आप जब सोशल ओपननेस की बात आती है तब भी पीछे हो, और जब साइंटिफ़िक रिगर की बात आती है तब भी पीछे हो। और दोनों में आपके पिछड़े होने का कारण एक ही है — दर्शन का अभाव। और ये बात मुझे बहुत चुभती है क्योंकि पश्चिम में दर्शन ने जितनी भी ऊँचाई पाई है, उससे बहुत-बहुत-बहुत ज़्यादा ऊँचाई भारतीय दर्शन में मौजूद है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं एक सॉफ़्टवेयर कंपनी में कार्यरत हूँ, मेरा एक फ़्रेंड है जो हाल ही में यूरोप से आया है। तो उसने एक वीडियो दिखाया वहाँ की नदियों का और पर्यावरण का। तो वो बहुत सुव्यवस्थित है और स्वच्छ है, और कम्पैरिटिव्ली हम भारत में देखते हैं तो हालत बहुत ख़राब है।
मेरा सवाल ये है कि जब यही बात मैं आई.टी. में अपने दोस्तों से करता हूँ तो उनको बाहरी पहनावा तो चाहिए, वेस्टर्न कल्चर तो चाहिए, बाहरी पहनावा चाहिए, खान-पान भी चाहिए; पर जब उन्हीं का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनको अपनाना होता है या मैं बात करता हूँ उनसे या वुमन एम्पावरमेंट की बात करता हूँ, तो उसके लिए उनका बहुत अलग नज़रिया है। तो इसमें आप थोड़ा मार्गदर्शन करिए।
आचार्य प्रशांत: उनको मार्गदर्शन चाहिए, वो आएँ तो उनका करूँ। मैं क्या बोलूँ? अब वो हैं पगले, पड़ा रहने दो उनको, उनका कुछ नहीं हो सकता। वो सोच रहे हैं कि जो सम्पन्नता है पश्चिम की, वो ऐसे ही आसमान से आ गई है। तो ये सम्पन्नता ऊपर-ऊपर से ओढ़ लेंगे या आयात कर लेंगे। नहीं, वो सम्पन्नता आई है एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से।




