हिंदुस्तान में असंभव है कि एक किशोर बेटा अपने बाप से अपने हृदय की बात कहे। हमारी परंपरा में बेटा बाप के चरण स्पर्श कर सकता है, पर गले नहीं लगा सकता। जिसके साथ चीज़ सेट हो गई, चाहे वह बाप-बेटे का रिश्ता हो या पति-पत्नी का, वहाँ फिर किसी तरह की कोई जिज्ञासा, कोई आत्मीयता नहीं रह जाती। ऐसे रिश्ते बनाना चाहते हो जहाँ दूसरे के लिए प्राण भी दे सको, तो मित्रता कर लो। रिश्ता तो वही चलेगा जिसमें नाम से ज़्यादा दोस्ती है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। मैं पिछले दो महीने से गीता सत्र से जुड़ा हुआ हूँ। मेरे साथ एक समस्या है।आचार्य जी, मैं बचपन से अपने मम्मी-पापा को लड़ते-झगड़ते हुए देख रहा हूँ। इस समय मेरी उम्र फोर्टी-नाइन-ईयर्स (४९) की हो गई है और आज मेरे पिता जी की ऐज पचहत्तर साल (७५) और मम्मी की ऐज सत्तर साल (७०) करीब है।
अभी पिछले वीक (सप्ताह) एक घटना घटी, जिससे मैं बहुत परेशान हूँ। वो आज भी, इतनी उम्र के बाद भी अभी भी लड़ते रहते हैं। और एक दिन अभी, पिछले हफ़्ते उनमें इतनी लड़ाई हो गई, और बहुत छोटी-छोटी बातें रहती हैं, बहुत बड़ी बातें नहीं रहती, अगर आप उसको समझें तो बहुत, वो होता है कि ‘क्या है ये, ये भी कोई लड़ाई की बातें हो सकती हैं?’
और मेरे पिता जी जो पहले से भी थे मारने-पीटने में, वो मेरी मम्मी को मारने लगे और मैंने उनको इतना समझाने की कोशिश किया, उनको हटाने की कोशिश किया कि पिता जी मत करिए, अब तो ये, ऐसी, इतनी उम्र में भी ये सब चीज़ें, वो नहीं मानने को तैयार थे। तो पता नहीं, मेरे को उनको रोकने के लिए, मेरा भी उन पर एक हाथ उठ गया। और मेरा हाथ उठना था, उसके बाद वो शांत हो गए और मेरे को उल्टा-सीधा बोलने लगे। और इतना ही नहीं, मतलब जिन मम्मी के लिए मैं ये कर रहा था, वो मम्मी भी मुझे बोलने लगी कि — तुम कैसे बेटे हो कि तुमने अपने पिता जी पर हाथ उठा दिया।




