
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मुझे अभी पता लगा कि आज विश्व हिंदी दिवस है। थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि हिंदी भाषा को विश्व में स्थान प्राप्त है। जब मैंने आगे अनुसंधान किया तो पता लगा कि विश्व भर में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली ये चौथी भाषा है। संस्था का एक स्वयंसेवक होने की वजह से विश्व भर में लोगों से बात करने का मौका मिलता है।
एक वाक्य है, एक श्रोता हैं जो आपको सुनती हैं। वो साउथ अमेरिका में एक जगह है, सूरीनाम। उनसे बातचीत हो रही थी। वो आपको सुनती हैं तो हम हिंदी में ही बात कर रहे थे, पर आगे पता लगा कि उनकी मातृभाषा डच है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज भारतीय थे और वहाँ थोड़ी बहुत हिंदी बोली जाती है, बहुत कम। लेकिन जब से वो आपको हिंदी में सुन रही हैं तो अब वापस से एक चलन-सा हो गया कि वो हिंदी बोलना शुरू कर रही हैं।
उसी तरह दुबई में एक श्रोता हैं। वो आपको सुनती हैं और एक ज़माने में न उन्हें हिंदी सुनना भी समझ में नहीं आती थी। अब वो न केवल बोलती हैं बल्कि लिखती भी हैं। तो एक तरफ़ा देखने को मिलता है कि विश्व भर में लोग हिंदी की तरफ़ आकर्षित होते जा रहे हैं। आज विश्व हिंदी दिवस था और सोशल मीडिया में कहीं भी कुछ पढ़ने को नहीं मिला, न पता लगा। अभी भी किसी ने मेसेज किया है कि आज ऐसा है, तो पता चला। तो आज कोई बड़ी बात नहीं है कि यहाँ बैठे श्रोता या जो ऑनलाइन हमें सुन रहे हैं, उन्हें भी इसका पता न हो। तो इस दिवस पर, विश्व हिंदी दिवस पर, आप कुछ बोलने की अनुकंपा करें।
आचार्य प्रशांत: हिंदी की स्थिति फिलहाल ऐसी है कि वो जिनके द्वारा बोली भी जा रही है, उनके लिए एक मजबूरी की तरह है। उनका चुनाव नहीं है, उनकी विवशता है। एक ऐसी विवशता है, जिससे वो जल्दी से जल्दी पिंड छुड़ा लेना चाहते हैं। ऐसी विवशता जिससे वे धीरे-धीरे आज़ाद हुए ही जा रहे हैं। स्वेच्छा से तो बहुत कम लोग हैं अब जो हिंदी वाले हैं।
अगर सिर्फ़ आँकड़ों पर जाएँ तो दुनिया की पाँच सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में है हिंदी, तीसरे या चौथे स्थान पर शायद काबिज़ है। लेकिन ये आँकड़ा झूठी सांत्वना देता है, सच्चाई दूसरी है। सच्चाई ये है कि ज़्यादातर लोग जो हिंदी बोलते हैं, वे हिंदी सिर्फ़ इसलिए बोलते हैं क्योंकि हिंदी उनकी आदत का हिस्सा है। इसीलिए वो हिंदी में भी जितना ज़्यादा हो सकता है उतना ज़्यादा अन्य भाषाओं का, विशेषकर अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करते हैं। अगर अंग्रेज़ी पर उनका हाथ थोड़ा और साफ़ होता, अगर अंग्रेज़ी पर उनकी पकड़ थोड़ी और मज़बूत होती, उनका अगर बस चलता तो वे हिंदी बिल्कुल ही न बोलते। जितनी बोल भी रहे हैं हिंदी, उतनी मजबूरी वश बोल रहे हैं। अंग्रेज़ी पूरी तरह अभी आती नहीं, अंग्रेज़ी में अभी पूरे तरीक़े से प्रवीण हुए नहीं, धारा-प्रवाह फ़र्राटेदार अभी अंग्रेज़ी पर उनका अधिकार हुआ नहीं। कुशलतापूर्वक अपने सब भावों और ख़्यालों को अंग्रेज़ी में व्यक्त कर पाते नहीं। इसीलिए बेचारों को थोड़ा-बहुत अभी हिंदी का सहारा ले लेना पड़ता है, और धीरे-धीरे करके वो सहारा लेने की ज़रूरत भी कम होती जा रही है।
हिंदी बोलने वाले तो अभी भी बहुत हैं, लेकिन ज़रा देखिएगा कि हिंदी लिखने वालों की तादाद कितनी बची है।
पहली बात तो हिंदी बहुत-बहुत कम लिखी जा रही है अन्य भाषाओं की अपेक्षा। और जो थोड़ी बहुत लिखी भी जा रही है, सामान्य प्रयोग में बिल्कुल निचले तल की, वो अक्सर रोमन लिपि में लिखी जा रही है। देवनागरी में हिंदी लिखना और भी कम हो गया है।
अब कहने को तो हिंदी फ़िल्म उद्योग दुनिया के बड़े फ़िल्म उद्योगों में से है, पर अगर आप हिंदी फ़िल्मों के संवादों को ही ध्यान से सुनें तो स्पष्ट हो जाएगा कि वो जिस मन को दर्शा रहे हैं वो मन हिंदी को बस झेल रहा है। उस मन में हिंदी के सौंदर्य के लिए कोई प्रेम या सम्मान नहीं है। वो मन बोलना तो अंग्रेज़ी चाहता है, जहाँ कहीं अंग्रेज़ी नहीं बोल पा रहा वहाँ पर बीच-बीच में हिंदी की गोटी बैठा रहा है। तो हिंदी फिलहाल ऐसी भाषा नहीं है जिसकी ओर लोगों की प्रेरणा, अभिप्सा, आकांक्षा मुड़ी हुई हो, और वजह साफ़ है।
दो तलों पर उसकी वजह का निरूपण करना चाहूँगा। पहली वजह पूरी तरह भौतिक है और दूसरी वजह थोड़ी सूक्ष्म, थोड़ी मानसिक।
पहली भौतिक वजह पर आते हैं, हिंदी बोलने वाला ग़रीब है। यूँ तो 60–70 करोड़ लोग हैं जिनकी मातृभाषा ही हिंदी है, उसके अलावा 20–30 करोड़ और हैं जो हिंदी समझते हैं। उसके अलावा उर्दू भाषियों को भी शामिल कर लो तो पूरा कुनबा क़रीब-क़रीब एक अरब लोगों का हो जाता है। दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली चीनी भाषा से बस थोड़ा ही कम। लेकिन ये लोग ग़रीब हैं और इनको अभी सौंदर्य नहीं चाहिए, शरीर की सलामती चाहिए। प्राकृतिक बात है, सामान्य बात है, दोष देने की बात नहीं है।
उनको ये दिखाई दे रहा है कि देश की व्यवस्था रचने वालों ने कुछ इस तरह रची है कि रोज़गार के अवसर, भौतिक तरक़्क़ी के अवसर, पैसा कमाने के अवसर हिंदी में तो बहुत ही कम हैं और अंग्रेज़ी में बहुत-बहुत ज़्यादा। ऐसे रोज़गार जिनमें अंग्रेज़ी का कोई स्थान होना नहीं चाहिए था, जहाँ अंग्रेज़ी की कोई ज़रूरत ही नहीं है, उन रोज़गारों में भी प्रार्थी की योग्यता का परीक्षण अंग्रेज़ी में किया जाता है। जबकि उसके काम का अंग्रेज़ी से कोई लेना-देना नहीं। छोटे से छोटे काम के लिए भी अंग्रेज़ी अनिवार्य कर दी गई है जबकि उस काम में अंग्रेज़ी का कोई उपयोग होने वाला नहीं है। ये व्यवस्था अंग्रेज़ों के समय चल रही थी, आज़ादी के बाद के राजनीतिज्ञों ने भी इस व्यवस्था को कायम रखा। अब जाकर कुछ बदलने लगा है पर बहुत नुकसान हो चुका है।
अभी मेरे सामने कई लोग बैठे हैं जो आईआईटी से हैं, मैं स्वयं भी हूँ। तो जो आईआईटी की प्रवेश परीक्षा है, एंट्रेंस एग्ज़ाम, उसके इतिहास के बारे में कुछ बातें समझिएगा। आज आप आईआईटी जेईई को फिज़िक्स, केमिस्ट्री, मैथमैटिक्स भर के नाम से जानते हैं। साठ के दशक में और अगर मुझे सही याद है तो सत्तर के दशक के भी कुछ सालों तक, फिज़िक्स, केमिस्ट्री, मैथमैटिक्स और अंग्रेज़ी। क्या बात है साहब, आईआईटी जाने के लिए अंग्रेज़ी जाँची जा रही थी! और ये आज की बात नहीं है कि आज भारत बड़ा वेस्टर्नाइज़्ड हो गया है, पश्चिम से बड़ा प्रभावित हो गया है, तो आजकल अंग्रेज़ी को प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये हम बात कर रहे हैं आज़ादी के बीस सालों के भीतर के घटनाक्रम और मानसिकता की। आईआईटी में घुसना है तो अंग्रेज़ी आनी चाहिए भाई। ये चलता रहा, चलता रहा।
ख़ुद ही समझ गए होंगे आप कि हिंदी का कितना भी प्रतिभाशाली छात्र होगा, उसके लिए आईआईटी के दरवाज़े बंद। एक तो हिंदी की ज़मीन का लड़का या लड़की, ग़रीब, उसको अच्छी शिक्षा मिल गई हो हिंदी भाषा में ही दसवीं–बारहवीं तक, यही बड़ी बात। और फिर जब वह दसवीं–बारहवीं उत्तीर्ण कर ले तो उससे कहा जा रहा है कि बेटा, इंजीनियरिंग करनी है तो अंग्रेज़ी दिखाओ। देख लीजिए कि आपने हिंदी वालों को क्या संदेश दे दिया।
और यहाँ जब मैं हिंदी कह रहा हूँ तो वही बात देश की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर भी लागू होती है, बंगाली पर भी, पंजाबी पर भी, कन्नड़ पर भी, तमिल पर भी।
मशीन अंग्रेज़ी समझती है क्या? कहिए, बोलिए। ये जो बिजली के तार हैं, इनमें जो करंट बह रहा है, वो अंग्रेज़ी में बात करता है क्या? ट्रक का इंजन अंग्रेज़ी में दहाड़ता है? तो मैकेनिकल इंजीनियरिंग या केमिकल इंजीनियरिंग या इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के लिए अंग्रेज़ी की क्या अपरिहार्यता थी?
पर जब देश की सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में थी जो ख़ुद अंग्रेज़ी शिक्षा–दीक्षा से निकले थे, जिनके दिमाग़ ख़ुद भारतीय मिट्टी का उत्पाद नहीं थे — शरीर से भारतीय, मन से कहीं और से संस्कार लिए हुए हैं, तो ये ध्यान ही नहीं दिया कि भाई, कितना मुश्किल काम होता है किताबों का अनुवाद ही करा लेना। कहिए, ये बहुत मुश्किल काम है? हो सकता है कि उस समय पर भारतीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की किताबें उपलब्ध न हों। अनुवाद क्या इतना कठिन काम था कि करा नहीं जा सकता था? सोचिए कि कितने प्रतिभाशाली छात्र इंजीनियरिंग की शिक्षा से वंचित रह गए होंगे सिर्फ़ इसलिए कि उनको कहा गया, जाओ, अंग्रेज़ी दिखाओ पहले। और ये चलता रहा। फिर हो–हल्ला हुआ, ये क्या चल रहा है? तो अंग्रेज़ी को अनिवार्य विषय से हटा दिया गया। लेकिन परीक्षा–पत्र, प्रश्न–पत्र अंग्रेज़ी में ही आता रहा।
तो अब आपकी अंग्रेज़ी सीधे–सीधे नहीं जाँची जा रही है, पर परोक्ष रूप से जाँची जा रही है। आप अगर अंग्रेज़ी माध्यम से नहीं पढ़े हो, अंग्रेज़ी में निष्णात नहीं हो तो पर्चा ही समझ में नहीं आएगा, क्योंकि प्रवेश परीक्षा मात्र अंग्रेज़ी में हो रही है। और बनी रही है ये स्थिति अगले कुछ दशकों तक। और अगर स्मृति मेरा साथ दे रही है तो ये स्थिति फिर जाकर बदली है शायद नब्बे के दशक में। नब्बे के दशक में ऐसा हुआ कि वो जो पर्चा है, वो हिंदी में भी उपलब्ध हो गया। अभी क्या स्थिति है, मैं उससे वाक़िफ़ नहीं हूँ। हो सकता है कि अब अन्य भारतीय भाषाओं में भी परीक्षा देने का विकल्प उपलब्ध हो गया हो। पर आप सोचिए, पचास साल का नुकसान! और पचास साल एक पूरे वर्ग, एक पूरे समुदाय के मन को बहुत पीछे धकेल देने के लिए काफ़ी होता है।
और ये तो मैं बात कर रहा हूँ इंजीनियरिंग की, जिसमें आप फिर भी ये तर्क दे सकते हो कि अंग्रेज़ी का कुछ महत्त्व है, क्योंकि रिसर्च पेपर इत्यादि जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छपते हैं, वो भारतीय भाषाओं में नहीं छपते। तो आप इस तरह का तर्क दे सकते हो कि दुनिया भर का जो ज्ञान है, वो न हिंदी में उपलब्ध है न गुजराती में, तो भाई अंग्रेज़ी तो आनी चाहिए। आप इस तरह का तर्क दे सकते हो। जहाँ तक इंजीनियरिंग की बात है ऐसा तर्क दिया जा सकता है। लेकिन और बहुत छोटे–छोटे काम — क्लर्क की परीक्षा है, वो भी अंग्रेज़ी में हो रही है। पुलिस में भर्ती चाहिए, अंग्रेज़ी आनी चाहिए। हिंदी की ताक़त को, हिंदी के आत्मविश्वास को लगातार व्यवस्थित तरीक़े से, सिस्टमिक तरीक़े से, ऐसी चोट पहुँचाई गई कि हिंदी वाले को आज अगर एक सामान्य भौतिक सुख–सुविधा वाला जीवन भी जीना है तो उसे हिंदी लगभग त्यागनी पड़ती है। वो कहता है, इससे मिलेगा क्या?
भारतीय मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के लिए प्रगति का एक बड़ा तरीक़ा रहा है शिक्षा। और शिक्षा में भी ख़ास तौर पर व्यवसायिक शिक्षा, प्रोफेशनल एजुकेशन। और अगर आपने सारी व्यवसायिक शिक्षा, चाहे वो इंजीनियरिंग की हो, चाहे मेडिकल की हो, चाहे अकाउंटेंसी की हो, वकालत की हो, अंग्रेज़ी में कर दी, तो बताइए मुझे कि हिंदी वाले या तेलुगु वाले या बंगाली वाले या मराठी वाले के पास अब क्या कारण बचता है कि वो अपनी मातृभाषा के साथ जुड़ा रहे? हाँ, कुछ भावना–केंद्रित कारण बचते हैं। वो कहेगा, मेरे घर में ये भाषा बोली जाती है तो मैं इसको बोलता हूँ। भावना के आधार पर जुड़ा रहे तो जुड़ा रहे, आपने भौतिक कारण सारे छीन लिए। आपने कह दिया, रोटी तू नहीं पाएगा अपनी मातृभाषा में, बात समझ ले सीधी। और ये काम विश्व ने नहीं किया है, ये काम हमारी व्यवस्था ने किया है। दुनिया हमसे कहने नहीं आई थी कि तुम अपने बच्चों को उनकी मातृभाषा में या राष्ट्रभाषा में या क्षेत्रीय भाषा में भौतिक तरक़्क़ी के मौके मत देना। ये ख़ुद हमारी करतूत है, यह नीति–निर्धारकों के फ़ैसले हैं हमारे।
चीन हो, जापान हो, तरक़्क़ी कर गए वो बिना अपनी मातृभाषा को लात मारे, और ज़बरदस्त तरक़्क़ी कर गए। तक़रीबन पूरा दक्षिण–पूर्व एशिया निकल ही गया आगे, बिना ये कहे कि जब तक अपनी बोली, अपनी लिपि, अपनी मिट्टी को नहीं त्यागेंगे तब तक रोटी नहीं पाएँगे।
जापान, चीन, कोरिया, फ़िलीपींस, मलेशिया, इंडोनेशिया और तो और कुछ हद तक वियतनाम भी। सिंगापुर इसमें मैं नहीं जोड़ूँगा क्योंकि वहाँ पर सब कुछ मिला–जुला है। पर ताइवान को जोड़ूँगा, हांगकांग को जोड़ूँगा। और सबसे जो इसमें प्रबल उदाहरण है वो तो जापान का ही है, और अगर थोड़ा पश्चिम की ओर देखना है तो फ्रांस, जर्मनी, स्पेन। थोड़ा और अगर दक्षिण की तरफ़ चले जाना है तो ब्राज़ील, अर्जेंटीना, ये विकसित मुल्कों की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन भारत से ज़्यादा प्रति व्यक्ति आय है यहाँ पर। और इन देशों में अंग्रेज़ी इत्यादि का चलन नहीं है। तो हिंदी वालों ने जो ये हिंदी के प्रति अब अनिच्छा और अनादर का रुख किया है, इसका बहुत बड़ा कारण आज़ादी के बाद से जो हमने हिंदी में और बाक़ी भारतीय भाषाओं में रोज़गार के अवसर ही बंद कर दिए, वो है। ये साज़िश करी गई है, या तो साज़िश है या महान मूर्खता। जो भी है, इन नीतियों ने भारतीय भाषाओं की कमर तोड़ कर रख दी। बात समझ रहे हैं?
अब कहने को तो हिंदी इतनी बड़ी भाषा है। कहने को तो आप कह सकते हैं कि दुनिया के 10% से ज़्यादा लोग हिंदी बोलते या समझते हैं। लेकिन मैं आपको एक जाँचने का पैमाना देता हूँ। इंटरनेट के कुल पृष्ठों में से, इंटरनेट पर जितने पेज हैं, उन सब पेजों में से अगर आप अनुपात निकालें, गणना करें कि हिंदी के कितने हैं, तो 1% भी नहीं पाएँगे। इससे आपको आधुनिक जगत में हिंदी की जो दुर्दशा है उसके बारे में पता चल जाएगा। इंटरनेट की भाषा हिंदी नहीं बन पाई, क्योंकि भाई, इंटरनेट पर हिंदी की कुल मौजूदगी किन क्षेत्रों में है? कुछ समाचारों इत्यादि की वेबसाइट्स हैं, कुछ फ़िल्मी गीतों की वेबसाइट्स हैं, कुछ और इधर-उधर की दो-चार, बस हो गया। बाक़ी काम हिंदी पर नहीं।
हवाई जहाज़ का आपको टिकट बुक कराना है और आपका नाम है अमित, तो आपको ए-एम-आई-टी ही लिखना होगा, अ-मी-त लिख के आप हवाई जहाज़ में यात्रा करके दिखा दीजिए। आप कह दीजिए कि अ-मी-त नाम है मेरा, तो आप हवाई जहाज़ में यात्रा नहीं कर पाएँगे। ई-कॉमर्स ने हिंदी को बिल्कुल अलग रख दिया है। आप जाइए और जितनी भी ये ऑनलाइन ट्रैवल बुकिंग, होटल बुकिंग की जो वेबसाइट्स होती हैं, उन पर होटल बुक करने की कोशिश करिए। आपका नाम है मान लीजिए अरिंदम, आप कोशिश करिए उस पर अ-रि-न-द लिखने की वो सॉफ़्टवेयर स्वीकार ही नहीं करेगा। वो एल्गोरिदम एक्सेप्ट ही नहीं करेगा। अब हिंदी वाला देख रहा है कि अगर मैं हिंदी बोलूँगा तो भाई, मैं तो प्लेन पर भी नहीं चल सकता। मैं हिंदी बोलूँगा तो मैं किसी होटल की बुकिंग भी नहीं करा सकता। तो उसके मन में क्या हिंदी के लिए अब सम्मान बचेगा? इस भाषा की इज़्ज़त कौन करे, जिस भाषा में आप ट्रेन का टिकट नहीं करा सकते, फ़्लाइट का टिकट नहीं करा सकते। कहिए।
मैं सदा से हिंदी में हस्ताक्षर करता था, बहुत लोगों को बड़ा कष्ट भी हुआ इससे। पर मैंने कहा, कोई बात नहीं, करता रहा। तो एक दफ़े का मुझे याद है, बैंक से कुछ लोग आए कुछ अपने काग़ज़ात पूरे करने के लिए, बैठे मेरे सामने, मैंने हस्ताक्षर किए। जैसे ही हिंदी में दस्तख़त किए, वो बेचारे परेशान हो गए। बोले, अरे अब एक चक्कर और लगाना पड़ेगा। मैंने कहा अपने तरीक़े से, काहे को? तो बोले, नहीं, अब एक एफ़िडेविट बनवा के लाना पड़ेगा, शपथ पत्र, कि आपको अंग्रेज़ी आती है। मैं 27-28 वर्ष का था तब, आईआईटी, आईआईएम दोनों से निकल चुका था, सिविल सर्विस छोड़ चुका था। तो मैंने कहा, फिर बताइए क्या बोल रहे हैं? बोले, हम एक एफ़िडेविट बनवा के लाएँगे जिसमें लिखा होगा कि जो सामने व्यक्ति बैठा है, ये अनपढ़ नहीं है, इसको अंग्रेज़ी आती है। मैंने कहा, उसकी क्या ज़रूरत है? बोले, देखिए, ये जो पूरा डॉक्यूमेंट है, दस्तावेज़ जिसके नीचे आपने अभी दस्तख़त किए हैं, ये तो अंग्रेज़ी में है और आप हस्ताक्षर कर रहे हो हिंदी में। तो फिर ये एक सवाल खड़ा होगा न कि जिसने हस्ताक्षर किए हैं, उसे क्या समझ में भी आया ये सब क्या लिखा है? तो आपको अगर हिंदी में ही दस्तख़त करने हैं तो फिर एक शपथ पत्र और बनेगा।
हिंदी वालों के साथ ये दुर्व्यवहार है। और ये दुर्व्यवहार अंग्रेज़ नहीं कर रहे, ये दुर्व्यवहार इस देश की व्यवस्था कर रही है। अंग्रेज़ों ने हिंदी को नहीं दबा दिया है, भारतीयों ने अंग्रेज़ी को सर चढ़ा लिया है। और जब इस बात पर आए ही हैं कि भारतीयों ने अंग्रेज़ी को सर चढ़ा लिया है, जानते हो दुनिया की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा नहीं है अंग्रेज़ी। पर न हम पढ़ते हैं, न लिखते हैं, न दुनिया की कुछ ख़बर रखते हैं। जिसको देखो वही इसी ख़्याल में बैठा हुआ है, अंतरराष्ट्रीय भाषा है न, इंटरनेशनल लैंग्वेज, ग्लोबल लैंग्वेज। कैसे भाई, कैसे?
दुनिया का बहुत बड़ा तबका है, और बड़ा समृद्ध तबका है, और बड़ा पढ़ा-लिखा तबका है, जिसका अंग्रेज़ी से कोई लेना-देना नहीं। तुमसे किसने कह दिया कि अंतरराष्ट्रीय भाषा है?
ये किसने कह दिया? पर हमारी कुछ ऐसी मानसिकता है कि दो तरह के लोग होते हैं, एक होते हैं गँवार जिनका नाम है भारतीय और वो बोलते हैं हिंदी। और जो दूसरे तरह के लोग होते हैं वो सब हैं जो भारत की सीमाओं के बाहर रहते हैं, और वो हैं तरक़्क़ी-पसंद गोरे-गोरे लोग, और वो सब बोलते हैं अंग्रेज़ी। हमारा ख़्याल है कि भारत के अलावा बाक़ी पूरी दुनिया, जो विकसित है और समृद्ध है, वो अंग्रेज़ी ही बोल रही है। अनभिज्ञता की, अज्ञान की हद हो गई।
चाणक्य नाम से एक धारावाहिक आता था जब मैं बच्चा था। और उसमें क्या दिखा रहे हैं, कि जो सब आक्रांता आए हैं भारत पर आक्रमण करने, वो अंग्रेज़ी बोल रहे हैं। अब मैं छोटा ही था लेकिन कुछ-कुछ इतिहास पढ़ लिया था, भारतीय भी, विश्व इतिहास भी, इतना जानता था कि अंग्रेज़ी बोलने वाले तो नहीं थे। सिकंदर अंग्रेज़ी नहीं बोलता था भाई, लेकिन यही दिखाया जा रहा है। और हमको लग रहा है, सो यू सी, अलेक्ज़ेंडर टू वाज़, यू नो, एन इंग्लिश स्पीकिंग चैप, प्रीटी स्मार्ट। नहीं बोल रहे। वो अंग्रेज़ी नहीं बोलता था। उसकी भी अपनी भाषा थी, अपनी मिट्टी थी। इसीलिए वो सिकंदर बन पाया, दुनिया को फ़तह कर पाया, क्योंकि अपनी मिट्टी में जड़ें गहरी थीं उसकी।
पर यहाँ जिसको देखो, ख़ासतौर पर जो मध्यम वर्ग है, उसको यही लग रहा है कि भारत से बाहर निकलेंगे नहीं कि जिसको देखो वही अंग्रेज़ी बोल रहा होगा। और ऐसों को बड़ी निराशा होती है अगर वो जर्मनी पहुँच जाएँ, कि रूस पहुँच जाएँ, कि नीदरलैंड्स पहुँच जाएँ। वहाँ ये सोचते हैं कि गोरा आ रहा है तो अंग्रेज़ी ही तो बोलता होगा। गोरा माने अंग्रेज़। वाह रे गँवारों, गोरा माने अंग्रेज़। तो रूसी मिला उसको बोल रहे हैं अंग्रेज़ी। कुछ देर तक तो शक्ल देखी, फिर कहा, अच्छा, हिंदुस्तानी लगता है। ठीक, कोई बात नहीं, कुछ भी बोल सकता है। ये अफ़्रीका भी पहुँच गए, तो वहाँ पर जो भी मिल रहा है उसको अंग्रेज़ी बोल रहे हैं। सोच रहे हैं, यहाँ अंग्रेज़ी ही तो चलती होगी। स्पेन, पुर्तगाल, हर जगह अंग्रेज़ी ठोक रहे हैं। नहीं समझ में आ रहा कि यूरोप के ये जो छोटे-छोटे सब देश हैं न, छोटे-छोटे हैं, भारतीय प्रांतों से भी छोटे देश हैं, आकार में भी, आबादी में भी। ये सब अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा में ही तरक़्क़ी किए हुए हैं। अंग्रेज़ी यूरोप की एक भाषा है। और अन्य कई भाषाएँ हैं जो अपने आप में बहुत ताक़तवर खड़ी हैं, कहीं गिर-विर नहीं रहीं, सब तरक़्क़ी कर रही हैं।
हमें तो ये सुनकर ही बड़ा अचरज होगा कि स्पैनिश भाषा एक बहुत बड़ी भाषा है। हमें तो ये सुनके और ताज्जुब होगा कि दक्षिणी अमेरिका में फ़्रेंच और स्पैनिश बोली जाती हैं, हैं! अंग्रेज़ी नहीं बोलते। अंग्रेज़ी भी बोलते हैं, लेकिन मरे नहीं जा रहे अंग्रेज़ी के लिए। न जाने कहाँ से ये कीड़ा, ये वहम हिंदुस्तान के दिमाग़ में डाल दिया गया कि भौतिक तरक़्क़ी अंग्रेज़ी भाषा में ही हो सकती है। और गरीब लोग हम बेचारे बेबस, रोटी के लिए ममारी चल रही है। जो आदमी रोटी के लिए मर रहा हो, उसको अगर तुम बोल दोगे कि देख, तुझे रोटी तो हिंदी में नहीं मिलने वाली, तो कहेगा अरे हिंदी गई भाड़ में, रोटी बताओ, रोटी। और तुम कहोगे, देखो रोटी तो मिल जाएगी पर बोलो “R-O-T-I।” तो बोलेगा, “R-O-T-I,” उसे रोटी चाहिए भाई। रोटी के लिए तुम उसका हाथ जिस तरीक़े से मरोड़ना चाहो, मरोड़ सकते हो। और हमने उसका रोटी देने के लिए हाथ ऐसे ही मरोड़ा है कि “R-O-T-I।”
छोटे-छोटे बच्चे होते हैं, उन्हें विवश किया जा रहा है अंग्रेज़ी में तुतलाओ रे। तुतलाना भी है तो अंग्रेज़ी में तुतलाओगे। मज़ाक नहीं है, उसको स्कूल में नहीं मिलेगा प्रवेश। ज़्यादा हिंदी बोलेगा तो स्कूल में प्रवेश नहीं पाएगा। स्कूलों में प्रवेश के लिए अब यही नहीं अनिवार्य है कि अंग्रेज़ी आनी चाहिए, मैं तीन साल के बच्चों की बात कर रहा हूँ, ये भी ज़रूरी है कि ज़्यादा हिंदी न बोलता हो।
बल्कि जितना दिखाइए कि इसको तो अ से अनार भी नहीं पता, बोलता क्या है ये अनार की जगह? पोमेग्रेनेट। उतना ज़्यादा उसके प्रवेश के आसार बढ़ते हैं। और वो वहाँ गया और उसने बोल दिया क से कद्दू, तो हो गया फिर। नहीं पाएगा, इंटरनेशनल स्कूल है भाई। प्रवेश ही नहीं पाएगा। कद्दू बोला रे, कद्दू। सो अनुकूल, कद्दू बोलता है कोई! भिंडी बोल गया, क्या बोलना था? लेडी फ़िंगर। नाम ही कितना हसीन है, लेडी फ़िंगर देवी जी की उँगली। और उसकी जगह बोल रहा है भिंडी, गँवार। तू भूखा मरेगा, हिंदी वाले तू भूखा मरेगा। भिंडी बोला, कद्दू बोला। हल्दी बोलता है, टर्मरिक क्या है? ग्वाले की तरह बोल रहे हो टर्मरिक, क्या बोलना है? टर-मरिक़। (अमेरिकन/ब्रिटिश ऐक्सेंट में बोलते हुए)। बोलो साथ में टर-मरिक़।
ये कोई तरीक़ा है? तुमने हिंदी वालों की तरह अंग्रेज़ी बोल दी। पहली बात तो हिंदी मत बोलना और दूसरी बात, अंग्रेज़ी भी हिंदी वालों की तरह मत बोल देना। बात समझ में आ रही? याद है न, क्या? मेडिटेशन, (ऐक्सेंट बदल बोलते हुए)। अरे अब तो अध्यात्म से भी हिंदी को धक्का मार के निकाल दिया गया है। स्कूल में कैसे घुसेगी वो, अब तो वो आश्रम में भी नहीं घुस सकती। आश्रमों में भी क्या चलता है अब, मेडिटेशन। (ऐक्सेंट बदल बोलते हुए)।
हिंदी की क्या औकात? अपमानित भाषा! तो भौतिक कारण समझ में आ रहा है? नल की टोटी ठीक करने की शिक्षा भी अंग्रेजी में हीं मिलेगी। डॉक्टर तो डॉक्टर तुम कंपाउंडर भी अंग्रेजी में ही बन सकते हो और अगर बहुत हठ दिखाओगे तो 'भाषायी-आतंकी' कहलाओगे। "देखो इनको! ये भाषा से ऊपर ही नहीं उठ पा रहे हैं, हिंदी पकड़ कर बैठे हुए हैं; इनके दिमाग़ पर पुरानी चीज़ों ने कब्ज़ा कर रखा है, पुराने संस्कार, पुरानी भाषाएँ, भाषा से ऊपर उठो।"
अगर दस रुपया भी कमाना है तो हिंदी को छोड़ो, नहीं तो हिंदी बोल कर के फिर एक ही धंधा है जो तुम बकर सकते हो कबाड़ी... वो हिंदी में बोलता है, वहाँ हिंदी में भी काम चल जाता है या "चाय गरम चाय" वहाँ पर अभी ये नहीं है, हॉट टी, हॉट टी वहाँ अभी बचा हुआ है, इतना अभी है। हालाँकि मुझे लग रहा है कि अगर प्लेन वग़ैरह में चाय बिकेगी और वहाँ 'चाय गरम' बोल दिया तो कोई न ख़रीदे। वो जो देवी जी आती है वो बोलती हीं नहीं चाय, "टी ऑर कॉफी?" बोल दो चाय तो वो उनको समझ में ही न आय, कि ये कौन सी चीज़ बता दी? चाय। आ रही है बात समझ में? “आई मीन आर यू गेटिंग इट?”
तरक़्क़ी पसंद मुल्क है भाई ये, क्या कर सकते हैं? क्या करोगे ऐसे देश का जो अपने ही ऊपर ये बंधन, ये बाध्यता लगा ले, अपनी ही व्यवस्था ऐसी बना ले कि सरकारी नौकरी पानी हो, प्राइवेट नौकरी पानी हो, अंग्रेजी आनी चाहिए। अब सही-सही बताना उस प्राइवेट नौकरी में अंग्रेजी का काम क्या है बताओ?
मजेदार था! बीच में कॉल-सेंटर का बड़ा ज़ोर चला था, क़रीब दस साल तक। तो एक मिला यूँ ही रोता हुआ मैंने कहा क्या हुआ? बोलता है, “इंटरव्यू में रिजेक्ट हो गया।” मैंने कहा पोजीशन क्या थी? बोला, “हिंदी टेलीकॉलर की।” उसका इंटरव्यू पूरा अंग्रेजी में हुआ था। अंग्रेजी उस बेचारे की ज़रा हल्की, काम था हिंदी में कॉलिंग का और इंटरव्यू हो रहा था उसका अंग्रेजी में। वो तो होगा ही न कोई भी दो अनजान लोग भी मिलते हैं सड़क पर तो बातचीत काहे में कर रहे होते हैं? अंग्रेजी में कर रहे होते हैं। कैसे दिखा दें कि हम गँवार हैं? अगर बोल दिया हमने "कहिये क्या मिजाज़ हैं?" या "तबीयत कैसी है आपकी, हालचाल?" तो तुरंत सिद्ध हो जाएगा कि ये गँवार आदमी, ज़रूर उत्तर प्रदेश की मिट्टी से उठा है, ज़लील!
तो जैसे ही कोई अपरिचित दिखाई देता है, तुरंत झरझर आंग्ल भाषा हमारे मुँह से बहने लगती है। भले बोलनी न आती हो, लिखनी न आती हो। "हाउ डू डू? आई डू गुड।" ये ठीक है पर "श्रीमान आप कैसे हैं?" ये बोलना बड़े अपमान की बात है और मैं दोष नहीं दे रहा इनको, मैं इनका मज़ाक नहीं उड़ा रहा।
मैं उस व्यवस्था का मज़ाक उड़ा रहा हूँ। मैं उस व्यवस्था से पीड़ित हूँ जिस व्यवस्था ने आम हिंदुस्तानी को मजबूर कर दिया अपनी भाषा की ओर पीठ फ़ेरने को।
और ये व्यवस्था मैं फिर कह रहा हूँ, अंग्रेजों का षड्यंत्र नहीं थी और न ही ये व्यवस्था ऊपर आसमान से उतरी थी, ये हमारे नीति-निर्धारकों का काम था। कुछ आ रही है बात समझ में? और वो चीज़ हमारे दिमाग़ में इतनी गहरी उतर गई है, आप दिल्ली, जयपुर, लखनऊ, कानपुर, भोपाल के किसी रैस्टराँ में जाते हैं वहाँ मेन्यू किस भाषा में होता है? ROTI, TANDOORI ROTI, (अल्फाबेट्स उच्चारण करते हुए) लंदन से लाएगा क्या बे? यहीं बना रहा है, देसी गेहूँ से और शिव प्रसाद चौरसिया बेल रहा है रोटी, और लिख रहा है, ROTI (अल्फाबेट्स उच्चारण करते हुए)। खाने वाला मैं गंगाधर छत्रपति, बेलने वाला शिव प्रसाद चौरसिया और ये माता जी की गली और ROTI और नतीजा होता है, बड़े हास्यास्पद तरीक़े के मेन्यू होते हैं।
मैं पूरा एक सत्र ले सकता हूँ, हिंदुस्तान के जो ये मेन्यू होते हैं, उनकी गुणवत्ता पर। और मैं एकदम जो बेचारे ग़रीब तबके के रैस्टराँ, होटल होते हैं उनकी ही नहीं बात कर रहा। ये जो अच्छे-अच्छे होते हैं, मैंने उनका भी देखा है। ये भौतिक कारण है, हिंदी के पतन का।
अब आओ मानसिक कारण पर। किसी भी जाति की भाषा और जाति से मेरा अर्थ जात-पात से नहीं है। जाति अर्थात लोग, पीपल, एक समुदाय, किसी भी तरीक़े से ले लो। ये सब अलग-अलग हैं पर इशारा वो एक हीं तरफ़ कर रहे हैं। एक राष्ट्र, एक नेशन उसको मैं एक जाति कह रहा हूँ। किसी भी जाति की भाषा का संबंध उसके अपने आत्मविश्वास से होता है, उसके भीतर अपने प्रति कितनी ठसक है, वो अपनी ताक़त में कितनी निष्ठा रख पा रहा है इससे होता है।
हिंदी और भारतीय अन्य भाषाएँ, जिन वर्गों की भाषाएँ हैं उनकी ख़ासियत कभी भी न तो सामरिक बल रहा है न भौतिक बल, मैटेरियल प्रोस्पेरिटी। उनकी ताक़त हमेशा से 'आध्यात्मिक बल' रहा है बात को समझना। हिंदी हो कि मराठी हो कि बंगाली हो कि पंजाबी हो इनको बोलने वालों की ताक़त कभी इसमें नहीं रही कि वो दुनिया को फ़तह करने वाले योद्धा थे। भारतीय कहीं गए ही नहीं किसी को फ़तह करने कभी और न उनकी ताक़त, उनका आत्मविश्वास, उनका स्वाभिमान इसमें रहा कि वो दुनिया के सबसे समृद्ध लोग थे। आप कह लो कि भारत कभी 'सोने की चिड़िया' था। लेकिन भारत की आबादी भी हमेशा बहुत ज़्यादा थी, तो प्रति व्यक्ति औसत आय ऐसा नहीं है कि भारत में ही, दुनिया में सबसे ज़्यादा हुआ करती थी।
जिन दिनों आप कहते हो कि भारत सोने की चिड़िया था, उन दिनों भी भारत का जो आम किसान था वो अधिक से अधिक उन दिनों के हिसाब से एक मध्यमवर्गीय जीवन ही जी रहा था। हाँ, उसके पास खाने को रोटी थी, सामान्य जीवन जीने के लिए जो न्यूनतम सुख सुविधाएँ चाहिए होती हैं वो सब थीं, लेकिन आप उसको समृद्ध नहीं कह सकते। भारत रहा होगा सोने की चिड़िया, भारत का आम किसान सोने-चाँदी में नहीं खेल रहा था। तो आप ये भी नहीं कह सकते कि भारतीयों की ताक़त कभी भौतिक बल थी, धन बल थी। न सामरिक बल, न धनबल, तो फिर भारतीयों की ताक़त, भारतीयों की पहचान सदा किससे रही है? आध्यात्मिक बल से। वही जिसको आप सामान्य भाषा में कहते हो कि "भारत विश्व गुरु था।"
भारत की पहचान रहा है धर्म, भारत की पहचान रही है भारतीयों की जीवन के प्रति समझ और गहराई। ज़िंदगी को जितना हिंदुस्तान में जाना क़रीब से और गहराई से, उतना अन्य लोगों ने जानने में रुचि नहीं दिखाई न उतनी साधना करी। भारत ने घनघोर साधना करी है। विदेशी भी यहाँ आए तो बोले कि "यहाँ की मिट्टी में अध्यात्म है, यहाँ का आम किसान भले ही वो अनपढ़ हो, आध्यात्मिक ज़रूर है, वो बिना पढ़े-लिखे ही आध्यात्मिक है। कुछ बातें ऐसी हैं जो यहाँ के आम किसान को भी पता हैं और बाहर के पढ़े-लिखों को भी, दार्शनिकों को भी आसानी से समझ नहीं आती। तो भारत की पहचान रही है — धर्म।
मैंने इस दूसरे बिंदु की चर्चा शुरु करी है ये कह कर के "कि भाषा संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ होता है।" और किसी भी जाति की, वर्ग की, राष्ट्र की, समुदाय की अपनी भाषा में उतनी ही निष्ठा होगी, अपनी भाषा के प्रति वो उतना ही संवेदनशील होगा, अपनी भाषा के प्रति उतना ही आग्रही होगा, जितना उसके भीतर अपनी हस्ती के प्रति आत्मविश्वास होगा। हम हिंदी के पतन के मानसिक कारणों की चर्चा कर रहे हैं।
मैं कह रहा हूँ, एक भारतीय के मन में अपने प्रति जितना आत्मविश्वास होगा उतना ही आत्मविश्वास उसके मन में अपनी भाषा के प्रति होगा।
ये संबंध आप समझ पा रहे हैं? और अपने प्रति आत्मविश्वास होने से, अपने प्रति सम्मान होने से क्या अर्थ है? जब भारत की मूल पहचान ही धर्म रहा है, तो अपने प्रति विश्वास होने का अर्थ है, अपने धर्म में विश्वास होना। जितना एक भारतीय में धर्म के प्रति विश्वास होगा, उतने ही विश्वास से वो अपनी भाषा के साथ खड़ा हो पाएगा। आप में से कई लोग मेरी इस बात के ख़िलाफ़ तर्क करना चाहेंगे उनका स्वागत है। पर तर्क करिएगा! बिना सोचे, बिना समझे, बिना गहराई में उतरे, मेरी बात को यूँ ही खंडित करके अस्वीकार मत कर दीजिएगा, बात को समझिएगा।
हिंदुस्तान की मूल पहचान धर्म रहा है और मूल पहचान के साथ संस्कृति का बड़ा अटूट रिश्ता होता है और संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ होता है, भाषा। धर्म के प्रति अगर अपमान भाव पैदा होगा तो भाषा नहीं टिकेगी। अगर आप हिंदुस्तानियों में उनके धर्म के प्रति अनादर भर देंगे, हीनभावना भर देंगे, तो उनमें अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के प्रति भी अनादर और हीनभावना आएगी, आ चुकी है, बहुत गहरी बैठ चुकी है।
अंग्रेजी व्यापार की भाषा है, व्यापारियों की भाषा रही है, साहित्य की भाषा बाद में हुई है पहले व्यापार की थी। और आप भारतीय भाषाओं में जाएँ तो कई भाषाएँ तो ऐसी हैं जैसी पंजाबी, जिनमें साहित्य की शुरुआत ही संत कवियों ने करी थी। आप अगर पंजाबी को उठाएँगे या सिंधी को उठाएँगे या ब्रज भाषा को उठाएँगे तो आप पाएँगे कि उनके विकास में तो योगदान ही संतों का रहा है, धर्म का रहा है, संतों ने ही उनमें गीत गाए और वो भाषाएँ आगे बढी। तो भारत में भाषा और धर्म बिल्कुल साथ-साथ चले हैं। 'धर्म' भारत का केंद्र रहा है।
आज़ादी के बाद से, बहुत कारणों से, भारतीयों में उनके धर्म के प्रति हीनभावना भर दी गई और जिसके मन में तुम धर्म के प्रति हीनभावना भर दोगे, वो भाषा को भी छोड़ ही देगा। ये मैं कोई बहुत दूर का रिश्ता नहीं बैठा रहा हूँ। ये मैं एक ज़बरदस्ती का संबंध नहीं स्थापित कर रहा हूँ। कृपा करके विचारें और प्रयोग करें, देखें कि ऐसी बात है कि नहीं है। वो सब कुछ जो आपकी मूल पहचान का परिचायक है, आप उसके प्रति अवमानना से भर चुके हैं। आप उसके प्रति हीनभाव से भर चुके हैं। हमें ये बता दिया गया है कि हमारा सब कुछ ही निकृष्ट है, घटिया है, हमें बता दिया गया है कि भारत का अतीत एक लंबी काली अंधेरी रात जैसा है बस, जिसमें रोशनी आई ही पाश्चात्य सूरज के उदय के बाद है।
अभी मैं दो घंटे पहले ही यहाँ देवेश जी बैठे हैं, आईआईटी खड़गपुर से हैं, उनसे कह रहा था कि हम आठवीं क्लास में थे तब से हम प्रोग्राम लिखते थे फिबोनैकी सीरीज़ का, और हमें कभी ये बताया ही नहीं गया कि फिबोनैकी सीरीज़ फिबोनैकी की थी ही नहीं कभी। फिबोनैकी सीरीज़ एक भारतीय की थी, ये बात आधिकारिक रूप से भी मानी जा चुकी है। लेकिन वाह रे! भारतीय पुस्तक निर्धारकों, वाह रे! भारतीय शिक्षकों, भारतीय छात्रों को नहीं बताओगे कि ‘फिबोनैकी सीरीज़’ फिबोनैकी की नहीं, भाई इसी मिट्टी के एक गणितज्ञ की है। और ये मैं कोई कयास नहीं निकाल रहा, ये मैं कोई दूर की नहीं फेंक रहा। मेरी बातों को उसी श्रेणी में मत रख दीजिएगा, जिसमें कहा जाता है कि भारत में आज से दो हज़ार साल पहले भी इंटरनेट था। नहीं मैं नहीं कह रहा हूँ कि पुष्पक विमान में जेट इंजन लगा था, और आज से दो हज़ार साल पहले यहाँ इंटरनेट चलता था। लेकिन जो बात सही है वो तो कहनी पड़ेगी न।
मैं उन सब लोगों से जवाब माँग रहा हूँ, जिन्होंने मेरी गणित की और कंप्यूटर साइंस की किताबें लिखी थीं। जिन्होंने मुझे लगातार कहा फिबोनैकी सीरीज़ – फिबोनैकी सीरीज़। क्यों नहीं बता रहे हो तुम मेरे भारतीय भाइयों को, मेरे साथ के छात्रों को कि ये 'फिबोनैकी सीरीज़' वाला काम हिंदुस्तानी का है।
‘पाइथागोरस थ्योरम –पाइथागोरस थ्योरम’ बोलते रहते हो, उसके साथ जो भारतीय रिश्ता जुड़ा हुआ है उसको क्यों नहीं बताते भारतीय छात्रों को? भारतीयों को तो यही लगता है की पाइथागोरस माने अंग्रेज क्योंकि PYTHAGORAS है न? (अल्फाबेट्स उच्चारण करते हुए)। भारतीयों की नज़र में ग्रीक वग़ैरह सब अंग्रेज ही हैं। यूरोपियन है माने अंग्रेज है। वो भूल ही जाते हैं, की पाइथागोरस के ज़माने में तो अंग्रेजी थी भी नहीं। जो पूछो एरिस्टोटल किस भाषा में लिखता था?
बहुत भाई लोगों को बड़ा ताज्जुब हो जाता है, जब मैं उनसे बोलता हूँ कि ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। बोलते हैं "अरे! पर वो तो अंग्रेजों के भगवान जी हैं न? तो अंग्रेजों के भगवान अंग्रेजी नहीं बोलते थे तो क्या बोलते थे?" तो नहीं मेरी जान, ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। उनको बड़ा धक्का लगता है, काहे उनकी नज़र में दुनिया में दो ही भाषा हैं, या तो अंग्रेजी या देसी। वो कहते हैं, अंग्रेजी नहीं बोलते थे तो फिर क्या हमारी ही तरह थे बिल्कुल, ये तो इन्होंने बड़ा हमें निराश किया। इनकी तो शक्ल देख कर के गोरे-गोरे हैं, सुनहरे लंबे बाल हैं, “हैंड-सम दिखत बा” और हैंडसम है तो भारतीय हो नहीं सकता। हैंडसम है तो उसे तो अर्नाल्ड श्वाजनेगर होना होगा न? हैं! अब तुमसे कोई बोले मोहन गुप्ता हैंडसम है तो कैसा लगेगा? और ब्रैड पिट बोलो तो, हाँ! ये कोई बात है कि मोहन गुप्ता को हैंडसम बता रहे हैं? इतनी कुछ हम में अपने आपको लेकर के समस्या हो गई है।
अभी हद बात सुनिए, कोई उस दिन बोले कि मयंक अग्रवाल शतक पर शतक मार गया दो-तीन। मैंने कहा, हाँ। बोल रहे, कुछ जच नहीं रही बात। मैंने पूछा, काहे नहीं जच रही? बोले, मुझे तो तभी नहीं जच रही थी जब से ये इशांत शर्मा, रोहित शर्मा जमने लग गए थे। अब क्या अग्रवाल भी क्रिकेट खेलेंगे? जच ही नहीं रहा ये। अग्रवाल तो वही ठीक लगता है – 'अग्रवाल स्वीट कॉर्नर,' हलवाई है, बढ़िया तोंद निकली हुई है और जलेबी छान-छान निकाल रहे हैं। एक तो अग्रवाल और ऊपर से 'हिमाकत ये कि डेल स्टेन पर छक्का मार दिया? तुम्हारी इतनी हिम्मत?
कुछ आ रही है बात समझ में?
हमें बता दिया गया है कि हम कुछ नहीं है, हमें बता दिया गया है कि हमारे इतिहास में बस एक चीज़ है महत्त्वपूर्ण, और वो ये कि भारत में जाति-प्रथा बहुत चलती थी और भारत ने जितना शोषण करा है लोगों का, उतना किसी ने नहीं करा है। हमें अपने ही प्रति शर्मसार कर दिया गया है। और ये बहुत सोची-समझी साजिश है। हमें नहीं बताया जा रहा है कि विज्ञान में हमारी गहरी से गहरी उपलब्धियाँ क्या थी? हमसे छुपाया जाता है कि हम गणित में कितने आगे थे। और दुर्भाग्य कुछ ऐसा रहा है हिंदी वालों का। हिंदुस्तानियों का, जब मैं हिंदी वाला कहूँ तो उसको व्यापक करके समझ लिया करो कि पूरे भारत की बात कर रहा हूँ। उससे मेरा आशय ये नहीं है, कि पूरा भारत हिंदी ही बोलता है। पर हिंद से मैं हिंदी को जोड़ रहा हूँ। 'हिंद' शब्द भी जानते हो न कहाँ से आया है? सिंधु के पूरब में जितने लोग रहते थे, सबको कह दिया गया हिंदू। जैसे सिंधु है वैसे हिंदू। अरब लोग 'स' का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाते थे। अरब थे कि जाने फारसी?
हमसे बिल्कुल छुपा दिया गया कि सत्रहवीं शताब्दी तक भी भारत का जीडीपी, वही जीडीपी जिसके लिए आज हम इतने आकुल रहते हैं कि जीडीपी उठ गया, गिर गया, इस बात से भारत की नब्ज़ ऊपर नीचे होनी शुरू हो जाती है। सत्रहवीं शताब्दी तक भी भारत का जीडीपी दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा था। भारत की टक्कर में सिर्फ़ चीन का जीडीपी था। हम क़रीब-क़रीब आधुनिक युग की बात कर रहे हैं। क़रीब-क़रीब, वहाँ तक आने तक भी।
एक बात बताओ इतना निकम्मा देश था तो इतना जीडीपी कहाँ से आया? अगर हम उतने ही गए-गुजरे गँवार और जाहिल लोग थे तो बोलो न, इतना धन, इतना उत्पाद कहाँ से आ रहा था? कहो? हाँ, सामरिक सामर्थ्य नहीं थी। ये ध्यान नहीं दिया था भारत ने कि सेना भी अपनी वित्तीय ताक़त के अनुपात में होनी चाहिए। आज अमेरिका को देखो, तो जितना उसका जीडीपी है उसी हिसाब से उसकी सेना भी है, ये उसने संतुलन बना कर रखा है। भारत ने ये संतुलन बनाकर नहीं रखा, और वजह ये थी कि भारत में कोई केंद्रीय सत्ता नहीं थी, बंटा हुआ था। तो सब राजों-रजवाड़ों की अपनी छोटी-छोटी सेनाएँ थी, तो कई दफ़े तो आपस में ही भिड़ रही होती थी।
और अभी मैं बात कर रहा हूँ विज्ञान की, गणित की, वित्त की, उत्पाद की, अर्थव्यवस्था और उद्योग की। कला की, काव्य की, साहित्य की तो अभी मैंने बात करनी शुरू ही नहीं करी। उन क्षेत्रों में भारत विश्व के सामने कहाँ खड़ा हुआ था, इसकी तो अभी मैंने चर्चा करनी शुरू ही नहीं करी। सैन्य ताक़त को छोड़कर के सब कुछ था यहाँ पर, और जो वो सब कुछ था वो जंगली, आदिम, अनपढ़, जाहिल शोषकों के पास नहीं होता।
हमको तो बताया जा रहा है कि भारत का इतिहास बस एक मूर्खतापूर्ण, क्रूरतापूर्ण, शोषण भर का इतिहास है। ऐसा नहीं हो सकता, ऐसा नहीं था।
तमाम साक्ष्य मौजूद हैं उन साक्ष्यों को छुपाया जाता है, दबाया जाता है, हमारे सामने नहीं लाया जाता है। हमारे सामने बस वो चीज़ें लाई जाती हैं जो हमें अपने ही प्रति और अपमानित कर दे और उन बातों को हमारे सामने बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर दिया जाता है और फिर कह रहा हूँ ये काम करने वाले विदेशी नहीं हैं। ये काम करने वाले इसी मुल्क के ज़्यादा पढ़े-लिखे लोग हैं, जो अपने आपको बुद्धिजीवी बोलते हैं।
एक चीज़ थी जो भारत में नहीं हुई, स्टीम-इंजन का आविष्कार और वो भी हम कह नहीं सकते कि नहीं ही होता। यूरोप का सारा औद्योगिकरण उसी इंजन की ऊर्जा से हुआ, और फिर तो कहानी आगे बढ़ती ही गई। पहले कोयला जलाकर भाप पैदा की जाती थी, जिससे ऊर्जा मिलती थी और मशीनें चलती थीं। फिर कोयले की जगह आ गया तेल और फिर तेल की भी छनाई होने लगी तो क्रूड से डिस्टल होकर रिफाइंड होकर और ज़्यादा वो शुद्ध रूपों में उपलब्ध होने लग गया। लेकिन जो कुल शुरुआत थी वो तो इतने से ही थी कि दिख जाए, कि जब पानी उबलता है तो भगौने के ऊपर का ढक्कन हिल जाता है। भाप में ताक़त होती है। इसी में पीछे रह गए और पीछे रहने का कारण भी था।
ऊर्जा की ज़्यादा ज़रूरत उन लोगों को पड़ती है, जहाँ लोग कम हों काम ज़्यादा हो। लोग कम हैं और काम ज़्यादा है तो आपको ऊर्जा चाहिए न? क्योंकि अब बाहुबल से काम नहीं चलेगा, मसल पॉवर से काम नहीं चलेगा। मसल पॉवर के अतिरिक्त आपको एक एडिशनल सोर्स ऑफ़ एनर्जी चाहिए। ऊर्जा का आपको एक अतिरिक्त स्रोत चाहिए। भारत में लोग इतने थे, कि उर्जा वहीं से आ जाती थी। कोई काम है, बीस लोग लगा दो। तुम उसमें करोगे क्या स्टीम-इंजन का? क्या करना है? गाड़ी खींचनी है? आओ रे! पूरा गाँव है।
भाई आवश्यकता ही तो आविष्कार की जननी होती है, यही बताया गया है न? भारत को आवश्यकता थोड़ी कम लग रही थी, पर आविष्कार हो जाता। आवश्यकता भर से ही आविष्कार नहीं होते हैं। उत्सुकता से भी होते हैं, और भारत में उत्सुकता की कभी कमी नहीं रही है, भारत महाजिज्ञासु रहा है। भारत ने ऐसी-ऐसी चीज़ों में जिज्ञासा कर ली, ऐसे-ऐसे सवाल पूछ लिए जिनकी ओर कभी किसी का ध्यान ही नहीं जाता था। कौन था पश्चिम में जिसने ये पूछा हो कि "मन के आगे भी कुछ है क्या?" पश्चिम तो आज तक इस सवाल का उत्तर पाना छोड़ो, ये सवाल भी ढंग से नहीं पूछ पाता। वो ये प्रश्न ही नहीं उच्चारित कर पाते की मन के आगे क्या है? वो कहते हैं कुछ नहीं है। वो डर जाते हैं सवाल ही सुनकर। भारत के बुद्धिजीवी भी ये सवाल ही सुन के डर जाते हैं कि मन की भी सीमा है, बुद्धि एक बिंदु से आगे नहीं जा सकती।
भारत ने आगे का भी देखा, अंदर का भी देखा। भारत ने तो ये भी जिज्ञासा कर ली की बुद्धि शुरु कहाँ से होती है? क्या बुद्धि पर बुद्धि लगाई जा सकती है? क्या मन स्वयं अपना दृष्टा बन सकता है? भारत ने ये प्रश्न तक पूछ डाला। पश्चिम अभी भी ये प्रश्न नहीं पूछ पा रहा। तो जब इतना कौतूहल से भरा और इतना जिज्ञासु था भारत, तो ऐसा नहीं होता कि विज्ञान से संबंधित, भौतिकी से संबंधित, रसायनों से संबंधित कुछ मूलभूत प्रश्न भारत नहीं पूछता। बहुत बड़ा भारत था, बहुत आबादी थी, कोई-न-कोई उठता जो इन सवालों को पूछता, खोज करता। कर ही रहे होंगे खोज, हमें क्या पता? हम कैसे कह सकते हैं भारत में कोई नहीं था जो भाप की ताक़त को समझ गया हो। कि भारत में कोई नहीं था जिसको ये समझ में आया हो की पदार्थ से मिलने वाली ऊर्जा का उपयोग करके बड़े-बड़े कारखाने चलाए जा सकते हैं। अब वो सब बातें पता नहीं चलेगी। उन तथ्यों को कभी लिखा नहीं गया, कभी संग्रहित नहीं किया गया, वो इतिहास विलुप्त हो चुका है। विलुप्त भी हो चुका है और बहुत लोगों का स्वार्थ है इसमें कि वो इतिहास खोया ही रहे।
आज का आम हिंदुस्तानी अपनी अस्मिता के प्रति बड़ी शर्म से भरा हुआ है। उस दिन कह रहा था न मैं, 'आनंदिता' हो कोई उसको बड़ा भला लगता है, उसे 'एंडी' बना दो तो। ये एक तरह का कन्वर्जन है, समझना! एक तरह का पहचान परिवर्तन है, अगर धर्म परिवर्तन न कहें तो। धर्म परिवर्तन वग़ैरह करो तो, हो-हल्ला होता है, शोर मचता है, विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं, तो चुपके चुपके अपनी पहचान बदल दो। ‘आनंदिता’ से 'एंडी' बन जाओ। चुपके चुपके कुछ और हो जाओ। क्यों? क्योंकि बड़ी शर्म आती है, ये कोई नाम है आनंदिता? इस नाम से तो ग़रीबी की, और अशिक्षा की, और पिछड़ेपन की दुर्गंध आती है, छी! "आई एम 'एंडी'। मैं कौन हूँ? एंडी।
हम अपनी पहचान दफ़न कर देना चाहते हैं क्योंकि हमें हमारी पहचान के बारे में बड़े दुराग्रहों से भरा गया है। बहुत कम लोग होंगे जिन्हें उनके शुद्ध, भारतीय, सांस्कृतिक नामों से पुकारा जाता हो। ये विशाल बैठा है, ये विशि है। और ख़ासतौर पर आपके जो क़रीबी लोग हों, कोई इनकी प्रेयसी हों, गर्लफ्रेंड तो वो तो इनको विशाल बोलने से रहीं। वो विशि भी नहीं विशु बोलेगी। कोई भी अपना नाम बताना ज़रा, मैं अभी बता दूँगा कि तुम्हारा कन्वर्टेड नाम क्या होगा? ये कन्वर्जन ही चल रहा है। बताओ। पुनीत, पुन्नी या पोनी या पोन्स। एक बार तुमने पुनीत को पोन्स बना दिया, तुम्हें लग रहा है अब हिंदी बोलेगा वो? अब वो गुजिया में नहीं केक में गर्व महसूस करेगा। अब वो भजन नहीं कैरल गाएगा। और इसलिए नहीं कि उसे ईसा मसीह से प्यार है। ईसा मसीह से प्यार मुझे है पर मैं भजन भी गाता हूँ। मैं भजन ही गाता हूँ, मैं कैरल नहीं गाता, जबकि जीज़स से प्रेम है मुझको।
लेकिन तुमको ईसा से कोई लेना-देना नहीं। लेकिन तुम गुजिया से दूर हो जाओगे और तुम केक की तरफ़ भागोगे। आंकलन है कि भारत में क्रिसमस, राखी से ज़्यादा बड़ा त्यौहार बन चुका है। और जब मैं ये कह रहा हूँ तो सुनो, मूर्खतापूर्ण निष्कर्ष मत निकाल लेना। मुझे न क्राइस्ट से कोई आपत्ति है, न क्रिस्चियन से, न क्रिसमस से। बाइबल को गुनता हूँ और जीज़स से प्रेम करता हूँ। लेकिन तुम क्रिसमस की ओर इसलिए नहीं जाते हो क्योंकि तुम्हें क्राइस्ट से प्यार है, तुम क्रिसमस की ओर इसलिए जाते हो क्योंकि वो तुमको बड़े लोगों का त्यौहार लगता है।
जानते हो ये जो 'बड़ा लोग' है, इससे मुझे क्या याद आया? अंग्रेजों के जमाने में, गँवार हिंदुस्तानियों को कहा जाता था कि 25 दिसंबर को मनाओ, ये बड़ा दिन है। उस त्योहार का नाम ही रखा गया था, 'बड़ा दिन' और उसके आसपास छुट्टियाँ कर दी जाती थीं क्योंकि उन्हीं दिनों यूरोप में छुट्टियाँ की जाती थीं। तो स्कूली बच्चे बोलते थे "बड़े दिन की छुट्टियों पर नानी के घर जाएँगे।" बड़े दिन की छुट्टी भाई! बड़े लोगों का त्यौहार बड़ा दिन ही तो कहलाएगा और हम लोग कौन हैं? हम छोटे लोग हैं! हम छोटे लोग हैं!
हम छोटे है नहीं हमें उनके ख़िलाफ़ विद्रोह करना नहीं आता जो हमारे सर पर पाँव रखकर हमको छोटा महसूस करने पर मजबूर कर रहे हैं। और मैं फिर कह रहा हूँ वो काम आज अंग्रेज नहीं कर रहे, वो काम आज के बुद्धिजीवी कर रहे हैं। इनसे बचो, जो अंग्रेजी का आसरा लेकर के तुम्हारे सर पर चढ़ते हैं। जिनके पास न बुद्धि है, न बोध, पर उनके पास बहुत सारी अंग्रेजी है। और वो चढ़े हुए हैं तुम्हारे ऊपर अंग्रेजी बोल-बोल कर और अंग्रेजी लिख-लिख कर। और तुम दबे हुए हो उनके सामने क्योंकि तुम तुम्हें लगता है जहाँ अंग्रेजी है उधर ही ताक़त है, भीतर एक अजीब-सी हीनभावना बैठ गई है।
मैंने देखा, एयरपोर्ट पर एक महिला एक वेटर के साथ बहस कर रही थी और मूर्खतापूर्ण तर्क था महिला का। बहस चलती रही, वेटर कुछ बोल रहा है, महिला कुछ बोल रही है। वेटर सम्मान के साथ ही बोल रहा था जैसा उसको प्रशिक्षण मिला होगा। जब महिला ने देखा कि दो-तीन मिनट हो चुके हैं और वेटर की बात काटी नहीं जा रही तो महिला ने मार दिया ब्रह्मास्त्र, धड़-धड़ा के अंग्रेजी में कुछ बोला, वो भी वो वाली अंग्रेजी (जिसमें एक भी शब्द समझ नहीं आता), अब वेटर बेचारा नेस्तो-नाबूत हो गया। अब उसके पास कुछ नहीं बचा।
ये हाल हर हिंदुस्तानी के साथ किया गया है। तुम्हें अंग्रेजी के सामने नतमस्तक होने के लिए मजबूर किया गया है। तुम उनसे कभी ठसक के साथ कह ही नहीं पाते कि "जो भी बोल रहे हो, ज़रा देसी में बोलो। बात का पूरा जवाब मिलेगा; पर ज़रा देसी में बोलो।" तुम्हें पता है वो नहीं बोलेंगे, क्यों? उन्हें आती नहीं। उन्हें शर्म आनी चाहिए कि वो न हिंदी बोल सकते हैं न लिख सकते हैं, उल्टे तुम्हें शर्म आने लग गई है हिंदी को लेकर के।
और जो हमने पहली बात की चर्चा करी थी कि भौतिक सफलता को हिंदी से काट दिया गया है, डिस्कनेक्ट कर दिया। वो पहला बिंदु वास्तव में इस दूसरे बिंदु के कारण ही है। पहले हमें मानसिक रूप से हिंदी को त्यागना सिखाया गया, फिर हमने भौतिक जगत में सफलता से भी हिंदी को काट दिया। हिंदी उठेगी भी तभी जब हिंदुस्तानी उठेगा। और हिंदुस्तानी के उठने से मेरा मतलब ये नहीं है कि हिंदुस्तानी के पास रुपया-पैसा आ जाए। दमन आंतरिक है, दमन मानसिक है तो फिर विद्रोह भी मानसिक होना चाहिए। दमन में जो मूल अस्त्र है, दमन का जो मूल तर्क है वो ये है कि तुम नालायक हो, तुम नाक़ाबिल हो, तुम कुछ नहीं हो। तुम्हारी जात ही ख़राब है। हमसे कहा जाता है, हिंदुस्तान ने विश्व को दिया ही क्या है?
एक बड़े विद्वान हैं, एक बड़ी भारतीय यूनिवर्सिटी के। वो कह रहे हैं, "भारत से विश्व को जो कुल एक चीज़ मिली है तो वो है बौद्ध धर्म, उसके अलावा दुनिया को देने के लिए भारत के पास कुछ रहा नहीं है। बड़ी ही भद्दी और बेकार जगह रही है, भारत। यहाँ से दुनिया को कुछ नहीं मिला।” ये आदमी बेवकूफ़ नहीं है, ये आदमी मक्कार है। इसको मानसिक सुधारगृह में भेजा जाना चाहिए। ये झूठा आदमी है और ये बहुत बड़ा अपराध कर रहा है ये 1.4 अरब लोगों को हीनभावना से भर रहा है। देखो मैं झूठे आत्मविश्वास की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं जिंगोइज़्म की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उग्रवादी राष्ट्रीयता की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं तथ्य को तथ्य की तरह जानने की बात कर रहा हूँ, मैं झूठ को नकारने और सच को स्वीकारने की बात कर रहा हूँ।
किसी आदमी को उसी की मिट्टी के प्रति, उसी की खाल के प्रति, उसी के खून के प्रति, उसी के पुरखों के प्रति, उसी की पहचान के प्रति, हीनभावना से भर देना बहुत बड़ा अपराध है।
इस अपराध की सजा मिलनी चाहिए और ख़ासतौर पर जब वो अपराध नासमझी में न हुआ हो एक सोची-समझी साज़िश के तहत हुआ हो। जानते हो हिंदी वालों को, मैं एक बार फिर से स्पष्टीकरण दूँगा, जब मैं कहूँ हिंदी वाला तो उसमें शामिल है पंजाबी वाला भी, कश्मीरी वाला भी, बंगाली वाला भी, असमिया वाला भी, उड़िया वाला भी, मलयालम वाला भी, सब शामिल हैं।
भारत का अपराध ये रहा है, कि भारत ने जीवन की कुछ सच्चाइयाँ जानी हैं, जो उन सच्चाइयों को जान ले वो ख़तरनाक हो जाता है, उसको दबाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। जानते हो भारत में कौन सी सच्चाई जानी है? भारत ने जान लिया है कि ये जो पूरा विश्व ही है न, ये जो पूरा भौतिक संसार का जो पूरा पसार है, यही कितना सार और कितना निःसार है। ये भारत ने जाना है, और जो ये बात जान ले, वो उन लोगों के लिए बड़ा ख़तरा हो जाता है जो संसार को ही भोगने और चाटने के लिए लालायित होते हैं। बात समझ में आ रही है कुछ?
एक जवान आदमी, जवानी की हसरतों के साथ और कामनाओं, उन्मादों और वृत्तियों के साथ खड़ा हुआ है भोग-विषयों की एक बड़ी दुकान के सामने। उस दुकान में भोगने के जितने विषय हो सकते हैं, सब मौजूद हैं। खाने का चाहिए? मिलेगा। पहनने का चाहिए? मिलेगा। औरत चाहिए? मिलेगी। आदमी चाहिए? मिलेगा। पैसा चाहिए? मिलेगा। इज़्ज़त चाहिए? मिलेगी। रोमांस चाहिए? मिलेगा। बड़ी दुकान है सब मिलेगा। और उसके सामने एक जवान आदमी खड़ा हुआ है, ऐसा जवान आदमी जिसे अध्यात्म में, धर्म में कोई शिक्षा नहीं मिली है। शरीर से जवान हो गया है, मन से शिशु है — अज्ञानी। और वो लालायित हो रहा है बार-बार अंदर जाने को। दुकानदार उससे कह रहा है, आ भीतर आ, और अपनी जो भी जमा पूँजी है, अपना सर्वस्व है, सब इधर देता जा। भोगने को जो चाहता है, मै दूँगा।
और इस जवान गोरे आदमी के बगल में एक लंबा है, तगड़ा है, गोरा है, आकर्षक है, अरे! अपनी भाषा में कहें तो अंग्रेज़ है। भाई, जवान, गोरा, लंबा, आकर्षक, माने अंग्रेज़। इसके बगल में खड़ा हुआ है एक प्रौढ़ उम्र का, साधारण-सा दिखने वाला, दुबला-पतला, मझोले कद का, साँवला-सा, गेरुए वस्त्र धारण किया हुआ किसान। किसानी करते हुए संन्यस्त है। किसान है, अपने घर का काम चलाता है, गेरुआ धारण करे है लेकिन। इस प्रौढ़ व्यक्ति ने दुनिया देखी है, ध्यान देखा है, भक्ति देखी है, जीवन को समझता है। जितनी बार ये जवान अंग्रेज़ भोग की उस दुकान में घुसता है, उतनी बार ये कहीं से प्रकट हो जाता है, गेरुआ किसान, ज़्यादा बोलता नहीं, बस मुस्कुरा देता है।
उसको अंदर के खाने-पीने में आसक्ति हुई जा रही है जवान आदमी को। ये बाहर मौज में बैठकर सत्तू फेंट रहा है, फिर ज़रा-सी उसमें मिर्च डालता है और स्वाद ले-लेकर चटखारे भरता है। और फिर गाता है, “मन लागो यार फ़क़ीरी में।” हमारे जवान अंग्रेज़ के सामने बड़ी दुविधा है। उसे इतना तो समझ में आ रहा है कि कोई राज़ है, जो ये प्रौढ़ गैरिक वस्त्र धारण किए किसान को पता है। लेकिन भीतर उसे जो भोग-माया दिखाई दे रही है, उसकी तो बात ही निराली है। और हमारा ये देसी ताऊ बड़ा मस्त-मौला है, बोलता कुछ नहीं, बस कुछ गा देता है। कभी कबीर साहब का कोई दोहा बोल दिया। जाने किस मिट्टी से आया है, जहाँ के पुराणों में कहानियाँ ही कहानियाँ भरी हैं, कभी कोई छोटी-सी कहानी बोल दी। बड़ी दिक़्क़त हो रही है दुकान को भोगने में, बड़ी दिक़्क़त हो रही है।
गेरुए की उपस्थिति ही घातक है, अगर तुम्हारा इरादा जीवन को अज्ञान और भोग में बिताने का है। गेरुए की उपस्थिति घातक है, बहुत घातक। क्योंकि गेरुआ दुनिया को जानता है, संसार को जानता है, भोग के यथार्थ को जानता है। वो तुम्हें चैन से भोगने नहीं देगा, क्योंकि वो ख़ुद नहीं भोगता। ये नहीं कि वो तुम्हारे हाथ पकड़ लेगा, ये नहीं कि वो बल प्रयोग करेगा। वो तुम्हें दिखा देगा बस कि सत्तू फेंट करके भी “जो सुख पायो राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।” अब अंदर पैसों की दुकान नए-नए तरीक़े बताए जा रहे हैं समृद्धि के, और ये कह रहा है, “जो सुख पायो राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।”
हमारे हैंडसम नौजवान के लिए बड़ी दिक़्क़त हुई जा रही है, और जब दिक़्क़त बहुत बढ़ जाती है तो वो मुड़ता है उस किसान की ओर और बोलता है, है क्या तेरे पास? दिखा। वो बोलता है, हाथ में कुंडी और बगल में सोटा, और चारों दिशा जागीरी में। वो कहता है, अच्छा, हाथ में कुंडी, बगल में सोटा, और मेरे पास ये है (हाथ से बंदूक की तरह इशारा करते हुए) फ्रेंच मेड। और जब वो ये दिखाता है तो वो और हँसता है, और हँसता है। बोलता है, लूट लो। वो लूट ही लेता है। और जितना वो लूटता जा रहा है, उतना वो हँसता जा रहा है, हँसता जा रहा है।
लूटना बहुत ज़रूरी है। जब तक उसे लूटा नहीं, जब तक उसे दबाया नहीं, जब तक उसे अपमानित नहीं किया, तब तक चैन से भोग नहीं सकते। वो जो गेरुआ है, वो व्यक्ति नहीं है, वो एक ज़बरदस्त सिद्धांत है। वो ऐसा सिद्धांत है, जो अगर ज़िंदा रह गया तो किसी अज्ञानता को, किसी मूर्खता को जीने नहीं देगा। अज्ञान को, मूर्खता को, भोग को और लिप्सा को अगर जीना है तो गेरुए को मारना बहुत ज़रूरी हो जाता है। गेरुए को पददलित करना, अपमानित करना बहुत ज़रूरी हो जाता है। और वो अपना निकालता है फ्रेंच पिस्तौल। हँसे ही जा रहा है न वो पगला। उसके ख़ोपड़े में दाग देता है। और मरते-मरते भी बोल रहा है — “अयमात्मा ब्रह्म।” काँप गया है एक बार को तुम्हारा हैंडसम गोरा।
वो मरते-मरते भी बोल रहा है, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता, तीर बींध नहीं सकता, वो हूँ मैं, सोऽहम्। पर मार तो दिया ही उसको, अब वो मर गया अब आराम से नाचो। भीतर ज्ञान भी बहुत है, कौन-सा ज्ञान? भौतिक ज्ञान, सांसारिक ज्ञान। अब भोगो जो भोगना है, भोगो।
अगर अहंकार का वर्चस्व स्थापित करना है तो भारत को अपमानित करना बहुत ज़रूरी हो जाता है। और जब मैं भारत कह रहा हूँ, भूलिएगा नहीं मैं किसी राजनैतिक इकाई की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं किसी सामाजिक इकाई की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं किसी विशेष धर्म-पंथ समुदाय की भी बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उस चित्त की बात कर रहा हूँ, जो सत्य का पारखी है क्योंकि वो चित्त ही भारत की असली पहचान है, बाक़ी सब बातें एक तरफ़।
भारत की कोई पहचान बचनी नहीं है, भारत की कोई पहचान भारत के काम नहीं आएगी। भारत की वास्तव में एक ही पहचान है असली — अध्यात्म।
जब मैं कहूँ भारत तो मेरा मतलब है, अध्यात्म। जब मैं कहूँ गेरुआ तो मेरा मतलब है, अध्यात्म।
चलो उन्होंने तोड़ दिया, मरोड़ दिया, अपमानित कर दिया। हम अपनी नज़रों में क्यों गिर गए भाई? उनका तो स्वार्थ था ये सिद्ध करने में कि हम गिरे हुए, जलील लोग हैं। हम क्यों अपनी नज़रों में गिर गए? बोलो। हम क्यों अपने जीवन को, अपने इतिहास को, अपनी भाषा को उनकी नज़रों से देखने लगे? और आज तो वो प्रकट रूप से हमारा कोई बड़ा नुकसान कर भी नहीं रहे, कर भी रहे हैं तो कम ही, कर सकते हैं। आज तो हमारा नुकसान करने वाले हम ही लोग हैं, हमारे ही भीतर बैठे हुए हैं वो लोग, जो हमें भीतर से नीचा दिखाते हैं, भीतरघाती।
बात कुछ समझ में आ रही है? कि क्यों हमारे अवचेतन में हिंदी के विरुद्ध दुराग्रह बैठ गया है? कि क्यों किसी भी दफ़्तर में, किसी भी औपचारिक अवसर पर, फ़ॉर्मल ऑकेज़न पर हिंदी बोलते हमारी ज़ुबान में गाँठ पड़ जाती है? तुम कोशिश करो, बोल ही नहीं पाओगे। करो कोशिश। बड़ी दिक़्क़त आने वाली है।
एयरपोर्ट पर चेक-इन करने जाना और वहाँ कोशिश करना शुद्ध हिंदी में काउंटर पर बैठे सज्जन या देवी जी से बात करने की। तुम कहोगे, अरे शुद्ध हिंदी क्यों? तुम शुद्ध अंग्रेज़ी नहीं बोलते क्या? और जब शुद्ध अंग्रेज़ी बोलते हो तो तुम्हें बड़ा अच्छा लगता है, लगता है न? नए-नए शब्द तुम अपनी वोकैब्युलरी में जोड़ते रहते हो ताकि तुम्हारी अंग्रेज़ी और ऊँची और शुद्ध होती रहे। अंग्रेज़ी को तुम बढ़ाना चाहते हो, अंग्रेज़ी के अपने शब्दकोश का विस्तार करना चाहते हो। और हिंदी में अगर सही शब्द बोल दें तो तुम बोलते हो, दूरदर्शन की भाषा क्यों बोल रहे हो साहब? अंग्रेज़ी शुद्ध होती चले तुम्हारी तो बड़े प्रसन्न होते हो और हिंदी को तुम चाहते हो कि विकृत और भ्रष्ट ही रखो। ये क्या तर्क है बताओ मुझे?
विमान में एयर-होस्टेस को देवी जी कहकर मैं क्यों नहीं बुला सकता? और बुलाऊँ तो तुम्हारी हँसी क्यों छूट जाती है? जवाब दो। अंग्रेज़ी में जब तुम्हें किसी शब्द का अर्थ नहीं पता होता, तुम तत्काल डिक्शनरी खोलते हो। खोलते हो कि नहीं? और उस शब्द को तुम अपने कोश में जोड़कर गौरवान्वित हो जाते हो। तुम कहते हो, ये देखो, आज एक और नया शब्द हमने जोड़ लिया। और इतना ही नहीं, लोगों पर रुतबा जमाने के लिए नए-नए सीखे हुए शब्द का झटपट कहीं प्रयोग भी कर आते हो, कि भाई वसूलना भी तो है। नया-नया शब्द सीखा है, तो किसी को अगर बेवकूफ़ बोलना है तो उसको बेवकूफ़ नहीं बोलोगे, उसे बोलोगे, बर्ड-ब्रेन, डिम-विट, मुरॉन, ओफ़। बेवकूफ़ बोलने में क्या रखा है, सीधे बोल दिया फूल। दस-बारह रंग-बिरंगे शब्द होने चाहिए न, उससे ज़रा सिक्का जमता है, प्रभाव पड़ता है भाई।
और हिंदी में अभी मैं अगर तुमको बोलूँ, इधर आ रे मंदबुद्धि। तो तुम कहोगे, ये देखो फिर इनकी आकाशवाणी शुरू हो गई। मंदबुद्धि क्या होता है? अभी बोलूँ, हे विकृत-मना। तो तुम कहोगे, ये अभी सीधे-सीधे रामायण से ही लैंड कर रहे हैं। विकृत-मना में तुम्हें बड़ी आपत्ति है और डिम-विट तुम्हें बड़ा सहज लगता है। तुम्हें समझ में नहीं आता कि तुम बुरे तरीक़े से बर्बाद किए जा चुके हो।
जो बात बोल रहा हूँ, एक-एक पर लागू होती है कि नहीं? तुमसे कोई अंग्रेज़ी बोले और उसके शब्द तुम्हें समझ में न आए तो तुम्हें लगता है, तुम्हारी ग़लती। क्योंकि वो तो अंग्रेज़ी बोल रहा है, तुम्हें नहीं पता तो किसकी ग़लती? तुम्हारी ग़लती। और तुम किसी से हिंदी बोलो, उसको हिंदी समझ में न आए तो उसकी ग़लती नहीं होती, बोलने वाले की ग़लती होती है। ये क्या अन्याय है भाई?
तुमसे कोई अंग्रेज़ी बोले, तुम्हें उसका कोई शब्द समझ में नहीं आया। तुम शर्म से गड़ जाओगे ये कहने में, कि नहीं जी, मैं डेलिंक्वेंट शब्द का अर्थ नहीं जानता, बताइए। तुम कहोगे, अरे राज़ खुल गया, मैं इतना गँवार हूँ, मुझे डेलिंक्वेंट जैसे साधारण शब्द का अर्थ नहीं पता। वो बोलना चाह रहा था अपराधी, वो क्रिमिनल भी बोल सकता था, पर वो भी रुतबेदार आदमी है भाई, वो कैसे बोल दे अपराधी।
वो तुमसे ये भी बोल सकता है, ट्राइ टू अंडरस्टैंड। नहीं, इससे पहले वो बोल सकता था, समझ जाओ। नहीं, समझ जाओ नहीं बोलेगा। वो ट्राइ टू अंडरस्टैंड भी नहीं बोलेगा। वो तुमसे बोलेगा, रैप योर हेड अराउंड दिस। इसके इर्द-गिर्द अपना ख़ोपड़ा लपेटो। वो नहीं बोलेगा, प्लीज़ अंडरस्टैंड भी। और जब वो तुमसे बोलेगा, रैप योर हेड अराउंड दिस, तो तुम शर्म से गड़ जाओगे, क्योंकि तुम्हें इस मुहावरे का अर्थ ही नहीं पता। तुम्हारी ग़लती हुई।
और यही तुम उससे बोलो, अल्लाह मियाँ की गाय हो बिल्कुल, और उसको समझ में ना आए, तो ग़लती तुम्हारी होगी। “ये देखो, ये पिछड़े हुए की मध्यकालीन भाषा लेके आ गए। ना जाने कहाँ-कहाँ के जुमले-मुहावरे उठा के बोल रहे हैं। अल्लाह मियाँ की गाय। ये क्या होता है अल्लाह मियाँ की गाय? अरे हिंदी बोलो भाई, हिंदी। ये कौन-सी भाषा है, अल्लाह मियाँ की गाय।” अरे गँवार, तुझे मतलब नहीं पता किसी मुहावरे का तो तुझे शर्म नहीं आ रही, उल्टे तू मुझसे बोल रहा है कि मैं अपनी भाषा सुधारूँ। बात समझ में आ रही है?
बाजा बज चुका है। जो इतनी हीनभावना से ग्रस्त हो, वो मुल्क, वो क़ौम, वो जात, वो समुदाय, वो लोग कैसे आगे बढ़ेंगे? आध्यात्मिक रूप से तो छोड़ दो, वो भौतिक रूप से भी आगे नहीं बढ़ पाएँगे। अंग्रेज़ी के आगे इतने घुटने टेक करके मिला क्या गया? जिन क्षेत्रों को तुम बोलते हो कि तुम्हारी अर्थव्यवस्था के सनराइज़ सेक्टर्स हैं, उनमें भी पता है ना भारत की जगह क्या है? क्या मिल गया? बात करते हो, आईटी, आईटीएस, सॉफ़्टवेयर। सॉफ़्टवेयर में बड़ी प्रतिष्ठा है क्या भारत की? जितना बैक-रूम का काम होता है, वैल्यू-चेन में जो सबसे नीचे का काम होता है, वो हिंदुस्तानियों को मिल जाता है। और वो काम मिलने में भी अक्सर यही रहता है कि अपना इधर-उधर का ओछा काम, कचरा काम इनके सुपुर्द कर दो, आउटसोर्स कर दो। सस्ते में कर देंगे। आईटी-कुलीज़।
कुछ अपवाद हैं, बेकार का तर्क मत करना। ये मत कहने लग जाना कि नहीं देखो ये जो भी है, मूर्ख प्रशांत झूठ बोल रहा है। मुझे एक स्टार्टअप एंटरप्रेनल कंपनी पता है जो बहुत हाई-वैल्यू एडेड काम करती है। दो-चार अपवादों की बात मत करो। ये जो लाखों भारतीय आईटी सेक्टर में लगे हैं, ये किस तल का काम कर रहे हैं, जानते नहीं हो क्या? और चाहे मैन्युफ़ैक्चरिंग हो, तुम कहते हो कि भारत को मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बना रहे हो। डिज़ाइन का काम भारत में हो रहा है? तो ये अंग्रेज़ी-अंग्रेज़ी करके भी भौतिक रूप से क्या पा गए? हाँ, रोटी पा जाओगे। विश्व के क्लर्क बन जाओगे। इसमें तुम्हें अगर बड़ी ख़ुशी मिलती हो तो कर लो भाई। ये जो लोग अपनी भाषा की ही इज़्ज़त नहीं कर सकते, कहाँ आगे बढ़ेंगे? आध्यात्मिक रूप से नहीं, भौतिक रूप से भी नहीं आगे बढ़ेंगे।
भारत को पुनर्जागरण चाहिए, रेनेसाँ। हमें सुधार नहीं चाहिए, रिफ़ॉर्म नहीं चाहिए। हमें रेनेसाँ चाहिए। हमें अपने आप पर यक़ीन करना सीखना होगा।
हज़ार सालों तक मिली सामरिक हारों ने और झूठे इतिहासकारों ने, इन दोनों ने मिलकर हमें भीतर से बिल्कुल पंगु कर दिया है, छलनी-छलनी कर दिया है। हम टूट गए हैं, हम चूरा-चूरा हो गए हैं। हम ऐसे हो गए हैं जैसे कोई बस रोटी के लिए जिए।
बड़ा बुरा बदला लिया गया भारत के साथ, भारत चला था दुनिया को अध्यात्म सिखाने। दुनिया ने बड़ा करारा बदला लिया, दुनिया ने भारत को अध्यात्म भुला दिया। दुनिया ने कहा, तू हमें अध्यात्म सिखाने आया है? विश्वगुरु! तू हमारे भोग-विलास, हमारी लिप्साओं, हमारे अहंकार, हमारी वृत्तियों में खलल डालेगा? देख हमारा बदला, तू हमें क्या सिखाएगा अध्यात्म? हम तुझे अध्यात्म भुला देंगे।