
प्रश्नकर्ता: बहुत से लोग हैं जो फाउंटेनहेड पढ़कर जीवन में कोई बदलाव नहीं ला पाते हैं। और दूसरी तरफ़ बहुत ऐसे भी लोग हैं जो इस पुस्तक को पढ़ने के बाद विद्युतीकृत हो जाते हैं। आचार्य जी मैं दूसरे लोगों की श्रेणी में आने के लिए क्या कर सकता हूँ?…






अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।
प्रश्नकर्ता: न आलस है, न उठा हुआ है, न सोया हुआ, कुछ ऐसा मतलब एक कंफ्यूजन (संशय) है कि क्या ये, ये क्या है? नींद भी है उसमें हल्की सी, जागृति भी है, अब जागृति का तो पता नहीं लेकिन कुछ है, विचार भी नहीं है लेकिन कुछ है। लेकिन…
पिछले वर्ष ईरान में 22 वर्षीया 'माशा अमीनी' की ईरानी पुलिस द्वारा हत्या हुई। पूरी दुनिया ने विरोध जताया। माशा ओमिनी का जुर्म क्या था? उसने हिजाब वैसे नहीं पहना था जैसा ईरानी सरकार का आदेश था।
इस बर्बर हत्या के बाद ईरान की सड़कों पर हज़ारों महिलाओं की…
Man’s basic vice, the source of all his evils, is the act of unfocusing his mind, the suspension of his consciousness, which is not blindness, but the refusal to see, not ignorance, but the refusal to know. Irrationality is the rejection of man’s means of survival and, therefore, a commitment…
पीरियड्स से महिलाएं कमजोर नहीं होतीं, फिर भी यह मान्यता सदियों से चली आ रही है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हर ऐसी मान्यता के पीछे किसी का डर या स्वार्थ छुपा होता है। सिर्फ तर्क या जानकारी से बदलाव नहीं आता, जब तक हम खुद अपने भीतर के इस डर या स्वार्थ को पहचानकर उससे मुक्त होने का चुनाव न करें। असली आज़ादी वहीं से शुरू होती है जहां हम मूर्खता की बातों को पीछे छोड़ना सीखते हैं और सोच-समझकर संगति का चुनाव करते हैं।
स्त्री-पुरुष के रिश्तों में समस्या केवल आकर्षण या कामना की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें दोनों एक-दूसरे को अपनी इच्छाओं का साधन बना लेते हैं। पुरुष स्त्री को शरीर और स्त्री पुरुष को धन, सुरक्षा या सुविधा के माध्यम के रूप में देखने लगती है। इससे निर्भरता, कुंठा और संघर्ष पैदा होते हैं। स्वस्थ संबंध के लिए आत्मज्ञान, स्पष्टता, समानता, स्वतंत्रता और अपनी इच्छाओं की विवेकपूर्ण जाँच ज़रूरी है। साथ ही, रिश्तों के बने-बनाए सामाजिक मॉडलों पर पुनर्विचार करना और किसी भी व्यक्ति को अपनी मुक्ति का साधन न बनाना आवश्यक है।

लड़कियों को बचपन से निर्भर बनाना उनकी क्षमता नहीं, उनकी स्वतंत्रता छीनता है। आर्थिक, बौद्धिक और व्यावहारिक आत्मनिर्भरता ही वास्तविक सम्मान और सुरक्षा का आधार है। समाज अक्सर उन्हें रूप, भावनाओं और दूसरों पर आश्रित रहने तक सीमित कर देता है, जबकि उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता आज़ादी है। जो भी शिक्षा, कौशल या संघर्ष स्वतंत्रता की ओर ले जाए, उसी पर पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए; बाकी सब उसके बाद है।

स्वतंत्रता केवल बाहरी प्रतिबंधों से मुक्त होने का नाम नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानसिक निर्भरता से ऊपर उठने का साहस भी है। दूसरों की राय, सुरक्षा के नाम पर लगाए गए बंधन और सामाजिक भय तभी प्रभावी होते हैं जब व्यक्ति उन पर निर्भर हो। गरिमा और आत्मनिर्भरता व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की शक्ति देती हैं। शांति, सम्मान और स्वतंत्र जीवन के लिए कभी-कभी सुविधा, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति की कीमत भी चुकानी पड़ती है।

व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें।

आर्थिक निर्भरता, भावनात्मक आघात और घरेलू हिंसा के बीच व्यक्ति अक्सर अपनी वास्तविक समस्या को पहचान नहीं पाता। रिश्ते कई बार प्रेम से अधिक मजबूरी और निर्भरता पर टिके होते हैं। आत्मनिर्भरता व्यक्ति को भय और विवशता से मुक्त कर सही निर्णय लेने की शक्ति देती है। दूसरों की सहायता करने से पहले स्वयं को सुरक्षित, स्वतंत्र और सशक्त बनाना आवश्यक है, क्योंकि स्वतंत्रता के बिना न संबंध स्वस्थ हो सकते हैं और न जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय।

सच्चा जीवन समाज के दबाव या तथाकथित “पैशन” के पीछे चलने से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर दोनों प्रकार की गुलामी से मुक्त होने से शुरू होता है। अक्सर जिसे अपनी पसंद या पैशन समझा जाता है, वह भी सामाजिक संस्कारों का परिणाम होता है। जब व्यक्ति स्वयं को गहराई से समझकर स्वतंत्र निर्णय लेता है, तब उसका कर्म स्वाभाविक, सार्थक और समाजोपयोगी बनता है। भय और सुरक्षा की मानसिकता से ऊपर उठकर भी गरिमापूर्ण, संतुलित और आर्थिक रूप से पर्याप्त जीवन जिया जा सकता है।

आप सोचते हैं कि संसद में 33% महिलाएँ आ जाएँगी तो सशक्तिकरण हो जाएगा, लेकिन जब ज़मीन पर ही लड़कियों को स्वतंत्र होने नहीं दिया जाता, तो संसद तक पहुँचेंगी कौन? वही महिलाएँ जो पहले से सत्ता के सहारे हैं। असली बदलाव आरक्षण से नहीं, घर और समाज में महिला की स्वतंत्रता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से आएगा। वरना यह सिर्फ़ एक सजावटी परिवर्तन रह जाएगा।

युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।

महिला का सबसे ज़्यादा अपमान तो खुद महिला करती है। नाम है ‘शक्ति’ और जीवन है पूरा ‘अशक्त’। अगर लड़की इतनी ही बुरी चीज़ है, तो आप क्यों लड़की हो? आप खुद जिस लिंग की हो, आप उस लिंग के प्रति भी अपमान से भरी हुई हो। पाँच करोड़ महिलाएँ भारत की आबादी से गायब हैं। इनकी हत्या करी गयी है। इससे बड़ा नरसंहार कोई होगा। ये सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए देश में, बहस में, मीडिया में। लेकिन इसकी कोई बात नहीं करना चाहता। क्योंकि ये नारीसंहार है, इसीलिए इसे नरसंहार भी नहीं माना जाता।

जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।

आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ये ख़तरनाक बात है। स्त्रियों के लिए विशेषतया ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाए। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। बात तुलना की नहीं है, बात आत्मनिर्भरता की है।

आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ये ख़तरनाक बात है। स्त्री के लिए तो बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाए। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। बात तुलना की नहीं है, बात आत्मनिर्भरता की है।

यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।

कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है।

वो सब बातें, कि “माँ से ऊँची जगह तो भगवान की भी नहीं होती,” वग़ैरह-वग़ैरह। सुना है न खूब? न पढ़ी-लिखी हो, न उसमें कोई गुण हो, न संसार को जानती हो, न अध्यात्म को जानती हो; ऐसा इंसान अगर गर्भधारण कर ले, तो क्या वो भगवान के बराबर हो जाएगा? अगर पुरुष का पहला धर्म बाप बनना नहीं है, तो स्त्री के लिए मातृत्व पहली चीज़ कैसे हो गई? आप एक मनुष्य हैं, महिला बाद में हैं। आपका भी अपने प्रति वही कर्तव्य है, जो एक पुरुष का होता है: चेतना को उसकी ऊँचाइयों तक पहुँचाना।

यह जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, यह अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। यह निरुद्देश्य हो कैसे सकती है? जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं डिज़ीज़लेस हूँ। एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो तो आपके पास एक धधकता हुआ उद्देश्य होना चाहिए। क्या? बुखार उतारना है भाई! इसी तरह से जब तक ‘मैं’ है, उद्देश्य होना चाहिए। और वो उद्देश्य होगा उस ‘मैं’ की शांति।

‘मुझे किसी की फीलिंग्स नहीं हर्ट करनी है। मुझसे मम्मी-पापा के आँसू नहीं देखे जाते। मैं गिल्टी फील करने लगती हूँ।’ गिल्टी फील करना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है लेकिन सही वजह से गिल्टी फील करो न। असली गलती यह है कि आप अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। न ज्ञान है, न कला है, न कौशल है, न अनुभव है, कुछ नहीं है, दुनिया देखी नहीं है। महिला वग़ैरह आप बहुत बाद में हैं, सबसे पहले आप इंसान हैं और इंसान होने का मतलब ही होता है कि चेतना होना।

धन माने जिसकी अपनी कोई चेतना नहीं। धन माने जो सदा किसी और के स्वामित्व में रहेगा, वो धन है। धन कभी बोल नहीं सकता कि मैं अपने हिसाब से खर्च होऊँगा। धन ऐसा बोल सकता है? धन माने वो जो किसी की प्रॉपर्टी है। और अगर आपको किसी का इस्तेमाल अपने हिसाब से करना है, तो बहुत ज़रूरी है कि उसकी चेतना उससे छीन कर उसे ऐसे ही जड़ बना दो। बात ये नहीं है कि स्त्री पराया धन है, कि अपना धन है — वो धन क्यों है? किसी का धन नहीं है वो, वो एक स्वतंत्र चेतना है, मनुष्य है।

तुम बात-बात पर यदि निर्भर रहो, ‘पैसे दे दो, सुरक्षा दे दो,’ तुम्हें क्या लगता है, जो कोई तुम्हें यह सब कुछ देगा, तुमसे इनकी कीमत नहीं वसूलेगा? जिस लड़की के कदम खुले आकाश में नहीं निकले, जिसने दुनिया नहीं नापी, जो शिक्षित नहीं है, जो कमाती नहीं है, जिसका मन खुला हुआ नहीं है, सबसे ज़्यादा संभावना उसी लड़की के शोषण की है। घर के बाहर निःसंदेह खतरा है, पर घर के भीतर और बड़ा खतरा है। सुरक्षा तुम्हें सबसे ज़्यादा पिंजड़ों में मिलती है, पर फिर पिंजड़ों में तुम उड़ भी नहीं सकते। भूलना नहीं इस बात को।

ये जो विमेन बॉक्सिंग रिंग है, ये सिर्फ़ एक रिंग नहीं है, ये उस संघर्ष की निशानी है, जो महिलाओं ने बहुत शताब्दियों तक किया है। ‘मिलियन डॉलर बेबी’ फ़िल्म है जिसमें एक महिला बॉक्सर चैंपियन कह रही है कि “मुझे मृत्यु तक मंज़ूर है, लेकिन गरिमाहीन जीवन मंज़ूर नहीं है।” महिला की उन्नति पर सिर्फ़ महिला की उन्नति निर्भर नहीं करती; पुरुष, राष्ट्र और पूरा विश्व भी इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि महिला अपने आप को महिला से ज़्यादा मनुष्य जानना शुरू करे।

गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे। ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है।

अगर आपको कोई छेड़ रहा हो लड़का और मैं आकर के वहीं पर सशरीर उस लड़के को रोक दूं और उसको भगा दूं तो आपको लगेगा आचार्य जी ने मदद करी। लेकिन अगर मैं ऐसा माहौल पैदा कर रहा हूं कि जिसमें यह छेड़ाछाड़ी की घटनाएं घटे ही कम तो बात उतनी साफ-साफ पता नहीं चलती। ऐसा लगता नहीं कि कुछ हुआ। लेकिन असली महत्व का काम तो यही है कि सारी बदतमीजियां मन से पैदा होती हैं और मन को ही साफ करना पड़ेगा। लेकिन इस प्रक्रिया में समय लग सकता है। तो जो टैक्टिकल एक्शन होता है, जो तत्काल करना होता है, वो चीज यह नहीं होती।

जो हमें कहा जाता है कि "इंडियन वूमन की तो बात ही दूसरी होती है। वह तो होती ही कमज़ोर है, भावुक बहुत होती है।" नहीं, कमज़ोर नहीं होती। और उसका प्रमाण यह है कि उसने गोरी महिलाओं को हराया है। और किस मैदान में? भावना के मैदान में नहीं, खेल के मैदान में। जूझती हुई लड़की ज़्यादातर लोगों को पसंद नहीं आएगी, क्योंकि अगर वो क्रिकेट में या बैडमिंटन में जूझ सकती है, तो फिर वो समाज से भी जूझ सकती है। लड़की को तो जुझारू होना ही पड़ेगा, क्योंकि बहुत-बहुत ज़्यादा संभावना है कि वो जहाँ भी जाएगी, उसको माहौल प्रतिकूल ही मिलेगा।

वो जो भीतर बैठ के ये भी कह रहा है कि "मैं बर्बाद हो गया," वो बस यही कह रहा है कि जो ऑब्जेक्ट मुझे अच्छा लगता था, मुझे वो नहीं मिला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके पास अब कोई ऑब्जेक्ट नहीं है। इसका मतलब ये है कि वो अभी भी कोई और ऑब्जेक्ट पकड़ कर बैठा ही हुआ है। तो सारे दुख की वजह ये नहीं होती कि ऑब्जेक्ट नहीं है। उसकी वजह होती है कि ईगो अभी भी है, डिज़ायर अभी भी है। और "मुझसे कुछ नहीं होगा" ये आईडिया अभी भी है।

अहंकार पूरी ज़िंदगी आत्मरक्षा के अलावा और कुछ नहीं कर रहा होता। 'मुझे अपने आप को बचाना है,' और अगर उसे अपने आप को बचाना है, तो वो अपने लिए कोई कठिन लक्ष्य चुनेगा क्या? यह मत कहो कि 'मुझे जो पसंद है, मैं वो काम करूँगा,' तुम वो काम करोगे तो फिर कुछ बदलेगा भी नहीं। जहाँ दिख रहा है कि कमज़ोरी है, वहाँ जाओ — भले ही वहाँ कुछ लाभ न हो रहा हो, भले ही वहाँ कोई पूछने वाला न हो। वहाँ पर ठीक है, पोल खुलेगी, थोड़ी बेइज़्ज़ती होगी, लेकिन कमज़ोरी टूटेगी।

एक क्रांतिकारी को उसकी वीरता के लिए जितना श्रेय मिलता है, उससे ज़्यादा श्रेय उसकी माँ को मिलना चाहिए। माँ चाहिए, जो बताए बेटे को कि तुम वो हो, जो शरीर के जाने के बाद भी नहीं मर सकता; तो मौत से घबराना कैसा? "न हन्यते हन्यमाने शरीरे।" भारत को अगर वीरों का देश बनाना है तो सर्वप्रथम हमने माँ का जो विकृत आदर्श खड़ा कर दिया है, इसको ढहाना पड़ेगा।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

आप मुक्त हो तो आपकी आँखें सुंदर, आपकी काया सुंदर, आपके कर्म सुंदर, आपके वचन सुंदर, आपका जीवन सुंदर। अगर आप मुक्त हो तो आपका जो कुछ है, सब सुंदर हो जाएगा। और अगर आप मुक्त नहीं हो तो आपका जो कुछ है, वो सब बहुत ही विकृत और कुरूप रहेगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका घर भी सुंदर हो जाएगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका ग्रह भी सुंदर हो जाएगा। ग्रह भी और गृह भी।

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…

अपने ख़िलाफ़ जाना ही सबसे मुश्किल होता है। जो अपने ख़िलाफ़ जा सकता है, वही ‘अपने’ को पाता है। आमतौर पर हम एक संस्कारित मशीन की भाँति पुराने बहाव में बहे चले जाते हैं। लेकिन अपनी वृत्तियों और संस्कारों के बहाव को तोड़ा जा सकता है। संस्कारों का तूफ़ान आता है और तुम उसमें थोड़ी देर के लिए अडिग खड़े हो जाओ — यह तुम्हारा विद्रोह हुआ। इसी विद्रोह का नाम अध्यात्म है।

अपना दृष्टा होने का मतलब ये होता है कि मैं बस देखूँगा कि मैं कितना बिगड़ा हुआ हूँ। सुधारने का मेरा कोई इरादा नहीं है, कोई इरादा नहीं है। इरादा लेकर के जो ख़ुद को देखेगा, वो फंस गया। परपज़लेस, पूरे तरीक़े से परपज़लेस होना चाहिए आत्म-दर्शन, आत्मवलोकन।

प्रकृति ने ही स्त्री को ऐसा बना दिया है कि उसका देह से बड़ा सरोकार रहता है और उसमें आसक्ति, मोह और ममता पुरुष से कहीं ज़्यादा प्रबलता से मौजूद रहते हैं। यह स्थिति तब और भी बुरी हो जाती है, जब उसे समाज भी संस्कारित कर देता है कि तुम्हारा गहना तो लज्जा और ममता ही हैं। ये चीज़ स्त्रियों ने आत्मसात् कर ली है, अब वो बंधनों का चुनाव ख़ुद कर लेती हैं। अगर स्त्री की ही सहमति न हो, तो पुरुष इतने समय तक और इतनी आसानी से उसको दबाकर नहीं रख पाएगा।

यूँ ही कुछ हो नहीं जाता, सब कुछ चुनाव है। बहुत समय तक तुम एक ही चुनाव को दोहराते रहे हो। अब तुम्हारे सिस्टम ने उस चुनाव को पकड़ लिया है और डिफ़ॉल्ट बना दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कभी भी तुमसे चुनने का अधिकार छीना जा सकता है। तुम्हारे ही चुनाव से तुम्हारी दुर्गति हुई है और तुम्हारा ही चुनाव तुम्हारा कल्याण करेगा। कोई बाहरी ताक़त आकर तुम्हारा उद्धार नहीं करने वाली। तुम्हारा जो कुछ भी है, वो बस तुमसे है।

मनुष्य ही है जो बंधन का अनुभव करता है, इसलिए उसे अर्थ चाहिए। ज़िंदगी मिली है भीतरी बंधन तोड़ने के लिए, न कि भीड़ या रेस में दौड़ने के लिए। हमें लगता है रेस में दौड़ने वाले मेहनत कर रहे हैं, पर वो मौज कर रहे हैं। निरर्थक काम करने में तो मेहनत लगती है, लेकिन अकेले चलने और सार्थक काम करने में उससे कहीं ज़्यादा मेहनत लगती है। खोजो वो, जो जीवन को अर्थपूर्ण बना दे। भीड़ में जीवन नहीं लगाना है, क्योंकि भीड़ में निरर्थकता है। उस निरर्थकता से बचना ही सार्थकता है।

यहाँ जिस प्रेम की बात हो रही है, वो वो प्रेम है जहाँ दूसरे के होने से आपका होना मिट जाता है, गाढ़ा नहीं हो जाता, बढ़ नहीं जाता। "तुम ही हो जिसमें सारी सत्यता है। और तुम यदि सामने हो, तो मैं पूरी तरह असत्य हो गया।" ग़ज़ब का प्रेम है ये। "सारी सत्यता तुम में है, तो फिर तुम्हारे सामने मैं क्या हो गया? मैं असत्य हो गया और असत्य माने, जो फिर है ही नहीं। नकली, मिथ्या।"

तुम्हारे पास सम्यक युद्ध नहीं है लड़ने को तो फिर तुम अपनी परेशानियों से लड़ोगे, क्योंकि युद्धरत तो सबको रहना है। कोई है जो असली लड़ाई लड़ रहा होता है, और जो असली लड़ाई में नही उतरेगा वो फिर नकली लड़ाई लड़ता है। नकली लड़ाई यही होती है, अरे मैं परेशान हूँ! अरे मुझे यह दुःख है!

ऋषियों ने कहा कि देखो, बाण से छूटा हुआ तीर तो लौट के नहीं आता न। कुछ काम ऐसे होते हैं, जो भविष्य में अपना फल दिखाएँगे ही। अब ये किया था आपने, आपने छोड़ दिया। छोड़ने के तुरंत बाद आपको पता चल गया कि गलती हो गई, तो क्या होगा? अब तो वो जिसको लगना है लगेगा। यही बात मुँह से निकले शब्द से होती है।

जब भी विज्ञान और लोकधर्म आमने-सामने आएँगे, लोकधर्म मुँह की खाएगा, क्योंकि लोकधर्म किससे बना है? कल्पना और भावना से। और कल्पना और भावना, तथ्य से नीचे की बातें होती हैं, विज्ञान तथ्यों पर चलता है। लेकिन विज्ञान से भी ऊपर क्या है? अध्यात्म। क्योंकि विज्ञान, सब कुछ हटा देने के बाद भी कल्पना, भावना, इत्यादि कचरा हटा देने के बाद भी, एक द्वैत में तो विश्वास करता ही है न?

शारीरिक रूप से तो परनिर्भरता रहेगी, लेकिन जब परनिर्भरता मानसिक बन जाती है, तो वह बहुत ख़तरनाक हो जाती है। अगर आप देह हैं, तो परनिर्भरता ठीक है, लेकिन आप देह भर नहीं हैं। जब हम स्वयं को देह ही समझ लेते हैं, तो देह का दर्द चेतना का दुख बन जाता है — यह बहुत बड़ी ग़ुलामी है। आपके भीतर कुछ ऐसा है जो आज़ादी के लिए फड़फड़ाता है। जब आपका होना किसी भी विषय के होने से आज़ाद हो जाता है, तब आपका होना सार्थक हो जाता है, और आप सही तरीक़े से जीने के लिए मुक्त हो जाते हो।

लोग भी न बंदा देख कर और शक्ल देख कर बोलते हैं। तुम शेर की तरह रहो, शेर की तरह जियो, किसी की हिम्मत नहीं होनी चाहिए तुम पर आक्षेप या आपत्ति करने की।

पुरुष रिश्तों में कठोर और शोषक रहे हैं, आप भी कठोर और शोषक हो जाएँ, तो आप आधुनिक नहीं हो गईं। आधुनिकता के नाम पर सेक्शुअलिटी का वेपनाइज़ेशन खूब चल रहा है। मुआवज़ा उगाहने की माँग को छोड़िए। मुआवज़े की ज़िंदगी जियोगे, तो आत्मसम्मान खो बैठोगे। बिल्कुल हो सकता है कि आपके पति, पिता, भाई, परंपरा, समाज ने आपका नुकसान किया हो। लेकिन इनको दोष देते रहने से कुछ नहीं होने वाला। अपनी ज़िंदगी अपने हाथों में लीजिए। ख़ुद भी मुक्त जियो और दूसरे को भी मुक्ति दो।

लड़की को यह रोल असाइन ही नहीं किया गया कि उसका शरीर मज़बूत रहे — ताकि वह भी दमखम से कभी लड़ सके। यह काम समाज ने उसे दिया ही नहीं। और समाज की जो बात है, लड़की ने उसे बहुत गहराई से स्वीकार कर लिया है — बिना सवाल उठाए, बिना विरोध किए। अगर सेल्फ-कॉन्सेप्ट ही कमज़ोरी पर आधारित है, तो आप अपने शरीर को कभी एक सीमा से ज़्यादा मज़बूत होने ही नहीं देंगे। इसमें आपको क्या महिला सशक्तिकरण मिलने वाला है?

महिला दुनिया के हर उस काम में बराबर हो सकती है, जहाँ मनुष्य देह नहीं, चेतना है। वो ज़बरदस्त बॉम्बिंग कर सकती है। वो बेस्ट फाइटर पायलट हो सकती है। पर उससे कहो, “नहीं, तुम्हें दुश्मन की सीमा में घुसकर मुक्कों से मारना है।” तो वो ये नहीं कर पाएगी, क्योंकि मुक्का देह है और फाइटर प्लेन दिमाग है। महिला का पहला बंधन तो उसकी देह ही है। देह से स्वार्थ मत बाँधो। अपने शरीर को न तो अपनी पूँजी मानो, न अपना हथियार। ज्ञान शरीर से बहुत ऊँची बात है।

शरीर भी 80-90% एक महिला का एक पुरुष जैसा ही होता है। किडनी, लिवर, हार्ट इसमें क्या जेंडर देख के होता है ट्रांसप्लांट?और खून और दवाइयाँ और वैक्सीन्स, दाँत ये सब जेंडर देख के चलते हैं क्या? तो पहली बात तो चेतना, दोनों की ही चेतना मनुष्य की चेतना है मुक्ति माँगती है। दोनों का आईक्यू लगभग एक जैसा होता है दोनों जीवन में वास्तव में एक ही महान लक्ष्य के लिए पैदा हुए हैं रही शरीर की बात तो शरीर भी 80- 90% भाई एक ही है। ये तो काम वासना का जलवा है कि हमको दूसरे के शरीर में बस वही चीज़ें दिखाई देती हैं जो हमसे विपरीत है।