अध्यात्म का अर्थ यह नहीं है कि रिश्ते तोड़ देने हैं। अध्यात्म का अर्थ है— घटिया रिश्ते को सुंदर बनाना है। बीमारी अगर जाती है तो 'स्वास्थ्य' प्रकट भी तो होता है। इसी तरीके से रिश्तों में, जब बंधन कटते हैं तो स्वस्थ संबंध प्रकट होता है। अध्यात्म सबकी मुक्ति के लिए है। इसलिए स्वयं मुक्त होते चलो और जिनसे संबंधित हो, उन सब के भी मुक्ति में सहायक बनो।
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प्रश्नकर्ता: सार्थक कर्मों की बात कही तो यह तो अभी स्पष्टता आती है कि जीवन में जैसे-जैसे मिलता जाता है, इच्छाएं बढ़ती जाती हैं, तब हम रुक नहीं पाते। तो यह भी समझ में आता है कि जैसे आपने बताया कि बंधन दिखे तो तोड़ दीजिए, तो यह सार्थक काम है। और बंधन नहीं हैं तो उसको 'क्रीड़ा' मानिए। बंधन को तोड़ना थोड़ा-सा कठिन मालूम पड़ता है, तो क्या करे कि मतलब पारिवारिक ज़िम्मेदारी के चलते और दूसरी इच्छाओं के चलते, या दोनों करते है तो कुछ लगता है कि बंधन है?
आचार्य प्रशांत: परिवार नहीं बंधन होता। बंधन सदा अपने भीतर होता है। जब भी हम कहते हैं कि परिवार है तो जॉब करना पड़ेगा, परिवार है तो बंधन है, यह है। यह सब बातें असली मुद्दे को छुपाने की कोशिश होती हैं।
कोई दूसरा आपको क्या बाँध लेगा? जीव का जन्म हुआ है, अपनी मुक्ति के लिए और दूसरे को भी मुक्ति देने के लिए। संबंध तोड़ने नहीं होते। हमारा तो जन्म ही हुआ है दूसरे को मुक्ति देने के लिए, तो दूसरे को मुक्ति देनी है, तो उससे संबंध तोड़ने होगें या बनाने होगें?
प्रश्नकर्ता: बनाने होगें।




