भारत राष्ट्र मूलतः वेदान्त के ऊँचे मूल्यों पर आधारित है। जिसे भारत कहते हैं — यह महान तो है ही, लेकिन खतरे में भी है। जो हिस्से भारत से अलग हो गए, इतिहास पर नज़र डाल लो कि उनके साथ क्या हुआ। बामियान (अफ़गानिस्तान) में बुद्ध की प्रतिमाएं थीं, जिन्हें तालिबान ने बम से उड़ा दिया। धर्म, कला, संस्कृति और विचार की ऊँची से ऊँची उड़ान — यह सब बहुत बढ़िया है; लेकिन इन सबको सुरक्षा और संरक्षण चाहिए। और एक संयुक्त सेना ही वह सुरक्षा दे सकती है।
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आचार्य प्रशांत: अनिल ठाकुरी और अनिकेत तमराकर से दो अलग-अलग प्रश्न हैं, जिनको संयुक्त कर दिया गया है। कह रहे हैं कि हाल में आपका वीडियो सुना, शीर्षक था:
"वेदांत के ज्ञान से, सेना के सम्मान तक।"
मेरे मन में कई प्रश्न उठ रहे हैं। पहला, देशों की और ज़मीन के भौगोलिक बँटवारे की ज़रूरत क्या है? इन बँटवारों का कारण और परिणाम — सेनाएँ हैं, और फिर युद्ध होते हैं, जिनमें ना जाने कितने लोग मारे जाते हैं, और संसाधनों का अपव्यय होता है। पूरी पृथ्वी को एक मानकर भी तो जिया जा सकता है, विश्वबंधुत्व की भावना से, और विश्वबंधुत्व तो देशप्रेम से कहीं आगे की बात हुई ना?
ये पहला प्रश्न है और अगला है कि — सेना तो सत्तासीन सरकार की ग़ुलाम होती है, बहुत सी सरकारें तो सेना को पेशेवर हत्यारों के रूप में भी इस्तेमाल करती हैं। ये हुई दूसरी शंका, और जिज्ञासा का तीसरा हिस्सा है कि — क्या सेना इत्यादि में विश्वास रखकर, और राष्ट्रवाद, देशप्रेम जैसी, भावनाओं को प्रश्रय देते हुए भी अध्यात्म में ऊँचा उठा जा सकता है?




