
प्रश्नकर्ता: डॉक्टर अनूप कुमार मिश्र, एसोसिएट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, डीएवी पीजी कॉलेज, वाराणसी से। नमस्ते।
स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिकता को पाश्चात्य विज्ञान से एकाकार करने का सपना देखा था। वो मानते थे कि अध्यात्म और विज्ञान का मेल स्वाभाविक है। उसी तरह आप अद्वैत वेदान्त को राष्ट्रवाद की नींव बनाना चाहते हैं। आपके अनुसार ऊँचे से ऊँचा मानव आदर्श है वेदान्त, और एक देश का एक आदर्श की नींव पर टिके होना ही सच्चा राष्ट्रवाद है। कृपया इस बात को और स्पष्टता से समझाएँ, ताकि हम शिक्षक, प्राध्यापक इत्यादि भी गहराई से इस पर मनन करें।
आचार्य प्रशांत: एक मायने में डॉक्टर मिश्र का ये प्रश्न पिछले प्रश्न से ही संबंधित है, तो हम उसी बात को आगे बढ़ाते हैं।
देखिए, दो लोगों को संबंधित तो होना ही है। एकदम बुनियादी बात करते हैं। लोग रह रहे हैं, एक साथ रह रहे हैं, तो वो एक-दूसरे से कुछ रिश्ता-नाता तो रखेंगे ही रखेंगे। हम कैसा रिश्ता रखना चाहते हैं दूसरे से? किस आधार पर संबंधित होना चाहते हैं? निश्चित रूप से हम आधार ऐसा चाहते हैं, जिस पर चलकर शांति बनी रहे, दोनों पक्षों के लिए और पूरे जगत के लिए बात कल्याण की हो। वो संबंध शुभ हो सबके लिए। है न?
तो वो कौन-सा आधार है, जिसको मान करके दो लोग सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च तरीके से संबंधित हो सकते हैं? प्रश्न ये है। और वो आधार है, आत्मा; वो आधार है, सच्चाई। क्योंकि कोई भी संबंध जो झूठ की नींव पर बनता है, उसमें स्वार्थ ज़रूर होता है।
आदमी का पहला झूठ होता है, उसका अपना ‘मैं’। जहाँ से आगे और न जाने कितने झूठ फूटते हैं। पहला झूठ होती है हमारी भावना कि ‘मैं हूँ, मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ।’ उसको झूठ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि उसमें कोई सातत्य, कोई नित्यता नहीं होती है। ऋषियों ने सत्य की कसौटी यही बताई थी, जो चीज़ समय के साथ बदल जाए उसको झूठ जानना। क्योंकि जो चीज़ समय के साथ बदल गई है, वो भरोसे के क़ाबिल नहीं है; उसके साथ रहकर चैन-शांति नहीं पा सकते। तो उसको सच नहीं मानना। वो चीज़ अभी ऐसी दिख रही है; समय बदलेगा, थोड़ी देर में कुछ और हो जाएगी। और उस चीज़ पर भरोसा करके आपने कुछ निर्णय ले लिए, कुछ निवेश कर दिए, तो फिर आप न घर के रहोगे न घाट के। आपकी तो बुनियाद ही हिल जाएगी।
तो पहला झूठ तो ये ‘मैं’ की भावना होती है। और हम दूसरे से संबंधित कैसे होते हैं? मेरा अपने ‘मैं’ पर बड़ा विश्वास है, ठीक है? ‘मैं कुछ हूँ,’ और ऐसा मेरी मान्यता है। साथ-ही-साथ तुम्हारी भी कुछ मान्यता है कि तुम कुछ हो। मैं जैसा भी मानता हूँ अपने-आप को, उसमें कोई पूर्णता तो है नहीं। क्योंकि अहंकार में कोई पूर्णता हो ही नहीं सकती। कोई व्यक्ति अपने-आप को क्या कुछ ऐसा मानता है, जिसमें कोई बदलाव, कोई सुधार की ज़रूरत न हो? हर व्यक्ति अपने-आप में कुछ बदलना चाहता है, कुछ जोड़ना चाहता है। क्यों? हर व्यक्ति बेहतर हो जाना चाहता है।
क्यों? क्योंकि हमने अपनी जो मान्यता रखी होती है, जो आत्म-छवि रखी होती है, जो आत्म-परिभाषा रखी होती है, वो होती ही अपूर्ण है। आप अपने-आप को कुछ भी मानिए, ऊँचे से ऊँचा मानिए, तो भी आपकी मान्यता में अपूर्णता होगी निहित। तो मैं भी अपने-आप को अधूरा मान रहा हूँ, आप भी अपने-आप को अधूरा मान रहे हो, और संबंध हम दोनों बनाना चाह रहे हैं। तो निश्चित रूप से वो संबंध स्वार्थ का ही संबंध होगा न। मेरा स्वार्थ ये होगा कि मैं आपका उपयोग करके अपने-आप को आंतरिक रूप से पूर्ण कर लूँ। आपका स्वार्थ होगा कि आप मेरा इस्तेमाल करके अपने-आप को आंतरिक रूप से पूर्ण कर लें।
तो जब भी झूठे ‘मैं’ के आधार पर संबंध बनेगा, उसका अंजाम दुख होगा, हिंसा होगी, अलगाव होगा। तमाम तरह के नरक उसमें से उपजेंगे।
तो फिर हम संबंध कैसे बनाएँ? शायद संबंध बनाने का आपस में शुभ तरीका यही है कि ‘मैं’ के आधार पर संबंध न बनाए जाएँ। ‘मैं’ के आधार पर जो संबंध बनाया जाता है, वो कहलाता है, द्वैतवादी संबंध। ठीक है न? वो कहलाता है, स्वार्थवादी संबंध। जहाँ पर दो आधे एक-दूसरे के सामने खड़े होकर ये आशा कर रहे होते हैं कि वो मिल जाएँगे तो पूरे हो जाएँगे। और ऐसा कभी होता नहीं है। जहाँ तक संबंधों की बात है, वहाँ आधा और आधा जब आपस में क्रिया करते हैं, तो एक नहीं हो जाते। आधा और आधा जब वहाँ आपस में क्रिया करते हैं, तो एक-चौथाई हो जाते हैं।
तो अगर कोई द्वैतवादी आधार है दो लोगों के आपस में संबंधित होने का, तो उससे हमनें कहा निश्चित रूप से क्या फलित होगी? हिंसा और दुख।
अब वो जो दो लोग हैं, वो दो करोड़ या दो सौ करोड़ लोग भी हो सकते हैं। वो पूरा एक राष्ट्र भी हो सकता है, या वो पूरा एक विश्व भी हो सकता है। ये लोग आपस में किस आधार पर जुड़े हुए हैं? अगर वो आधार ही शुभ नहीं है, तो किसी के जीवन में कौन-सा शुभ उतरेगा? इसलिए किन्हीं भी दो लोगों के मध्य जो संबंध है, वो अद्वैत पर आधारित होना चाहिए, ऐसा मैं कहता हूँ। और मेरा मानना है कि जो असली भारतीय राष्ट्र है, उसकी बुनियाद में अद्वैत वेदान्त ही है। क्योंकि अगर अद्वैत नहीं है, तो फिर किसी भी राष्ट्र का लाभ क्या, फिर तो कुनबा बनेगा एक और वो कुनबा कैसा होगा, जिसमें अंतर्कलह भी होगी। आपस में भी उसके लोग एक-दूसरे का सर फोड़ रहे होंगे। और उस कुनबे के होने का दुनिया में कुल प्रयोजन ये होगा कि दुनिया के बाक़ी सब लोगों से लड़ाई-झगड़ा करते रहो।
इस तरह के देश आप बहुत देखते हैं, कि नहीं देखते हैं? जहाँ पर भले लोगों के पास खाने को न हो, विद्यालय न हों, अस्पताल न हों, लेकिन वहाँ का सैन्य बजट ज़बरदस्त रहता है। जीडीपी का, सकल घरेलू उत्पाद का 4% होगा, 5% होगा। और कुछ मुल्क ऐसे हैं? जहाँ तानाशाही है, वहाँ 10-20% तक हो जाता है, बीच-बीच में। ऐसे देशों के अस्तित्व का कुल प्रयोजन ही क्या होता है? दूसरों से लड़ाई-झगड़ा। वो दूसरों से भी सर फुटव्वल करते हैं, और उनमें आंतरिक स्थिति क्या रहती है? लगातार भीतर गृहयुद्ध जैसे हालात बने रहते हैं। ये नतीजा होता है गलत राष्ट्रवाद का।
गलत राष्ट्रवाद से मेरा क्या आशय है? ऐसा राष्ट्र, जो खड़ा ही हुआ है एक गलत बुनियाद पर। और मैं कह रहा हूँ, द्वैतवादी सारी बुनियादें ऐसी ही होती हैं। इसीलिए तो फिर बहुत सारे विद्वान लोगों ने राष्ट्रवाद को बड़ा ज़हरीला माना है। ख़ासतौर पर विश्वयुद्धों के बाद, और उनसे थोड़ा पहले से भी जो पश्चिमी विचारक हुए हैं, आप उनसे पूछेंगे तो वो कहेंगे कि नैशनलिज़्म इज़ अ बिग प्रॉब्लम।
भारत में ही रवीन्द्रनाथ ठाकुर से लेकर के वर्तमान समय तक बहुत विचारक हैं, बुद्धिजीवी हैं, जो कहते हैं कि राष्ट्रवाद न जाने कितनी समस्याओं की जड़ है। उनकी बात पूरी तरह गलत नहीं है, बल्कि उनकी बात 99% सही ही है। क्योंकि 99% राष्ट्र खड़े ही ऐसे आधारों पर हैं कि उनका होना ही हिंसा है। इसलिए ज़रूरी है कि राष्ट्र की बुनियाद में सही मूल्य, सही आदर्श, सही सिद्धांत बैठा हो। कौन-सा मूल्य होगा वह? कौन-सा आदर्श? कौन-सा सिद्धांत? मैं कह रहा हूँ, अद्वैत वेदान्त। और जब तक वो नहीं है राष्ट्र की जड़ में, तब तक राष्ट्र किसी की भलाई नहीं कर सकता, न अपने नागरिकों की, न शेष विश्व की। भय का, असुरक्षा का और हिंसा का ही माहौल रहेगा।
समझ में आ रही है बात?
तो चाहे दो लोग हों, दो मित्र हो सकते हैं, माँ-बेटा हो सकते हैं, पति-पत्नी हो सकते हैं, भाई-बहन हो सकते हैं; उनके मध्य भी संबंध तभी शुभ, कल्याणकारी और शांतिप्रद होगा जब वो आधारित अद्वैत पर है। और चाहे एक पूरा जन-समुदाय हो एक सौ चालीस करोड़ लोगों का, उनके भी आपसी संबंध तभी परस्पर कल्याणकारी हो सकते हैं, जब उनमें अद्वैत का भाव हो।
अद्वैत वास्तव में कोई भावना नहीं होता। जब मैं कह रहा हूँ ‘अद्वैत का भाव’, तो उससे मेरा आशय बस ये है कि हम छुपे हुए द्वैत के प्रति सजग, सचेत रहें। द्वैत का मतलब ही है, विखंडन। कुछ टूटा हुआ है, कुछ कटा हुआ है। कुछ है जो अभी बाक़ी है। कुछ शेष रह गया, कुछ अधूरा, अपूर्ण रह गया; बड़े आधे-अधूरे हैं हम। यही तो सब द्वैत का मूल है। बात समझ में आ रही है? और जहाँ हमारे अपने बारे में ये विचार हैं कि हम आंतरिक रूप से अपूर्ण हैं, और इसी बात को हमने सत्य मान लिया है, वहाँ हमने अपने जीवन को ख़ुद ही नारकीय बना लिया।
देखिए, इन दो बातों में अंतर करना ज़रूरी है, डॉक्टर मिश्र। एक बात तो ये है कि मेरे जीवन का तथ्य ये है कि तमाम तरह की अशुद्धियाँ, विकार और अपूर्णताएँ मुझमें प्रवेश कर गई हैं। ये जीवन का तथ्य हो सकता है आपके, factuality; कि मैंने असावधानी में, अपनी अचेतना में न जाने कैसी-कैसी धारणाओं को अपने भीतर स्थापित कर लिया है, जिनके कारण मैं बड़ा अपूर्ण अनुभव करता हूँ। ये एक बात हुई।
और दूसरी बात ये कहना कि मैं तो हूँ ही आधा-अधूरा, ये बिल्कुल दूसरी बात है। पहली बात में आप ये कह रहे हैं कि मेरा तथ्य है अपूर्णता, पर वो मेरा सत्य नहीं है, सत्य मेरा कुछ और है। ये जो तथ्य है ये तो एक अपघात है, एक दुर्घटना है। कुछ समय के लिए ये आ गया है, एक समयबद्ध विकार है। समय के साथ आया है; समय के साथ मैं इसको हटा भी सकता हूँ।
सत्य तो वो है न, जो आता, न जाता; जो है बस है। उसको हटाया नहीं जा सकता। और वो जो सत्य है, वो मेरी पूर्णता है, जो सब अपूर्णताओं के मध्य भी प्रकाशित है।
समझ में आ रही है बात?
जो आच्छादित तो है, पर बंधक नहीं; जो अदृश्य तो है, पर अस्तित्वहीन नहीं। ये सच्चा और सही तरीका है अपने बारे में जानने का। ये सही दृष्टि है अपने आप को देखने की। और जो दूसरी दृष्टि होती है, वो कहती है, कि मैं एक 37 वर्षीय पुरुष हूँ, जिसने जीवन में इतना ज्ञान, इतनी उपलब्धियाँ अर्जित की हैं; जिसके पास इतना धन है, और जिसको अभी पाने- कमाने के लिए इतनी चीज़ें शेष हैं। और ये जो मैंने अभी वक्तव्य दिया, यही मेरी सच्चाई है।
अगर आपने इस वक्तव्य को अपनी सच्चाई बना लिया, तो मैं आपसे निवेदन करके कह रहा हूँ कि आपने अपने साथ बड़ा अन्याय कर लिया।
बात समझ रहे हैं?
अब आप किसी के साथ संबंध भी बड़े क्रूर, बड़े हिंसक तरीके से रखेंगे। क्योंकि आपके अनुसार आप कौन हैं? आप वो हैं, जिसको अभी जीवन में इतना मिला है और इतना पाना शेष है। तो अब आगे आप जो भी कुछ कर रहे हैं, वो कर किस लिए कर रहे हैं? जो बचा है पाने को, उसको पाने के लिए। माने आप किसी से संबंध भी बना रहे हैं, तो सिर्फ़ एक प्रयोजन से बनाएँगे, क्या? कुछ पाना शेष है। ये हिंसा हो गई न? ये बात हुई दो लोगों की। मैंने कहा, ये बात बाप-बेटे की भी हो सकती है, दो मित्रों की भी, पति-पत्नी की भी।
जो भी संबंध गलत आत्मज्ञान के साथ बनेगा, वो संबंध विनाशकारी होगा, दुखदायी होगा। भारतीय राष्ट्रीयता का आधार आत्मज्ञान को ही होना पड़ेगा। और ये मैं कोई बहुत ऊँचे और कोरे सिद्धांत की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं बहुत व्यावहारिक बात कर रहा हूँ। क्योंकि अगर आत्मज्ञान नहीं है संबंधों का आधार, तो जीवन जीने लायक़ नहीं है। फिर देश रहने लायक़ नहीं है। फिर हम हैं ही क्यों, दुख भोगने के लिए सिर्फ़ क्या?
कुछ आ रही है बात समझ में? स्पष्ट हो रहा है?
प्रश्नकर्ता: अपेक्षा मिश्रा, बीएचयू से। अल्बर्ट आइंस्टाइन कहते थे कि नैशनलिज़्म इज़ एन इन्फ़ैन्टाइल डिज़ीज़। इट इज़ द मीज़ल्स ऑफ़ मैनकाइंड।
राष्ट्रवाद एक इनफ़ेंटाइल, बालकपने की बीमारी है। जैसे बच्चों को चेचक हो जाता है न, वैसे ही सब मानवता को लग जाने वाला, शैशव-काल में ही चेचक है राष्ट्रीयता।
मुझे मालूम है कि आइंस्टीन किस आधार पर इस बात को कहा करते थे। लेकिन फिर भी इस समय देश में, भारत में, जिस तरह का सांप्रदायिक माहौल है, आपको नहीं लगता कि ये बात हम पर भी, भारत पर भी लागू होती है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, बिल्कुल आप सही कह रही हैं, अपेक्षा। राष्ट्र, जैसा अभी हम बात करते हुए आ रहे हैं, किसी आदर्श पर आधारित होता है न। राष्ट्र के बुनियाद में कोई सूत्र, कोई सिद्धांत होना चाहिए न। वो सिद्धांत जितना सच्चा होगा, राष्ट्र उतना भला, अच्छा और शुभ होगा। और राष्ट्र के बुनियाद में ही जो सिद्धांत है, अगर वो झूठा है, मायावी है, तो वो राष्ट्र निस्संदेह एक बीमारी की तरह ही होगा, जैसा आइंस्टीन कहा करते थे।
अभी थोड़ी देर पहले ही मैंने कहा कि बहुत विचारकों और बुद्धिजीवियों ने राष्ट्रवाद को बड़ी बीमारी मानकर उसकी खूब निंदा करी है। और जिस राष्ट्रवाद की उन्होंने निंदा करी है, मैं सहमत हूँ उनसे कि वो निंदा-योग्य ही है। क्योंकि दुनिया के अधिकांश राष्ट्र खड़े ही हैं बड़े बीमार आधारों पर।
अब आधार ये है किसी राष्ट्र का, कि साहब, हम एक नस्ल हैं जो इस ज़मीन पर, इस क्षेत्र पर पिछले पंद्रह सौ सालों से रह रहे हैं, तो हम एक राष्ट्र हो गए। ये आप क्या कर रहे हो? ये आप कह रहे हो, कि आप माने वो जो व्यक्ति हैं उस राष्ट्र के, वो सिर्फ़ देह हैं। क्योंकि आपने अपनी परिभाषा ही बड़े लौकिक, बड़े पार्थिव आधार पर रख दी है न। आप कह रहे हो कि हम एक नस्ल हैं। नस्ल किस चीज़ की होती है? देह की होती है न। वी आर अ रेस। रेस किस चीज़ की होती है? कॉन्शियसनेस की होती है? चेतना की होती है?
तो ये जो नस्ल है या जातीयता है, ये तो होती हुई पूरी तरीके से दैहिक है न। तो जैसे ही आपका राष्ट्र रेस पर, नस्ल पर, जाति पर आधारित हुआ, वैसे ही उस राष्ट्र के सब व्यक्तियों ने अपने-आप को क्या घोषित कर दिया? कि हम तो शरीर भर हैं।
अब सोचिए, जिस राष्ट्र के सब लोगों ने घोषित कर दिया कि हम शरीर भर हैं, उस राष्ट्र में क्या संबंध हो जाएगा माँ-बेटे का, क्या संबंध हो जाएगा स्त्री-पुरुष का सब क्या है? सब क्या हैं सिर्फ़? देह है। माने सब क्या हैं सिर्फ़? जानवर-मात्र हैं। देह के लिए ही जिएँगे। प्रकृति का शोषण करेंगे, एक-दूसरे का शोषण करेंगे। एक आदमी दूसरे आदमी से कोई भी रिश्ता सिर्फ़ इसलिए रखेगा कि मैं इससे कुछ लाभ निकाल सकूँ। क्योंकि जहाँ आपने अपने-आप को देह मान लिया होता है, वहाँ आपने अपनी घोर, दुखदायी अपूर्णता को मान्यता दे दी होती है।
और वो जो दुख होता है, वो आपको ऐसा सालता है कि उसके पार जाने के लिए आप कुछ भी कर सकते हो। क्या करोगे कुछ भी? भीतर देखने की तो दृष्टि नहीं, तो बाहर ही करोगे जो भी करोगे। बाहर क्या करोगे? बाहर यही करोगे, नोच-खसोट, लूट-पाट। और यही करते हैं देश। जब मैं देश कह रहा हूँ, तो मेरा अर्थ है वो देश जो किसी राष्ट्रीयता पर आधारित है। बात समझ में आ रही है?
राष्ट्र ही जब एक राजनैतिक चोला पहन लेता है, तो क्या कहलाता है? देश। राष्ट्र और देश में अंतर यही होता है कि राष्ट्रों के पास सरकारें नहीं होतीं। राष्ट्रों के पास संबंध होते हैं, एक सामुदायिक भावना होती है। पर देश के पास राजनैतिक सत्ता और सरकार होती है। समझ में आ रही है बात?
तो आप जो सवाल पूछ रही हैं, कि “क्या राष्ट्रवाद एक बीमारी ही नहीं है?” उस सवाल को अब आप ज़रा दूसरे तरीके से रखिए। वो सवाल ये है, कि क्या आदमी और आदमी के संबंध बीमार नहीं हैं? बिल्कुल बीमार हैं। राष्ट्र का मतलब हुआ, सौ करोड़ लोगों में जो परस्पर बाँधने वाला सूत्र है। तो सौ करोड़ की बात क्यों करें, किन्हीं दो लोगों की बात क्यों न कर लें। कि उन दो लोगों को परस्पर बाँधने वाला सूत्र क्या है? और फिर दो लोगों की बात भी क्यों करूँ? क्योंकि वो दो लोग भी एक-दूसरे के साथ संबंध तो उसी आधार पर रख रहे हैं न, जो आधार उनकी आत्म-परिभाषा का है।
तो होगा राष्ट्र दस करोड़ लोगों का, चाहे सौ करोड़ लोगों का, लेकिन उसके केंद्र में तो उसके एक-एक सदस्य की, व्यक्ति की आत्म-परिभाषा बैठी हुई है। जो आप अपने बारे में सोचते हैं, उसी आधार पर आप दूसरे संबंध बनाते हैं, और उसी आधार पर फिर आप व्यापक, विस्तृत तौर पर एक राष्ट्र खड़ा कर लेते हैं।
चूँकि ज़्यादातर लोग अपने बारे में ही ठीक नहीं जानते। इसीलिए आगे बढ़कर के ज़्यादातर राष्ट्र भी ठीक नहीं होते। राष्ट्र की इकाई क्या है? एक व्यक्ति। वही राष्ट्र की इकाई है न। जब व्यक्ति ही गलत जानता है अपने-आप को, तो उसी तरह के बहुत सारे व्यक्तियों का जो एक समुदाय है, जो अपने-आप को राष्ट्र बोलता है, वो समुदाय कैसे ठीक हो जाएगा। एक आदमी गलत, दूसरा आदमी गलत, तीसरा आदमी गलत, चौथा आदमी गलत, पाँचवाँ आदमी गलत, और इस तरीके के अगर पचास करोड़ लोग मिल जाएँ या पचास लाख लोग मिल जाएँ, तो वो सही हो जाएँगे?
एक आदमी गलत है, पाँच आदमी गलत हैं, पचास आदमी गलत हैं, पाँच हज़ार आदमी गलत हैं, ये संख्या बढ़कर अगर पचास करोड़ हो जाएगी, तो अपने-आप सही हो जाएगी, क्या? बल्कि जब ये संख्या बढ़कर के करोड़ों में हो जाएगी, तो मामला और ज़्यादा विस्फोटक हो जाएगा। स्थिति और भयावो हो जाएगी। इसलिए राष्ट्रवाद ज़हरीला रहा है, क्योंकि दुनिया में आत्मज्ञान की हमेशा कमी रही है।
पर हम दुनिया के राष्ट्रों की बात कर रहे हैं यहाँ पर, भारतीय राष्ट्र की नहीं। भारतीय राष्ट्र का मैंने कहा, आधार ही आत्मज्ञान है। तो राष्ट्रीयता ज़हरीली है अगर उसकी बुनियाद में आत्मज्ञान नहीं है।
भारतीय राष्ट्रीयता ज़हरीली नहीं है उस दिन तक, जिस दिन तक उसकी बुनियाद में अध्यात्म है, धर्म है, आत्मज्ञान है।
और मैं जब धर्म कह रहा हूँ, तो मेरा आशय धर्म के बाहरी अवयवों से नहीं है। धर्म से मेरा आशय समुदाय से नहीं है। धर्म से मेरा आशय न समुदाय से है, न संप्रदाय से है; धर्म से मेरा आशय सत्यता से है। सच को जानने की आपकी उत्सुकता कितनी है, सत्य के लिए आप समर्पित कितने हैं, मूल्य कितना बड़ा चुका सकते हैं। इसको मैं धार्मिकता कहता हूँ।
अगर ये धार्मिकता एक व्यक्ति की आत्म-परिभाषा का आधार है, दो लोगों के संबंधों का आधार है, और एक राष्ट्र के सब लोगों के परस्पर संबंधों का आधार है, तो वो राष्ट्र निश्चित रूप से शुभ होगा। हाँ, अल्बर्ट आइंस्टीन ने ऐसा कोई राष्ट्र कभी देखा नहीं था। तो अपनी जगह वो जो कह रहे हैं, वो बात बिल्कुल ठीक है। उन्होंने कौन-सा राष्ट्र देखा था? उन्होंने देखा है जर्मनी। उन्होंने देखा था फ़्राँस। उन्होंने देखा था इटली। वो ब्रिटेन देख रहे थे। वो ऑस्ट्रिया-हंगरी देख रहे थे। वे रूस देख रहे थे।
और इन सब जगहों की राष्ट्रीयता की बुनियाद खोखली थी, और इसलिए ज़हरीली थी। ओशविट्ज़ के गैस-चैंबर्स में जो ज़हरीली गैस यहूदियों पर डाली जा रही थी, वो ज़हरीली गैस कोई रसायन मात्र नहीं था। वो ज़हरीली गैस आदमी का आंतरिक अज्ञान था।
हम चूँकि ख़ुद को नहीं जानते, इसीलिए हमें ये नहीं पता कि दूसरे और हम में साझा क्या है। जो मुझ में भी है और तुम में भी है, और जो तब भी रहेगी जब न मैं रहूँगा, न तुम रहोगे, उसको आत्मा कहते हैं। जो आत्मा को नहीं जानता, उसको तो दुनिया में सिर्फ़ भेद और अलगाव और पार्थक्य ही दिखाई देगा। फिर क्या ताज्जुब है कि एक आदमी कहे, कि “ये जितने दूसरे समुदाय के लोग हैं, यहूदी लोग हैं, ये सब दुश्मन हैं मेरे; इनसे जी-तोड़ मेहनत कराओ, इनकी हत्या करो; और फिर हज़ारों-लाखों में, जब ये किसी काम के न हों, तो इनको गैस-चैंबर्स में डालकर इनको ख़त्म कर दो।”
समझिए तो बात को, वो जो ज़हर है वो आ कहाँ से रहा है? वो ज़हर आदमी के अंदर से आ रहा है। आदमी के अज्ञान से आ रहा है। जो राष्ट्र इस अज्ञान पर खड़ा है, वो राष्ट्र किसी के लिए कैसे शुभ होगा? फिर तो कोई ताज्जुब नहीं कि विश्व युद्ध होंगे, होंगे ही होंगे। क्योंकि आदमी के अंदर युद्ध चल रहा है। आदमी अपने ही प्रति हिंसक है।
एक इंसान अपने प्रति बड़े से बड़ा अन्याय क्या कर सकता है? वो यही है कि वो अपने ही बारे में अनभिज्ञ रहे। आप ख़ुद को नहीं जानते, आप इससे बड़ी क्या क्रूरता करोगे अपने साथ। तो जब आप भीतर से ज़बरदस्त कष्ट में होते हो, तो आपको फिर कोई दुख नहीं होता, कोई लाज नहीं आती दूसरे को भी कष्ट देते हुए। आप कहते हो, मेरे साथ भी तो लगातार बुरा ही-बुरा हो रहा है न। मैं भीतर से इतना तड़प रहा हूँ। तो बाहर भी अगर दूसरे लोग तड़प रहे हैं, तो उसमें बुराई क्या है, गलत किया है। ये तो हो ही रहा है। मेरे साथ हो रहा है, सबके साथ हो रहा है, हो। बात समझ में आ रही है?
तो सतर्क रहना है अपेक्षा। एक ओर तो हमें ये समझना है कि अधिकांश राष्ट्रवाद निश्चित रूप से रुग्ण होता है और विषैला होता है, क्योंकि उसकी बुनियाद ही गलत होती है। दूसरी ओर हमें ये भी समझना है कि भारतीय राष्ट्र अपवाद रहा है और अगर हम होश में रहें तो अपवाद रह सकता है।
भारतीय राष्ट्र एक बहुत ही स्वस्थ बुनियाद पर खड़ा रहा है। और वो जो स्वस्थ बुनियाद है, वो आत्मा की है, आत्मज्ञान की है, अध्यात्म की है, धर्म की है। जिस दिन तक हमारा राष्ट्र उस बुनियाद पर खड़ा है, ये राष्ट्र अशुभ नहीं है। और राष्ट्र अशुभ होंगे तो होंगे, और राष्ट्र रुग्ण होंगे तो होंगे। भारत राष्ट्र रुग्ण नहीं, अशुभ नहीं, पर साथ में शर्त संलग्न है। शर्त ये है कि हमें वो बुनियाद निरंतर स्मरण रहे।
वो बुनियाद साझी सहूलियत की नहीं है। सोशल कॉन्ट्रैक्ट की नहीं है, कि हम और आप तो साथ इसलिए हैं ताकि कुछ आपका लाभ हो सके, कुछ हमारा लाभ हो सके। अगर भारत राष्ट्र भी ऐसी किसी बुनियाद पर खड़ा है, तो फिर वो दूसरे राष्ट्रों से अलग नहीं हुआ। फिर दूसरे राष्ट्र अगर ज़हरीले हैं, तो भारतीय राष्ट्र भी ज़हरीला हो जाएगा, जो कि बहुत हद तक हो भी रहा है अब।
लेकिन अगर भारतीय राष्ट्र अध्यात्म की बुनियाद पर खड़ा है, तो सनातन रहेगा, चिरकाल तक अमर रहेगा। भारतीयों के लिए भी शुभ होगा और समस्त विश्व के लिए भी कल्याणकारी होगा।
तो ये मत कह दीजिए, कि देखिए, सब राष्ट्र गलत होते हैं। राष्ट्रीयता का तो सिद्धांत ही गलत है। ये कहिए कि राष्ट्रीयता का जो सही सिद्धांत है, उसकी खोज होनी चाहिए। राष्ट्रवाद के सही आधार की खोज होनी चाहिए।
आपने प्रश्न अंग्रेज़ी में पूछा है, तो अंग्रेज़ी में ही कहते हैं न, डोंट थ्रो द बेबी आउट विद द बाथवॉटर। भूसा है बहुत सारा, लेकिन उसके बीच में एक हीरा पड़ा हुआ है। भूसे के साथ-साथ हीरे को भी फेंक मत दीजिएगा। सफ़ाई ज़रूरी है, भूसा हटाइए, पर हीरे की क़द्र करिए।
आपने लिखा है, “भारत में भी अब माहौल बड़ा ज़हरीला हो रहा है। सांप्रदायिकता इत्यादि सिर उठा रहे हैं।”
वो इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि गलत शिक्षा के चलते, अज्ञान-प्रद शिक्षा के चलते, भारतीय भूलते ही जा रहे हैं कि उनका आधार क्या है। अब तो विश्ववाद है न, तो हम भी आंतरिक और सांस्कृतिक और वैचारिक तलों पर वैसे ही होते जा रहे हैं जैसे शेष विश्व के लोग हैं। तो जैसी फिर उनकी दुर्गति है, जैसा उनके समाजों में विघटन दिखाई देता है, वैसा ही फिर अब हमारे यहाँ दिखाई देगा।
अगर कुछ भारत में वैसा ही होता दिखाई दे, नकारात्मक, हानिप्रद, जो दुनिया के और देशों, मुल्कों में आपको दिखाई दे रहा है, तो इसका मतलब यही समझ लीजिएगा कि भारत अपने-आप को भुलाकर के बहुत ज़्यादा दूसरे देशों जैसा ही होता जा रहा है। इसीलिए जो बीमारियाँ वहाँ पाई ही जाती थीं, वो अब यहाँ भी पाई जा रही हैं।
उसका इलाज फिर ये नहीं है कि जो इलाज उन्होंने करे, वही इलाज हम भी अपना लें। यूरोप के लिए बिल्कुल आवश्यक है कि वो राष्ट्रवाद को बीमारी समझे, क्योंकि यूरोपियन राष्ट्रों के पास राष्ट्रवाद की कोई सच्ची अवधारणा है ही नहीं। तो वो बिल्कुल ठीक कर रहे हैं, कि साहब, हमें तो धीरे-धीरे करके अपनी सीमाओं को भूलना है, यूनियन बनानी है, एक होना है। यूरोपियन नेशनलिज़्म ने तो दो विश्व-युद्धों को जन्म दिया और कुछ नहीं। वे भूलना चाहें अपनी सीमाओं को, बिल्कुल शुभ है। लेकिन भारतीय अगर कहें कि हम भी भूलना चाहते हैं कि हम भारतीय हैं, तो ये बात, ग़ौर करिएगा, शुभ नहीं है।
क्योंकि भारत कोई भौगोलिक-राजनैतिक इकाई भर नहीं है। भौगोलिक और राजनैतिक दृष्टि से तो भारत न जाने कितने आकार-प्रकार लेता रहा शताब्दियों तक। हम इसकी चर्चा कर चुके हैं। कभी यहाँ पर सैकड़ों रजवाड़े हैं, कभी किसी बाहरी हुकूमत का शासन है, कभी विदेशी सत्ता है। तो ये सब तो यहाँ चलता ही रहा। लेकिन उन सबके नीचे एक आम, अनपढ़, अशिक्षित भारतीय भी कुछ जीवन की बुनियादी बातें जानता था, और उन पर जान देकर भी अमल करता था।
जब तक हमें वो बातें याद रहेंगी, जब तक हमें जीवन के उन मूलभूत सिद्धांतों की क़द्र रहेगी, तब तक भारत राष्ट्र शुभ ही शुभ है। अन्यथा तो फिर जो हाल बाक़ी राष्ट्रों का हुआ, वही हमारा होना है। सजग रहिए।