प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार। मेरा सवाल भारत देश के बारे में है कि मैं ये चीज़ नहीं देख पा रहा, अगर भारत आज से अपनी भाषा हिंदी और संस्कृति से जुड़ता है तो कैसे अन्य देशों के साथ कम्पीट (प्रतियोगिता) कर सकता है?
आचार्य प्रशांत: तुम क्या करते हो, जिसमें तुम अन्य देशों से कम्पीट करते हो?
प्र: जैसे आज के टर्म्स में तो जीडीपी के टर्म्स में ही बात होती है।
आचार्य: तुम अपना बताओ, अपना बताओ। तुम ऐसा क्या करते हो जिसमें तुम फ़्रांस से कम्पीट करते हो?
प्र: जी मैं तो नहीं करता, मैं तो जैसे!
आचार्य: तुम नहीं करते तो अपनी बात करो न। जिन्हें करना होगा वो सीख लेंगे अँग्रेज़ी, तुम क्यों अँग्रेज़ हुए जा रहे हो?
(व्यंग्यात्मक रूप से)बिजली विभाग में हैं, झारखंड में पोस्टिंग है और कह रहे हैं, मैं इंटरनेशनली कॉम्पिटीटिव (अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी) नहीं रह पाऊँगा। अबे! तू



