश्वर, मुझे ऊपर खींच ले। इसको भी पता नहीं है अपनी हालत का। ख़ुद को जान के ही तो पता चलेगा कि मेरे लिए कौन सही है, कौन उचित है। सब रिश्ते किसके लिए हैं? रिश्ता मैं ही तो बना रहा हूँ, ना। तो किसके लिए है? मेरे ही तो लिए है। और मुझे अपना ही नहीं पता तो मुझे संबंध का क्या पता? नहीं?
कोई भी संबंध सिर्फ़ दो उद्देश्यों के लिए हो सकता है, मैं बाहरी संबंधों की बात कर रहा हूँ अभी कोई पारमार्थिक भीतरी संबंध होता है, उसकी नहीं। किसी भी संबंध के सिर्फ़ दो उचित उद्देश्य हो सकते हैं। इधर (दाहिने हाथ को ऊपर उठाते हुए) से बनाओ तो अपने ऊपर वाले से कि खींच ले मुझे ऊपर, और इधर (बाएँ हाथ को नीचे की तरफ़ करते हुए) से बनाओ तो अपने नीचे वाले से, कि खींच लूँ तुझे ऊपर। और बाक़ी रिश्ते तो किसी काम के नहीं हैं। वह तो एक दूसरे को डुबोने का तरीक़ा है। अगर ख़ुद डूब रहे हो तो अपना हाथ दे दो उसको जो तुम्हें बचाना चाहता है, यह सही रिश्ता हो गया। और अगर बचा लिए गए हो तो अब जो बाक़ी सब डूब रहे हैं उनको हाथ दो कि आ जाओ, तुम्हें भी बाहर खींचता हूँ। ये भी सही रिश्ता हो गया। सिर्फ़ यही दो प्रकार हो सकते हैं सम्यक रिश्तों के। बाक़ी सब रिश्ते किस लिए हैं?
हाँ। मतलब, क्या कर रहे हैं? डूबते हुए क्या करोगे तुम? मतलब, वाटर पोलो खेलोगे? क्या करोगे? वो थोड़ी देर के लिए कंपेनसेट कर लोगे। जब यहाँ तक (नाक तक) आ जाएगा पानी तो भी क्या फ़ियर के प्रति ऐसे रहोगे उदासीन कि है ही नहीं। देखिए, हम सुखी होने को नहीं पैदा हुए हैं। तो रिश्ते भी एक दूसरे को सुख देने के लिए नहीं होते हैं, रिश्ते भी एक दूसरे को मुक्ति देने के लिए होते हैं।
जहाँ रिश्ता बनाया ही इसीलिए गया है कि मैं तुझे थोड़ा प्लेज़र दूँगा, तू मुझे प्लेज़र दे, यह रिश्ता ही थोड़ा फिर आगे चलकर के…कौन-सी जगह है जहाँ वह रहते हैं, अपने भैंसे वाले? क्या बोलते हैं उसको, कुछ एन से उसका नाम होता है न?
श्रोता: नरक।
आचार्य प्रशांत: हाँ हाँ, नरक। बोलिएगा ज़ोर से, क्या नाम होता है?
श्रोता: नरक।
आचार्य प्रशांत: नरक उस जगह का नाम है जहाँ वो सब लोग पाए जाते हैं जो एक दूसरे से जुड़े थे सुख देने के लिए और सुख लेने के लिए, वही नरक होता है। यू स्क्रैच माय बैक…
श्रोता: आइ स्क्रैच योर बैक।
आचार्य प्रशांत: बैक और व्हाटएवर। मतलब, डिपेंड्स। और फिर कहते हो, अरे, यह क्या हो गया! सिलेंडर फट रहे हैं। जितने भी तरह के कांड होते हैं, कोई ड्रम में डल गया, कोई पंखे से लटक गया। जहाँ डिवोर्स नहीं है, वहाँ डिप्रेशन है।
वो समझते क्यों नहीं हो कि ये सब क्यों है। क्योंकि तुम रिश्ता बनाते ही हो इसीलिए कि मैं तुझे खुश रखूँगा, तू मुझे खुश रख। यह एक एग्ज़िस्टेंशियल एरर कर दी है, जिसको जीवन का एल्गोरिदम परमिट ही नहीं करता। आपने जो कोड लिखा है न, उसका डिज़ाइन ही ग़लत है। आप सोच रहे हो कि एक्सचेंजिंग प्लेज़र इज़ द पर्पस ऑफ़ रिलेशनशिप। नो। क्या प्लेज़र दोगे तुम? तुम ख़ुद बीमार हो। दूसरे को क्या प्लेज़र दोगे? और दूसरे की भी यही हालत है। वह ख़ुद एक बीमार व्यक्ति है, तुम्हें क्या प्लेज़र देगा?
एक कोविड का रोगी और एक टीबी का, ये दोनों गले मिल रहे हैं, कूद रहे हैं, फाँद रहे हैं। ये दोनों एक दूसरे को क्या देंगे? स्वास्थ्य? क्या देंगे?
श्रोता: बीमारी।
आचार्य प्रशांत: तो बस वही है, प्लेज़र दे दिया एक दूसरे को। सिम्प्टम्स आ जाएँगे, हफ़्ता दस दिन इंतज़ार कर लो।
रिश्ते फिर से याद रखिए, आपको अपने बंधन दिख रहे हैं तो उससे रिश्ता बनाइए, जो आपको चुनौती देता हो, आपके सामने आईने की तरह खड़ा होता हो, आपको आपकी बेड़ियाँ दिखा देता हो कि देखो अपने गले को, इसमें बेड़ियाँ ही बेड़ियाँ हैं। आपको अपने बंधन दिख रहे हों तो उससे रिश्ता बनाइए जो आपकी आज़ादी में सहायक हो। और आपको अगर दूसरे के बंधन दिख रहे हैं तो उसके सामने आईना बन के खड़े हो जाइए। यही राइट रिलेशनशिप है। इसके अलावा कुछ नहीं होती। एक्सचेंज ऑफ़ प्लेज़र और यह सब बेकार की बातें हैं। लेट देयर बी एन एक्सचेंज ऑफ़ रियलिटी। स्टैंड ऐज़ मिर्स टू ईच अदर।
और जिनको नहीं पसंद है मिरर फिर ठीक है। अगर किसी को मिरर नहीं पसंद है, इसका मतलब वो जानता है कि उसकी शक्ल कितनी ख़राब है। जो आईने नहीं देख सकता, आप उसको मत देखिए। बनिए लेकिन आईना ही।
होता उल्टा है। जिससे आप रिश्ते में होते हो, किसी को भी आईना दिखा दो, उसको कभी नहीं दिखाओगे। कहोगे, बुरा मान जाएगा, रूठ जाएगी, आईना दिखा दिया तो। जो तुमको हो पसंद, वही बात कहेंगे। तुम दिन को कहो रात, और इसको हम बहुत क्यूट मानते हैं, कि अरे देखिए, मिसेज अब वो पूछ रही थी कि मैं दुबली हो गई ना। मैंने कहा, दुबली क्या होता है, तुम कांटा हो गई हो, दिखाई नहीं दे रही हो, इसीलिए अब दूसरों को देख रहा हूँ।
जितना झूठ हम अपने तथाकथित चाहने वालों से बोलते हैं, उससे ज़्यादा झूठ किसी और से बोलते हैं? बताइएगा। झूठ बोलते भी हैं और झूठ चाहते भी हैं। कोई आपसे आकर सच बोल दे, आप रिश्ते ही तोड़ दोगे। आप कहोगे, सच बोलने के लिए तो दुनिया में बहुत लोग हैं, घर में तो कोई ऐसा चाहिए जो हमें मीठे झूठ चटाए। यह चलता है कि नहीं चलता है? हाँ, तो ये गड़बड़ है बात। लेकिन मीठा झूठ चाटना अच्छा नहीं, यह तब पता होता है जब अपनी ब्लड शुगर पता हो पहले। इसे कहते हैं आत्मज्ञान। क्या? एचबी वन एसी नापते चलो, रोज लेते चलो। जब पता चला, अरे फास्टिंग आई है 250, तब जो घर में गुड़ का ढेला बनकर बैठा है, वह फिर पसंद नहीं आएगा। जान जाओगे, गुड़ नहीं है ये, गुड़गुड़ है, ज़हर है। लेकिन उसके लिए पहले अपनी शुगर पता होनी चाहिए। आत्मज्ञान।
अच्छा आपको खूब पता भी हो कि आप डायबिटिक हो, हम और धीरे से चोरी से बिस्कुट ऐसे अपना ऐसे तोड़ के बस खाने ही वाले थे, पापी ज़बान, स्वाद की भूखी, और तभी कोई आकर के पट से हाथ पे मारे, रखो। अच्छा तो नहीं लगता ना, अच्छा तो नहीं लगता ना। पर ये रिश्ता सही है, ऐसा ही रिश्ता चाहिए। पर अच्छा कम से कम उस वक़्त तो नहीं लगता ना। और वही आ के कहे, अच्छा ठीक है, ले लो, कोई बात नहीं, मैं आगे कंपनसेट करा दूँगा। अच्छा खा लो, अभी मन कर रहा है तो खा लो। तो आ रहा है धन्य भाग्य। क्या साथी मिला है! वो साथी मिला है, वो ज़हर खिला रहा है तुमको तुम्हारा दिल रखने के लिए। पर अच्छा बहुत लगता है, ब्लड शुगर नापो, इससे पता चलेगा कि एलिवेशन हो रहा है कि नहीं।
आचार्य प्रशांत: थैंक यू सर।