
आचार्य प्रशांत: स्त्री के लिए तो बहुत-बहुत ज़रूरी है अपने पाँव पर खड़ा होना। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। आदमी के लिए भी ज़रूरी है, औरत के लिए भी। पर लड़कियों के लिए, स्त्रियों के लिए विशेषतया ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाएँ।
और प्रकृति का खेल कुछ ऐसा है कि आर्थिक रूप से सबसे ज़्यादा पराश्रित स्त्रियों को ही होना पड़ता है। शादी हो गई तो नौकरी छोड़ दो, क्योंकि पति दूसरे शहर में रहता है। लो, हो गई बेरोज़गार। हो गई न बेरोज़गार? पति थोड़ी नौकरी छोड़ता है कभी। नौकरी हमेशा कौन छोड़े? लड़की छोड़े।
अब इतना आसान है दूसरी जगह पर नौकरी मिल जाना? गई! अपना व्यवसाय आसानी से वो चला नहीं सकती, क्योंकि व्यवसाय में दौड़-धूप करनी पड़ती है और मन में ये बात बैठ गई है कि दौड़-धूप करना लड़कियों का काम नहीं है।
प्रश्नकर्ता: सर, ऐसा भी है कि बाहर काम करना है तो उसके लिए फिर घर को भी देखो तुम।
आचार्य प्रशांत: और अगर दौड़-धूप कर रहा है तो साथ-ही-साथ घर को भी देखो, दुना बोझ। जब दुना बोझ रहेगा तो बाहर सफलता मिलने की संभावना कम हो जाएगी। सफलता न मिले तो ये ठप्पा लग जाएगा कि इनसे बाहर का कोई काम तो होता नहीं। चली थी बहुत फ़न्ने-खाँ बनने। लो, पैसा भी डुबो दिया, असफलता भी मिली। और उसके बाद अगर मातृत्व आ गया तो महीनों-महीनों तक घर पर बैठो। वो भी ज़िंदगी में एक बार नहीं। हो सकता है दो बार, चार बार और बैठे रहो घर पर।
एक बार घर पर बैठ जाओ कुछ महीने या कुछ साल, तो उसके बाद अपनी जो तीक्ष्णता होती है, जो शार्पनेस होती है, वो भी कुंद हो जाती है। तलवार को ज़ंग लग जाता है। फिर बाहर निकलने का ख़ुद ही मन नहीं करता।
एक बार तुम्हारा गृहिणी बनने में मन लग गया, उसके बाद तुम चाहोगी ही नहीं कि मैं बाहर निकलूँ।
और अपना आराम से घर में गृहिणी बनकर, पराश्रित बनकर पड़ी रहोगी।
आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। तो अहंकार की ख़ातिर सही, लेकिन उसे उठकर के बाहर निकलना पड़ता है कि कुछ कमाऊँ। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। कोई ताना नहीं मारेगा, वो पड़ी हुई है बढ़िया। ये ख़तरनाक बात है, इससे बचना। समझ रहे हो?
कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। कोई हो घर में तुम्हारा पिता हो, पति हो वो हो सकता है एक लाख कमाता हो, पाँच लाख कमाता हो। उससे तुलना मत करो अपनी। अगर तुम बहुत नहीं कमा पा रही हो, तो दस ही हज़ार कमाओ। पर इतना तो रहे न कि मुँह में जो टुकड़ा जा रहा है, वो अपना है।
ये मत कह देना कि पति जब एक लाख कमाता है तो मुझे कमाने की क्या ज़रूरत है? और इस तरह की बातें अक्सर प्रेम के नाम पर चल जाती हैं कि “प्रिय,” हिमांश पूरा करेगा मेरी बात को। करो, बेटा।
श्रोता: “मैं कमा रहा हूँ तो तुम्हें क्या ज़रूरत है?”
आचार्य प्रशांत: सुना? “जब हम कमा ही रहे हैं तो तुम्हें क्या ज़रूरत है? बेगम, घर में रानी बन के बैठो।”
अरे, तब तो अच्छा लगता है न सुनने में? कि बिना मेहनत के ही हुज़ूर बोल रहे हैं कि घर में रानी बनकर बैठो। और तब तो लगता है कि पुरुष इतने प्रेम से आग्रह कर रहा है कि घर में ही बैठो, और हम कमाने निकल जाएँ तो इस बेचारे का दिल टूट जाएगा। तो इसका दिल रखने के लिए हम घर में बैठते हैं।
वो ज़रा साल, दो साल, चार साल बाद पता चलता है कि खेल तो दूसरा था। बाहर निकलो, ढूँढ़ो। शुरू करने के लिए कोई काम छोटा नहीं होता। और तुलना मत करना, फिर कह रहा हूँ, कि पति इतनी बड़ी नौकरी करते हैं तो मैं कोई छोटी-सी नौकरी कैसे कर लूँ। बात तुलना की नहीं है। बात आत्मनिर्भरता की है।
तुम पाँच हज़ार, दस हज़ार, जितना न्यूनतम कमा सकती हो, उतने से ही शुरू कर लो। बाद में बढ़ता रहेगा, अभी शुरुआत तो करो। और किसी को बेरोज़गार रखने का ही बड़ा अच्छा तरीका होता है कि “हाँ-हाँ, कर लेना नौकरी, जब कम से कम पचास हज़ार की मिल जाए तो कर लेना।” न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी; न तुम्हें पचास हज़ार वाली मिलेगी, न करने की नौबत आएगी।
ऐसे नहीं बाहर निकलो, पूरा व्यक्तित्व बदल जाएगा। घर में घुसे-घुसे व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। समझ रहे हो? बाहर निकलो।
मैं घर के काम को छोटा नहीं कह रहा। मैं सिर्फ़ ये कह रहा हूँ कि जो घर में क़ैद है, उसे दुनिया का कुछ पता ही नहीं चलेगा। उस काम का प्रकार कुछ ऐसा है कि वो तुम्हारे विकास में बाधा बनता है। वही काम तुम निरंतर करते रहते हो न। दुनिया में बाहर निकलते हो तो विकास की पचास संभावनाएँ होती हैं।
घर में अपनी माँओं को देखा होगा, वो चालीस साल पहले भी रोटी ही बनाती थीं और आज भी रोटी ही बनाती हैं। बाहर निकलते हो तो प्रोन्नति होती है न, प्रमोशन। गृहिणी का कोई प्रमोशन होता है? काम में बुराई नहीं है, पर काम में विकास भी तो हो। वो पहले भी दाल बनाती थी, आज भी दाल ही बनाती है। फिर उसने सीखा क्या? उसकी तरक़्क़ी कहाँ हुई?
और घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। हम बार-बार कहते हैं, तथ्य सत्य का द्वार है। उसे तथ्यों का ही नहीं पता चलता, जब तक तुम दुनिया में निकल नहीं रहे। सड़कों की धूल नहीं फाँक रहे, बाज़ारों से रूबरू नहीं हो रहे, तुम्हें क्या पता चलेगा?
घर का काम भी करो, मैं पुरुषों से भी कहता हूँ, घर का काम भी करो, और स्त्रियों से भी कहता हूँ, घर का काम भी करो। पर अगर तुम ऐसे हो कि घर का काम ही कर रहे हो, तो तुम्हारा विकास बाधित हो जाएगा। मैं दोहरा के कह रहा हूँ ताकि किसी को ग़लतफ़हमी न हो जाए, मैं घर के काम को छोटा नहीं मानता। घर अपना है तो घर के सारे काम अपने हैं। छोटे कैसे हो सकते हैं? किसी और का घर थोड़ी है, अपना ही तो घर है। तो उनको मैं छोटा नहीं कह रहा। पर घर के काम की सीमाओं को समझना आवश्यक है। समझ रहे हो? कमाओ। बाहर निकलो और कमाओ।