वेदान्त का राष्ट्रवाद से क्या सम्बन्ध? क्या राष्ट्रवाद विषैला नहीं?

“क्या राष्ट्रवाद एक बीमारी ही नहीं है?” उस सवाल को अब आप ज़रा दूसरे तरीके से रखिए। वो सवाल ये है, कि क्या आदमी और आदमी के संबंध बीमार नहीं हैं? तो होगा राष्ट्र दस करोड़ लोगों का, चाहे सौ करोड़ लोगों का, लेकिन उसके केंद्र में तो उसके एक-एक सदस्य की, व्यक्ति की आत्म-परिभाषा बैठी हुई है। जो आप अपने बारे में सोचते हैं, उसी आधार पर आप दूसरे संबंध बनाते हैं, और उसी आधार पर फिर आप व्यापक, विस्तृत तौर पर एक राष्ट्र खड़ा कर लेते हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: डॉक्टर अनूप कुमार मिश्र, एसोसिएट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, डीएवी पीजी कॉलेज, वाराणसी से। नमस्ते।
स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिकता को पाश्चात्य विज्ञान से एकाकार करने का सपना देखा था। वो मानते थे कि अध्यात्म और विज्ञान का मेल स्वाभाविक है। उसी तरह आप अद्वैत वेदान्त को राष्ट्रवाद की नींव बनाना चाहते हैं। आपके अनुसार ऊँचे से ऊँचा मानव आदर्श है वेदान्त, और एक देश का एक आदर्श की नींव पर टिके होना ही सच्चा राष्ट्रवाद है। कृपया इस बात को और स्पष्टता से समझाएँ, ताकि हम शिक्षक, प्राध्यापक इत्यादि भी गहराई से इस पर मनन करें।
आचार्य प्रशांत: एक मायने में डॉक्टर मिश्र का ये प्रश्न पिछले प्रश्न से ही संबंधित है, तो हम उसी बात को आगे बढ़ाते हैं।
देखिए, दो लोगों को संबंधित तो होना ही है। एकदम बुनियादी बात करते हैं। लोग रह रहे हैं, एक साथ रह रहे हैं, तो वो एक-दूसरे से कुछ रिश्ता-नाता तो रखेंगे ही रखेंगे। हम कैसा रिश्ता रखना चाहते हैं दूसरे से? किस आधार पर संबंधित होना चाहते हैं? निश्चित रूप से हम आधार ऐसा चाहते हैं, जिस पर चलकर शांति बनी रहे, दोनों पक्षों के लिए और पूरे जगत के लिए बात कल्याण की हो। वो संबंध शुभ हो सबके लिए। है न?



