किसी भी समुदाय की अपनी भाषा में उतनी ही निष्ठा होगी, जितना उसके भीतर अपनी हस्ती के प्रति आत्मविश्वास होगा। भारत की पहचान रहा है — धर्म; जीवन के प्रति समझ और गहराई। मूल पहचान के साथ संस्कृति का अटूट रिश्ता होता है और भाषा संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। जितना एक भारतीय में धर्म के प्रति विश्वास होगा, उतने ही विश्वास से वह अपनी भाषा के साथ खड़ा हो पाएगा। यदि धर्म के प्रति अपमान-भाव पैदा होगा तो भाषा नहीं टिकेगी।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मुझे अभी पता लगा कि आज विश्व हिंदी दिवस है। थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि हिंदी भाषा को विश्व में स्थान प्राप्त है। जब मैंने आगे अनुसंधान किया तो पता लगा कि विश्व भर में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली ये चौथी भाषा है। संस्था का एक स्वयंसेवक होने की वजह से विश्व भर में लोगों से बात करने का मौका मिलता है।
एक वाक्य है, एक श्रोता हैं जो आपको सुनती हैं। वो साउथ अमेरिका में एक जगह है, सूरीनाम। उनसे बातचीत हो रही थी। वो आपको सुनती हैं तो हम हिंदी में ही बात कर रहे थे, पर आगे पता लगा कि उनकी मातृभाषा डच है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज भारतीय थे और वहाँ थोड़ी बहुत हिंदी बोली जाती है, बहुत कम। लेकिन जब से वो आपको हिंदी में सुन रही हैं तो अब वापस से एक चलन-सा हो गया कि वो हिंदी बोलना शुरू कर रही हैं।
उसी तरह दुबई में एक श्रोता हैं। वो आपको सुनती हैं और एक ज़माने में न उन्हें हिंदी सुनना भी समझ में नहीं आती थी। अब वो न केवल बोलती हैं बल्कि लिखती भी हैं। तो एक तरफ़ा देखने को मिलता है कि विश्व भर में लोग हिंदी की तरफ़ आकर्षित होते जा रहे हैं। आज विश्व हिंदी दिवस था और सोशल मीडिया में कहीं भी कुछ पढ़ने को नहीं मिला, न पता लगा। अभी भी किसी ने मेसेज किया है कि आज ऐसा है, तो पता चला। तो आज कोई बड़ी बात नहीं है कि यहाँ बैठे श्रोता या जो ऑनलाइन हमें सुन रहे हैं, उन्हें भी इसका पता न हो। तो इस दिवस पर, विश्व हिंदी दिवस पर, आप कुछ बोलने की अनुकंपा करें।




